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एक मुलाक़ात: एक अनोखा अनुभव

अमित बरुआअमित बरुआ|सोमवार, 17 मई 2010, 15:20 IST

वह एक अजीब और न भूलने वाला अहसास था.

बीबीसी में मेरे सहयोगी भारत के कुछ इलाक़ों में हिंदी सेवा की लोकप्रियता और उससे गहराई से जुड़े श्रोताओं के बारे में अब तक मुझे बताते आ रहे थे.

लेकिन हाल ही में गोरखपुर के एक होटल में श्रोताओं और कुछ तादाद में हिंदी ऑनलाइन के पाठकों से मिलना और उनकी प्रतिक्रियाएँ जानना इतना सुखद अनुभव था कि मैंने उसकी कल्पना भी नहीं की थी.

वहाँ युवा श्रोता भी मौजूद थे और बुज़ुर्ग भी. वहाँ ऐसे भी थे जो हमारे प्रसारणों की सराहना कर रहे थे और ऐसे भी जो आलोचक थे. कुछ ऐसे भी लोग थे जो अपनी पसंद-नापसंद दोनों के बारे में बता रहे थे. लेकिन लोग जो भी कह रहे थे उसकी तह में उनका बीबीसी हिंदी से जुड़ाव और उसकी साख पर भरोसा साफ़ झलक रहा था.

एक सज्जन हमें पिछले 60 वर्ष से सुन रहे थे तो कुछ ऐसे भी थे जो दो या तीन दशकों से बीबीसी से जुड़े हुए थे. गोरखपुर विश्विद्यालय का एक ऐसा छात्र भी मौजूद था जिसने हमें दो साल पहले ही सुनना शुरू किया.

वहाँ मौजूद लोगों में से एक ने कहा, "मैं बीबीसी का दीवाना हूँ. आपके प्रसारण सुने बिना मैं सो नहीं पाता हूँ".

कुछ लोग 200-300 किलोमीटर की यात्रा कर के आए थे तो कुछ गोरखपुर के आसपास के गाँवों से वहाँ पहुँचे थे. चिलचिलाती धूप में, तापमान जबकि चालीस का आंकड़ा पार कर चुका था, उनकी वहाँ उपस्थिति बीबीसी के प्रति उनकी निष्ठा साफ़ ज़ाहिर कर रही थी.

वहाँ वकील थे, छात्र थे, एक पूर्व मंत्री थे और एक पूर्व विधायक भी.

एक श्रोता का कहना था कि वह अपने विचार खुल कर प्रकट नहीं कर पा रहे हैं, उन्होंने हमें काग़ज़ का एक पर्चा दिया जिस पर कुछ पंक्तियाँ लिखी हुई थीं. कुछ अन्य इसी बात से ख़ुश थे कि वे अपने जानेपहचाने उत्तर प्रदेश संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी और दिल्ली से गए रेहान फज़ल को 'साक्षात' देख पा रहे हैं.

गोरखपुर में श्रोताओं से मिलने पर यह स्पष्ट हो गया कि बीबीसी हिंदी सेवा की लोकप्रियता की वजह क्या है. जबकि भारतीय मीडिया का एक बड़ा वर्ग ऐसे विषयों की रिपोर्टिंग में व्यस्त है जो उनके लिए महत्वहीन है, बीबीसी से उन्हें वह मिलता है जो वे चाहते हैं, यानी ठोस, सटीक समाचार और गहन विश्लेषण.

हमारे कुछ कार्यक्रमों की भारी आलोचना हुई-जैसे फ़िल्मों पर आधारित 'टेक वन'. इसके साथ ही श्रोताओं के सवालों के जवाब उपलब्ध कराने वाले कार्यक्रम 'हमसे पूछिए' को दोबारा शुरू करने की मांग भी उठी. लेकिन साथ ही, इस बात को भी स्वीकार किया गया कि बीबीसी हिंदी को समय के साथ स्वयं को बदलना होगा.

