राहुल की अमानत सुरक्षित है
मनमोहन सिंह कम बोलने और विवादित बयानों से दूर रहने के लिए मशहूर हैं और भारत में प्रेस से खुलकर कभी-कभी ही बात करते हैं. सोमवार की प्रेस कॉंफ़्रेंस में भी पत्रकारों को एक सवाल के बाद उससे जुड़ा हुआ दूसरा सवाल पूछने की इजाज़त नहीं दी गई.
उम्मीद के मुताबिक़ प्रेस कॉंफ़्रेंस में उनसे अलग-अलग विषयों पर सवाल पूछे गए लेकिन ज़्यादातर सवालों को वो या तो टाल गए या बहुत ही संक्षिप्त जवाब दिए और ज़्यादातर वही बातें दुहराईं जो वह विभिन्न फ़ोरमों में पहले भी कहते रहे हैं.
विदेश नीति पर सिर्फ़ पाकिस्तान से बात-चीत के हवाले से प्रश्न हुए लेकिन उन प्रश्नों में वह तीव्रता नहीं थी जो शर्मल-शैख़ घोषणा के बाद देखने में आए थे.
पाकिस्तान से बात-चीत पर उन्होंने विश्वास की कमी ख़त्म करने की बात की, माओवादियों को उन्होंने हमेशा की तरह सबसे बड़ा ख़तरा बताया, दूरसंचार मंत्री के कॉंट्रैक्टों में वह मंत्री डी. राजा को क्लीन चिट देने से कतराते नज़र आए, लेकिन गृह मंत्री पी चिदंबरम और पार्टी के अन्य नेताओं के बीच असहमति की ख़बरों के बारे में उन्होंने कुछ कहने से इनकार कर दिया.... "मेरे लिए इस बारे में कुछ कहना मुनासिब नहीं होगा, जब मौक़ा मिलेगा इन पर संसद में बहस होगी... मेरे पास फ़िलहाल पूरी जानकारी नहीं है...." ये बात बार बार सुनने को मिली.
शायद इसीलिए प्रेसकॉंफ़्रेंस की हाइलाइट किसी गंभीर विषय के मुक़ाबले सोनिया गांधी और उनकी पत्नी के बारे में एक प्रश्न रहा.
जवाब में मनमोहन सिंह ने कहा, मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि मुझे सोनिया गांधी और मेरी पत्नी गुरशरण कौर से लगातार सलाह मिलती रहती है. दोनों का विषय अलग-अलग होता है. और मैं दोनों की सलाह की क़द्र करता हूं.
और हमेशा की तरह राहुल गांधी के राजतिलक का सवाल भी उठा और उन्होंने फिर वही इम्प्रेशन दिया जिसे वह अब तक ख़त्म करने में विफल रहे हैं और वह यह है कि इस कुर्सी पर वे सिर्फ़ उस वक़्त तक बैठे हैं जब तक राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार नहीं हो जाते.
"मुझे कभी कभी लगता है कि नौजवानों को ये ज़िम्मेदारी संभालनी चाहिए. जब भी पार्टी ये फ़ैसला करेगी मैं ख़ुशी से कुर्सी छोड़ दूँगा."
मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों के बारे में पत्रकारों के जो सवाल थे वो तो अभी भी बने हुए हैं लेकिन राहुल गांधी को ये संदेश ज़रूर गया होगा कि उनकी अमानत प्रधानमंत्री के हाथों में सुरक्षित है.

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सुहैल भाई, कुर्सी कुछ भी करा सकती है. मतलब साफ़ है कि जिस तरह दिवंगत सीताराम केसरी के साथ हुआ, वैसा मनमोहन सिंहजी के साथ न हो इसलिए वो पहले ही कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार हैं. लगता है मनमोहन सिंह का ये सपना जल्द पूरा होने वाला है. पर कौन जानता है कि कांग्रेस को अगली बार ये गद्दी मिले कि नहीं.
जब तक राहुल गाँधी जैसे लोगों का देश की सबसे ऊंची कुर्सी के लिए सिर्फ़ इसलिए हकदार होना नहीं रुकता कि वो अपने मुंह में चाँदी की चम्मच लेकर पैदा हुए, मुझे नहीं लगेगा कि मैं एक स्वतंत्र गणतंत्र में रह रहा हूँ. मैं नहीं कहता कि उनमें प्रतिभा नहीं है, पर मुझे पूरा भरोसा है कि मेरे स्कूल का चपरासी का बेटा जो जेएनयू से पढ़कर प्रोफेसर बना है, उनसे ज्यादा मेधावी था और है - तो वो क्यूँ नहीं?
