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मैं अफ़ज़ल की फ़ाइल हूँ!

रेणु अगालरेणु अगाल|गुरुवार, 20 मई 2010, 15:08 IST

मैं अफ़ज़ल की फ़ाइल हूँ. पिछले चार सालों से मैं दिल्ली के गृह मंत्रालय में आराम से सो रही थी. धूल की चादर ओढ़े. मेरे आस पास घुप्प अंधेरा था, कहीं कोई हलचल नहीं.

मैं और केवल मैं, साथी के नाम पर मेरे सपने थे. कभी अच्छे तो कभी दिल दहलाने वाले. अच्छों में मेरे दिन बदलने वाले थे. मुझे आस थी कि मेरे पन्नों पर लिखा होगा कि आप सुरक्षित है. आप जा सकती है. और बुरों में नज़र आता था काली स्याही से लिखा पैग़ाम--- अब बस काम तमाम.

फ़ाइल बंद की जा रही है. सर्वोच्च न्यायालय के फ़रमान का पालन होने जा रहा है. सोच के ही नींद टूट जाती है. पर अपनी दुनिया में अच्छे बुरे दिन समेटे मैं आराम से जी रही थी. बीच-बीच में बंद कमरे के बाहर से आवाज़ सुनाई देती थी. राजनीति छोड़ो. अफज़ल को फांसी दो.

कभी कभी अफज़ल के मानवाधिकारों की चर्चा भी सुनाई देती थी. पर इस सबको भी एक अर्सा हो गया. फिर लंबे समय तक सब कुछ शांत हो गया. मुझे लगा कोई ख़बर न होना ही अच्छी ख़बर है. पर फिर मई के शुरु में मेरे आसपास हलचल तेज़ हो गई. अजमल कसाब को 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमलों के लिए फांसी की सज़ा सुनाई गई. और तब से अब तक मानो भूचाल ही आ गया है.

मेरी धूल की चादर मुझ से खींच ली गई. मुझे नींद से जगा कर तेज़ रोशनी के कमरे में पहुंचाया गया. मैं दिल्ली की सड़को को लंबे समय बाद देख पाई. मेरे बारे में हर ओर बात होने लगी. मुख्यमंत्री और लेफ़्टिनेंट गवर्नर के दफ़्तरों के बीच पिंग-पांग की गेंद की तरह मुझे भेजा जाने लगा.

मुझे लगा कि मुझे छूने भर से लोग डर रहे थे. मैं एक मुसीबत बन गई थी जिसे कोई पालना नहीं चाहता था. दिल्ली की गर्मी को मेरी चर्चा और बढ़ा रही है तो लोग कश्मीर के अफ़ज़ल गुरु की फांसी की बात से बढ़ने वाले तापमान की बात कर रहे थे.

मैं प्राइम टाइम टीवी पर नज़र आ रही थी. पर मन ही मन सोच रही थी. क्यों रे कसाब तू क्यों आया? क्यों पकड़ा गया? तू न होता तो मैं कहीं किसी कमरे के किसी कोने में कई साल और चैन से रह सकती थी.

मन में ग़ुस्सा भी आ रहा है कि सबको फ़ाइल क्लोज़ करने की इतनी जल्दी क्यों हो रही है. क्यों अब कोई मेरे मानवाधिकारों की चिंता नहीं कर रहा... क्यों?

क्या इसलिए कि पाकिस्तानी कसाब को फांसी पर लटका देखने की जल्दी है? और उस इच्छा के सामने अफ़ज़ल गुरु के फांसी के फंदे पर लटकने में हो रही देरी खटक रही है. फांसी पर चढ़ने वालों की लाईन तो बहुत लंबी बताई गई थी. फिर मुझ पर ही क्यों सबकी नज़र है.

मैं फिर बंद कमरे में रहना चाहती हूँ. पर क्या कोई मेरी सुनेगा? शायद नहीं! शायद फ़ाइल बंद होने का समय आ गया है! पर शायद कोई चमत्कार हो जाए! आशा तो मैं कर ही सकती हूँ. वैसे भी और क्या है मेरे पास इसके अलावा...!

