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पीठ खुजाने की कला

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 27 अप्रैल 2010, 14:54 IST

इंसान क्या कुछ नहीं कर सकता. हिमालय पर चढ़ने को उसने बच्चों को खेल बना लिया है और अब चाँद पर बस्तियाँ बसाने की योजना चल रही है.

उसने सुपर कंप्यूटर बना लिए और ईमेल के ज़रिए दुनिया को गाँव जैसा छोटा बना दिया.

उसने मोबाइल को इतना सुलभ बना दिया कि उनकी संख्या शौचालयों से ज़्यादा हो गई और फ़ोन टैपिंग को इतना आसान कर दिया कि सरकार को कानों कान ख़बर हुए बिना फ़ोन टैप हुए जा रहे हैं.

लेकिन वह अपनी पीठ अब भी ख़ुद नहीं खुजा सकता. इसके लिए दूसरों की ज़रुरत होती है.

निजी तौर पर लोग ऐसा करते होंगे तो दिखता नहीं लेकिन दफ़्तरों में, सरकारों में और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा होता है तो साफ़ दिखता है.

इससे पीठ वाले और पीठ खुजाने वाले दोनों को फ़ायदा होता है क्योंकि दोनों की भूमिका बदलती रहती है.

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा कि 1984 के दंगों के लिए सिर्फ़ सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने कांग्रेस की पीठ खुजाई. अब वे उम्मीद करेंगे कि बदले में कांग्रेस किसी समय कहे कि गोधरा के बाद के दंगों के लिए सिर्फ़ मोदी सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

इससे थोड़े दिन पहले संसद में एक अद्बुत नज़ारा देखने को मिला था जब भाजपा के लोग खड़े होकर यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम की तारीफ़ कर रहे थे.

नक्सलियों ने सीआरपीएफ़ के 76 जवानों को मार दिया था और भाजपा के लोग गृहमंत्री की तारीफ़ कर रहे थे. कई लोगों को समझ में नहीं आया. लेकिन जो जानते थे वे समझ गए कि पीठ खुजाई जा रही है.

इसके बाद कांग्रेस ने भाजपा की पीठ खुजाई. वह कम ही लोगों को दिखाई दी. लेकिन भाजपा के लोगों को महसूस हुआ. सुकून भी मिला. बदले में कांग्रेस ने एक बार भी नहीं कहा कि छत्तीसगढ़ में भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह अपना काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं.

आईपीएल का पूरा विवाद ही पीठ खुजाने का था. मंत्री ने कहा कि मेरी दोस्त को एक टीम दे दो. आईपीएल के कमिश्नर ने ऐसा कर दिया. मंत्री ने पीठ आगे की तो आईपीएल कमिश्नर ने खुजा दी. फिर आईपीएल कमिश्नर ने कहा कि फलाँ कन्या को भारत मत आने देना. मंत्री समझ नहीं पाए. आने दिया. पीठ सामने थी लेकिन खुजाने से इनकार कर दिया. तो लो अब भुगतो.

ललित मोदी ने तीन साल तक अपने फ़्रैंजाइज़ियों की पीठ खूब खुजाई. वे टीम की मिल्कियत में गोलमाल करते रहे. इधर-उधर से पैसा कबाड़ते रहे. खेल के पीछे कई खेल करते रहे. लेकिन मोदी साहब चुप रहे. वे पीठ खुजा रहे थे. इसलिए जब मोदी मुसीबत में पड़े तो सारे मालिक अपने नाखून सजाकर सामने आ गए. टेलीविज़न कैमरों के सामने मोदी की पीठ खुजाने लगे.

यूपीए सरकार संकट में दिख रही थी. लग रहा था कि अब पीठ दिखाकर भागना होगा. लेकिन मायावती ने पीठ खुजाकर कहा, चिंता मत करो. उसने कटौती प्रस्ताव पर सरकार को समर्थन की घोषणा कर दी.

अब सरकार की चिंता है कि आय से अधिक संपत्ति के मामले में, ताज कॉरिडोर के मामले में वह मायावती की पीठ कैसे खुजाएगी. हो सकता है कि मायावती कहें कि मेरी पीठ खुजाने का अच्छा तरीक़ा यह है कि राहुल गाँधी को उत्तर प्रदेश भेजना बंद करो.

अनगिनत क़िस्से हैं पीठ खुजाने के.

दफ़्तर में कोई तारीफ़ करे तो मन में हो रही गुदगुदी को संभालिएगा. हो सकता है कि वह आपकी पीठ खुजा रहा हो और जब मौक़ा आएगा अपनी पीठ आपके सामने कर देगा.

पीठ खुजाना बुरी बात नहीं है. यह एक कला है. इसमें पारस्परिक तरक़्की और लाभ का राज़ छिपा है.

