जया और माया...
उत्तर प्रदेश में दो नई, अप्रत्याशित घटनाएँ घटीं. समाजवादी पार्टी ने जया बच्चन को दोबारा राज्य सभा के लिए उम्मीदवार बनाया तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री मायावती ने विधान परिषद के लिए अपना नामांकन दाखिल करते हुए बतायाकि उनकी सम्पत्ति बढ़कर 87 करोड़ हो गई है.
दरअसल जया बच्चन को लेकर तभी से अटकलें लगाई जा रही थीं, जब अमर सिंह को समाजवादी पार्टी से निकाला गया था. समाजवादी पार्टी ने उस समय रामपुर से सांसद जया प्रदा को तो पार्टी से निकाल दिया था, लेकिन अमर सिंह से घनिष्ठता के बावजूद जया बच्चन को नहीं छुआ था.
तब जया बच्चन ने कहा था कि वह राज्य सभा का अपना छह महीने का बचा कार्यकाल पूरा करना चाहेंगी, मगर पार्टी चाहे तो उससे पहले उन्हें दल से निकाल सकती है.
इस बयान को देखते हुए प्रेक्षकों का अनुमान था शायद समाजवादी पार्टी जया बच्चन को दोबारा प्रत्याशी न बनाए.
कुछ लोगों का कहना है कि मुलायम सिंह यादव ने अमिताभ बच्चन और उनके परिवार को अमर सिंह से अलग करने के लिए यह दांव चला है, जबकि अन्य लोगों का कहना है कि अमर सिंह ने चालाकी से जया बच्चन को समाजवादी पार्टी से दोबारा राज्य सभा भेजने का इंतजाम कर दिया है.
उधर मायावती की घोषित संपत्ति लगभग 87 करोड़ है जो अब से तीन साल पहले उनकी घोषित संपत्ति 52 करोड़ थी.
आने वाले कुछ समय में जया और माया मीडिया में छाई रहेंगी, हालाँकि अलग-अलग कारणों से...

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
जहाँ तक जया के अमर का साथ छोड़ने की बात है तो वर्तमान भारतीय राजनीति में नैतिकता का कोई स्थान ही नहीं रह गया है. राजनीति में सिर्फ अवसरवाद बच गया है. माया तो राजनीति में माया के लिए ही आई हैं इसलिए उनके पास माया का बढ़ना कोई आश्चर्य नहीं देता. वैसे यह सिर्फ माया की ही बात नहीं है. लगभग सभी राजनीतिज्ञ काफी तेजी से माया जोड़ने में लगे हैं. विश्वास नहीं हो तो सरकार निष्पक्ष जाँच करवा ले लेकिन जाँच वास्तव में निष्पक्ष होनी चाहिए. अंतर इतना ही है कि जो काम बाक़ी लोग छिपाकर करते हैं मायावती उसे खुलेआम करती हैं. हमारे अधिकतर राजनेता राजनीति में पैसा जोड़ने के लिए आए हैं, कोई समाज सेवा या देश सेवा करने के लिए राजनीति में नहीं आया है.
यह मज़ेदार लेकिन कड़वा सच है.
रामदत्त त्रिपाठी जी, जब हर बार अमर सिंह जी चाल चल सकते हैं तो इस बार वही दांव मुलायम सिंह ने चल दिया है. राजनीति में इस तरह के पैंतरे रोज देखने को मिलते हैं.यहाँ कोई किसी का सच्चा दोस्त नहीं है और नहीं कोई किसी का दुश्मन. यहाँ सब समय-समय पर बदलता रहता है. अपना-अपना पेट भरने के लिए लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं. अब जया जी हों या माया जी सब पैसा और अपनी शक्ति बढ़ाने में लगे हुए हैं. किसी को किसी की परवाह नहीं है. जो लोग राजनीति के पक्के खिलाड़ी हैं वे इस तरह के खेल में परिपक्व हो चुके हैं. अब देखना यह है कि राजनीति में देश के बारे में सोचने वाले आएँगे या सिर्फ़ अपना मकसद देखने वाले.