यह एक यादगार और कभी न भूल पाने वाला अनुभव था. अब जबकि मैं दिल्ली लौट कर यह सब कुछ लिख रहा हूँ, बस इतना ही कह सकता हूँ कि श्रोताओं के प्रति मेरी और मेरी टीम की ज़िम्मेदारियों में कई गुना की बढ़ौतरी हो गई है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:41 IST, 17 मई 2010 kulwant happy:

    रेडियो सेवा तो सुनी नहीं, लेकिन उसकी ऑनलाइन हिन्दी सेवा देखकर दिल गदगद हो उठता है। बहुत अच्छा टीम वर्क है। दिल खुश होता है। सच में।

  • 2. 18:09 IST, 17 मई 2010 praveen sinha:

    बात 1996 की है उस समय मैं नवीं कक्षा का छात्र था, भारतीय राजनीती में काफी उठा पटक चल रही थी ऐसे में जबरदस्ती हमें 7.30 से रात 8.30 तक अपने पिताजी के पास बैठकर BBC सुनना पड़ता था, उस अनमने से एक घंटा सुनना कब एक आदद सी बन गई पता ही नहीं चला उसके बाद तो चारों सभा सुनाने की आदत हो गई. अब तो पिता जी से बीबीसी सुनने के लिए डांट मिलाने लगी कि केवल 7.30 वाली सभा सुनो बाक़ी समय पढाई करो. बीबीसी से यह प्यार आज तक जारी है. बस इतना अंतर है कि आज मैं दिल्ली में हूँ और इस भाग दौड़ की जिन्दगी में रेडियो तो नहीं सुन पाता हूँ. हाँ ऑनलाइन का सिलसिला अब जारी है. वैसे, आज भी अगर गाँव जाना होता है तो खुली हवा में घर के बाहर या छत BBC सुनना बचपन की याद दिला देता है जब सारे लोगों(BBC टीम) की आवाज़ के अनुसार एक काल्पनिक तस्बीर थी जो ऑनलाइन होने से वास्तविक हो गई है .

  • 3. 18:15 IST, 17 मई 2010 brajkiduniya:

    कभी हाजीपुर, बिहार भी पधारें और हमें मेजबानी का अवसर प्रदान करें तो बड़ी कृपा होगी.

  • 4. 19:31 IST, 17 मई 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    अमित जी, शायद पहली बार आपकी क़लम ने यह स्वीकार किया है कि अधिकतर श्रोता बीबीसी टेक वन को बंद कराने के इच्छुक हैं और हमसे पूछिए दोबारा सुनना चाहते हैं. अगर आपके पास समय हो तो पूरे भारत का दौरा करें और श्रोताओं के विचार जानें. आपको 99 प्रतिशत लोगों से यही सुनने को मिलेगा. आपका ईमानदारी से यह सब लिखने पर मैं आपका क़ायल हो गया हूँ.

  • 5. 21:48 IST, 17 मई 2010 Pranav Das:

    यही वजह है कि बीबीसी अलग है. अमित जी के लिए यह दौरा बहुत ज़रूरी था. उनको अब समझ में आएगा कि बीबीसी के श्रोताओं से मिलना कितना महत्वपूर्ण है. हमें उम्मीद है कि वे अपने प्रोग्राम के ज़रिए श्रोताओं से लगातार संपर्क में रहेंगे.

  • 6. 22:00 IST, 17 मई 2010 Lakhan Gusain:

    जब भारत में भाषाविज्ञान की कक्षा में हिंदी भाषा का भौगोलिक मानचित्र दर्शाया जाता है तब उसमें दस राज्यों और दो केन्द्रशासित प्रदेशों का निरूपण किया जाता है. लेकिन बीबीसी हिंदी सेवा के दैनिक "ऑनलाइन" किर्याकलापों से लगता है कि उसकी दृष्टि में जम्मू, हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, और मध्यप्रदेश में हिंदी-भाषी व्यक्तियों की संख्या लगभग नगण्य है. ऐसे उदाहरणों से कभी-कभी लगता है हिंदी भागलपुर बलिया बनारस तक ही सिमट कर रह गई है. आशा है आप वहां भी श्रोताओं और पाठकों की राय से रु-ब-रु होने का प्रयास करेंगे.

