कैसे समाज में रहते हैं हम
उसे मिटाओगे
एक भागी हुई लड़की को मिटाओगे
उसके ही घर की हवा से
उसे वहां से भी मिटाओगे
उसका जो बचपन है तुम्हारे भीतर
वहां से भी
मैं जानता हूं
कुलीनता की हिंसा ! ( आलोक धन्वा की कविता का अंश)
निरुपमा पाठक से मेरा कोई नाता नहीं था लेकिन उसकी मौत ने झकझोर कर रख दिया है. इसलिए नहीं कि वो पत्रकार थी. इसलिए भी नहीं कि वो आईआईएमसी में मेरी जूनियर थी और इसलिए भी नहीं कि वो अलग जाति में शादी करना चाहती थी.
मेरे दिलो दिमाग को ये बात परेशान किए जा रही है कि क्या सचमुच इज्जत के नाम पर निरुपमा की हत्या कर दी गई. पुलिस इस बात को मानती है और इसी आधार पर जांच भी चल रही है. निरुपमा हरियाणा के खाप पंचायतों के कोप का शिकार नहीं हुई. वो अशिक्षित नहीं थी. उसके परिवार को मध्ययुगीन रुढ़ियों में जकड़ा हुआ भी मानना संभव नहीं.
ये मुद्दा कुलीन हिंसा का है. निरुपमा का परिवार पढ़ा लिखा और तथाकथित संभ्रांत परिवार है. पिता राष्ट्रीयकृत बैंक में अधिकारी हैं. वो अपनी बेटी को पढ़ने के लिए दिल्ली भेजते हैं लेकिन बेटी जब अलग जाति में शादी करना चाहती है तो उसे सनातन धर्म का हवाला देते हुए कहते हैं, 'अपने धर्म एवं संस्कृति के अनुसार उच्च वर्ण की कन्या निम्न वर्ण के वर से ब्याह नहीं कर सकती. इसका प्रभाव हमेशा अनिष्टकर होता है.'
कुलीन हिंसा ख़तरनाक होती है खाप पंचायतों की हिंसा से. क्योंकि वो ख़ुद को सही साबित करने की पूरी कोशिश करती है और कई बार सफल भी होती है. ये मध्य वर्ग है जो आगे भी बढ़ना चाहता है लेकिन अपनी पुरानी सड़ी गली रुढ़ियों की जंज़ीरें तोड़ना नहीं चाहता है.
वो अपने बच्चे को पढ़ाता लिखाता है. आईएएस बनाना चाहता है लेकिन दूसरी बिरादरी में शादी नहीं करने देना चाहता. समझ में नहीं आता कैसा प्रगतिशील देश है हमारा जहां बाप अपनी बेटी की मौत पर आंसू नहीं बहाता और पोस्टमार्टम रिपोर्ट को झुठलाते हुए कहता है कि बेटी ने आत्महत्या की है.
निरुपमा पत्रकार थी इसलिए उनके मित्रों ने मामले को ख़त्म नहीं होने दिया. वरना न जाने हर दिन बिहार, बंगाल, झारखंड, राजस्थान और पूरे देश में कितनी निरुपमाओं को जाति-बिरादरी के नाम पर बलि कर दिया जाता है.
हां ये ज़रुर है कि इसकी जानकारी कम मिल पाती है क्योंकि तथाकथित सभ्य समाज इस पर पर्दा डाल देता है.
आज निरुपमा की मां अपनी बेटी की हत्या के सिलसिले में गिरफ़्तार है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट साफ़ कहती है निरुपमा का गला घोंटा गया है. कहीं न कहीं कोई अपना ही ज़िम्मेदार है लेकिन लगता नहीं कि उन्हें इसका ज़रा भी अफ़सोस हैं क्योंकि उनके चेहरों पर जाति का दंभ साफ़ दिखता है.
निरुपमा ने और उसके अजन्मे बच्चे ने विजातीय प्रेम की बड़ी क़ीमत चुकाई है. निरुपमा ने तो जीवन के 23 साल देखे. प्रेम भी किया लेकिन उस बच्चे का क्या कसूर था जो उसके गर्भ में था. अगर निरुपमा के गर्भ में बेटी थी तो अच्छा हुआ वो दुनिया में आने से पहले ही चली गई क्योंकि ऐसे समाज में लड़की होकर पैदा होना ही शायद सबसे बड़ा गुनाह है.
मुझे घिन आती है ऐसे समाज में जिसमें हम ख़ुद को जन्म देने वाली नारी को भी मार डालने से नहीं चूकते हैं वो भी एक ऐसी पहचान ( जातिगत) जिसका कोई अर्थ नहीं.
अगर निरुपमा की हत्या हुई है तो उसके हत्यारों को सज़ा मिलनी ही चाहिए चाहे ये हत्यारे उसके अपने ही क्यों न हों..