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 17:43 IST, 20 मई 2010 Afsar Abbas Rizvi :ANJUM":

    रेणु जी आप इस फ़ाइल के माध्यम से बताना क्या चाहती हैं. मुझे तो सही में अभी तक यही समझ में नहीं आया.
    ख़ैर हमारे देश में न्यायपालिका का बहुत बुरा हाल है. हमें न्याय में पारदर्शिता और जल्दी फ़ैसले चाहिए. इसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर बदलाव की सख़्त ज़रूरत है. ख़ास कर देश की स्मिता से जुड़े मामलों पर जल्दी से जल्दी फ़ैसले होने चाहिए और उनपर राजनीति कभी नहीं होनी चाहिए वरना ऐसे ही अजमल क़साब और अफ़ज़ल गुरू हमारे देश पर बुरी नीयत से हमले करते रहेंगे. आपके माध्यम से मेरी सरकार से गुज़ारिश है कि इस प्रकार के मामलों में अलग से विभाग बनाया जाए और जितनी जल्दी हो सके फ़ैसले दिए जाएं और मुजरिमों को सख़्त से सख़्त सज़ा ज़रूर मिलनी चाहिए, तभी अंकुश लगेगा.

  • 2. 18:56 IST, 20 मई 2010 Intezar Hussain:

    अफ़सर साहब आपने जो लिखा है मैं उसका पूरा समर्थन करता हूँ और साथ ही मैं भी बीबीसी के माध्यम से अपनी सरकार से गुज़ारिश करता हूँ कि देश के ख़िलाफ़ कोई ऐसा करता है तो उस का फ़ैसला जल्द करके उसे अंजाम तक पहुँचाया जाए ताकि फिर कोई ऐसी हरकत करने की जुर्रत न कर सके. जयहिंद-जय भारत.

  • 3. 19:11 IST, 20 मई 2010 mohammed sahul hameed dantewada:

    रेणु जी आप ज़रूर आशा कीजिए. मेरे देश के मंत्रियों और न्यायालयों में इतनी फ़ुरसत नहीं है कि अजमल क़साब जैसे लोगों के मामले में जल्दी फ़ैसला करें. मजबूरी में शीला जी ने फ़ाइल निकाली है. अगर उन्हें कोई न टोके तो शायद फ़ाइल फिर बंद हो ही जाएगी. आप आशा कर सकती हैं. हमारे नेता और न्यायपालिका आपको इतनी जल्दी फ़ैसला नहीं देने वाले.

  • 4. 19:13 IST, 20 मई 2010 gunjan:

    कुछ लोगों को फांसी पर देखने की बड़ी इच्छा है और उनमें अगर कुछ नेताओं को भी लटकते देखूंगा तो लगेगा कि देश के साथ कुछ न्याय हुआ।

  • 5. 19:40 IST, 20 मई 2010 brajkiduniya:

    वास्तव में फ़ाइल को जगाने का काम किया है कसाब को मिली सज़ा ने. कांग्रेस शायद यह मानकर चल रही थी कि देश का आम मुसलमान आतंकवाद गुरू को अगर सज़ा मिलती है तो उससे ख़ुश नहीं होगा और उसका ख़मियाज़ा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है. ये एक तरह से देश के मुसलमानों की वतन-परस्ती पर संदेह प्रकट करना भी हुआ. जबकि जहां तक मैंने आम मुसलमानों को देखा है वो तो किसी भी तरह कि आतंकी हिंसा के समर्थक नहीं हैं और इससे नाराज़ होने के बजाए वे ख़ुश ही होंगे.

  • 6. 19:43 IST, 20 मई 2010 MANOJKUMARNIGAM:

    मैं चाहता हूं कि अफ़ज़ल गुरू को ज़रूर फांसी हो.

