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जादूगोड़ा की याद दिलाता है दिल्ली का मामला

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 03 मई 2010, 13:41 IST

कोबाल्ट 60 पर आजकल बड़ा बवाल है. रेडियोऐक्टिव पदार्थ है जो दिल्ली विश्वविद्यालय के लैब से मायापुरी कबाड़ी मार्केट पहुंचा. इस कोबाल्ट 60 ने एक की जान ले ली और कुछ को प्रभावित किया.

बड़ी ख़बर बनी और केंद्र सरकार ने संज्ञान भी लिया लेकिन रेडियोऐक्टिविटी का ये भारत में पहला मामला नहीं है.

झारखंड के जमशेदपुर से तीस किलोमीटर दूर जादूगोड़ा में यूरेनियम की खदान है और वहां पिछले चालीस सालों से लोग यूरेनियम कचरे के साथ जीवन यापन करने को मजबूर हैं.

शायद दिल्ली से दूर है जादूगोड़ा इसलिए वहां रेडियोऐक्टिव विकिरणों के प्रभाव पर कोई बवाल नहीं होता है.

जादूगोड़ा आदिवासी बहुल पहा़ड़ों से घिरी एक छोटी से कॉलोनी है जहां भारत की एकमात्र सक्रिय यूरेनियम की खान है. यूरेनियम निकालने के बाद बचे हुए कचरे को कारखाने के पास में ही फेंक दिया जाता है.

इस हज़ारों टन कचरे के पास बड़ी संख्या में लोग रहते हैं. चूंकि विकिरणों का प्रभाव धीरे धीरे गुणसूत्रों पर पड़ता है इसलिए यहां के बच्चों में अजीब तरह की बीमारियां पाई जाती हैं और गौर से देखने पर इन बीमारियों और हिरोशिमा के बच्चों में पाई गई बीमारियों मे समानता देखी गई है.

ये बात मैं नहीं कह रहा बल्कि न्यूकलियर साइंस से जुड़े वैज्ञानिक ऊर्जा नियामक बोर्ड से जुड़े पूर्व वैज्ञानिक इसे मान चुके हैं.

ग्रीनपीस ने इस पर रिपोर्ट लिखी है और कुछ वर्ष पहले ( जब झारखंड बिहार का अंग था) राज्य विधानसभा की पर्यावरण कमेटी ने जादूगोड़ा का दौरा करने के बाद भी यह बात मानी थी.

आज जादूगोड़ा की लड़कियों से जल्दी कोई शादी नहीं करना चाहता क्योंकि यहां मरे हुए बच्चे पैदा होने, गर्भ गिर जाने और आनुवंशिक रुप से विकलांग बच्चे होने की समस्या आम होती जा रही है.

ज़ाहिर है यूरेनियम खनन करने वाली कंपनी यूरेनियम कारपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड इस मामले को दबाती हैं और आवाज़ उठाने वालों को धमकाती भी हैं.

दिल्ली से दूर का मामला है और शायद तथाकथित राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है तो केंद्र सरकार भी इस मुद्दे पर बहस से बचती है

कुछ समय पहले भारत सरकार ने न्यूकलियर बिल पर बहस की थी लेकिन वो पास नहीं हुआ.

इस बिल के तहत प्रावधान थे कि अगर किसी परमाणु संयंत्र के आसपास कोई घटना होती है तो लोगों का कैसे ख्याल रखा जाएगा.

इस बिल के विरोधियों का तर्क यह भी था कि विकिरणों का प्रभाव कई पीढ़ियों तक रहता है इसलिए मुआवज़े की व्यवस्था उसी प्रकार की होनी चाहिए.

ये बिल अभी पास नहीं हुआ है. मैं तो बस इतना जानना चाहता हूं कि जब सरकार पहले से भी विकिरणों से प्रभावित लोगों का ख्याल नहीं रख रही है तो किसी घटना के बाद कैसे ख्याल रखेगी ये तो भगवान ही जाने.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 20:14 IST, 03 मई 2010 jai kumar jha:

    बेहद दुर्भाग्यपूर्ण ,सरकार को इस ओर तुरंत ध्यान देना चाहिए / अच्छी प्रस्तुती के लिए आपका धन्यवाद /

  • 2. 19:06 IST, 05 मई 2010 Virag Sharma :

    निरुपमा की कहानी को सामने लाने के लिए बीबीसी का धन्यवाद. मेरा मानना है कि इसका कारण भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट के लिए केवल दिल्ली ही अहम है जबकि सारे भारत की कोई अहमियत नहीं है.

  • 3. 23:30 IST, 10 मई 2010 आलोक मिश्र:

    रेडियोधर्मिता जैसे अतिसंवेदनशील मसले पर लिखा गया आपका यह लेख सरकारी तंत्र की पोल खोलने के लिए काफी है। खुद मुझे जादूगोड़ा की हकीकत का पता नहीं था, सरकारी अमले ने इस मसले को छुपा कर रखने के लिए कितने पापड़ नहीं बेले होंगे? यहां तो बाड़ी के खेत खाने वाली कहावत चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। भारत सरकार और इसके परमाणु कार्यक्रमों के माथे पर जादूगोड़ा कलंक की मानिंद है। देश की ऊर्जा और सुरक्षा ज़रुरतों की अहमियत तो समझ में आती है लेकिन क्या उसके लिए अपने ही हजारों नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ किया जाना ज़रूरी है? बिल्कुल नहीं कम से कम मैं तो ऐसा नहीं समझता। सरकार को लीपापोती की अपनी आदत से बाज़ आना चाहिए और अब वहां रेडियोधर्मिता का शिकार बनने के लिए लोगों को नहीं छोड़ा जाना चाहिए, उन्हें उचित मुआवज़ा देकर उनकी उचित बसाहट का इंतज़ाम किया ही जाना चाहिए और वहां रेडियोधर्मिता को कम करने के प्रयास भी किए जाने चाहिए।

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