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सच में हैरान और स्तब्ध करने वाली घटना. आपका गुस्सा और निराशा बहुत सही है. ऐसे समाज का क्या करियेगा. इस घटना को और व्यापक रूप में देखें तो चिंता के जंगल माथे में उग आते हैं. कुछ सूझता नहीं है.
निरुपमा की मौत इज्ज़त के नाम पर की गई थी या फिर किसी कारण से ...उम्मीद है जांच के बाद सामने वो सच सामने आए? उसकी मौत के लिए जो भी जिम्मेदार है उसको सजा तो मिलनी चाहिए ...साथ ही जिस हालत में वो थी वो हालात अकेले उसने नहीं पैदा किए हैं...इसके लिए उसके साथ जुड़े लोग भी जिम्मेदार हैं.....इसमें माता पिता, भाई,प्रेमी या फिर कोई और....पूछ-ताछ उनसे भी होनी चाहिए...
मैं मानता हूं कि यह एक बहुत ही ग़लत हुआ है, लेकिन जो समाजिक बंधन मां बाप को ऊपर होता है उसे समझने की ज़रूरत है, क्योंकि एक कुंआरी बेटी के बाप की अपनी कुछ मजबूरियां भी होती है.
भ्रष्टाचार ने आम लोगों के बीच दुख और अभाव का वो तांडव पैदा किया है कि सामाजिक व्यवहार और संस्कार पूरी तरह मिटने के कगार पर हैं. लोगों की जिन्दगी और मानवता के प्रति लगाव और समर्पण मरने की अवस्था में पहुँच चूका है. सुशील झा जी अच्छी प्रस्तुती है.
निरुपमा के साथ जो हुआ उसपर सब दुख जता रहे हैं, मेरा सीधा सावल यह है कि यदि ऐसी घटना आपके घर में होती है तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? असल सवाल यह ही है और यही तय करेगा समस्या को.
निरूपमा एक पत्रकार थी उसके साथियों ने उसकी हत्या के बाद मामले को पूरी ताक़त के साथ समाज के सामने पेश किया है. इसमें कोई शक नहीं है कि न जाने कितनी निरूपमा(एं) आए दिन विजातीय विवाह करने के कारण मौत का शिकार हो रही हैं. अपनी नाक समाज के सामने उंची रखने की ज़िद ने अपने ही वंश को मिटाने तक का जघन्य अपराध करने के लिए कैसे तैयार होते हैं लोग आश्चर्य होता है. इसकी सज़ा तो अवश्य मिलनी चाहिए.
निरुपमा के माता-पिता आमिर अजमल क़साब जैसे दोषी हैं और उन्हें वही सज़ा मिलनी चाहिए जो क़साब को मिलने वाली है. क़साब ने अपने दुशमनों (जो उसे सिखाया गया) पर हमला किया जबकि निरुपमा के माता-पिता ने अपनी ही बेटी की हत्या की है. इन्हें फांसी की सज़ा होनी चाहिए.
सुशील जी इतना ग़ुस्सा ठीक नहीं क्योंकि ये सच है कि अगर गर्भ में बच्चा था तो शादी से पहले ये सब किस समाज में सही माना जाता है? जीवन साथी चुनने का अधिकार हर महिला को हो. सुशील जी प्यार को सही माना जा सकता है लेकिन प्यार के बाद बहाव में बहने को कैसा दुरुस्त माना जा सकता है.
आज भी हम कितने पढ़ लिख लें, लेकिन हमारा स्भाव नहीं बदला है. हम आज भी इज़्ज़त की दुहाई देकर अपना नुक़सान कर रहे हैं. यह मेरी समझ से बाहर है कि क्यों हम ऐसा कर रहे हैं. इस घटना से साबित होता है कि हमने पढ़ लिख लिया है लेकिन दिमाग़ आज भी नहीं बदला है और अपनी झूठी शान पर गर्व कर रहे हैं. हम आज भी पाषण युग में रह रहे हैं.
हत्या प्रत्येक स्थिति में हत्या नहीं होती. सीमा पर युद्ध के दौरान की गई हत्या को किसी भी स्थिति में हत्या नहीं माना जा सकता. इज्जत के नाम पर की गई हत्या की व्याख्या भी परिस्थितियों पर नज़र डाले उचित-या-अनुचित नहीं कहा जा सकता.
इस मामले में जो लोग माता-पिता के ख़िलाफ़ हैं उनसे मेरा सीधा सवाल यह है कि अगर उनकी बहन या बेटी 'नाजायज़ रिश्ते' अपनाती तो वो क्या करते? क्या वो उनकी तारीफ़ करते......? कहते बहन या बेटी आपने क्या ही अच्छा काम किया है....? तुम तो महान हो.... ? ईमानदारी की बात यह है कि वो ग़लत थी... और ऐसे लोगों को समाज में रहने का कोई हक़ नहीं है. ऐसे लोग समाज पर धब्बा हैं.