  • 7. 19:46 IST, 20 मई 2010 Ankit :

    क्या हम जानते है कि लोकतंत्र का विश्व में क्या और क्यों इतना महत्व है? विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च सभा पर हमला होता है, और आज ये मजाक का विषय बन चुका है? भारत की किसी भी न्यूज़ मीडिया में ताकत नहीं है वो सरकार से सवाल कर सके. आप बता रहे हैं कि कश्मीर में तापमान बढ़ सकता है,अ गर इस फाइल को आगे बढ़ाते है तो, में साफ कर दूँ कि ये खोखला तर्क है, हर रोज कश्मीर में कई आतंकवादी मारे जाते हैं, पूरे भारत में आन्दोलन करने में कितनी देर लगती है ये तो आपको पता ही होगा! मैं इस फाइल को यही कहूँगा कि कमज़ोर सरकार और पक्षपाती मीडिया के चलते अभी इसे कई और सालो तक धूल खानी पड़ेगी...

  • 8. 20:03 IST, 20 मई 2010 mohd naseem:

    मेरे ख्याल से संसद पर हमले को लेकर सीबीआई ने सही जाँच नहीं की है इस हमले के पीछे कौन लोग हैं यह सब हमारी सरकार को पता है. यह काम सिर्फ एफबीआई का है जैसा मुंबई पर हुए हमले में जिस तरह डेविड हेडली शामिल है हो सकता है की उसी तरह इसमें भी कोई और शामिल हो इस लिए सही जाँच होनी चाहिए ऐसा न हो की हमले कोई और करे और फाँसी किसी और को जाये यह सरासर गलत है.

  • 9. 20:26 IST, 20 मई 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    रेणु जी, आपके इस लेख को पढ़ कर यह समझ में नहीं आ रहा है कि आप अजमल क़साब और अफ़ज़ल गुरु की हमदर्दी कर रही हैं या विरोध. आप की इस फ़ाइल का मतलब समझ से परे है. रहा सवाल अफ़ज़ल गुरू की फ़ाइल का तो आने वाला समय ही बताएगा कि क्या होगा लेकिन क़साब और अफ़ज़ल में फ़र्क़ है इतना समझ लीजिए. जिस दिन क़साब का कुछ होगा उस दिन निर्दोष सुरजीत सिंह को उसका ख़ामियाज़ा न भुगतना पड़े इसका डर है.

  • 10. 20:56 IST, 20 मई 2010 raj kishore jha:

    रेणु जी, बहुत बहुत बधाई, ख़ूब लिखा है आपने. क्या कीजिएगा अफ़ज़ल हमारे नेताओं को वोट बैंक के जाल में फांस गया है.

  • 11. 21:57 IST, 20 मई 2010 Prem Verma:

    वह फ़ाइल ही क्या जो चल जाए. भारत में फ़ाइलें फ़ाइल पर पैसा रखने पर चलती है. फ़ाइल को चूहे कुतर जाते हैं. कुछ फ़ाइलें गुम भी हो जाती हैं. इस फ़ाइल का दुर्भाग्य भी तो देखिए न इसे चूहों ने कुतरा और न ही ये गुम हुई. कम से कम इस मामले में हमारी सुरक्षा व्यवस्था बड़ी चाक़-चौबंद रही. भले ही हम आतंकियों से देश को न बचा पाए हों इस फ़ाइल को बचा कर हमने देश पर एहसान तो किया है. हमें ये चिंता क़तई नहीं करना चाहिए कि फ़ाइल धीमी है, चल नहीं रही सिर्फ़ खिसक रही है. हम भारत के लोग आराम पसंद हैं.

  • 12. 23:03 IST, 20 मई 2010 satnam singh:

    रेणु जी आपने बहुत अच्छा लिखा है. पर क्या आपके लिखने से सरकार की आंख खुलेगी. मुझे तो नहीं लगता. इस देश में बोलने की आज़ादी है अमल करने की नहीं. कोई आदमी देश की इज़्ज़त पर हमला करता है उसका गुनाह सिद्ध हो जाता है और फिर आजतक उसको सज़ा नहीं मिली क्यों. अरे रेणु जी, इसी में तो हमारी महानता छुपी है. अमरीका पर हमला हुआ था उसने अफ़ग़ानिस्तान की ईंट से ईंट बजा दी और एक हम हैं कि मुजरिम हमारे सामने है और हम उसको सज़ा नहीं दे रहे हैं. इसीलिए तो मेरा भारत महान है.