  • 7. 11:23 IST, 18 मई 2010 Bhim Kumar Singh:

    मुझे अफसोस है कि मैं उस मौके पर नहीं पहुंच पाया। मैं दिल्ली में हूं और मीडिया से जुड़ा हूं इसलिए वक्त नहीं निकाल पाया। लेकिन बरुआ जी मैं आपको तब से बीबीसी पर सुनता रहा हूं, जब आप हिंदू समाचार पत्र में थे। इसके अलावा पहले हिंदू में और बाद में हिंदुस्तान टाइम्स में भी मैं आपको पढ़ता रहा हूं। इसके बाद जब आप बीबीसी हिंदी सेवा के प्रमुख बने तो बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं तकरीबन पिछले 10 वर्षों से संभवत: नियमित रुप से बीबीसी सुनता रहा हूं। आपने जो कार्यक्रम का कलेवर बदला है उसकी सराहना की जानी चाहिए, लेकिन एक गुजारिश भी है- इन कार्यक्रमों में खेल की तरह कारोबार की कोई नियमित कड़ी नहीं है। यदि आप इसकी व्यवस्था करें तो बड़ी खुशी होगी।

  • 8. 12:32 IST, 18 मई 2010 सुन्दर सिंह नेगी दिल्ली,रानीखेत,उत्त�:

    बचपन की यादें ताजा हो गई हैं, मैं जब नौ या दस साल का था तब पिताजी
    के साथ गांव में शॉर्टवेव पर बीबीसी पर सामाचार सुना करता था. उन दिनों शायद
    गांवों तक फ्रीक्वेन्सी कम आती होगी. इसलिए रेडियो बार-बार घुमाना पड़ता था,
    मुझे अभी भी अच्छी तरह याद है उन दिनो आजकल हम बहुत सुनते थे और दूसरी तरफ़ कम फ्रीक्वेन्सी के कारण रिपोर्टरों की आवाज़ का लहराना रेडियो की तरफ झुका देता था. खैर छोडो गांव की याद और वो सुनहरा बचपन और सुनहरे बचपन के साथ बीबीसी रेडियो साथ.
    फिर उसके बाद हमारा रेडियो गिर जाने की वजह से खराब हो गया और लगभग
    तीन चार साल तक घर मे कोई नया रेडियो नही आया. और जब घर में नया रेडियो
    आया तो मैं दसवी की पढ़ाई छोडकर दिल्ली रोजी रोटी की तलाश में आ गया. फिर तब से बीबीसी रेडियो के साथ साथ गांव,घर वालो, गाव वाले सभी का साथ छुट गया।
    लेकिन फिर सन 2000 मे मैने बीबीसी को नेट पर खोजा और मुझे नेट पर
    बीबीसी हिन्दी से जुडने का मौका मिला, और तब से अब तक बीबीसी हिन्दी से जुडा हुआ हूँ.

  • 9. 12:37 IST, 18 मई 2010 bashir ahemad, GUJRAT(INDIA):

    मैं लगभग 8वीं कक्षा से बीबीसी सुन रहा हूँ और अब इन्टरनेट पर पढ़ता हूँ. मेरे पापा बीबीसी उर्दू के दीवाने हैं और मैं हिंदी और थोडा बहुत उर्दू का. मुझे ख़बरों में बीबीसी के सिवा किसी भी समाचार में विश्वास नहीं है. मैंने आज तक काफी समचार पत्र और टीवी न्यूज़ देखे पर बीबीसी जैसा कोई नहीं. बीबीसी को सुनने और पढ़ने का मज़ा कुछ और ही है. जेसे कोई दिलचस्प कहानी पढ़ रहे हो या कोई लव स्टोरी में जितना मज़ा आता है वैसा ही मजा बीबीसी के ब्लॉग, न्यूज़ और अन्य सभी कार्यक्रम पढ़ने में आता है. बीबीसी से मेरी एक गुजारिश है कि वो बदलते ज़माने के साथ थोडा बदलाव लाए. मैं चाहता हूँ कि बीबीसी अब अपना उर्दू या हिंदी लाइव टीवी चैनल प्रसारित करे तो मुझे बेहद खुशी होगी !