रामदत्त जी, आप अपने लेख में क्या कहना चाहते हैं, यह समझ से परे हैं. रहा सवाल इन नेताओं का तो इन पर चर्चा करना ही बेकार है.दुख इस बात का है कि मायावती दलितों और ग़रीबों की देवी का नारा देती हैं और 87 करोड़ रुपए की मालकिन बन बैठी हैं. वे धन की पूजा कर रही हैं. रहा सवाल जया बच्चन का तो वे बिना स्वार्थ अमर सिंह या मुलायम सिंह के साथ नहीं रहती हैं. यह पैसा ही बेईमानी और चोरी का है. इन पर बहस करना अपना समय नष्ट करने के जैसा है.
जया बच्चन का समाजवादी पार्टी द्वारा राज्यसभा के लिए फिर से उम्मीदवार तय करना कोई अचरज की बात नहीं है. यह स्वभाविक था. इसके आसार पहले से ही दिख रहे थे. जया ने कभी भी अमर सिंह का पार्टी छोड़ने के बाद खुलकर साथ नहीं दिया और ना ही उनके सुपरस्टार पति अमिताभ बच्चन ने ही अमर वाणी में मुलायम के खिलाफ कोई राग छेड़ा. ऐसे हालात में जया को राज्यसभा का टिकट नहीं देना कुछ ऐसी स्थिति नहीं बन रही थी. रही बात माया की धन में बढ़ोतरी की तो यह दिनों दिन की प्रगति है, यह भी चौकाती नहीं है, हाँ यह बात अच्छा है कि वह समय-समय पर अपने इस स्थिति को सार्वजनिक करती रहती है.
यह राजनीति है. बाहुबल और पैसे के बल पर देश में कुछ भी हो सकता है. जबतक आंकड़ों का खेल चलता रहेगा, सब कुछ संभव है और जनता मुँह ताकती रह जाएगी.
कहानी में कुछ भी नया नहीं है. राजनीति में सब कुछ जायज है. जनता केवल तमाशाबीन है.
रामदत्त जी, आप भी कहाँ माया और जया के चक्कर में पड़ गए. आख़िर नेता गेम शो न करें तो करें क्या. बेचारों के पास जनता के लिए करने को तो कुछ है नहीं. आज तो नेताओं के बीच यह दौर प्रारंभ हो गया है कि कौन जनता को कितना बेवक़ूफ़ बना सकता है और कौन कितना धनी हो सकता है. चाहे यह पैसा दलितों का पेट कर कर ही क्यों न कमाया गया हो. जनता फिर भी सलाम और प्रणाम के चक्कर में पिस जाती है.
माया को अपनी आमदनी का स्रोत बताना चाहिए और जया को अपनी उपलब्धियाँ.
दोनों नेताओ में एक समानता है-राजनैतिक महत्वाकांक्षा.मायावती किसी भी कीमत पर सत्ता में बनी रहना चाहती हैं. कांग्रेस के साथ वो कोई भी सौदा करने को राजी हैं,जिससे आगे चलकर के भारत के प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना पूरा हो सके. जया जी किसी भी कीमत पर अपना राजनैतिक आधार खोना नहीं चाहतीं. उन्हें इससे मिलने वाली ताकत का अंदाज़ा है. ये दोनों अपनी महत्वाकांक्षा के आगे लाचार हैं.
रामदत्त जी, बात चाहे मायावती की हो या किसी और नेता की, इस हमाम में सभी नंगे हैं. मायावती ने तो खुद कहा है कि वो माया की देवी हैं तो माया उनसे दूर जा ही नहीं सकती. जहां तक जया बच्चन का सवाल है, वो मायावती के एहसान की कीमत अदा कर रही हैं. लेकिन अमर सिंह और मुलायम सिंह-दो पाटों के बीच पीसकर. नेताओं का उद्देश्य रहा है-पहले स्वार्थ सेवा फिर देश सेवा. अगर इन नेताओं की सारी संपत्ति जब्त कर गरीबों पर खर्च करें तो देश की सारी गरीबी दूर हो जाएगी.
बात जया की हो या माया की , बात लालू की हो या राबड़ी की, सोनिया जी की हो या राहुल की, दरअसल बात राजनीति और सियासत की है. ये नेता लोग जो आज इधर और कल उधर होते हैं उनका मसला बस कुर्सी होता हैं. इनको बड़ा पद चाहिए. बस, इस गठजोड़ के लिए वो किसी का भी ज़मीर खरीदने की बड़ी कोशिश करते हैं. हम इन नेता लोगों पर विश्वास भी करते हैं लेकिन कभी-कभी ये सवाल अचानक उभर आता है कि ये विश्वासघात क्यों करते हैं. यहां एक और भी सवाल पैदा होता है कि जितना शक जनता इन नेताओं पर करती है क्या किसी और पर किया जाता है? जी! जितना शक उन पर किया जाता है उससे ज़्यादा उन पर भरोसा भी तो होता है और उसका इज़हार उनको वोट दे कर किया जाता है. हम राजनीतिक संस्कृति की बात कर रहे हैं जो हमारे देशों की आम समस्या है.