  • 13. 07:25 IST, 21 मई 2010 brajkiduniya:

    हमारे राजनेता इतनी गंदी राजनीति करेंगे कि देश के दुश्मनों को सज़ा भी नहीं दिला पाएंगे शायद नेहरु-गाँधी ने कभी सोंचा भी नहीं होगा. वैसे मैं आपको बता दूं कि गुरु या कसाब को फांसी देने के भारतीय मुसलमान विरोधी नहीं है बल्कि कसाब को सज़ा सुनाने पर बिहार के कई मुस्लिम परिवारों ने स्वागत किया और ईद मनाई. उनके परिजन मुंबई हमले में मारे गए थे. गुरु ने तो सीधे संसद पर ही हमला किया था जिससे वे राजनेता ही सीधे तौर पर प्रभावित होते जो आज उसे फांसी देने में देरी कर रहे हैं. कभी-कभी तो इन राजनेताओं पर इतना ग़ुस्सा आता है कि सोचता हूँ कि काश गुरु सफल हो गया होता और एक साथ इन सभी पाखंडियों का अंत कर दिया होता तो कितना अच्छा होता. ये अपने ही हमलावरों को लेकर राजनीति कर रहे हैं उसे ही बचा रहे हैं! कितने घृणित हैं ये लोग.

  • 14. 11:43 IST, 21 मई 2010 himmat singh bhati:

    ये भारत के क़ानून का जीता जागता एक नमूना है. देश के भीतर दुशमन घुसकर बेगुनाहों को मार देते हैं और देश की सबसे बड़ी पंचायत पर हमला करते हैं और न्यायालय उसे सज़ा देती है तो ऐसे लोगों की फ़ाइल चलना क्या भारतीय न्याय प्रणाली का खोखलापन या दिखावा साबित करता है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या ये भारतीय क़ानून केवल भारतीयों को सज़ा देने के लिए ही बना है. विदेशी हमलावरों के लिए भारत में क़ानून नहीं है, इसीलिए ये फ़ाइल घिसटती हुई चल रही है. और भारत में फ़ाइल गुम होना आम बात है. कल को ये फ़ाइल गुम होती है तो क्या सरकार इन्हें छोड़ देगी या सज़ा बरक़रार रखेगी. ऐसे में न्यायलयों को फांसी की सज़ा न देकर 100 साल या उम्र क़ैद की कठोर सज़ा देनी चाहिए जिससे फ़ाइलों का चलना ही बंद हो जाए और लोगों का क़ानून पर भरोसा बना रहे.

  • 15. 12:28 IST, 21 मई 2010 IBRAHIM KUMBHAR PAKISTAN:

    एक फ़ाइल के खुलने या बंद होने से ना संसद पर हमले रोके जा सकते हैं ना ही मुबंई हमलों जैसी दुर्घटनाओं को मात दी जा सकती है, मैं नहीं कहता कि अफ़ज़ल गुरु की फ़ाइल अंधेरे कमरे में पड़ी रही ना ही उसको क्षमा करने की याचिका करता हूँ. क़ानून जो कहता है राज्य वही करता है, और करना भी वही चाहिए, लेकिन एक गुरु को या एक कसाब को लटकाने से क्या होगा, सुरक्षा और शांति के लिए वो कुछ करने की ज़रूरत है जो आज तक नहीं किया गया, दस गुरु को लटका दो लेकिन उससे आप वह परिणाम नहीं हासिल कर सकते जो आप लेना चाहते हैं, अब तो कोशिश ये करनी चाहिए कि ऐसी कोई फ़ाइल नहीं आनी चाहिए जिसको आप संभाल कर रखें या जिसको संभालने कि लिए मेहनत करनी पड़े ,जहां तक गुरु का मामला है तो वो ही होगा जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होगा.

  • 16. 14:14 IST, 21 मई 2010 sunder singh negi delhi,ranikhet india. :

    अंडे का फ़ंडा तो आपने सुना ही होगा. मगर दोस्तो ये तो डंडे का फ़ंडा है. देखते हैं ये डंडा कितनी मारक क्षमता वाला है...

  • 17. 15:24 IST, 21 मई 2010 Krishna tarway, Mumbai:

    अफ़ज़ल की फ़ाइल तुम चिंता क्यों करती हो , तुम्हें चाहने वालों की इस देश में कोई कमी नहीं है. तुम तो धर्मनिर्पेक्ष कहे जाने वाले राजनीतिक दलों की वोट बैंक हो. भला तुम्हारा कोई क्या बिगाड़ लेगा. चंद लोगों के शोर मचाने से कुछ भी नहीं होने वाला. तू मानवाधिकार की भी लाडली है. मानवाधिकार तुम्हारे जैसों के लिए ही तो हैं. उन सुरक्षा कर्मियों के लिए थोड़े ही कोई मानवाधिकार हैं जिन्होंने संसद और नेताओं की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी . उनका तो काम ही है देश के लिए जान देना. और नेताओं का काम है राजनीति करना सो नेता बख़ूबी राजनीति कर तुम्हें सुरक्षित अँधेरी कोठारी में रखे हुए हैं. यह जो शोर मच रहा है इस वजह से मजबूरी में नेताओं को तुम्हें बाहर निकालना पड़ा है. घबराने की ज़रुरत नहीं तुम्हारा साथ देने के लिए अजमल कसाब की फ़ाइल भी जल्द आने वाली है. तुम्हारा तब टाइम पास भी अच्छे से होने लगेगा. तू बाहर सिर्फ़ कुछ दिनों के लिए ही है तू फिर उस अँधेरी कोठारी में पहुँच जाएगी जहाँ तू अपने-आप को सुरक्षित पाती है. तुम्हारा इस देश में कोई बाल-बांका नहीं कर सकता.

  • 18. 23:35 IST, 21 मई 2010 shesh chauhan:

    ख़ैर हमारे देश में न्यायपालिका का बहुत बुरा हाल है. हमें न्याय में पारदर्शिता और जल्दी फ़ैसले चाहिए. अफ़ज़ल की फ़ाइल तुम चिंता क्यों करती हो , तुम्हें चाहने वालों की इस देश में कोई कमी नहीं है. तुम तो धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले राजनीतिक दलों की वोट बैंक हो. भला तुम्हारा कोई क्या बिगाड़ लेगा. चंद लोगों के शोर मचाने से कुछ भी नहीं होने वाला. तू मानवाधिकार की भी लाडली है. मानवाधिकार तुम्हारे जैसों के लिए ही तो हैं.

  • 19. 00:48 IST, 22 मई 2010 Mohammad Athar Khan, Faizabad Bharat:

    भारत में सैंकड़ों लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है, लेकिन उनको अभी तक फांसी नहीं हुई. तो फिर जनाब अफ़जल गुरू और जनाब अज़मल अमीर को जल्दी क्यों फांसी दी जा रही है. उनसे पहले जिनको सज़ा मिली, पहले उनको फांसी दी जानी चाहिए. हो सकता है कि इन्हें पहले फांसी देकर कोई सच्चाई छुपाने की कोशिश हो. मुंबई हमलों से लेकर मालेगांव धमाकों का सच दब गया. कोर्ट ने बड़ी तेजी से जनाब अजमल अमीर को सज़ा दे दी लेकिन वही कोर्ट मालेगांव, हैदराबाद, अजमेर शरीफ और समझौता एक्सप्रेस में धमाके करने वालों को अभी तक सज़ा नहीं दे पाया और न देगा.

  • 20. 11:14 IST, 22 मई 2010 गणपतलाल विश्नोई गाँव-रणौदर तह॰ साँचौ�:

    अफ़ज़ल की फाईल का अकेलापन दूर करने एक और फाइल आ रही है. फिर दोनों मिलकर किसी कमरे के कोने मे गप्पे लड़ाना. वैसे तो फाइलों का इतिहास अपने देश मे कैसा रहा है सभी जानते हैं. हमारे देश में करोड़ों कसाब बैठे हैं जो देश को भ्रष्टाचार, बाल श्रम, रिश्वतखोरी और भी अनेक अपराधों से खोखला किए जा रहे हैं, इनके पीछे भी नेताओं का ही हाथ है. अब इस देश को नेता लोग किसी विदेशी के हाथों न बेच दें.

  • 21. 11:19 IST, 22 मई 2010 Shambhu Kumar Singh:

    रेणुजी! कृपया मेरे शब्द अफ़ज़ल की फाइल तक पहुँचा देने का कष्ट करें.‘अफ़ज़ल की फाइल! तुम्हें अगर ऐसा लगता है कि लोग तुम्हें छूने भर से डर रहे हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा, तुम्हारी करनी भी तो ऐसी ही है? आश्चर्य तो इस बात का है कि तुम्हें ये क्यों लगता है कि “मैं एक मुसीबत बन गई”. अरे तुम तो (कुछ) भारतीय राजनेताओं के लिए राजनीति की रोटी सेंकने का ऊर्जा का काम कर रही हो जो न तो तुम्हें उगल सकता है और न ही निगल सकता है. उगल लेंगे तो निगलने वाले हाय तौबा मचाएँगे, और निगलेंगे तो उगलने वाले हाय-तौबा मचाएँगे. तुम खुद ही सोचो न! अगर ऐसा न होता तो क्या कसाब की फाइल जैसा कोई फाइल तुम्हारा साथी बनने की जुर्रत करता? नहीं न! तो फिर चिन्ता कैसी? जहाँ हो वहाँ बेफिक्र होकर पड़े रहो. हाँ ये बात दीगर है कि तुम्हारी बेफिक्री की समय सीमा क्या होगी, क्योंकि दुनियाँ तो भारत को सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में जानती है.’

  • 22. 15:57 IST, 22 मई 2010 Vijay Kumar Sharma:

    हिंदी में एक कहावत है कि बकरे की मां कब तक कैर मनाए, वही हाल "अफ़ज़ल की फ़ाइल" के साथ हुआ है. ऊपर वाले के यहां देर है पर अंधेर नहीं.

  • 23. 17:05 IST, 22 मई 2010 ashfaque ahmed :


    रेणु जी आपको बहुत-बहुत धन्यवाद. मेरी आपसे गुजारिश है कि आप उस फाइल के बारे में भी पता करवाएं जो बाबरी मस्जिद के विध्वंश से जुड़ी थी. वो सारी की सारी कहां चली गईं, या बेच दी गईं या भेज दी गईं. बड़ी मेहरबानी होगी.

  • 24. 23:27 IST, 22 मई 2010 anjan southwest:

    रेणु जी! एक बात समझ में नहीं आती, जब-जब आतंक और हिंसा की बात आती है, नाम सिर्फ़ मुसलमान का ही क्यों आता है, क्या मुसलमान इतने बुरे हैं? हालांकि मैं हिंदू हूं, लेकिन अंधा नहीं. समाज में बदलाव लाना होगा जिससे ओसामा और कसाब जैसे लोग न पैदा हों, मुहम्मद रफ़ी और रहमान जैसे लोग पैदा हों जिनके आगे पूरी दुनिया सिर झुकाती है. जय मानवता, जय शांति.

  • 25. 07:59 IST, 24 मई 2010 kulwant happy:

    उम्दा लेख.

  • 26. 15:03 IST, 24 मई 2010 vijay thakur:

    बहुत ही उम्दा पोस्ट है.

  • 27. 16:24 IST, 24 मई 2010 यूसुफ अली अजीमुदीन खाँ (भींचरी), रियाद,�:

    हमारे देश की सुस्त और लापरवाह न्याय व्यवस्था के कारण अपराध ज़्यादा होते हैं, अफ़ज़ल का अपराध साबित हो गया और उसे सजा सुनाई जा चुकी, फिर उसे फाँसी क्यों नहीं दी जा रही है. शायद सरकार क़ंधार जैसी घटना का इन्तजार कर रही है.

  • 28. 20:04 IST, 01 जून 2010 arun:

    राजनेताओं की सहमति के बिना अधिकारी फैसले नहीं ले पाते. हमारा नेतृत्व ही भ्रष्ट हो चुका है.

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