बेहतर है आप भी इस कला में पारंगत हो जाइए.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:09 IST, 27 अप्रैल 2010 Mukesh Sakarwal:

    मैं अपनी हँसी नहीं रोक सका. पिछले काफ़ी दिनों में बीबीसी पर यह सबसे अच्छा ब्लॉग है जो मैंने पढ़ा है. वर्मा जी, मुझे आपका सेंस ऑफ़ ह्यूमर पसंद है. आपने बहुत अच्छा वर्णन किया है.

  • 2. 16:31 IST, 27 अप्रैल 2010 Gaurav Shrivastava:

    बहुत बढ़िया. बस एक सवाल मेरे दिमाग़ में आ रहा है. ऐसा कब होगा कि कोई आम आदमी की पीठ खुजाएगा?

  • 3. 17:47 IST, 27 अप्रैल 2010 IBRAHIM KUMBHAR ISLAMABAD:

    इंसान और साइंस के विकास से शुरु की हुई आप की बात आकर पीठ खुजाने पर ख़त्म हुई, इसमें इतनी हैरानी भी नहीं, राजनीति में पीठ खुजाना अब एक परंपरा बन गई है, लेकिन ये सवाल अहम है कि अगर नेता के बग़ैर कोई और पीठ खुजाए तो ये कैसे मुमकिन है, या यह कि नेता के बग़ैर कोई और भी ऐसा कर सकता है? उसका जवाब यह ही हो सकता है कि अब जो भी पीठ खुजाएगा वह नेता के अंदाज़ में ही खुजाएगा और ये उन नेताओं की मेहरबानी है कि समाज के हर क्षेत्र को उन्होंने पीठ खुजाना सिखा दिया है, इस मुद्दे पर बात करने से पहले फ़ोन टैपिंग का मामला अहम है, हैरानी की बात तो यह है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश मैं भी वह काम हो रहा है जो दूसरे देशों में आम बात है, यह काम तो उन देशों में होता है जहाँ कि सरकारों का ना उनकी जनता पर भरोसा होता है ना उनके चुने हुए नेताओं पर भरोसा होता है, या अगर ये कहा जाए कि ये काम वहाँ होता है जहाँ दो सरकारें होती हैं, एक दिखाने के लिए और एक असल सरकार जो परदे के पीछे सारा काम करती है. हमारे आसपास कई ऐसे देश हैं जिनमें जनता तो जनता उनके प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी नहीं छोड़ा जाता, और फ़ोन टैपिंग का आदेश कौन देता है कौन मानता है उसकी तो आखिर तक खबर नहीं पड़ती. लेकिन भारत में भी ये कुछ होने लगा है और वह भी नेता लोगों के फ़ोन, अनोखी बात तो है. इसका मतलब कि भारत जो अब कर रहा है इससे पहले जिस भी देश में यह काम होता था वह सही होता था. क्योंकि अब तो फ़ोन टैपिंग में नंबर एक देश तो ये ही कहेंगे कि दुनिया के बड़े लोकतांत्रिक देश में भी वह सब हो रहा है जो हम सालों से करते चले आए हैं. मैं तो कहता हूँ कि उस तरह के मामलों में हमें किसी की पीठ नहीं खुजाना चाहिए ना किसी को अपनी खुजाने देनी चाहिए. बाकी जो जिसकी पीठ खुजाता हो तो उसको खुली छूटी है, हम न मायावती को रोक सकते हैं न मोदी को, यह परंपरा नेतागिरी से निकल कर अब सारे समाज तक पहुँच चुकी है.

  • 4. 18:17 IST, 27 अप्रैल 2010 Bhim Kumar Singh:

    वर्मा जी राजनीति, अर्थनीति और अवसरनीति के बीच के तानेबाने को समझाने के लिए आपने सही तरीका अपनाया है. लेकिन एक बात समझ में नहीं आई, आपने मीडिया को क्यों बख्श दिया. शायद यह मेरी समझ का फेर हो, लेकिन मेरा मानना यही है कि जो काम ललित मोदी, कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और मायावती ने प्रत्यक्ष रुप से किया ठीक वही काम बड़ी चालाकी से मीडिया भी कर रही है. उसने भी राजनीतिक दलों, सरकारों और कॉरपोरेट जगत की पीठ बड़ी शिद्दत से खुजाई है. यह बात और है कि मीडिया यह काम बड़ी सफ़ाई से करता रहा है, जिसे आम लोग नहीं समझते पाते, लेकिन आपको क्या हो गया आप तो पत्रकार हैं?

  • 5. 19:23 IST, 27 अप्रैल 2010 Rakesh Jain:

    वर्मा जी, बहुत ही अच्छा लिखा है. आपके व्यंग्य की कला की दाद देनी पड़ेगी. आपके अगले लेख का इंतिज़ार रहेगा.

