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ग़रीब के माथे पर तख़्ती

विनोद वर्माविनोद वर्मा|रविवार, 16 मई 2010, 02:04 IST

आपको 'दीवार' फ़िल्म का अमिताभ बच्चन याद है, जिसके हाथ पर लिखा होता है, मेरा बाप चोर है.

उसमें सलीम-जावेद ने एक ऐसे ग़रीब परिवार के साथ समाज में होने वाले व्यवहार की एक कहानी रची थी जिसका दोष सिर्फ़ ग़रीबी था.

लेकिन देश की सरकारों ने ग़रीबों को ज़लील करने का एक नया तरीक़ा ढूँढ़ निकाला है. मानों ग़रीबी की ज़लालत कम थी.

कम से कम दो राज्य सरकारों ने ग़रीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों के घरों से सामने एक तख़्ती लगाने का फ़ैसला किया है जिससे कि पहचाना जा सके कि वह किसी ग़रीब का घर है.

छत्तीसगढ़ की सरकार पहले से ऐसा कर रही थी और अब राजस्थान की सरकार ने भी इसी तरह का फ़ैसला किया है. सरकारों का तर्क है कि इससे लोग जान सकेंगे कि कौन सा परिवार सरकार की दो या तीन रुपए किलो चावल की योजना का लाभ उठा रहा है. उनके अनुसार इससे यह पहचानने में भी आसानी होगी कि टीवी,फ़्रिज और गाड़ियों वाले किन घरों के मालिकों ने अपने को ग़रीब घोषित कर रखा है.

लेकिन उन ग़रीबों का क्या जो आज़ादी के 63 साल बाद भी सिर्फ़ इसलिए ग़रीब हैं क्योंकि इस देश की और प्रदेशों की कल्याणकारी सरकारों ने अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई? क्या सरकार को हक़ है कि वह ग़रीब रह गए लोगों का इस तरह से अपमान करे?

इन ग़रीबों ने सरकारों से जाकर नहीं कहा था कि उन्हें दो या तीन रुपए किलो चावल दिया जाए. एक तो वह राजनीतिक दलों का वोट बटोरने का तरीक़ा था. दूसरे वे जब ग़रीबी दूर करने का उपाय नहीं तलाश कर सके तो ग़रीब को ग़रीब रखते हुए सरकारी खजाने से अस्थाई राहत देने का तरीक़ा निकाल लिया. और अब इस बात पर सहमति भी बन रही है कि सरकारें ग़रीबों के माथे पर लिखवा दे कि वह ग़रीब है.

इससे दो बातें तो साफ़ है, एक तो यह कि चाहे वह भाजपा के रमन सिंह की सरकार हो या फिर कांग्रेस के अशोक गहलोत की सरकार, ग़रीबों के प्रति दोनों का नज़रिया एक जैसा ही है.

दूसरा यह कि जिन सरकारों को शर्मिंदा होना चाहिए कि वह ग़रीबी दूर नहीं कर पा रही हैं इसलिए मुआवज़े के रुप में दो या तीन रुपए किलो में चावल दे रही हैं, वही सरकारें ग़रीबों पर अहसान जता रही हैं.

जिस समय योजना आयोग के आँकड़े कह रहे हैं कि ग़रीबों की संख्या वर्ष 2004 में 27.5 प्रतिशत थी जो अब बढ़कर 37.2 प्रतिशत हो गई है, देश में किसानों की आत्महत्याएँ रुक नहीं रही हैं और जिस समय ख़बरें आ रही हैं कि ग़रीबी उन्मूलन का पैसा राष्ट्रमंडल खेलों में लगा दिया गया है.

उसी समय सरकारी आंकड़ों में यह भी दर्ज है कि देश के उद्योगपतियों और व्यावसायियों ने बैंकों से कर्ज़ के रूप में जो भारी भरकम राशि ली उसे अब वे चुका नहीं रहे हैं. यह राशि, जिसे एनपीए कहा जाता है, एक लाख करोड़ रुपए से भी अधिक है. देश की सौ बड़ी कंपनियों पर बकाया टैक्स की राशि पिछले साल तक 1.41 लाख करोड़ तक जा पहुँची थी.