  • 10. 18:51 IST, 18 मई 2010 Afsar Abbas Rizvi "ANJUM":

    अमित बरुआ जी, बीबीसी हिंदी की ब्रॉडकास्टिंग और आप जैसे इससे जुड़े सभी पत्रकारों को धन्यवाद. जैसाकि आपने अपने इस ब्लॉग में लिखा है कि लोग इसके दीवाने हैं तो मैं आपसे बिलकुल सहमत हूँ. क्योंकि मैं ख़ुद पिछले 25-30 साल से जब मैं बहुत छोटा था अपने पापा के साथ समाचार सुना करता था. मेरे पापा का तो यह हाल था कि जब तक बीबीसी हिंदी सेवा पर समाचार नहीं सुन लेते थे उनको नींद नहीं आती थी. मुझे अच्छी तरह याद है जब देश-विदेश में जब कोई बहुत बड़ी घटना या दुर्घटना हो जाती थी तो हम सब का यही मत होता था कि सही आँकड़े सिर्फ़ बीबीसी पर ही मिलेंगे.

  • 11. 20:20 IST, 18 मई 2010 Ankit :

    लगभग दो साल पहले मैं बीबीसी विश्व समाचार की साइट से बीबीसी हिंदी तक आया था. जब मैंने बीबीसी अंग्रेजी समाचार टीवी पर देखा तो मुझे यकीन हो गया कि ये इतना विश्वसनीय क्यों है, इसके बाद से मैं बीबीसी के ऑनलाइन रेडियो कार्यक्रम सुनता हूँ, आज भारत में सनसनी फैलाना ही असली न्यूज़ माना जाता है, ब्रेकिंग न्यूज़ तो क्रिकेट स्कोर की तरह अपडेट होते हैं, इसमें बीबीसी ने वास्तविक पत्रकारिता का सही प्रमाण दिया है, जब मैंने बीबीसी के अन्य रेडियो कार्यक्रम सुने, जैसे बीबीसी एशिया नेटवर्क, तब से में बीबीसी का नियमित श्रोता और दर्शक हो गया हूँ. मुझे समझ में ये नहीं आता कि आप हिंदी न्यूज़ चैनल लेने में इतना कतरा क्यों रहे है? आशा है आपको ऐसी कई सफलता मिलती रहें.

  • 12. 20:50 IST, 18 मई 2010 gangaram vishwakarma:

    आपने बहुत अच्छी और सही बात लिखी है.

  • 13. 03:06 IST, 19 मई 2010 संजय करीर:

    क्‍या बीबीसी हिंदी के और श्रोता सिर्फ यूपी और बिहार में हैं... कभी एमपी की ओर भी रुख करें.

  • 14. 16:13 IST, 19 मई 2010 NEETA KUMARI, Behat, Jhanjharpur, Madhubani, Bihar, India:

    मैं बीबीसी की तीसरी पीढ़ी की श्रोता हूँ और कभी बीबीसी से अलग न होने के कारण बीबीसी अपने परिवार जैसा लगता है. उसके एक-एक संवाददाता और श्रोता अपने लगते हैं. बीबीसी में जब कोई नया जुड़ता है चाहें आप हों या कोई नए पाठक या श्रोता, तो बेहद ख़ुशी होती है, लगता है जैसे हमारे परिवार में एक और नई ख़ुशी आई है. न जाने बीबीसी को जब कोई छोड़ देता है तो क्यों इतनी दुखी हो जाती हूँ. नागेन्द्र जी, अचला जी और इसी तरह औरों के जाने से कुछ समय तक तो रोने के बाद भी विश्वास नहीं होता है. हो सके तो आप इन लोगों को वापस ले आएँ.
    आप बीबीसी के प्रमुख हैं और इतनी ईमानदारी से आपने अपने ब्लॉग में टेक वन के बारे में श्रोताओं के विचार प्रकट किए हैं तो जल्दी कीजिए इसे हटा कर हमारे लिए कुछ स्पेशल पेश कीजिए. हो सके तो हम प्रतियोगी छात्रों के लिए रेडियो और बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर ज़रूरत की चीज़ों को लाइए.
    साथ ही एक और गुज़ारिश...बिहार के हर ज़िले में ज़रूर श्रोता सभा कीजिए ताकि बीबीसी की टीम को अपनी आँखों से देख कर पुराना सपना पूरा कर सकूँ.