जो लोग निरुपमा के रिश्ते का समर्थन कर रहे हैं दरअसल वो पाखंडी हैं.
मेरा मानना है कि किसी को भी किसी के परिवारिक मामले में कूदने का अधिकार नहीं है. ये बात जाननी चाहिए कि एक माता-पिता ने अपनी बेटी के कारण ही उसे खोया है और फिर उसे जेल (फ़िलहाल) जाना पड़ रहा है. ये तथाकथित आधुनिक दरअसल चरमपंथी तालेबान जैसे ही हैं.
ये बहुत ही आम घटना है और मैं इससे अचंभित नहीं हुई क्योंकि मैं अपने समाज के दोहरेपन से भलीभांति अवगत हूं. मैं व्यवस्था की कमी को भी जानता हूं. हम अपने समाज के तालेबानी मानसिकता से भी अवगत हैं. ये एक घिनौनी हत्या है., हालांकि ऐसी घटनाएं रोज़ ही होती है. अगर निरूपमा पाठक एक पत्रकार नहीं होती तो शायद यह मामला सामने आता भी नहीं.
निरुपमा ने जो भी किया वो भी सही नहीं था. बाक़ी आगर ये सब अपने घर में हो तो असलियत का पता चलता, वैसे दूरे बैठे बाते बनाना आसान है. लेकिन अकेली लड़की क्यों, लड़के को भी सज़ा मिलनी चाहिए थी.
निरुपमा की हत्या पहले से ही रसातल में जा रही रिश्तों की मर्यादा के ताबूत पर आख़िरी कील है. सामाजिक विकृतियाँ ममता जैसे पवित्र रिश्ते पर भी इस तरह भारी पड़ सकती है. यह सच झंझोड़ देने वाला है. इससे पूरे प्रकरण में अब चाहे जो भी कार्रवाई हो सच तो ये है कि इस संकुचित समाज में निरुपमा जैसी कई मासूम जानें जाती रही हैं. और अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि शायद जाती भी रहेंगी. और हम सब सिर्फ़ हाथ पर हाथ धरे इस पतन के गवाह बनते रहेंगे. महिलाएं किस तरह तमाम बंधनों में जकड़ी हुई हैं ये जानने के लिए हमें खाप पंचायतों में जाने की ज़रूरत नहीं. तथाकथित शिक्षित और बुद्धिजीवी वर्ग भी ऐसे मामलों में उनसे कंधे से कंधा मिलाकर चलता है. अफ़सोस....और... शर्मनाक.
कुछ महाशयों ने बहुत बड़ा सवाल खड़ा किया है की अगर ऐसा किसी के अपने घर में होता तो क्या करते? तो आपके कहने का क्या आशय है? कि हम भी निरुपमा के परिवार को आदर्श मान लें और उन्होंने जो किया उस पर चुप्पी साध ले? ये बेहद शर्मनाक सोच है.
अगर आप व्यक्तिवाद का समर्थन करते हैं और इस तरह की घटना का समर्थन करते है तो कृपया पश्चिमी देशों की पारिवारिक और सामाजिक स्थितियाँ देखें और ख़ुद से सवाल पूछें कि क्या व्यक्तिवाद सही है इस हद तक कि आप अपने माता-पिता की भावना की परवाह नहीं करते है और किसी के साथ भी अवैध संबंध बना लेते हैं ....
भारत में ये सब सामान्य बात है. तथाकथित उच्च लोग बड़ी शान से ये सब करते हैं.
अगर कोई कूड़ा साफ़ करने वाला मिल जाए तो कहते हैं "अरे कहीं छू न जाए".
और उनके परिवार की कोई महिला या लड़की मिल जाए तो "सब ठीक है".
हिंदू समाज का पतन और हरास इन बातों के कारण ही हुआ है और होता जा रहा है. जय भारत..जय संविधान.
मैं नही जानता की तुम कौन हो क्या हो लेकिन आप यदि किसी ऊँची जाती से हो तो उस पर दंभ करना छोड़ दो क्योंकि उसमे न तो तुम्हारा और न ही तुम्हारे घर वालो का कोई योगदान है. दूसरी बात अगर आप जैसे लोग समाज में है तो इस दुनिया से माँ बहन और बेटी का नामोनिशान मिट जाना चाहिए. तुम अपने अंदर झंकार देखो तुम मुझे कुंठित लगते हो
निरुपमा शादी से पहले गर्भवती हो गई और वो अपने से अलग जाति के युवक स ब्याह करना चाहती थी. यहां जो महानुभाव उसके माता पिता को सही ठहरा रहे हैं. मैं उनसे ये पूछना चाहती हूं कि क्या किसी की हत्या करना उचित है. अफसोस है मुझे ऐसे दोगले समाज पर और लोगों पर. मेरी भगवान से प्रार्थना है कि निरुपमा को न्याय मिले.