बैंकों का पैसा और टैक्स अदा न करने वालों में देश के कई नामीगिरामी औद्योगिक घराने हैं और कई नामधारी कंपनियाँ हैं. इन कंपनियों के मालिक आलीशान बंगलों में रह रहे हैं और शानदार जीवन जी रहे हैं. इनमें से कोई भी ग़रीब नहीं हुआ है. अपवादस्वरूप भी नहीं.

क्या किसी राज्य की सरकार में यह हिम्मत है कि वह किसी बड़े औद्योगिक घराने या किसी बड़ी कंपनी के दफ़्तर के सामने या फिर उसके मालिक के घर के सामने यह तख़्ती लगा सके कि उस पर देश का कितना पैसा बकाया है?

जिस तरह सरकार को लगता है कि ग़रीबों का घर पहचानने के लिए तख़्ती लगाए जाने की ज़रुरत है उसी तरह देश के आम लोगों का पैसा डकारने वालों के नाम सार्वजनिक करने की भी ज़रुरत है.

लेकिन सरकारें ऐसा नहीं कर सकतीं क्योंकि यही उद्योगपति और व्यवसायी तो राजनीतिक पार्टियों को चंदा देती हैं और यही लोग तो मंत्रियों और अफ़सरों के सुख-सुविधा का ध्यान रखते हैं.

अगर एक बार कथित बड़े लोगों से बकाया राशि वसूल की जा सके तो इस देश में ग़रीबी दूर करने के लिए बहुत सी कारगर योजना चलाई जा सकती है.

लेकिन साँप के बिल में हाथ कौन डालेगा और क्यों डालेगा?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 08:37 IST, 16 मई 2010 बेचैन आत्मा :

    यह नहीं कहा जा सकता कि 'गरीब का घर' लिखना पूर्णतया गलत है. सिर्फ नकारात्मक पहलू को ही देखना उचित नहीं. इसका एक लाभ भी है. वह यह कि जिन लोगों ने गलत तरीके से गरीबी का प्रमाण पत्र हथिया लिया है और गरीबों को मिलने वाले लाभ का उपयोग करते हैं वे सार्वजनिक रूप से अपमानित होंगे. और जो वास्तव में गरीब हैं उनके घर के आगे 'गरीब घर' लिखा हो तो इसमें कैसा अपमान.! गरीब होना कोई अपमानजनक बात नहीं है. जिस तरह सरकार को लगता है कि गरीबों का घर पहचानने के लिए तख़्ती लगाए जाने की ज़रुरत है उसी तरह देश के आम लोगों का पैसा डकारने वालों के नाम सार्वजनिक करने की भी ज़रुरत है. यह ठीक है. होना चाहिए.

  • 2. 09:02 IST, 16 मई 2010 अमित प्रभाकर:

    ये बात हम बारंबार उठा तो देते हैं और चर्चा करके दिल में सुकून आ तो जाता है. पल भर के लिए, पर हमें हर बार यही याद करना पड़ता है. मधेपुरा, बिहार के जिस गाँव में मेरा जन्म हुआ (मानपुर, सिंहेश्वर) या जहाँ मेरे पिताजी आज भी खेती करते हैं, वहाँ आज भी बिजली नहीं है. ये बात तो मैं अपने बंगलूर स्थित आवास में लैपटॉप पर लिखकर आपको भेज देता हूँ अपना दुःख बांटने के लिए. पर इससे समस्या सुलझ नहीं जाती. कभी-कभी लगता है कि सरकारों की ही एकमात्र जिम्मेवारी नहीं है- लोगों को भी प्रयास करने होंगे. सरकार को अपनी आवाज़ सुनाने के मुझ जैसे लोगों को याचिकाएँ, आवेदन-पत्र तथा समय देना होगा. दुःख इस बात का है कि वही सुविधा पाने के लिए, गाँव की गरीब जनता को शहरों के मध्यमवर्गीय समाज के मुकाबले बहुत अधिक मेहनत करनी होती है और फिर उनकी शक्ल-सूरत की वजह से या पता नहीं क्या, सरकारी दफ़्तरों में उन पर अफ़सरों का ध्यान नहीं जा पाता. लोगों ने बिजली का सपना 40 साल पहले देखा था. हो सकता है कल हमारे गाँव वाले उसे साकार कर भी लें पर तब तलक दिल्ली और मुंबई में 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार वाली वातानूकूलित शय्यादार ट्रेन आ जाएगी. जब हमारे गाँव वाले इसका स्वप्न देखेंगे तो इसको साकार होने में जाने और कितने दशकों का समय लगे. गर यह सपना भी पूरा हुआ तो तब तलक शायद शहरों के तमाम ऐश्वर्य भोग चुके लोगों को संतुष्टि के उपाय बताने वाला कोई यौगिक गुरु यह सिखा रहा हो. - "मेहनत करने से आपको संतुष्टि का मार्ग प्राप्त होगा. प्रतिदिन प्रतिपल श्रम करना चाहिए- एक किसान की तरह. इसलिए आप सब कुदाल चलाइये, गर फसल न हो तो दफ्तर मत जाइए. पैसे न मिलें तो क्या, पैसों से संतुष्टि नहीं मिलती. पैसा कम कमाइए और भिक्षु बनकर रहिए. आप सब 2010 के मधेपुरा के किसानों की जिन्दगी जीने की कोशिश कीजिए । ..." और तब शायद ही ये जाकर बदल पाए. दुःख और शहरों के प्रति विकर्षण बढ़ाने का कारण क्या सिर्फ़ सरकारी नीतियाँ हैं ? क्यों गाँवों से कोई बन्दा बॉलीवुड या क्रिकेट या गणित या कला के क्षेत्र में आगे नहीं आ पाता? क्या प्रतिभा की कमी है गाँवों में? अगर आप हाँ कहें तो मुझे आपसे सहमत होने में परेशानी होगी. शहरों में भी गरीब जनता रहती है, उनका क्या भविष्य है? बंगलूर के कन्नड़भाषी ग्रामीण प्रवासियों के कन्नड़ स्कूलों में इतनी कन्नड़ और हिन्दी पढ़ा दी जाती है कि बच्चे 6ठीं कक्षा के बाद सब्जी बेच सकें. ये तो राहुल द्रविड़ और महेश भूपति या नारायण मूर्ति बनने का अपना सपना साकार नहीं कर सकते. क्यों? क्या हमारे पास संसाधनों की कमी है? अगर इस सवाल का जबाब बिना संदेह के मिल गया होता तो मैं आज यहाँ एक विदेशी कार्यों की अनुकृति करने वाला यंता नहीं होता. दुष्यंत कुमार की उस प्रसिद्ध ग़ज़ल के दो मिसरों का ज़िक्र किए बिना नहीं रहा जाता -
    कहाँ तो तय थे चरागाँ हर घर के लिए
    कहाँ चराग मुअस्सर नहीं शहर के लिए.
    और आख़िर में -
    वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
    मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए.

  • 3. 10:02 IST, 16 मई 2010 Malik Faisal:

    लोकतंत्र में स्वागत है. माफ करें यह लोकतंत्र नहीं है. यह "पूंजीवादियों की तानाशाही" है.

  • 4. 10:42 IST, 16 मई 2010 Intezar Hussain:

    विनोद जी, आपने जो कुछ लिखा है, वह सौ फीसदी सही है. यह तो सदियों की परंपरा है. राजतंत्र हो या प्रजातंत्र, जिसकी लाठी, उसकी भैंस.

  • 5. 11:33 IST, 16 मई 2010 ashiq dubai:

    आप लोग सरकारी योजनाओं की बुराई ढूंढ़ने में ही क्यों लगे रहते हैं. आप अमीरों को खलनायक की तरह पेश करते हैं जो 30 फीसदी टैक्स देते हैं. गरीब लोग सरकार को मदद करना तो दूर नुकसान ही पहुंचाने में लगे रहते हैं. सरकार जब स्ट्रीटलाइट लगवाती है तो बल्ब तोड़ देते हैं. अक्सर सरकारी सामानों को क्षतिग्रस्त करने में ये लोग शामिल होते हैं.

