विश्व कप का असली हीरो...
विश्व कप समाप्त हो गया.....और ऑक्टोपस की डिश खाने की इच्छा रखने वालों को संतरे के जूस से संतोष करना पडा है..
कप ले गए पहली बार जीतने वाले स्पेन के खिलाड़ी लेकिन असली हीरो कौन है इस पर बहस की पूरी गुंजाइश है.
आप समझ गए होंगे मैं पॉल द ऑक्टोपस की बात कर रहा हूं. विश्व कप की ऐसी कोई ख़बर नहीं जिसमें पॉल का ज़िक्र न हो.
ट्विटर पर अमिताभ बच्चन से लेकर शशि थरुर, युवराज सिंह, करण जौहर और शेखर कपूर भी पॉल से प्रभावित हैं.
अमिताभ लिखते हैं जय पॉली बाबा की और युवराज सिंह कहते हैं पॉली तुसी ग्रेट हो. शेखर कपूर ट्विट करते हैं कि पॉल को अब हेज़ फंड मैनेजर की नौकरी ज़रुर मिल जाएगी...
वैसे फुटबॉल और खिलाड़ियों के अलावा विश्व कप के दौरान पॉल, वुवुजेला, पराग्वे की मॉडल (जो टीम जीतने पर बिना कपड़ों के दौड़ने वाली थीं) और माराडोना अधिक चर्चा में रहे.
मैचों की स्तर पर जाएं तो कुछेक मैचों को छोड़कर स्तर पर भी बहस हो सकती है.....लेकिन फिलहाल पॉल द ऑक्टोपस..
ऑक्टोपस अष्टावक्र की भांति विद्वान हैं और मात्र दो वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपने ज्ञान का पूरी दुनिया से (केवल भारतीय मीडिया नहीं) लोहा मनवाया है.
महान पॉल ने साबित कर दिया है कि पश्चिमी देशों में भी भविष्य जानने को लेकर उतनी की उत्कंठा है जितनी भारत या कथित रुप से पिछड़े देशों में. स्पेन को ही नहीं हम सभी को पॉल पर गर्व होना चाहिए.
कम से कम अब विकसित देश हमारी तरफ़ ऊंगली उठाकर नहीं कहेंगे कि भारत में लोग बड़े अंधविश्वासी होते हैं.
ये पॉल की बड़ी उपलब्धि है और कम से कम इस उपलब्धि के लिए ही सही उन्हें गोल्डन बूट दिए जाने चाहिए..हां वैसे सोने के आठ बूट देना मंहगा पड़ेगा मंदी के दौर में..
वैसे पॉल के लिए बहुत सारे कामों की सूची बन चुकी है. अगले चुनावों में बराक ओबामा जीतेंगे या नहीं...यूरोप मंदी से निकल पाएगा या नहीं...ओसामा बिन लादेन पकड़े जाएंगे या नहीं....अफ़गानिस्तान से विदेशी सेनाएं कब तक वापस आएंगी... भारत को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता मिलेगी या नहीं...
इन सारे सवालों का जवाब महान पॉल दे सकते हैं और हम सभी को आभारी होना चाहिए उस रेस्तरां का जिसने महान पॉल को शरण दी ताकि लोग आज फुटबॉल की बजाय उन पर अधिक चर्चा करने में लगे हुए हैं.
हां एक बात और.. पता चला है कि जानवरों के अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठन इस बात से नाराज़ हैं कि पॉल को उनकी सेवाओं का सही मुआवज़ा नहीं दिया जा रहा है.

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इस बार विश्व कप के दौरान खेल, खिलाडि़यों के साथ-साथ आक्टोपस बाबा की चर्चा भी हैरान करने वाली रही. इसे किस रूप में लिया जाए यह अलग बात है.
अब भारत भर के ज्योतिषी मिस्टर पॉल की उपलब्धि से जरुर जल-भुन रहे होंगे कि आखिर उनकी ज्योतिषी की दुकान का अब क्या होगा ? भारत के लोग अपने ज्योतिषियों को कोसना शुरू भी कर दें तो कोई आश्चर्य न होगा कि पॉल जैसी भविष्यवाणी उनके बारे में उनके ज्योतिष्यों ने आज तक नहीं की. मिस्टर पॉल के पीछे अपना भविष्य जानने के लिए अब लोगों की लंबी लाइन भी शायद लगनी शुरू हो जाए. वैसे भी पॉल के लिए एक लंबी सूची जैसा कि आपने कहा है भविष्य जानने के लिए तैयार की ही जा चुकी है. अब यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि ज्योतिषी के मैदान में एक प्रतिद्वंदी के आ जाने से भारत भर के ज्योतिषी अब क्या करते हैं. जय हो पॉल बाबा की!
सुशील जी, क्या खूब लिखा है आपने. सदियों से यूरोप के लोग भारत को अंधविश्वासी मानते रहे हैं, लेकिन आज वे खुद सबसे बड़े अंधविश्वास के घेरे में हैं. आपकी अंतिम पंक्ति पढ़ने से जानवरों की रक्षा करने वाले लोगों की असलियत पता चलती है.
पाल बाबा ने तो कमाल ही कर दिया. पहले जर्मनी को बाहर का रास्ता दिखाया, फिर स्पेन को दुनिया का सरताज दे दिया. लोग यह कह सकते हैं कि यह तो बस एक संयोग है लेकिन संयोग भी उन्हीं के साथ होता है जो कुछ योग्यता रखते हैं.
आखिर आपने भी अपना एक लेख पॉल के नाम कर ही दिया. मीडिया का भी तो दोष है इसको हवा देने में. पॉल एक प्रोडक्ट है और मीडिया ने उसे बेचा क्योंकि वो बिका. सबकी गलती है या फिर किसी की नहीं लेकिन पॉल की कत्तई नहीं. वो तो बस घोंघा खा रहा है.
ऑक्टोपस पॉल की भविष्यवाणी अगर सही साबित हो भी रही है तो यह सिर्फ एक संयोग है या फिर भगवान की माया है. इसके अलावे और कुछ नहीं. भविष्य कोई ऐसी चीज नहीं जिसके बारे में दावे से कुछ कहा जा सके. इसलिए हमें इस मामले में किसी भी तरह के अन्धविश्वास में नहीं पड़ना चाहिए और अपने भविष्य को भविष्य पर ही छोड़ देना चाहिए. पश्चिम के लोग भी अन्धविश्वास के मामले में हमसे अलग नहीं हैं, पॉल ने यह साबित कर दिया है.
ये कोरी अंधश्रद्धा है और कुछ नहीं.
यह लेख एक अच्छा व्यंग्य है या बौद्धिक दिवालियापन.
पॉल हो या कोई ज्योतिषी, यह केवल बहलाने के लिए ठीक लगता है. वास्तविकता तो यह है कि जिन्होंने मेहनत से अपनी कला का सही उपयोग किया वही जीते. न कि किसी की भविष्यवाणी...
सब हमारे अवचेतन का कमाल है, जर्मनी व हालैंड अपने अवचेतन में बैठे डर के कारण हार गये..........
पॉल बाबा सटोरियों के दिमाग़ की उपज है
पॉल बाबा ने तो अपना कर्तव्य निर्वाह सही से किया लेकिन इस चक्कर में कई टीमों को वक्त से पहले ही दुत्कार मिलनी शुरू हो गयी. मेरे ख्याल से अपने क्रिकेट के खेल के सट्टेबाज भी ईनाम के हक़दार हैं. कितनी मेहनत करते हैं बेचारे! जीता जिताया मैच हरवाना हो तो कोई इनसे सीखे. पॉल बाबा बेचारे ईमानदारी से काम करके अब तो रिटायर हो गए. चलो अच्छा हुआ न जाने कितने ही दुश्मन बेजान जीव के पैदा हो गए थे. पॉल बाबा को सलाम !
आक्टोपस पॉल ने स्पेन के जीतने की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी. यदि स्पेन हार जाता तो आक्टोपस पॉल की विश्वसनीयता भी खत्म हो जाती. दरअसल इस फाइनल मैच में स्पेन से ज्यादा आक्टोपस पॉल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी.
पाल बाबा द्वारा किया गया कार्य सराहनीय है लेकिन खिलाड़ियों की मेहनत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.