  • 15. 16:34 IST, 19 मई 2010 IBRAHIM KUMBHAR PAKISTAN:

    आज जहां मीडिया विकास की सारी सीमाएं पार कर गई है, जहां आप को बैठे बिठाए सब ख़बरें एक पल में मिल जाती है, जहां मीडिया ने दादु से दिल्ली और मिठी से मुंबई तक तमाम शहरों को तो क्या लेकिन सारी दुनिया को एक कर दिया है, आज के युग में जहां मीडिया तेज़ तरीन रफ्तार से अपना काम कर रहा है लेकिन भी कहा जाता रहा है कि कभी कभी मीडिया अपने काम से बढ़ कर वो कर जाता है जो इस को नहीं करना चाहिए,मीडिया के खिलाफ़ ये बात उस समय की जाती है जब मीडिया किसी एक की पार्टी बन जाती है, ये बात सारे मीडिया के लिए तो नहीं कही जा सकती और खास कर कि बीबीसी के लिए तो कभी नहीं, मैं ये बात अपने देश के कुछ मीडियाई समूहों के हवाले से कर रहा हूँ, जहां ये बात भी सामने आई है अधिकतर मीडियाई समूह टैक्स चोर हैं और ये सारी बात संसद में आई है, अब हर एक की आलोचना करने वालों पर भी बुरे दिन आए हैं, ये सारी बातें अलग इस ब्लॉग के हवाले से जो कुछ भी कहा जाए वो इस लिए कम है कि लोगों ने जिन भावनाओं को बयान किया है वो उन के अंदर की आवाज़ है, और आप ने जिस अंदाज़ से बयान की हैं ये उन के दिलों कि आवाज़ है, मैं समझता हूँ कि आप जिन लोगों से मिल कर आए हैं वो और उन जैसे करोड़ों लोग बीबीसी को चाहते भी हैं लेकिन उन के पास वो शब्द नहीं हैं कि वो खुल कर उन का इज़हार कर सकें. ये बीबीसी की मुहब्बत भी जो उनको आपके पास और आपको उनके पास लेकर आई, जहां धूम धडाके की खबरों के इस दौर हजारों चैनेल काम करते हों वहां बीबीसी की खबर आए तो बस लोग उस को ही देखते है, इस लिए तो लोग कहते है बीबीसी नाम ही काफ़ी है.

  • 16. 18:57 IST, 19 मई 2010 Pankaj Bhatnagar:

    मैं उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा हूँ जब आपकी टीम मुंबई आएगी.

  • 17. 23:51 IST, 19 मई 2010 shayama:

    मैं बचपन से बीबीसी रेडियो सुन रहा हूँ और एक दशक से ऑनलान का पाठक हूँ. मुझे बीबीसी का भारत प्रशासित कश्मीर कहना अच्छा नहीं लगता. कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और उसका इसी तरह उल्लेख होना चाहिए.

  • 18. 00:20 IST, 20 मई 2010 ashok bajaj:

    बीबीसी लन्दन के साथ मेरी बहुत सी यादें जुड़ी हैं .मै १९७०-७१ से बीबीसी का श्रोता हूँ .सन १९७५ में जब भारत में इमरजेंसी लगी तब प्रेस की आजादी छीन ली गई .समाचारों के लिए बीबीसी लन्दन पर ही निर्भर रहना पड़ता था . उन दिनों बीबीसी का समाचार सुबह ८ बजे रेडियो सिलोन से कैच करता था जबकि रात का समाचार सीधे बीबीसी से सुनते थे. बीबीसी के समाचार को लोग ज्यादा विश्वसनीय मानते थे. तब से अब तक बीबीसी का नियमित श्रोता हूँ. आजकल वेब साइट के माध्यम से नियमित रूप से बीबीसी से जुड़ा हूँ. मेरे कुछ फोटोग्राफ्स भी प्रकाशित हुए हैं. विगत दिनों "सन्डे के सन्डे" कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह से श्री अमित बरुआ की बातचीत बड़ी अच्छी लगी. मैंने कॉमेंट्स भी भेजे थे जिसे प्रकाशित नहीं किया गया.

  • 19. 02:25 IST, 20 मई 2010 Rajeev Pathak:

    बहुत अच्छी बात लिखी है.