  • 6. 13:33 IST, 16 मई 2010 Dhiraj:

    विनोद जी, आपकी बात तो ठीक है. लेकिन हरियाणा सरकार पहले से ही ऐसा कर रही है, उस बारे में आपने कोई जिक्र नहीं किया है.

  • 7. 14:58 IST, 16 मई 2010 Surjeet Rajput Dubai :

    विनोद जी, आपने सही लिखा है. मेरा मानना है कि गरीबों को ऊपर लाने के लिए ईमानदारी से काम होना चाहिए. तख्ती के बजाय इस काम के लिए कोई और तरीका अपनाया जा सकता है. किसी की कमजोरी को इस तरह से उजागर करना ठीक नहीं है.

  • 8. 15:10 IST, 16 मई 2010 राजीव श्रीवास्तव:

    मेरे विचार में कई दिनों बाद बीबीसी पर एक ऐसा लेख आया है जो संपूर्ण है सिवाय बीबीसी की एक कमजोरी के । मैं वर्मा जी की इस बात से पूर्णतया सहमत हू कि गरीबों के बजाय अमीरों को चिन्हित किया जाये तो देश का ज्यादा भला होगा । पर बीबीसी को हर समस्या में भाजपा को घसीटने से बाज़ आना चाहिये । ईस समय देश की जो बुरी हालत है वह किसी राज्य सरकार की नीतियों की वजह से नहीं है । हमारे देश की बुरी हालत, गरीब - अमीर की खाई, भ्रष्टाचार, अशिक्षा, ईत्यादि ये सब कांग्रेस के साठ सालों की बुरी नीतियों के नतीज़े हैं । छोटे - छोटे दक्षिण-पूर्व एशियाई देश सही समय पर वैश्वीकरण की नीतियॉ अपना कर समपन्न हो गये और भारत इसी झूठी शान पर इतराता रहा कि उसने बांग्लादेश को पाकिस्तान से अलग कर पाकिस्तान को नीचा दिखा दिया या कि एक भारतीय अंतरिक्ष से चिल्लाया कि -सारे जहॉ से अच्छा ...- जबकि सच्चाई यह थी की करोडो भारतीयों के पास एक साइकल तक नहीं थी । और अभी भी क्या बदला है - अर्थव्यवस्था जब मरणासन्न हो गई तब छद्म वैश्वीकरण की दो बूदें पिला कर किसी तरह मरीज़ सघन चिकित्सा केंद्र में लेटा है और तब भी यह सरकार गरीब देश का खून अमीरों को बेच रही है । मेरी यह तहे दिल से बीबीसी से गुज़ारिश है कि इस तरह के और लेख प्रकाशित करें लेकिन कांग्रेस की असफलताओं को यह कह कर जलमिश्रित न करे कि सभी राजनीतिक दल एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं ।

  • 9. 15:28 IST, 16 मई 2010 IBRAHIM KUMBHAR PAKISTAN:

    भाई कोई ग़रीब के घर पर तख़्ती लगे या पख़्ता,ये सरकारें बस ये ही कर सकती हैं. ग़रीबी के ख़ात्मे के लिए कोई ऐसा प्रोग्राम नहीं दे सकतीं जिनसे सही में गरीबी ख़त्म होने में मदद मिले. भारत का मुझे मालूम नहीं, मेरे देश में आज भी कई गांव ऐसे हैं जहां के मुखिया अपने गावों में स्कूल और पाठशाला खोलने की इजाज़त इसलिए नहीं देते कि वहां के ग़रीब कुछ पढ़ लिख लेंगे और उससे मुखिया के एकाधिकार को ख़तरा हो सकता है. मुखिया समझता है कि अगर ग़रीब पढ़ लिख गया तो मेरी बात कौन मानेगा. वो इस ख़ौफ़ की वजह से अपने गांवों में किसी पाठशाला और स्कूल खुलने से खुश नहीं होता. मेरा अपना खयाल ये है कि ग़रीबों की ग़रीबी दूर करने के लिए काम न करने वाली सरकारों की सोच भी उस मुखिया जैसी है. अब तो हमारे देशों पर दुनिया इसलिए भी हंसती है कि हमारे यहां की सरकारें करती क्या हैं, ये जो आपने ग़रीबी उन्मूलन का पैसा राष्ट्रमंडल खेलों में लगा देनी की बात की है, ये तो हमारे देशों का मसला रहा है कि सरकार को ये मालूम नहीं होता कि पैसा कहां लगाना चाहिए. उनको ये अहसास तक नहीं कि ग़रीब किस तरह जीता है, अब बस ये ही माना जाता है कि ये ग़रीब लोग बस वोट देने के लिए होते हैं. इसलिए ही हर बार नए वादे वचन से आकर वोट बटोरते हैं. बस इन ग़रीबों से वोट लेने हैं बदले में इन को देना कुछ नहीं, अगर दे दिया तो ये लोग अगली बार वोट नहीं देंगे. बस चले तो ये उन ग़रीबों की सांस भी अपने पास रखें और इन ग़रीबों को सांस लेने की इजाज़त भी चुनाव के समय दें.

  • 10. 15:44 IST, 16 मई 2010 viswas:

    वाह वर्मा जी वाह! आपने तो कमाल ही कर दिया, लेकिन फिर भी किसी के कान पर जूं त़क नहीं रेंगेगा.

  • 11. 20:01 IST, 16 मई 2010 raghu:

    सरकार बोर्ड पर ग़रीब का टैग लगाने के बजाए सर्वे कर सकती है. बीपीएल वालों के लिए, फिर अपनी कल्याणकारी योजनाओं से उन्हें लाभ दे सकती थी. मगर कुछ नेता और नौकरशाही जबतक शासन में रहेंगे तबतक इस देश में ऐसा ही होगा. नेता बनने के लिए लोकप्रिय होना काफ़ी नहीं और नौकरशाह बनने के लिए विवेक ही काफ़ी नहीं. देश भक्ति भी कुछ होती है. मैं तो बस इतना कहुंगा कि "जब मुजरिम ही मसीहा बन बैठे मैं अपनी शिकायत किससे कहूं". और विनोद जी आपने जो उद्योगपतियों से बक़ाया कर और धन वसूलने की बात की है तो यह कोई यूपीए या एनडीए सरकार नहीं कर सकती.

  • 12. 23:44 IST, 16 मई 2010 Dr.Lal Ratnakar:

    विनोद जी एक दुखती नब्ज को आप ने जरा धीरे से दबाया है, सदियों के दर्द से कराहता गरीब अब लगभग सर्कार के हर गरीबी हटाओ अभियान से जिस कदर उब चुका है, उसका संज्ञान पता नहीं सरकारों को हो रहा है कि नहीं, गरीब तो गरीब अमीर भी ऐसे उपक्रमों से बाज़ नहीं आ रहा है जिसे आप ने चिन्हित किया है उसके आलावा एक बड़ी फौज है जो इन योजनाओ का खून पी रहा है, आपको क्या पूरे देश को याद होगा एक ज़माने में एक राजनेता ने कहा था जो पैसा यहाँ से (सरकारों) भेजा जाता है उसका १५% ही पहुचता है, ८५% को कौन पीता है दरअसल वही पहचानने योग्य है. उसके माथे पर तो कुछ लिखा ही नहीं जा सकता. कई प्रदेश जो नियमित रूप से धन का रोना रोते रहते है वही अपने राज्यों में गरीब का सारा हिस्सा को लूट करते बेशरम हो जाते है.
    आजकल बाबा रामदेव विदेशों में जमा दौलत स्वदेश लाने का आन्दोलन चला रहे है काश उनके नामों कि लिस्ट ही कहीं लग जाती जिस तरह सरकार को लगता है कि ग़रीबों का घर पहचानने के लिए तख़्ती लगाए जाने की ज़रुरत है उसी तरह देश के आम लोगों का पैसा विदेशी बैंकों में रखने वालों की सूची बनाकर उनके नाम सार्वजनिक करने की भी ज़रुरत है.इन गरीबों पर जितना भी कहर ढा लें ये सरकारें पर जिस दिन भी उन औद्योगिक घरानों की ओर बुरी नज़र से देखने की हिमाकत भी इन्होने की तो इनके हाल क्या होंगे ?
    जो देश उस गरीब मेहनतकश मज़दूर को चूसता है तो वह देश कितना विक्सित होगा अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है, यही कारण है कि गरीब की हर योजना का मोटा हिस्सा किसी मशीन के तेल के रूप में जलाया जाता है, और उसी तेल के खेल से देश की मशीनरी सड़क रौदने वाली मशीन की तरह आराम से चलती जा रही है, और गरीब उसी रौदने वाली सरकारों से निरंतर रौदा जा रहा है. इन्ही के घरों पर तख्तियां लगायी जानी है जिससे उनकी पहचान कब्रगाह में की जा सके .
    डॉ. लाल रत्नाकर

