« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

कृष्णा क़ुरैशी बैठक

वुसतुल्लाह ख़ानवुसतुल्लाह ख़ान|शुक्रवार, 16 जुलाई 2010, 18:43 IST

कौन माई का लाल कहता है कि एसएम कृष्णा और शाह महमूद क़ुरैशी का वार्तालाप सफल नहीं रहा. पहली बार ऐसा हुआ कि एसएम कृष्णा इस्लामाबाद के बेनज़ीर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरे तो उन के स्वागत के लिए नया क़ालीन बिछाया गया.

दोनों विदेश मंत्रियों ने इस बात पर सहमति जताई कि डिनर में जो खाने परोसे गए वह स्वादिष्ट थे और इसी तरह से खानों से दोनों देशों के बीच विश्वास और बढ़ेगा.

जिस गाड़ी में शाह महमूद क़ुरैशी और एसएम कृष्णा राष्ट्रपति ज़रदारी और प्रधानमंत्री गिलानी से मिलने गए उस गाड़ी के एसी की ठंडक की मेहमान विदेश मंत्री ने प्रशंसा की और प्रस्ताव दिया कि इस तरह से एसी बनाने वाली फैकट्री में साझा निवेश में भारत और पाकिस्तान के बीच आर्थिक संबंधों को बढ़ावा मिल सकता है.

शाह महमूद क़ुरैशी ने श्री कृष्णा की भावनाओं की प्रशंसा करते हुए प्रस्ताव दिया कि इस परियोजना के लिए एमओयू की स्क्रिप्ट को अगली मुलाक़ात में डिस्कस किया जा सकता है.

जब दोनों विदेश मंत्री संयुक्त प्रेस कांफ़्रेस करने के लिए पाँच घंटे पत्रकारों को इंतिज़ार कराने के बाद मुस्कराते हुए हॉल में पहुँचे तो एक कर्मचारी ने मुझे एक कोने में ले जा कर बताया कि कृष्णा-क़ुरैशी बातचीत इसलिए लंबी हो गई क्योंकि इस में बहुत सा एजेंडा कवर किया गया.

मसलन जिस मेज़ के इर्द गिर्द दोनों प्रतिनिधिमंडल बैठे उस की बनावट विस्तार से डिस्कस की गई. कृष्णा जी यह भी जानना चाहते थे कि क़ुरैशी साहब चाय में दो चम्मच चीनी किस लिए डालते हैं.

उस अवसर पर क़ुरैशी साहब ने यह प्रस्ताव दिया कि अगली बार जब भी भारत और पाकिस्तान के डेलीगेशन मिलेंगे तो दोनों डेलीगेशन के लोग बग़ैर चीनी के चाय पिएँगे ताकि दक्षिण एशिया से ग़रीबी के ख़ात्मे के लिए ग़ैर-ज़रूरी ख़र्चों में कमी की शुरुआत हो सके.

मैंने उस कर्मचारी से कहा कि मगर हम तो समझ रहे थे कि मुंबई, कश्मीर, आतंकवाद, अफग़ानिस्तान, सियाचिन, सर क्रीक, न्यूक्लियर...... उस कर्मचारी ने मेरी बात काटते हुए कहा, ओहो... आप पत्रकार लोग जब भी सोचेंगे बुरा ही सोचेंगे... अरे भाई यह कोई डिस्कस करने की बातें हैं. हज़ार बार तो इन विषयों पर बात हो चुकी है. इंडिया को इस बारे में पाकिस्तान का पक्ष मालूम है और पाकिस्तान को इंडिया का. तो फिर समय बरबाद करने का क्या मतलब? भला डेडलॉक तोड़ने का इस से अच्छा एजेंडा और क्या हो सकता था जो कृष्णा क़ुरैशी ने डिस्कस किया.....

हाँ, तो मैं आप को बता रहा था कि दोनों शिष्टमंडलों ने इस बात पर भी सहमति जताई कि सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए अगली समग्र वार्ता में रवि शंकर और मेंहदी हसन को भी शामिल किया जाए.... और राग बागेश्वरी और झंजोटी को आम करने के लिए दोनों देशों.....

(माफी चाहता हूँ मैं उस कर्मचारी की पूरी बात नहीं सुन सका क्योंकि प्रेस कॉंफ़्रेंस ख़त्म होने से पहले ही मीडिया चाय की मेज़ की तरफ लपक चुका था. और दोनों विदेश मंत्रियों के चेहरे फ्लैश गनों की लपक झपक में टिमटिमा रहे थे.)..

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 19:14 IST, 16 जुलाई 2010 nilmani:

    बेहतरीन व्यंग्य है...आपकी शैली लाजवाब है...मज़ा आ गया...