एक सवाल परंपरा के ठेकेदारों से...जिनको उसकी हत्या पे कोई अफ़सोस नहीं और यहाँ सही ठहरा रहे हैं उनसे...
औरत और इज्जत कब अलग होंगे ?
क्या इज्जत को ढ़ोने का सारा THIKA औरतों के सर ही क्यों?
जरा ये बोझ मर्दों के सर भी तो हो...
मुझे आश्चर्य है कि 21 वीं सदी में हमारी सोच इतनी सड़ी हुई है. किसने किसी को अपने ही बच्चे की हत्या करने का अधिकार दिया. उसे घर से निकाल देते. उम्मीद है कि जिन लोगों ने उसकी हत्या की उन्हें जेल हो.
संपादक जी, आप किसी पर भी दोषारोपण कर सकते हैं क्योंकि यह आपका व्यवसाय है. आपको उन माता-पिता और बहन-भाई के बारे में भी सोचना चाहिए जिनके कुछ सपने थे जो उनकी आँखों के सामने टूट गए. समस्या है मीडिया, आपके जैसे पत्रकार जो अपराधी का फ़ैसला स्वयं सुना देते हैं. मुझे आप जैसे लोगों से घृणा है.
यह बदलाव का दौर है जहां हमारे बच्चे पश्चिमी सभ्यता की ओर जा रहे हैं. दस बीस साल के बाद सभी पश्चिमी सभ्यता को फॉलो करने लगेंगे. मैं यही कहूंगा कि अगर मेरे परिवार में ऐसा होता तो मैं भी यही करता. मुझे लगता है कि यहां टिप्पणी देने वाले कई लोग भी ऐसा ही करते. लेकिन वो यहां झूठ बोल रहे हैं. वो तब तक ये बात नहीं मानेंगे जब तक उनके घर में ऐसी स्थिति नहीं बनती.
भीम सिंह जी मैं आपकी टिप्पणी से पूरी तरह से सहमत हूं। पाखंड हमारे समाज में कूट-कूट कर भरा है। हमें तरक्की चाहिए। लेकिन तरक्की पसंद सोच नहीं। हम दुनिया देखना चाहते हैं, लेकिन मन की खिड़कियां खोलना हमे मंजूर नहीं। हम आधुनिक बनें लेकिन ऊपर हमारे दकियानूसी विचारों का तानाबाना जस का तस बरकरार रहे। ये हमारे तथाकथित प्रगतिशील समाज का मजमून है। जहां कथित बेहयाई के लिए कई निरुपमा के पर कतर दिए गए हैं। कई पढ़ी लिखी और सक्षम होने के बावजूद संस्कृति और परंपरा के इन तालिबानी पहरेदारों से समझौता कर लेती है। कई लड़कियां अपने माता-पिता के भावनात्मक शोषण के आगे अपने वजूद को गर्क कर देती हैं। हां कुछ निरुपमाएं अपने पंख फड़फड़ाती हैं वो परंपरा और संस्कार के जंग लगे कटारों से टकरा कर लहूलुहान होती है।लेकिन वो अपना मुस्तकबिल खुद लिखना पसंद करती हैं। चाहे अंजाम कुछ भी हो।
किसी भी परिस्थिति में हत्या एक जघन्य अपराध है, निरुपमा की हत्या को किसी भी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता! वैध अवैध संबंधों की सीमा तय करना सही नहीं, यहाँ साथियों ने पश्चिमी देशों के परंपरा की बात की है तो ऐसा नहीं है की हमारे समाज में प्यार में भागना कोई नई बात नहीं है पहले लड़के लडकियां भाग जाते थे अब युवा अपने माँ बाप का ख्याल रखते हैं और चाहते हैं की वो भी उनके निर्णयों का भागीदार बने तो इसमें बुरा क्या है! माँ बाप को भी सोचना चाहिए की जब बच्चे उनसे वात्सल्य चाहते हैं तो उनकी ममता इतनी निर्दयी कैसे हो जाती है की अपनी ही संतान को मौत के घात उतर दें!
अगर निरुपमा ने बिना माँ बाप की परवाह किये अपनी शादी करली होती तब उनके मातापिता क्या कर सकते थे! व्यक्तिगत तौर पर मुझे निरुपमा के माँ बाप से सहानुभूति है मगर सिर्फ इसलिए क्योकि वो शिक्षा और प्रगतिशीलता के बावजूद अपनी संक्रीनता से नहीं निकल सके, परिवर्तन को या तो पूरी तरह स्वीकारें या फिर ना स्वीकारें! चीजों को अपने सुविधानुसार चलने के प्रयास सदैव ही घटक होंगे
निरुपमा के रूप में हमने एक पत्रकार और एक परिवर्तनगामी साथी खोया है और हमें इसका ज़बरदस्त गुस्सा है
दोषी तो वह इंसान है जिसने उसे शादी से पहले ही गर्भवती बना दिया.
भाई सुशीलजी!