रामदत्त जी, अगर आप वर्तमान भारतीय राजनीति की सभी प्रमुख महिलाओं जैसे सोनिया गाँधी,मायावती, सुषमा स्वराज,वसुंधरा राजे,उमा भारती, ममता बनर्जी,जय ललिता... आदि के जीवन संघर्षों और उपलब्धियों की तुलनात्मक व्याख्या करते तो आपका तर्क निष्पक्षता की सीमा का अतिक्रमण या उल्लंघन नहीं करता.
इस बारे में कानून बनना चाहिए कि राजनीतिज्ञ एक हद तक ही पैसा रख सकते हैं या किसी भी पद पर दो बार से ज्यादा नहीं बने रह सकते.
मेरा मानना है कि ब्लॉग में वैचारिक बहस शुरू करने की क्षमता होनी चाहिए. अगर सूचना ही देनी है, तो खबर और ब्लॉग में अंतर क्या रह जाएगा. त्रिपाठी जी के विश्लेषण का कायल हूं, लेकिन यह पोस्ट देखकर निराशा हुई. जया और माया की जोड़ी पर त्रिपाठी जी अगर अपनी राय रखते, तो ज्यादा अच्छा होता.
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बहन मायावती ने कहा कि मेरा तो नाम ही 'माया' है. सामान्यतया माया का अर्थ हर उस वस्तु के लिए उपयोग में लाया जाता है जिससे कुछ प्राप्त हो रहा हो यथा धन दौलत हीरे मोती जवाहरात समृद्धि का हर वह इंतजाम जो आम आदमी को मुहैया नहीं होता, जब इस तरह की माया आने लगती है तो वह मायामय हो जाता है.
"कबीर दास" को लगता है माया कभी रास नहीं आयी तभी तो उन्होंने कहा "माया महाठगनी हम जानी". उन्हें जरूर माया ने ठगा रहा होगा यानि जब भी वह माया के चक्कर में पड़े होंगे तो ठगे जरुर गए होंगे, पर जया और माया को एक साथ जिस नज़रिए से त्रिपाठी जी ने देखा हो वह राजनीति में तो होता ही है.
जया फिल्म अभिनेत्री होने का फल काट रहीं है और माया को दलित सशक्तिकरण का फल मिल रहा है. शायद हम एक बात को भूल जाते हैं जो जौर्ज ओरवेल ने कहा था- जिसके पास पैसा और सत्ता आ जाते हैं वो न तो गरीब रहा, न ही दलित और बस वो गरीबों और दलितों को मूर्ख बनाता है. गरीब और दलित इन दोनों से कोई अपेक्षा न रखें तो अच्छा है...
बहनजी कम से कम अपनी आय घोषित तो कर रही हैं. धीरे -२ आय के स्रोत भी सार्वजनिक होंगे थोडा इंतज़ार करना पड़ सकता है. वरना यहाँ गुदड़ी के लाल फटेहाल बनकर गरीब जनता के गाढ़े पसीने की कमाई गटक जाते हैं और गज़ब का हाजमा कि डकार भी नहीं लेते. राजनीति में कौन किसका सगा है दुनिया सब जानती है. अमर कथा का तो कहना ही क्या. इसका भेद तो वे ही जानें ! इतना ज़रूर है जया बच्चन ने जो निर्णय लिया बिलकुल सही है. कीचड़ के दलदल में घुसने का क्या फायदा ?
माफ कीजिए समझ में नहीं आ रहा है कि आप क्या लिखना चाह रहे हैं.
अच्छी टिप्पणी है.
जया और माया के बीच कोई तुलना नहीं है, शीर्षक बदलें. माया के सामने जया की कोई हैसियत नहीं है.
हमारे यहां के नेताओं का एक ही मकसद है कि चर्चा में रहना और उसका राजनीतिक फायदा उठाना.