मनमोहन सिंह गांठ के पूरे हैं. वो ऐसे काम करते हैं जो सोनिया और राहुल को पसंद हों. उनमें भारत और भारतवासियों के लिए कोई दृष्टि नहीं है.
प्रधानमंत्री जानते हैं कि गांधी परिवार को चाटुकारिता हमेशा से ही पसंद रही है-- इंदिरा से लेकर सोनिया और राहुल तक. प्रधानमंत्री बने रहने के लिए मनमोहन सिंह को राहुल चालीसा पढ़ना ही पड़ेगा.
शाबाश मनमोहन जी आप अव्वल हैं. एक अरब की आबादी में आप जैसा कोई नहीं. श्रीमान, आप सिर्फ़ राहुल, सोनिया और प्रियंका की भक्ति कीजिए. आपने कोई लोक सभा का चुनाव थेड़े ही लड़ा है जो आप जनता के प्रति जवाबदेह होंगे. जिनकी शक्ति से आप शक्तिवान बन कर पीएम की कुर्सी से चिपके हुए हैं मरते दम तक उनसे बिगाड़ नहीं कीजिएगा. आपने कुर्सी तक पहुंचने का बहुत ही अच्छा रास्ता दिखाया है. इस रास्ते पर अगर बाक़ी नेतागण भी चलें तो चुनाव पर होने वाले ख़र्च बच जाएंगे और कुछ ग़रीब देश जैसे स्वीडेन की अर्थव्यवस्था सुधरेगी. आप प्रातः नमन करने योग्य हैं. आप बिल्कुल भी विचलित नहीं होते. भारत की जनता महंगाई से रो रही है, आतंक और नक्सल से परेशान है, और आपने उन्हें भगवान के हवाले छोड़ा हुआ है. आप जिस तरह से धार्मिक पक्षपात की बातें करते हैं वो तो लाजवाब हैं. राहुल जी को पीएम बनाना है इसलिए वोट की फ़स्ल उगाने का ज़िम्मा आपके ही कंधों पर है. सिर्फ़ इस तरह ही आप सोनिया जी का क़र्ज़ उतार सकते हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि अंतरराष्ट्रीय जगत आपको सर आँखों पर रखेगा, जैसे यूएसएसआर के राष्ट्रपति गोरबाचेफ़ को रखा गया था. अंतमें आपसे एक विनती है कि आप स्वार्थ को सीमा में रखकर कभी मातृभूमि के लिए भी सोचिए. यक़ीन कीजिए जनता आपको बहुत कुछ दे सकती है.
मैं मनमोहन सिंह जी के बारे में कल सुनी हुई और इनपर सटीक एक बात को दोहराऊंगा कि "प्रधानमंत्री सत्ता में तो हो सकता है लेकिन नियंत्रण में नहीं" ख़ैर जो भी हो, उन्हें 6 साल बाद सवाल के जवाब टालना आता है, और राहुल गाँधी के बारे में क्या कहूं? वो जब सत्य, अहिंसा, महात्मा गाँधी के विचारों की बात करते है तो यूँ लगता है मैं धार्मिक प्रवचन सुन रहा हूँ. मानो कांग्रेस कोई धर्म हो और वो उनके गुरु. क्यूंकि कांग्रेस के बारे में उनके विचार और कांग्रेस का क्रम मेल नहीं खाता, बिलकुल वैसे ही जैसे हमारे धार्मिक मूल्यों से हमारे धार्मिक गुरुओं के विचार और क्रम में फ़र्क़ है. उनसे ज़्यादा राजनीती की बातें बाबा रामदेव करते है.
सिर्फ़ राहुल ही प्रधानमंत्री के लिए हैं. और यह सारे भारतीयों की राय है. सिर्फ़ उन्हीं के पास प्रभामंडल है और वही देश को चला सकते हैं.