हत्या, आखिर हत्या आखिर हत्या है चाहे निरुपमा का हो या किसी और का, इसकी भर्त्सना तो की ही जानी चाहिए। मेरा एक सीधा सवाल आपसे है कि क्या शादी के पहले इस तरह के शारीरिक संबध कायम करना जायज है? यदि इस संबध में आप अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर पाते तो हमे लगता कि पत्रकारिता किस तरह हमारे समाज का सजग प्रहरी है।
जितने भी लोग इस घटना पर इतने रोष जता रहे हैं वो सब जब अपने जीवन में इस तरह की घटना का सामना करेंगे तो वो सब भी ऐसी लड़की/लड़का के विरुद्ध ही होंगे, लेकिन यहाँ पर उपदेश बहुत दे रहे हैं. ऐसे लोग जिनके दिल में कुछ है, जुबान पर कुछ है और करते कुछ और हैं, यह लोग पाखंडी हैं. यहाँ पर मैं किसी की हत्या का समर्थन नहीं कर रहा हूँ, लेकिन मैं अवैध सम्बन्ध और माता-पिता की भावना, उनकी अपेक्षाएं, अरमानों के गले घोंट देने वाले खुदगरज़ लोगों का भी नहीं समर्थन कर रहा हूँ.... लोगों को अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की ज़रूरत है, लेकिन माता-पिता को भी बच्चों की भावनाओं का ख़्याल रखना चाहिए.
एक और निरुपमा की हत्या हो गई, एक और निरुपमा रीति के भेंट चढ़ गई, और सारा समाज इस हत्या पर दाँत निकाल कर हँसने वाला एक तमाशबीन लग रहा था, एक पढ़ी लिखी नारी का इस तरह खून करना बहुत दुख की बात है, हम किस समाज में रहते हैं क्या हमें अपने पैरों में पड़ी इन पुरानी रीति रिवाज़ों को छोड़ नहीं पकते जो हमसे इस निरुपमा जैसी कई निरुपमा को मौत के मुंह में डाल देती हैं. हमारे देश की निरुपमओं की कहानी ही अलग है, मैं जिस देश मैं रहता हूँ वहां तो राज निरुपमा जैसी निर्दोष महिलाएं भयानक तरीके से मारी जाती है, और उनकी हत्या में 80 प्रतिशत उनके पिता या भाई होते हैं जिन के हाथों पर बहनों का खून लगा होता है. कई ऐसे मामले हैं जिसमें भाई अपनी बहन को मारता है और उसमें दोषी का पिता पुलिस में जाकर मुकदमा ही वापस ले लेता है, इस तरह हजारों खून बिना चले ख़त्म हो चुके हैं और बहनों को मारने वाले जानवर आज़ादी से घुम फिर रहे होते हैं, हम भारत में हुई इस हत्या पर भी इतने दुखी हैं जिसने दुखी हम अपने देश की निरुपमओं की हत्या पर करते हैं.
निरुपमा के हत्या के सिलसिले में गिरफ़्तार उसकी मां को मां नहीं कहा जा सकता है. वो ममता के नाम पर समाज में कलंक है.
कितने शर्म की बात है कि आज के समय में जहाँ एक तरफ राष्ट्रपति से लेकर किसी पार्टी की प्रमुख तक महिला हो सकती है वहीं कुछ संभ्रांत परिवार के लोभी हैं जो पुरानी बेड़ियों में जकड़े हुए हैं.
मैं ये सवाल किस से करों के सीमा के इस पार या उस पार जब कोई निरुपमा को इस तरह मारा जाएं तो राज्य कहां होती है, मुझे इस सवाल का जवाब कौन देगा?
हम जब अपने समाज में निरुपमा जैसी महिलाओं को मरता देखते हैं तो एक सवाल मन में ज़रुर उठता है कि ये जो राज्य होती है ये किस काम की है? राज्य जो मां जैसी होनी चाहिए, लेकिन जब हम समाज में प्रेम की शादी के मामले पर जब निरुपमा जैसी निर्दोष लड़कियों को मौत के मुंह में जाते हुए देख कर भी कुछ नही कर सकते तो एक लमहे के लिए ये ज़रुर सोचते हैं कि राज्य कहां है, अगर है तो उसकी भूमिका क्या है? उसको तब क्या करना चाहिए जब पुरानी रीति दरवाज़ों में बंधक बना हुआ ये समाज निरुपमओं को मौत की घाट उतार देता है, क्या राज्य के हाथ इतने बंधे हुए हैं कि रोज़ कहीं न कहीं किसी न किसी निरुपमा की हत्या हो जाती है, ये भारत की ही समस्या नहीं पाकिस्तान में आएशा,फ़ोज़िया, मुमल, मारवी और इस जैसे अनेक नाम हैं जिन्हें खून में लाल कर दिया जाता है और राज्य अपनी बेबसी दिखाने पर मजबूर हो जाती है, ये भी बड़ा सवाल है कि प्रेम की शादी को किस तरह सम्मान पर दाग का नाम दे कर लोगों को मौत की नींद सुलाया जाता है, बात मासूम निरुपमा की निकली तो भरत हो या पाकिस्तान लेकिन ये सवाल ज़रुरी है कि ऐसी घटनाओं में राज्य को अपना किरदार निभाने के लिए आगे आना चाहिए.