  • 6. 20:00 IST, 27 अप्रैल 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी, बहुत शानदार और सच लिखा है आपने. लेकिन बीबीसी की पीठ किसने खुजाई क्योंकि बीबीसी क्रिकेट के अलावा किसी भी खेल का इतना अधिक कवरेज नहीं करती है. लगता है बीबीसी की पीठ ललित मोदी या आईपीएल ने खुजाई है. आप ईमानदारी से अपने गिरेबान में झांक कर देखकर बताइए कि आप अपने श्रोताओं के साथ इंसाफ कर रहे हैं क्या? क्या बीबीसी अपने पाठकों की पीठ नहीं खुजा रहा है. लेकिन एक बात मानता हूँ कि काफी समय बाद आपने बीबीसी पर अच्छा और सच लिखा. लेकिन कुछ बातों में आपने भी पीठ खुजाई है.

  • 7. 11:38 IST, 28 अप्रैल 2010 Ankit :

    इसे ही तो राजनीति कहते हैं, यहाँ कोई हमेशा के लिए दोस्त या दुश्मन नहीं होता, वो भूतपूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री बेंजामिन डिज़रायली ने कहा था कि "हमारा कोई स्थायी दोस्त नहीं है. हमारा कोई स्थायी दुश्मन नहीं है. हमारे केवल स्थायी हित हैं." जिसको जिसकी ज़रूरत या फिर उस वक़्त की ज़रूरत, वो एक-दूसरे की पीठ खुजाते रहेंगे. आजकल तो पत्रकारिता और न्यूज़ मीडिया भी इस दौड़ में शामिल हो गया है. वह भी सोच कर और देख कर ही तय करता है कि किसकी पीठ खुजानी है, आप का लेख बहुत बढ़िया है (थोड़ी पीठ मैं भी खुजा लूँ!).

  • 8. 13:05 IST, 28 अप्रैल 2010 ZIA JAFRI:

    प्रिय विनोद वर्मा जी, मजा आ गया, काश शशि थरूर को यह कला आती होती. अपनी कह दी और खुजलवाली लेकिन मोदी के बारे में नहीं सोचा, बेचारे 11 करोड़ का टैक्स भर कर भी टांग दिए गए. जूनियर मंत्री राजनीति में भी जूनियर ही रहे. मायावती और भाजपा से पीठ खुजलवाना सीखें और ट्विटर में सबको बताएँ.

  • 9. 13:31 IST, 28 अप्रैल 2010 पद्मनाभ मिश्र:

    विनोद जी, पीठ खुजलाने वाली बात में एक चीज लिखना भूल गए. हमारे देश में पीठ खुजलाने की दक्षता से उनकी "साइज" का आभास होता है. मसलन, ये कि अमुक नेता कितना बड़ा है, यह इस बात से तय होता है कि वह किस हद तक पीठ खुजला सकता है.
    कलम में बहुत धार होती है. कलम रुला सकती है, कलम हँसा सकती है, कलम सकते में डाल सकती है. कलम क्या नहीं कर सकती है? कलम की महत्ता को इस लेख से अच्छा नहीं कोई नही बता सकता है. लेख पढ़कर किंकर्तब्यविमूढ़ हूँ लेखक की अद्भूत व्यँग्यात्मक शैली हँसने को मजबूर करती है. विषय-वस्तु इतना गंभीर कि हँसी को रोके हुए हैं.

  • 10. 15:08 IST, 28 अप्रैल 2010 सुन्दर सिंह नेगी दिल्ली-रानीखेत उत्त�:

    भई अब जब सब पीठ खुजा ही रहे है तो हम भी थोडा पीठ खुजा देते है. अब किसकी पीठ खुजाएं बस यही समझ में नही आ रहा है. चलो किसी की नहीं तो अपनी ही खुजवा लेते है. पिछली बार जब फ़ेसबुक पर विनोद जी नजर आए तो हमने उन्हें ऐड रिक्वेस्ट भेजी तो विनोद जी ने ऐड करने से तो मना कर दिया बदले में मेरी पीठ खुजा दी.

  • 11. 16:51 IST, 28 अप्रैल 2010 Afsar Abbas Rizvi "ANJUM":

    पिछले काफ़ी दिनों में बीबीसी पर यह सबसे अच्छा ब्लॉग है जो मैंने पढ़ा है.

  • 12. 18:49 IST, 28 अप्रैल 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB :

    वर्मा जी बहुत खूब लिखा है. मैं भाई शब्बीर खन्ना के विचारों से सहमत हूँ. मुझे भी हंसी आ रही है. बस इतना ही कहूँगा की खुजाते रहो. इसी में सबका भला है. श्रृंखला टूटने न पाए. वरना खेल खत्म.