  • 2. 20:15 IST, 16 जुलाई 2010 Anuj:

    माफ़ कीजिएगा खान साहेब,ये बहुत घटिया मज़ाक है. आप बात ऐसे करना चाहते हैं कि 20-20 मैच खेलने गए थे और बारिश की वजह से मैच धुल गया. अब अगले 20-20 मैच में तय होगा कि किसके पास क्या जायेगा!

  • 3. 20:22 IST, 16 जुलाई 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    आपने सच्ची बात लिखी है. कृष्णा साहब अभी भारत पहुंचे ही नहीं थे कि वाक युद्ध शुरू हो गया. आपने भी इंतज़ार किए बिना ही तुरंत ब्लॉग छाप दिया. दुख होता है ऐसी वार्ताओं पर जो निरर्थक होती है. ब्लॉग अच्छा है.

  • 4. 20:45 IST, 16 जुलाई 2010 bansi butta:

    लगता है कि आप भी उन नेताओं की तरह हैं तो काम तो कर नहीं सकते, सिर्फ़ बातें ही बना सकते हैं. आपका ब्लॉग पढ़कर मन को धक्का लगा.

  • 5. 20:51 IST, 16 जुलाई 2010 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    सार्थक वार्ता की उम्मीद भी किसी को नहीं थी. इसके लिए उचित माहौल भी नहीं था. लेकिन बातचीत होनी चाहिए.

  • 6. 22:38 IST, 16 जुलाई 2010 himmat singh bhati:

    आपकी लेखनी आपके खाली दिमाग की उपज लगती है. इस वार्ता के नतीजे के बारे में सभी को पता था. लेकिन यह तो अच्छी बात है कि बातचीत हुई. हां, यह खानापूर्ति नहीं होनी चाहिए.

  • 7. 00:36 IST, 17 जुलाई 2010 Narendra Kumar:

    कुरैशी साहब का रवैया किसी भी तरह से दोस्ताना नहीं कहा जा सकता. पिल्लै की तुलना हाफिज़ सईद से करना ठीक वैसा ही है जैसी ज़रदारी साहब की तुलना ओसामा बिन लादेन सी की जाए. भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती को लेकर मैं निराशावादी हूं.

  • 8. 08:40 IST, 17 जुलाई 2010 braj kishore singh:

    माफ़ करिएगा खान साहब, कृष्णा पाकिस्तान चाय पीने नहीं गए थे बल्कि जटिल और विवादित मुद्दों पर बातचीत करने गए थे और इन दृष्टिकोण से अगर देखें तो वार्ता पूरी तरह से विफल रही.

  • 9. 11:25 IST, 17 जुलाई 2010 vikas:

    खान साहब, आपने भी खूब लिखा है. बहुत ही सुंदर... मजा आ गया पढ़कर.....

  • 10. 12:34 IST, 17 जुलाई 2010 Rajesh:

    दोनों देशों के संबंधों को सुधारने में जवाबदेह पत्रकारिता की भूमिका काफी अहम है. इस हिसाब से आपका ब्लॉग पढ़कर बड़ा दुख हुआ.

  • 11. 13:29 IST, 17 जुलाई 2010 Manmohan:

    हालांकि आपने इस ब्लॉग से कुछ नया लिखने की कोशिश की है, लेकिन आप इस उद्देश्य में सफल नहीं हैं. अगली बार आपसे अच्छे ब्लॉग की उम्मीद करते हैं.

  • 12. 19:09 IST, 17 जुलाई 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB :

    हाँ साहब! जनता की गाढ़ी कमाई के बलबूते बस ऐसे ही सैर सपाटे की वार्ताएं चलती रहनी चाहिए. देश की परवाह किसे है. खान साहब! साथ ही इस सैर सपाटे में शामिल सरकारी और गैर सरकारी मेहमानों की सूची और उनके रहने, खाने के इंतजाम और उनके नखरों के बारे में भी कुछ लिखा होता? खैर यह खिचड़ी की हांडी तो चढ़ी ही रहेगी और खिचड़ी कभी बनेगी, भगवान जाने! पता नहीं इस तरह के वार्तालाप करवाकर सरकारें क्यों उपहास का पात्र बन रहीं हैं ?

  • 13. 19:21 IST, 17 जुलाई 2010 Udai Raj:

    कृष्णा का स्वागत हुआ या नहीं हुआ, लेकिन पाकिस्तान की हुकूमत से इससे ज्यादा उम्मीद भी नहीं थी.

  • 14. 00:48 IST, 18 जुलाई 2010 Abhay:

    सही लिखा है आपने...इसीलिए आप मेरे पसंदीदा हैं. लम्बी-लम्बी वार्ता का क्या फायदा जब सबको पता है कि दोनों देश अपने जगह से टस से मस नहीं होंगे.