अगर शादी से पहले गर्भवती होना ही आधुनिकता का प्रमाणपत्र है तो ऐसी आधुनिकता को दूर से ही नमस्कार.
जो हुआ शर्मनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है. ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वालों की सोच पर तरस आता है. लोगों ने आज़ादी के मायनों का दुरपयोग करना सीख लिया है और दकियानूसी के मकड़ जाल में ख़ुद को इतना उलझा लिया है कि अच्छे बुरे की पहचान करना ही भूल गए हैं! जब लोग अपने आप को क़ानून से ऊपर समझें तो ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न हो इसके लिए सरकार और तंत्र को पुख्ता कदम उठाने चाहिए!
मेरी टिप्पणी पश्चिमी सभ्यता के खिलाफ है क्या इसलिए आप कबूल नहीं करते हैं?
मैं किसी की तरफदारी नहीं कर रहा हूँ और न ही किसी के मौत के पक्ष में हूँ, मैं सिर्फ यह कह रहा हूँ की हिंदुस्तान अमेरिका नहीं बन सकता और अमेरिका हिंदुस्तान नहीं बन सकता दोनों की अपनी अलग-अलग संस्कृतियाँ और सभ्यताएँ हैं. नक़ल करना छोड़ों और अपनी पहचान एक भारतीय के रूप में बनाओ, कोई कम कपड़े पहनने या यौन संबंध बनाकर ही आधुनिक नहीं होता वर्ना पाषाण काल के लोग ज्यादा आधुनिक थे. पुराना युग होने का यह मतलब नहीं कि वह अनपढ़ और पिछड़ा ही होगा. महाभारत काल के विज्ञान के बारे में आप सभी परिचित ही होंगे. मानसिकता उन लोगों को बदलनी चाहिए जो अंग्रेजों कि लाइफ स्टाइल का अँधा अनुशरण कर यह सोचते हैं कि वे भी अंग्रेजों कि तरह आधुनिक हो गए हैं.
महोदय, समाज, मीडिया और सरकारें अपनी आँखों पर चढ़ा चश्मा उतारकर तभी झांकती हैं, जब कोई हाईप्रोफाइल घटना घटती है. आए दिन भारत में ऊँची जातियों के लोगों के ज़रिए अशिक्षितों, दलितों, ग़रीब कन्याओं के साथ जुल्म-ज्यादतियाँ, आगजनी, बलात्कार आदि किए जाते रहते हैं तब समाज के लोगों का दिल क्यों नहीं झकझोरता? अभी हाल में हरियाणा के हिसार ज़िले के मिर्चपुर गांव में दलितों के सैकड़ों घरों के साथ दलित बाप-बेटी को जिंदा जला दिया गया तब लोगों की कर्तव्य-रूचि अपराधियों को सजा दिलाने में कम और मुआवजा दिलाने में ज्यादा दिखी. पीड़ितों को न्याय दिलाने में इनकी रुचि क्यों नहीं होती?
सुशील झा जी! आपके गुस्से में वो वास्तविकता नहीं है जो होनी चाहिए थी, पता नहीं क्यूँ मुझे आप ओवर रियक्ट करते लगे, आप अपने को ज़बरदस्ती आदर्शवादी और मर्यादापुरुषोत्तम दिखाने की कोशिश की या फिर ऐसा लिखने के लिए आपको अच्छा मेहनताना मिला.
क्योंकि आपके लेख के अनुसार निरुपमा को अंतरजातीय विवाह के कारण मारा गया,
जबकि शादी तो हुई ही नहीं, निरुपमा अंतरजातीय लड़के से शादी करना चाहती थी न की शादी कर ली थी.
दूसरा पहलू - निरुपमा शादी से पहले ही गर्भवती थी, ये उसके मौत की एक बड़ी वजह थी, जिसका आपने अपने लेख में कहीं भी उल्लेख नहीं किया बल्कि इस बात को आपने नजरअंदाज करने की कोशिश की.
और यही बात आपके पाखंडी होने का सबूत है, अगर आप वास्तव में इस मुद्दे पर ईमानदार होते तो दोनों पहलुओं पर सामान रूप से अपनी बात रखते.
देखिए सुशीलजी भारतीय समाज में कहने को तो हर कोई अपने आपको आधुनिक कहलाना पसंद करता है. लेकिन जब इज़्जत की बात आती है तो सभी की सोच मध्ययुगिन ही होती है. आप भले ही आधुनिक और जाति बिरादरी की बात नहीं मानने वाले हो. लेकिन सच्चाई ये है कि जब आपके साथ ऐसा होगा तो संभव है आप भी कहीं ऐसे जगह पर अटक जाएगें.