वर्तमान भारत में कांग्रेस की राजनीति केवल सोनिया जी, राहुल गांधी और उनके परिवार के बीते दिनों के प्रतीक हैं जिसका कांग्रेस पूरा इस्तेमाल कर रही है और भारतीयों के जज़बात से खेल रही है. कांग्रेस में ही बहुत सारे ऐसे युवा नेता हैं जिनको राहुल गांधी की तरह राजनीति विरासत में नहीं मिली है बल्कि वे अपने कारनामों और महानता के दम पर वहां पहुंचे हैं. उनके पास राहुल जी की तरह शोहरत नहीं है मगर उनसे भी ज़्यादा राजनीतिक अनुभव है. इसलिए कांग्रेस की राजनीति का मैं पूरा विरोध करुंगा और राहुल के प्रधानमंत्री बनने पर अपनी असहमति जताता हूं जबतक कि वे अपे कर्मों से प्रमाणित न कर दें कि वे भारत जैसे देश के प्रधानमंत्री बनने के योग्य हैं.
राहुल के लिए अमानत संभालके बैठे हैं मनमोहन सिंह और बार-बार उसका इज़हार भी कर चुके हैं. ठीक है राजनीति में ये होता रहता है और सियासी लोग इस तरह के बयान देते रहते हैं लेकिन हम पाक और हिन्द की राजनीति और संस्कृति को देखें तो हमें काफ़ी चीज़ें एक जैसी मिलेंगी, वो सीमा पार एक दूसरे से मिलने की आशा हो या सीमाओं के पार एक दूसरे के लिए दिलों की धड़कन का मामला हो, पाकिस्तान और भारत की जनता से अगर विचार पूछ लिए जाएं तो उनमें काफ़ी समानता नज़र आएगी. ख़ैर ये तो दोनों देशों की जनता का मामला हैं लेकिन यहाँ उसको कोई इसलिए नहीं पूछता कि अगर जनता की बात मानी गई तो फिर दोनों देशों की सेना के लिए भोजन का आयोजन कैसे होगा, सेना कितनी होनी चाहिए कितनी नहीं हम उसपर बात नहीं करते. हर देश को उसकी सुरक्षा के लिए सेना रखने का अधिकार है लेकिन ये अधिकार जनता के प्रेम की क़ीमत पर नहीं होना चाहिए, बात शुरु हुई थी मनमोहन सिंह के उस बयान से जो उन्होंने राहुल गांधी के लिए दिया है, इसमें कोई शक नहीं कि राहुल इस तरह कांग्रेस के वारिस है जिस तरह सोनिया जी हैं या जिस तरह प्रियंका जी हैं, जिस तरह पाकिस्तान में पीपुल्स पार्टी की वारिस बेनेज़ीर भूट्टो बनीं और अब उनके वारिस बलावल भूट्टो हैं, दोनो देशों के भुट्टो और गांधी घराने ऐसे हैं जिन्होंने अपने-अपने देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली और अमन की आशा के लिए काम किया लेकिन ये दोनों देशों का दुर्भाग्य है कि दोनों परिवारों को मौत की नींद सूलाया गया.
देखिए मनमोहन सिंहा जी एक रिमोट हैं और रिमोट का स्विच सोनिया जी के हाथ में है क्योंकि आज देश में इतने आधिक ज्वलंत मुद्दे हैं लेकिन सत्य यही है कि उन मुद्दों को हल करने के बारे में किसी भी पार्टी का कोई भी नेता नहीं सोचता है. सोचते तो सिर्फ़ यही हैं कि अपने बैंक बैलेंस को जल्दी से जल्दी भरा जाए, क्या पता कौन सी सरकार की कब अर्थी निकल जाए. इसलिए अगर नौजवान आगे आते हैं तो हमें इतनी हाय-तौबा मचाने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सिर्फ़ और सिर्फ़ नौजवान साथी ही अपनी क़ाबलियत के दम पर इस देश का भविष्य सुधार सकते हैं. और सबसे पहले तो एक क़ानून बनाया जाए जिसमें देश का प्रतिनिधित्व करने वाले युवक और युवतियों की आयु सीमा 20 से लेकर 55 साल तक होनी चाहिए. जब यही सरकार 60 साल बाद नौकरियों से रिटायर कर देती है तो हमारे नेता क्यों नहीं रिटायर होते. आप नज़र उठा कर देख लीजिए हमारे यहां जो नेता अपने बल पर चल नहीं सकते वो देश चलाने की बात करते हैं. इसीलिए आज की सबसे अहम ज़रूरत है कि युवाओं को आगे आने दिया जाए. इसे सिर्फ़ एक पार्टी में नहीं बल्कि हर पार्टी में किया जाना चाहिए.