  • 15. 11:34 IST, 18 जुलाई 2010 Syed Shabbir Husain:

    आपकी टिप्पणी काबिले तारीफ है.

  • 16. 12:26 IST, 18 जुलाई 2010 Intezar Hussain:

    मुझे एक बात समझ में आती है कि पाकिस्तान अमन और शांति को लेकर गंभीर नहीं है. कुरैशी साहब का रुख परिपक्वतापूर्ण नहीं कहा जा सकता. पाकिस्तान के विदेश मंत्री के इस प्रकार के रवैये को देखते हुए बेहतर यही है कि बातचीत का दौर खत्म किया जाए. लगता है कि उन्हें दोस्ती और शांति अच्छी नहीं लगती.

  • 17. 12:33 IST, 18 जुलाई 2010 Rajesh Roshan:

    बेहतरीन कटाक्ष! सर फुटौव्‍वल कर रहे हैं, इच्‍छाशक्ति दिखती नहीं है. अखबारों में बाइलेट्रल डॉयलॉग, ट्रस्‍ट डेफिसिट, कॉमन एजेंडा जैसे शब्‍द पढ़ते-पढ़ते थक चुका हूं. दस साल पहले का अखबार देख लीजिए या फिर परसों का... यही शब्‍द मिलेंगे.

  • 18. 13:26 IST, 18 जुलाई 2010 Syed Shabbir Husain:

    आपका कॉलम काबिले तारीफ है.

  • 19. 13:34 IST, 18 जुलाई 2010 Akhilesh Shukla:

    मज़ा आ गया खान साहब.. इसको कहते हैं सार्थक व्यंग्य.

  • 20. 23:59 IST, 18 जुलाई 2010 ASHOK BAJAJ:

    पिछले गुरुवार को भारत -पाकिस्तान वार्ता विफल हो गई. सिवाय अपमान के भारत को कुछ हासिल नहीं हुआ. ना जाने इस प्रकार की वार्ता कब तक चलती रहेगी. पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भारतीय विदेश मंत्री के खिलाफ जो टिप्पणी की है वह अमर्यादित है. इस टिप्पणी के बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का यह कहना कि सभी मुद्दों पर बातचीत होगी, बड़ा आश्चर्यजनक है.

  • 21. 00:32 IST, 19 जुलाई 2010 UN KNOWN:

    हम भारतीय मुंबई में हुए हमले को कैसे भूल सकते हैं. इस घटना के लिए जिम्मेदार लोग अभी भी पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं. पाकिस्तान ने इनको दंड देने के बजाय इनके खिलाफ सबूत मांगने का एक सिलसिला चलाया हुआ है. पाकिस्तान ने कभी भी असल सबूतों को स्वीकार ही नहीं किया.

  • 22. 01:01 IST, 19 जुलाई 2010 anand:

    मैं अफसोस के साथ कहना चाहता हूं कि यह एक भद्दा मज़ाक है. आप जैसे पत्रकारों का फ़र्ज़ बनता है कि ऐसी बातचीत की वास्तविकता से जनता को अवगत कराएं न कि मज़े लें. दोनों देशों में ऐसे नेता भी हैं जो बातचीत से सभी मसलों को सुलझाना चाहते हैं.

  • 23. 12:34 IST, 19 जुलाई 2010 CS Goswami:

    समस्या नेताओं के साथ नहीं है. उन्हें हर हाल में अपनी कुर्सी बचानी है. इस खराब स्थिति के लिए जनता ही जिम्मेदार है. असल में, मुल्क़ का विभाजन ही जनता की मूर्खता को साबित करता है.

  • 24. 14:32 IST, 19 जुलाई 2010 Maneesh Kumar Sinha:

    भारत सरकार ने कई बार कहा है कि पाकिस्तान में अक्सर चरमपंथियों को पनाह मिलती रही है. वहां की लोकत्रांत्रिक व्यवस्था पर सेना और आईएसआई का सिक्का चलता है. ऐसे में बातचीत का असफल होना कोई नहीं बात नहीं है.

  • 25. 17:51 IST, 19 जुलाई 2010 Iqbal Fazli, Asansol (WB):

    आपकी व्यंग्य शैली लाजवाब है, शायद कुछ पाठकों को समझ में नहीं आती है. अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए धन्यवाद.

  • 26. 00:12 IST, 20 जुलाई 2010 anand:

    इस तरह व्यंग्य करना गलत है. इससे जनता में गलत संदेश जाता है.

  • 27. 23:54 IST, 27 जुलाई 2010 Nitish Biswas:

    गजब का लिखते हैं और कुछ नहीं मिला लिखने को.

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.