  • 13. 01:40 IST, 17 मई 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी, सच के साथ बहुत सुंदर लिखा है आपने. ग़रीबों के साथ एक तख़्ती इन बेईमान नेताओं के घरों पर भी लगा दें लेकिन अमीरों और न ही इन नेताओं के साथ ऐसा होगा. सिर्फ़ ग़रीबों के लिए यह तख़्ती बनी है. दुख तो बहुत होता है लेकिन कोई इलाज नहीं है हमारे पास. बस इन नेताओं के लिए हर समय बददुआ ही कर सकते हैं. दुआ के तो ये अधिकार ही नहीं रखते हैं.

  • 14. 02:59 IST, 17 मई 2010 Kapil Batra:

    बहुत अच्छा विनोद जी, आपने जो लिखा वह बहुत ही सही लिखा कि कर न देने वाले अमीरों को पकड़ा जाए. बहरहाल हमारे यहां आरटीआई नाम की चीज़ भी है लेकिन इस हक़ का इस्तेमाल किए बग़ैर हम यह जानते हैं कि कौन अमीर परिवार अपना बक़ाया कर अदा नहीं कर रहा है. बीबीसी एक सूची प्रकाशित करे जिसमें उन धनी लोगों का नाम हो जो टैक्स अदा नहीं करते.

  • 15. 11:21 IST, 17 मई 2010 praveen sinha:

    बिनोद जी आपकी बात से मैं पूरी तरह सहमत हूँ I यह गरीबी निवारण की नहीं बल्कि गरीब निर्धारण की कोई नीति है. शायद इन तख्तियो का आर्डर भी किसी बड़े उधोग घराने को मिल जाए I हमारे देश की सबसे मुलभुत समस्या जो है शिक्षा की जिसका वोट बैंक से सीधा संबध न होने के कारण इस देश के बुद्धिजीवी राजनेता और नौकरशाह इसकी ओपचारिकता पूरी कर देते है. अगर मै अपने गाँव के आसपास (सिवान बिहार) का ही उदाहरन लू तो लगभग हर गाँव में प्राथमिक स्कूल तो है लेकिन भवन न मात्र के पानी और शोचालय का नाम लेना shayad मेरी मुर्खता है. हाई स्कूल १० किलोमीटर में एक है और कालेज तो कुछ गाओं से ४० किलोमीटर तक दूर है. ध्यान देने वाली बात ये है की इस इलाको में बिधुतिकरण लगभग ४० साल पहले और टेलीफ़ोन लगभग २० साल पहले आ चूका है, लेकिन आज भी ९० प्रतिशत गरीबो (मेरा अनुमान) के घर में बिजली नहीं है वजह बिजली आती ही नहीं और खामखा उन्हें बिल भरना पड़ता है. खिचड़ी के लालच (MID DAY मिल) में भले ही उनके बच्चे स्कूल चले जाते है लेकिन बुनियादी सुबिधायो के अभाव जैसे पेड़ के निचे जमीं पर सर्दी(१० डिग्री ) ,गर्मी (३५-४० डिग्री) बरसात में आखिर क्या शिक्षा हासिल कर पाते होगे मासूम बच्चे .हा इन इलाको के अगर मद्य वर्ग या उच्च वर्ग के परिवारों का आकलन करे तो उनके बच्चे देश बिदेश में अच्छे कंपनियों में कम कर रहे है चाहे किसी भी जाती से हो कारण अपनी इच्छा शक्ति न की सरकारी योजना . आखिर गरीबो को अपवाद स्वरूप ही कुछ चमत्कार करने के लिए दुनिया के सबसे बड़े कल्याणकारी लोकतंत्र में किस्मत के भरोसे क्यों छोड़ दिया जाता है? शिक्षा के बिना गरीबी हटाना एक जादू ही है शायद अगले १०-२० साल में ये जादू पेपर पर नेता- बाबु की युगलबंदी में हो भी जाए.