  • 13. 19:18 IST, 28 अप्रैल 2010 Deepak Tiwari:

    क्या बेबाकी से बात रखी है वर्मा जी ने. बहुत अच्छा.

  • 14. 20:53 IST, 28 अप्रैल 2010 brajkiduniya:

    पीठ खुजाने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की जरूरत हो ही यह आवश्यक नहीं. इसके लिए कुछ लोग कंघी आदि से भी काम चला लेते हैं. भाजपा और अन्य दल चोर-चोर मौसेरे भाई भी हैं. विपत्ति में अपने ही काम हैं सो इस तरह एक-दूसरे की सहायता करने के दृश्य बराबर देखने को मिलते रहेंगे.

  • 15. 22:35 IST, 28 अप्रैल 2010 himmat singh bhati:

    विनोद जी, मजा आ गया इस बात पर. पर आप कुछ शर्मा गए. ऐसा नहीं है कि आपने अधूरी बात कही है. भारत की राजनीति में लोग ही ऐसे आते हैं, अपनी खुजली मिटाने के लिए.जब अपने हाथ से खुजली नहीं मिटती तो इन नेताओं को सहयोगी नेताओं से अपनी खुजली मिटवानें में कोई परहेज नहीं है. भारत की राजनीति में अपनी खुजली मिटाने का यह सबसे आसान तरीका है. देखिए वे अपनी तनख्वाह और सुविधाएँ बढ़ाने के लिए कैसे एक होते हैं. इसे कहते हैं, हिंग लगे न फिटकरी और रंग चोखा.

  • 16. 12:43 IST, 29 अप्रैल 2010 dkmahto:

    भई वाह, क्या लिखा है आपने.

  • 17. 14:27 IST, 29 अप्रैल 2010 anand jat:

    वर्मा जी आपने बिल्कुल सही बात कही है पीठ खुजाना तो आम हो गया है. सोरेन द्वारा कांग्रेस की पीठ खुजाई गई, हालाँकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है लेकिन अब सोरेन को भी खुजली हो रही है और देखना दिलचस्प होगा कि उनकी पीठ खुजाने को बेताब कांग्रेस बाबूलाल मरांडी को मना पाती है या नहीं.

  • 18. 15:09 IST, 29 अप्रैल 2010 कृष्ण कुमार तिवारी:

    विनोद जी वास्तव में आपने बहुत बड़ी बात बहुत ही सहज तरीके से कही है. मेरा आप से एक ही निवेदन है कि यदि ऐसे लेख आप कृपया मेरे ईमेल आईडी पर भी भेजने की कृपा करें. वास्तव मे काबिले तारीफ है.

  • 19. 22:50 IST, 29 अप्रैल 2010 shubham verma:

    बहुत बढ़िया, हमेशा मैंने दूसरों की पीठ खुजाई है, अब मुझे भी सिखना पड़ेगा पीठ खुजाई.

  • 20. 05:51 IST, 30 अप्रैल 2010 Sanjay Sharma:

    बड़ा पकाऊ और प्रभावहीन ब्लॉग है. मैं हमेशा विनोद वर्माजी से बेहतरीन ब्लॉग की उम्मीद करता रहा हूं.

  • 21. 14:58 IST, 30 अप्रैल 2010 yogesh dubey:

    विनोद जी नमस्कार! अच्छा ब्लॉग लिखने के लिए आपका धन्यवाद. मैं उम्मीद करता हूं कि आप आगे भई इस तरह का ब्लॉग लिखते रहेंगे.

  • 22. 17:23 IST, 30 अप्रैल 2010 जोजो पार्कर:

    लो वर्मा जी आपको भी ढ़ेर सारे पीठ खुजाने वाले मिल गए.

  • 23. 19:42 IST, 30 अप्रैल 2010 amrendra kumar:

    क्या ख़ूब लिखा है! मज़ा आ गया. सचमुच ये पीठ खुजाने की कला देश में जबरदस्त फैली है, ख़ासकर राजनीति में ख़ूब चलती है यह कला.

  • 24. 09:09 IST, 01 मई 2010 Maharaj baniya:

    विनोद जी, अच्छा लिखा है. कहीं ऐसा तो नहीं कि वाकई खाज हो गई है पीठ पर. कृपया डॉक्टर को दिखाइए और अपनी खुजली का इलाज करवाइए. आइपीएल वाली कंडिशन कहीं आपकी न हो जाए और इनकम टैक्स वाले आपको मलहम लगाने आ जाएं.

  • 25. 16:34 IST, 01 मई 2010 SACHIN CHATURVEDI:

    प्रिय विनोद जी, लंबे समय के बाद आपका लेखन पढ़ा. आपने काफी अच्छा लिखा है.

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