निरूपमा की हत्या में वो भी भागीदार हैं जिनके बच्चे की वो कुंवारी माँ बनने वाली थी.
यह घटना सचमुच हृदय विदारक है. अब तो बस तकलीफ ही हो सकती है, दुःख ही व्यक्त कर सकते हैं. दूसरी तरफ, किसी भी घटना के दो पहलू होते हैं. इस घटना में जो समस्या सामने आई, वह रुढ़िवादी सोच का नतीजा ही है, और कुछ नहीं. मेरी राय में ऐसे हालात में समझदारी से काम लेने की जरूरत थी. समस्या का समाधान अपराध से नहीं हो सकता ओर न ही पारिवारिक मर्यादा को कलंकित कर. मैं यह नहीं कहता कि निरुपमा का विवाह पूर्व गर्भ सही था. अगर निरुपमा ने ऐसा किया, तो यह किसी समाज को मान्य नहीं, न ही कोई चरित्रवान लड़की यह कदम उठा सकती है. हां, अगर निरुपमा अपने प्रेमी से विवाह कर लेती, तो यह गलत नहीं था. हो सकता है कि निरुपमा ने ऐसा किया हो, जो समाज के सामने नहीं आया. जो काम कथित रूप से उनके घरवालों ने किया, यह किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता. इसकी सजा तो मिलनी ही चाहिए. लेखक का दर्द, हर इंसान का दर्द है, इसे नकारा नहीं जा सकता. ईश्वर निरुपमा की आत्मा को शांति और लोगों को ऐसे दर्द सहने की शक्ति दे.
एक बात सारे तथाकथित आधुनिकता के ठिकेदारों से, जो प्रेम की बातें काफी करते है, क्या प्रेम एक लड़का/लड़की से ही होता है, वो भी माता-पिता के इच्छा के विरुद्ध ही. क्या प्रेम माता-पिता के साथ नहीं होता है, क्या प्रेम अपने संस्कृति के साथ नहीं होता है, क्या प्रेम देश के साथ नहीं होता है?
और अगर अप प्रेम किसी लड़का/लड़की के साथ थी करते है तो परिवार को विश्वास में लेकर करें, नहीं तो जब तक परिवार स्वीकार नहीं करें तब तक अपने रिश्ते को वहीं तक रखे जहाँ से आसानी से वापस लौटा जा सके ताकि किसी को कोई समस्या न हो जाए ना कि उसके साथ अवैध संबंध बना ले और गर्भवती हो जाएं,
तीसरी बात, आप अपने माता-पिता,भाई-बहन,दोस्त के साथ प्रेम करते है तो क्या इसका मतलब अपने माता-पिता,भाई/बहन के साथ शादी करते है उनके साथ सेक्स करते है, सबसे प्रेम करिए, तो अगर कोई लड़का/लड़की हो उससे प्रेम करिए, सेक्स की क्या ज़रुरत है प्रेम में, इसलिए प्रेम का कुतर्क मत दीजिए......
उस पर भी अगर प्रेम की बात करते है तो ये बताएं कि माता- पिता के साथ का 23-24 साल का प्रेम ज्यादा महत्वपूर्ण होता है या किसी लड़का/लड़की के साथ का एक-दो साल के तथाकथित प्रेम......
ये और कुछ नहीं, अंध स्वार्थ है और कुछ नहीं, अँधा- व्यक्तिवाद है, पागलपान है और कुछ नहीं, खुदगर्जी है, माता-पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों की भावना का अपमान है....
-> हमारे यहाँ शादी दो लोगो का न होकर दो परिवारों का होता है, मतलब परिवारों के सारे सदस्यों की सहमती से होनी चाहिए, ताकि सबका समर्थ हो, शादी जैसे रिश्ते या किसी भी तरह का रिश्ते को सफल बनाने के लिए सबकी सहमती, सबका समर्थन जरुरी होता है,
-> परिवाद तंत्र का मतलब होता है, हर एक-दूसरे पर सबका अधिकार और सबका एक-दूसरे के प्रति कर्तब्य, मतलब, हम पर हमारा परिवार का अधिकार है, तो ज़ाहिर है हमारे फैसले में उनकी भूमिका निश्चित हो होनी चाहिए, अगर आप उन्हें नहीं देते हैं तो उनका उचित अधिकार तो ये आपकी कर्तव्यहीनता है,
-> प्रेम में त्याग भी होता है, अप माता-पिता के साथ प्रेम करते है , वो बहुत बड़े हो चुके हैं, क्या आप त्याग नहीं कर सकते है थोडा, आपको किसी लड़का/लड़की के बहुत सारा आप्शन मिल जाएगा क्या माता/पिता दूसरा मिलेगा?