  • 16. 13:08 IST, 17 मई 2010 brajkiduniya:

    सरकारों के इस निर्णय के बारे में तो यही कहा जा सकता है कि क्या आईडिया है सरजी?हमारे राजनेता मानसिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो चुके हैं. ग़रीबी 8-9 प्रतिशत की सरपट रफ़्तार से विकास के पथ पर दौड़ रहे भारत के लिए कलंक की बात है. हम अपनी ग़रीबी का प्रदर्शन करेंगे. क्या ग़रीबी गर्व के साथ प्रदर्शित करने की वस्तु है. चुल्लू भर पानी में डूब मरो नेताओं. किसी तरह भारत से ग़रीबी को दूर करो. धनवान जो मोटी रक़म लेकर ग़ायब हैं उनके पेट से धन निकालो और ग़रीबी दूर करने के इंतज़ाम करो. लेकिन तुम्हे ग़रीबी से क्या. तुम तो ए.सी. लगे संगमरमर के मकानों में रहते हो और रोटी कम रूपये ज़्यादा खाते हो. तुम क्या जानो कि ग़रीबों के दिन और रात कैसे गुज़रते हैं.

  • 17. 13:15 IST, 17 मई 2010 rampal verma:

    वर्मा जी, आप सही कह तो रहे हैं लेकिन इसका सामाधान नहीं है. आप कुछ भी लिखो कोई भी हल नहीं निकलने वाला, किसी की जाति या अमीर ग़रीब लिखने से इसका सामाधान नहीं. इसको ईमानदारी से लागू करना सबसे बड़ी चुनौती है. अब तो यहां पर तानाशाही का राज है, अब तो सिर्फ़ भगवान की मालिक है.

  • 18. 13:30 IST, 17 मई 2010 कृष्ण कुमार तिवारी:

    सर आप के द्वारा जिस बात का ज़िक्र किया गया यह वास्तव में एक ऐसी पहल होगी कि इसके द्नारा लगभग 10% ग़रिबों का तो निदान संभव है लेकिन वही बात समने आती है कि जब चोर की दाढ़ी मे तिनका हो तो कौन बताए कि हल क्या है.

  • 19. 14:39 IST, 17 मई 2010 Kapil Batra:

    सरकार अपनी योजनाओं में कितनी प्रवरणशील हो सकती है यह इस बात से स्पष्ट है कि हमने कल बीबीसी पर यह प्रश्न पूछा कि आख़िर बीबीसी आरटीआई के तहत कर की चोरी करने वालों की सूची क्यों नहीं प्रकाशित करती तो मेरा विचार प्रकाशित नहीं किया गया. जब बीबीसी प्रवरणशील हो सकती है तो सरकार क्यों नहीं? हर कोई पहले अपना हित देखता है फिर कोई और चीज़. यही कारण है कि दुनिया में इतनी परेशानियां हैं क्योंकि कोई भी सच बोलना नहीं चाहता क्यों सच तो कड़वा होता है.

  • 20. 17:49 IST, 17 मई 2010 NEETA KUMARI, Behat, Jhanjharpur, Madhubani, Bihar, India:

    वर्मा जी आपने सही लिखा है कि सांपों के बिलमें हाथ डाले कौन? क्या हमारी सरकार अंधी, गूंगी और बहरी है कि वह अपने देश की ग़रीबी की नब्ज़ को पहचान न सके. ग़रीबी के दर्द से कराहती आवाज़ न सुन सके, ग़रीबी दूर भगाने की अपनी आवाज़ को बुलंदियों तक पहुंचा न सके? क्या इन्हें ग़रीबी ढंढने के लिए एक-एक ग़रीब के सर पर बोर्ड लगाने की ज़रूरत है? इन्हें अपनी ग़लती का एहसास क्यों नहीं होता. क्यों ये ग़रीबों को उपर ख़र्च की जाने वाली राशि को राष्ट्रमंडल खेलों पर लगा रही है?

  • 21. 11:03 IST, 18 मई 2010 Sanjay Verma:

    मुझे समझ में नहीं आता कि भारत में ग़रीबों का नेता अमीर क्यों होता है? क्या विदेशों में पढ़े-लिखे, शानदार गाड़ियों में घूमने वाले, नौकर-चाकर से घिरे लोग कभी ग़रीब का मतलब समझ पाएँगे? ये लोग अगर ग़रीबों को पीने का पानी देंगे तो वह भी किसी विदेशी कंपनी से ख़रीदकर. ग़रीबी के नाम पर पैसा बहा देने से क्या ग़रीबी दूर हो जाएगी? या अगर पैसा लगाया भी जाए तो उसका फ़ायदा सही लोगों को होगा? जो लोग गाय-भैंस का चारा खाने में नहीं चूके क्या वे ग़रीबों का चावल या गेहूँ छोड़ देंगे? इस सरकारी ढोंग का पर्दाफ़ाश कोई कर सकता है?

  • 22. 12:20 IST, 19 मई 2010 sukhjitsingh:

    विनोद जी, मैं आप के साथ पूरी तरह सहमत हूँ लेकिन क्या करूँ इन लीडरों का जिनका मक़सद ही लोकतंत्र को भुला कर सिर्फ़ कुर्सी और पैसा रह गया है. ग़रीबों के घरों पर ग़रीब लिखने से कुछ नहीं होगा. देखना तो यह है कि सरकार ग़रीबों को दे क्या रही है.

  • 23. 17:53 IST, 20 मई 2010 sajjan kumar:

    मायावती का अरबों रुपया स्विस बैंक में जमा है.

  • 24. 15:42 IST, 22 मई 2010 अवधेश मौर्या :

    वर्मा जी ने गरीबी का जो चित्रण किया है वास्तविकता तो उससे भी भयानक है. यह तो सिर्फ एक पहलू है. क्या ये सच नहीं हैं कि भारत की भोली भली जनता को धर्म व परम्परा के नाम पर भी सदियों से लूटा जा रहा हैं. लूट के तरीको में बदलाव भले ही आया हो पर गरीबों के लूट का यह घिनौना खेल अभी भी जारी है.

  • 25. 22:52 IST, 29 मई 2010 deep kumar patel:

    वर्मा जी ने गरीबी का जो चित्रण किया है, वास्तविकता तो उससे भी भयानक है. यह तो सिर्फ एक पहलू है. क्या ये सच नहीं है कि भारत की भोली भली जनता को धर्म व परम्परा के नाम पर भी सदियों से लूटा जा रहा हैं.

  • 26. 20:51 IST, 06 जून 2010 seraj akram:

    आज के ज़माने में ग़रीबी ही सबसे बड़ा कलंक है अब और क्या ज़लालत होगी मजबूर और परेशान ग़रीबों के लिए.

  • 27. 00:33 IST, 14 जून 2010 Sarveshwer S. Vyas:

    दोस्तो, मुझे एक बात अच्छी लगी कि आप सभी ने इस महत्वपूर्ण विषय पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी. विनोद जी को भी धन्यवाद्, इतना महत्वपूर्ण मुदा उठाने के लिए. कृपया सरकारों, समाज व सिस्टम को दोष नहीं दें. हम भी उसी सिस्टम का हिस्सा हैं. समाधान को खोजने में मदद करें. मुद्दा ये हे कि ग़रीबी के आंकड़ो को रखा कैसे जाए व इसकी नियमित मॉनिटरिंग कैसे की जाए. मेरा सुझाव है कि हम ग़रीबी की poverty mapping द्वारा निगरानी के साथ ही आंकड़े भी रख सकते हैं. यह हम G I S से आसानी से कर सकते हे. यह mapping अभी तक ज़िला सतर तक ही हो रही हे. क्यों न इससे अब घर घर की mapping की जाए.

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