  • 20. 03:46 IST, 20 मई 2010 Indrajeet Jha:

    जब से होश सम्हाला घर में बीबीसी की आवाज़ सुनी... उस समय गाँव में रात के १०:३० बजे तक सभी सो जाते थे, लेकिन चाचा जी १०:३० -११:०० का प्रोग्राम सुनकर ही सोते थे. शाम के ७:३० बजे से तो गाँव में बाहर निकलने पर लगभग हर घर के बाहर रेडियो बजते हुवे सुना जा सकता था और उस पर बीबीसी चल रहा होता था...जिसके घर में रेडियो नहीं होते थे या ख़राब हो जाता था वो दुसरे के दरवाजे पर बैठ कर न्यूज़ सुनते थे... बचपन में न्यूज़ उतनी समझ में नहीं आती थी लेकिन जैसे जैसे बड़ा हुआ तो मैं भी बीबीसी का आदि हो गया. वर्ष २००० में पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गया तो बीबीसी से नाता टूट गया...दिल्ली आकर पता चला कि बीबीसी की क्या अहमियत थी...बीबीसी के कारण राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय सभी तरह के घटना की जानकारी होती थी..और यहाँ आकर पता चला कि इस मामले में यहाँ के लोग शहरो में रहकर भी कितने पीछे हैं..हमारे यहाँ खेतो में कम करने वाले किसानों को भी अन्तराष्ट्रीय समाचार तक पता होते थे, लेकिन यहाँ के लोगो को बहुत सारी चीजे पता नहीं होती थी... वहां जितने लोग कम्पीटीशन की तैयारी करते थे उसके लिए बीबीसी सुनना जरुरी होता था..इसके बिना तैयारी अधूरी होती थी.. .उस समय इतने न्यूज़ चेनल्स भी नहीं थे... .वैसे एक रेडियो ख़रीदा था लेकिन उस पर फ्रीक्वेंसी ठीक नहीं आती थी... इन्टरनेट की सुविधा थी नहीं तो ऑनलाइन भी नहीं देख पता था... पिछले ढाई साल से मैं बीबीसी के प्रोग्राम को ऑनलाइन सुनता भी हूँ और पढ़ता भी हूँ...सचमुच इसमे जिन मुद्दों को और जितनी बातों को दिखाया जाता है उतनी चीजें कहीं नहीं मिलती हैं...सबसे बड़ी बात है की इसमे संवादाता भी काफी पढ़े-लिखे और जानकार हैं जिसका इलेक्ट्रोनिक मिडिया में तो आभाव ही दीखता है... उम्मीद करता हूँ कि बीबीसी अपनी गुणवत्ता को आगे भी बरक़रार रखेगी.

  • 21. 12:51 IST, 20 मई 2010 Ravi:

    श्री बरुआ जी,
    बीबीसी हिंदी वेबसाइट पढ़ना अपने आप में सुखद अनुभव है.
    निवेदन है कि पहले की तरह अंदाजे बयां और... या उसी प्रकार का कोई लेख फिर से प्रकाशित करें.

  • 22. 16:28 IST, 20 मई 2010 RANDHIR KUMAR JHA:

    नीता जी की इस टिप्पणी से मैं बिलकुल असहमत हूँ. भारत में बीबीसी हिंदी सुनने/पढ़ने/देखने वालों की गिनती में समानता की अभिलाशा रखना ग़त है. नीता जी को पसंद आने वाली ऐसी बहुत सी ख़बरें होंगी जो दूसरे बीबीसी सुनने/ पढ़ने/ देखने वालों की नज़र में व्यर्थ हों. इसलिए अगर उन्हें टेक-वन अच्छा नहीं लगा तो ये उनकी समस्या है, बीबीसी के दूसरे श्रोताओं का इसमें क्या दोश. इसलिए ये कहना कि टेक-वन बंद होना चाहिए मेरे ख़्याल में ग़लत है. उनकी मांग होनी चाहिए थी कि उनके पसंदीदा विषय पर बीबीसी एक नया प्रोग्राम शुरू करे, मगर किसी प्रोग्राम को बंद करके नहीं.

  • 23. 05:56 IST, 23 मई 2010 ABHIJIT SINHA:

    आपकी सेवा से मैं पिछले पांच सालों से जुड़ा हूं. ऑनलाइन पर समाचार पढ़कर बड़ी खुशी होती है.

  • 24. 13:57 IST, 31 मई 2010 prakash saxena:

    हम पूरी तरह से असहमत हैं ऊपर दिए गए विवरण से. ये भद्र समाज के लोग इतना नहीं जानते कि उन्हें क्या करना है.

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