सोचिए दिमाग़ से और स्वंतंत्र ढंग से, आपको मालूम चल जाएगा कौन कितना गलत है?
यहाँ पर मैं किसी के हत्या का समर्थन नहीं कर रहा हूँ , केवल ये बता रहा हूँ कि कौन कितना गलत था , जो भी हुआ गलत था मगर इसमें लड़का/लड़की का ज्यादा गलती है, माता-पिता का बहुत ही कम.
यहाँ पर मैं अपना नजरिया केवल रख रहा हूँ, आप सब अपना नजरिया रखने के लिए स्वंतंत्र है, किसी किस्म के व्यक्तिगत आक्षेप नहीं, अपको पसंद नहीं आए तो माफ़ करिएगा, ये मेरा अपना विचार हैं इस विषय पर, धन्यवाद !!!
मुझे लगता है कि निरुपमा शादी के पहले गर्भवति होकर माता-पिता पर दबाव बनाना चाहती थी जो उसके अंतरजातीय विवाह के ख़िलाफ़ थे और वो उसमें सफल नहीं हो सकी.
लगता है कि सुशील जी आप न्यायाधीश हो गए हैं और बिना जांच के ही एक माता-पिता को दोषी बना दिया. इस तरह की टिप्पणी करने से पहले आपको और इंतजार करना चाहिए था.
बेटी तु नही तो कुछ भी नही, मुझे बडा गर्व हुआ था जब तुने मेरी कोख मे जन्म लिया
मुझे बहुत खुशी मिलती थी जब मे तेरा हाथ पकडकर तुझे घुमाती थी
तेरी मन्द- मन्द मुस्कान पर मे फुले नही समाती थी। मेने तेरे लिए बडे बडे सपने देखे थे, पर तुने बदले मे मुझे जो कुछ दिया, वो मेरे देखे हुवे सपनो जैसे नही थे मुझे जो तुझसे उमीदै थी वो एक माँ के स्थान से भी कही जायदा बडी थी तु माँ तो बनने जा रही थी मगर तुझे उसका अंजाम मालुम नही था खैर जो भी हुआ वह अच्छा ही हुआ जो हो रहा है वो भी अच्छा ही है जो होगा वह भी अच्छा ही होगा।
तुझे नया जन्म मिल जायेगा मुझे मेरे माँ होने की सजा मिल जायेगी और हम दोनो गुनहेगारो का दुनियां जिर्क्र करते रहेगी फर्क सिर्फ इतना होगा जो तेरे करीब जायदा रहा होगा उसे तेरी याद जायदा आयेगी और जो मेरे जायदा करीब रहा उसे मेरी जायदा याद आयेगी.
जा बेटी खुशी से जा आखिर तु है तो पराई ही ना,
अब तु मेरे हाथो से ही पराई बन गई तो क्या हुआ,
तुने भी तो मुझे अपनी माँ के बजाय पराई ही समझा ना।
यह लड़के की भी ग़लती है. उसे यौन संबंध क़ायम नहीं करने चाहिए थे. वह भी मौत की एक वजह बना. यदि उसे सच्चा प्रेम था तो माता-पिता की स्वीकृति लेनी चाहिए थी.
मुझे यह देख कर अत्यन्त प्रसन्नता हुवी की आज भी लोग सनातन धर्म के पक्ष में हैं परन्तु अपार दुःख भी हुवा उन लोगों के विचारों को पढ कर जो आधुनिकता का अर्थ पश्चिमिकरण समझतें हैं| उस बालिका ने बिल्कुल अनुचित कार्य किया उसके प्रति सहानुभुति रखने वाले लोग पाखण्डी हैं और समाज कि अधोगति के उत्तरदाई हैं। उनमें से किसीने भी इस प्रश्न का उत्तर नही दिया की यदि ऐसा उनके घर में होता तो वे क्या करतें| मैं यह नही कह रहा की हत्या किसी भी प्रकार से उचित है परन्तु जो उस बालिका ने किया उसे उचित मानना भी घोर पाप है। प्रेम में तो लोग सब कुछ त्याग देते हैं बल्कि त्याग प्रेम का अभिन्न अंग है जिसका सर्वोत्तम उदाहरण माता-पिता होते हैं| न जाने उन्होंने कितने त्याग किये होंगे इस कन्या के लिये जिसने क्षणभर के भौतिक सुख व स्वस्वार्थ के लिये उनका जीवन नर्कतुल्य बना दिया। अन्तरजातिय विवाह तो अनुचित है हि परन्तु जो कुकर्म उस बालिका ने किया वह तो किसि भी प्रकार से न उचित है और न हि क्षमा अथवा सहानुभुति के योग्य है। और मीडीया के पाखण्ड को दर्शाने के लिये मैं एक अंग्रेजी कहावत का उल्लेख करना चाहुँगा "A person who reads nothing is more educated than the one who reads only newspaper."
धन्यवाद
नारायणि नमोऽस्तु ते