सुहैल भाई कल की प्रेस कांफ्रेंस देखकर मेरे मनमें सिर्फ़ एक याद आई. एक बार विनोद दुआ ने दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से पूछा- नरेंद्र मोदी और आप दोनों तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं, भाजपा में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताया जा रहा है, आपको क्यों नहीं. उन्होने फिर पूछा - गांधी परिवार का हर सदस्य केवल प्रधानमंत्री बनने के लिए क्यों आता है, आख़िर वह कोई मंत्री क्यों नहीं बनता. इस प्रेस कांफ्रेंस में यही मामला साफ़ हुआ कि कांग्रेस (राजघराने?) का वारिस जब तैयार हो जाएगा, तो कामचलाऊ राजा को हटना होगा?
मेरे विचार में आधुनिक गंणतत्र या पुरातन राजनीति में कोई अधिक फ़र्क़ नहीं है. मुझे नहीं मालूम के लोग राहुल में क्या ख़ास देखते हैं. गांधी ख़ानदान से होने के अलावा उनमें कोई विशेष ख़ूबी नहीं है. वो अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर कुछ भी नहीं बोलते. वो नक्सल और उग्रवाद जैसे मुद्दों पर भी नहीं बोलते. क्या राजनीति केवल किसी दलित के घर जाना है तो सलामत रहे उनकी राजनीति.
किसी ने सच कहा है कि राजा का बेटा राजा होगा. ऐसा ही कुछ गांधी परिवार के साथ है. अगर राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं तो क्या बुरी बात है. भाई मनमोहन सिंह ने अपने दिल-व-दिमाग़ से लोगों का दिल जीत लिया है. भले ही वो कम बोलते हैं या सोनिया गाँधी के कहने पर किसी फ़ैसले पर पहुंचते हैं लेकिन इस में हर्ज क्या है.
राहुल गांधी देश के लिए भविष्य के नेता हैं और यह निर्विवाद है. दूसरा निर्विवाद सत्य यह है कि मनमोहन सिंह हमेशा प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे. यदि मनमोहन सिंह कहते हैं कि जब युवा नेतृत्व तैयार हो जाएगा तो मैं कुर्सी छोड़ देने के लिए तैयार हूं तो इसमें क्या ग़लत है? यह उनकी समझदारी है.
प्रधानमंत्री जानते हैं कि कुर्सी की बागड़ोर का रिमोट कहां है. इसलिए राहुल के सवाल पर वो उन्होंने राजनीति के एक मझे हुए खिलाड़ी की तरह जवाब दिया.
आपके ब्लॉग से एक बार फिर एक सवाल खड़ा हुआ कि एक ऐसा प्रधानमंत्री जो कहीं से ग्राम प्रधान तक का चुनाव नहीं जीत सकता हो या जीता हो वह उस जनता को जो 'वोट' डालती है उसके लिए क्यों नीति बनाएगा या बनवाएगा या बात करेगा वह तो पांच फीसदी लोगों की नीति बनाएगा जिससे उसकी कुर्सी सुरक्षित रहे. भारतीय लोकतंत्र का इससे बड़ा मजाक क्या होगा कि इतनी बड़ी पार्टी और देश में इस पर आवाज उठाने वाला कोई नहीं है, आप ने अपने ब्लॉग में कम से कम इस बात पर जिक्र किया है जो अपने मंत्रियों के बारे में ठीक से बात कराने को तैयार नहीं, किसी पत्रकार का जवाब नहीं दूसरे देश में क्या छवि गयी होगी? कहाँ है लोक तंत्र ?
मैं सुरजीत सिंह के साथ सहमत हूँ और यह जानना चाहता हूँ कि राहुल की कोई भी उपलब्धि बताई जाए जो देश की तरक़्क़ी के लिए की गई हो या फिर इससे मिलता हुआ कोई मुद्दा जो उन्होंने उठाया हो.
मनमोहन सिंह वास्तव में राजनीतिज्ञ हैं ही नहीं और अगर होते तो सोनिया उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनाती. वे तो पार्ट टाइम जॉब में लगे हुए हैं और जब भी राहुल गाँधी पद सँभालने को तैयार हो जायेंगे उन्हें कुर्सी छोड़ देनी होगी. इस पार्ट टाइम प्रधानमंत्री ने पिछले छह सालों में देश का जितना नुकसान किया है उतना शायद लालू ने बिहार का 15 साल में भी नहीं किया था.
दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति का इस तरह मीडिया के सामने गांधी परिवार के वारिस के लिए बोलना शोभा नहीं देता है.क्योंकि आप भारत जैसे देश में रहते हैं, जहाँ सबको समान नज़र से देखा जाता है. न की किसी विशेष के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना.