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बात निकली है तो दूर तलक जाएगी?

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|बुधवार, 21 अप्रैल 2010, 14:10 IST

इंडियन प्रीमियर लीग से जुड़े इस पूरे तमाशे में ज़्यादातर आम लोग ख़ुश हैं. ख़ुश इसलिए क्योंकि इसी बहाने कम से कम 'ज़्यादा उड़ने' वालों के पर कतरने की बात हो रही है.

लोगों को आईपीएल, उसके खेल से भला क्या आपत्ति होगी उन्हें तो नामी खिलाड़ियों के बीच फ़टाफ़ट क्रिकेट देखने को मिल रहा है मगर खेल के साथ जो 'खेल' हो रहा था वो लोगों को नहीं भा रहा.

पहली बार उस खेल पर से पर्दा उठने की संभावना लोगों को रोमाँचित कर रही है.

भारत में क्रिकेट को पसंद करने वालों को खिलाड़ियों के ज़्यादा क्रिकेट खेलने से भी आपत्ति नहीं होती, मगर सिर्फ़ 20 ओवर के खेल में ढाई-ढाई मिनट के दो स्ट्रैटेजिक ब्रेक का भला क्या काम.

टीमें उसमें पता नहीं कितनी रणनीति बना या बदल पाती हैं मगर विज्ञापन तो एकमुश्त काफ़ी आ ही जाते हैं. बल्कि अब तो ओवर के बीच में भी विज्ञापन दिख रहे हैं.

इसके अलावा क्रिकेट के मैदान पर जितनी कंपनियों का नाम लिखा दिखता है उस पर क्या कहा जाए.

आईपीएल ने इस टूर्नामेंट के दौरान क्या नहीं बेचा ये ढूँढ़ पाना मुश्किल है. खेल टीवी पर दिखाने के अधिकार, इंटरनेट पर दिखाने के अधिकार, मोबाइल पर दिखाने के अधिकार और न जाने क्या-क्या.

मगर ये सब देखते हुए भी लोग चुप थे, भला करते भी क्या. मोदी के ट्विटर के ज़रिए जो जाँच का रास्ता खुला है अब वो सिर्फ़ मोदी को हटाए जाने पर जाकर नहीं रुकना चाहिए.

मोदी हटाए जाएँगे या उनके पर कतरे जाएँगे ये सब चर्चा तो गर्म है मगर क्या उतने भर से बात ख़त्म हो जाएगी.

आईपीएल के पहले सीज़न से लेकर अब तक जो भी सौदे हुए हैं सबकी गहन छानबीन होनी चाहिए.

और बात वहाँ भी क्यों रुके, बात आगे बीसीसीआई तक जानी चाहिए. जिस तरह दुनिया भर में बीसीसीआई सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है उसमें पारदर्शिता का तो नामोनिशान ही नहीं है.

उसकी कार्यशैली, उसमें शामिल लोगों की भी जाँच होनी चाहिए.

...वैसे होना तो बहुत कुछ चाहिए मगर जिस तरह से नेताओं के नाम क्रिकेट से जुड़े हुए हैं लगता तो नहीं कि ये जो बात निकली है वो दूर तलक जाएगी.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:57 IST, 21 अप्रैल 2010 Chandra Kumar:

    मुकेश जी एक बात समझ से बाहर है कि आख़िर बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार का इससे क्या लेना देना है? क्यों शरद पवार को पंच बनाकर ललित मोदी के भागय का फ़ैसला किया जा रहा है?
    लगता है कि आईसीसी चैयरमैन के रुतबे के आगे बीसीसीआई नतमस्तक है वरना शरद पवार और उन जैसे किसी भी पूर्व पदाधिकारी से सलाह मशविरा करने की ज़रूरत कहां है?

    आपका कहना सही है कि इस बार जांच की हद ललित मोदी या आईपीएल तक ही नहीं रुकनी चाहिए. बीसीसीआई और इससे जुड़े हर शख़्स के दामन को टटोलने का सही समय है.
    मीडिया में इतनी चर्चा है कि सरकार और प्रशासकों पर ज़रूरत से अधिक दबाव है. दाग़ी लोगों को ढ़ूंढना अब आसान होगा.

  • 2. 17:18 IST, 21 अप्रैल 2010 Rakesh Srivastava:

    सही बात लिखी है आपने. मैं इससे सहमत हूं.

  • 3. 17:31 IST, 21 अप्रैल 2010 BALWANT SINGH PUNJAB :

    मुकेश जी ! अब तक तो क्रिकेट के प्रेमियों की आँखें खुल जानी चाहिए? बड़ा दुःख होता है जब हमारे यहाँ लोग काम - काज छोड़कर क्रिकेट की पूजा करने बैठ जाते हैं. अक्सर देखा है कि लोग अपना घरेलू और अधिकारिक कार्यकलाप छोड़कर घंटों ही क्रिकेट देखने और क्रिकेट पर चर्चा करने में व्यर्थ कर देते हैं. बड़ा ही अफ़सोस होता है उन लोगों की मानसिकता पर जो क्रिकेट को भगवान समझ कर पूजा करते हैं. कोई अपनी जेबें भर रहा है और जो हर तरह से ठगा जा रहा है ,कंगाल बनाया जा रहा हैं वही इस क्रिकेट के पीछे पगला हुआ जा रहा है. सही कहा है "बेगानी की शादी में अब्दुल्ला दीवाना" समय बहुत अहम है लेकिन हमारे देश में लोग समय बर्बाद करने में बहुत माहिर हैं. मुझे कुछ साल पहले का वाक्य याद आ रहा है कि जब एक संस्थान में कुछ विदेशियों से मुलाकात हुई जो कि कई सालों तक उस संस्थान में रहे थे, का कहना था कि इंडिया में हर रोज़ रविवार जैसा माहौल रहता है यानि की लोग व्यक्तिगत और क्रिकेट जैसे कामों को आधिकारिक और सरकारी कामों से ज्यादा मान्यता देते हैं. यह हमें ही सोचना होगा कि कुछ लोग हर तरह से आम आदमी को लूट - खसूट कर अपनी जेबें भर रहे हैं और हम हैं कि अभी भी लुटे जा रहे हैं. दुःख होता है कि इसमें कुछ रानेताओं, मीडिया चैनलों फ़िल्मी सितारों और धनकुबेरों ने मिलजुलकर ऐसा ताना -बाना बुना है कि इस चक्रव्यूह को तोड़ना आसान न होगा. खेल को खेल की तरह ही समझना चाहिए. क्रिकेट आज भी वही खेल है जो कि सदियों पहले जेंटलमेन खेल मन जाता था. धनकुबेरों ने अपने हिसाब से ठगी करने के वास्ते नए -नए नियम क़ानून बना लिए है. सरकार को इस पर रोक लगानी चाहिए और क्रिकेट की गरिमा को बचाना चाहिए.

  • 4. 17:52 IST, 21 अप्रैल 2010 sanjay kumar:

    आईपीएल के बहाने ही सही लोगों की बीसीसीआई के बारे में ख़ास तौर पर सोचने और जानने का मौका मिला है कि कैसे इसमें पैसा आता है. ये एक ऐसी संस्था है जिसके पास ऑफ़िस तक नहीं है. कभी पांच सितारा मे बैठक होती है तो कभी कहीं और. बीसीसीआई ने आईपीएल को जन्म दिया और अब आईपीएल बीसीसीआई से भी विशाल होता जा रहा है और कहां जाकर रुकेगा पता नहीं. कैसे-कैसे लोग इसमें काला धन लगा रहे हैं और व्हाइट बनाने में लगे हुए हैं. जो भी इसमें पैसा लगा रहा है वो बेनामी धन लगा रहा है. जो अच्छी बात नहीं है.

  • 5. 18:07 IST, 21 अप्रैल 2010 Ibrahim kumbhar Islamabad:

    बात को कितनी दूर तक लेकर जाना चाहते हैं आप ये समझा भी नही पा रहे हैं, मोदी ने तो इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया हैं, हो सकता हैं कि उस का कारण आप वाली बात ही हो कि बहुत से नेता जुड़े हैं इस मामले से, पाकिस्तान में तो इतने छोटे मामलो में मंत्री या नेता दखल नहीं देते इन जैसे मामलों को क्रिकेटर खुद देख लेते हैं, चलो आप ने अच्छा क्या कि नाम छिपा कर नेताओं की इस मामले में दख़लअंदाज़ी की बात कर तो ली. भारत में आईपीएल क्या शुरू हुए एक तूफ़ान आया. शशि का पद छिन गया, अब मीडिया मोदी के पीछे पड़ चुका है. ठीक है हम एक लम्हे के लिए मान लेते हैं कि मोदी को दोषी मान कर उसको पद से हटाया जाता हैं, जैसे कि आप ने कहा है, या उस के पर काटे जाते हैं, लेकिन क्या गारंटी है कि कल जो इस पद पर आएगा वो इस तरह से नहीं करेगा, इसलिए मेरे ख़्याल में पद आते जाते हैं लेकिन इन पर जो लोग बिठाए जाते हैं उनको पहले परखो, ये इसलिए भी ज़रुरी है कि आप को आगे मुश्किल नहीं देखना पड़ेगी.

  • 6. 18:33 IST, 21 अप्रैल 2010 Intezar Hussain:

    बलवंत जी आपने जो लिखा है वो सही है. क्रिकेट को क्रिकेट के तौर पर ही लिया जाना चाहिए. अगर साल में दो तीन महीने यह खेल खेला जाए तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा. ये खेल नौजवान पर बहुत बुरा प्रभाव असर डाल रहा है. इसलिए हमारा अनुरोध है कि इससे बचा जाए.

  • 7. 19:02 IST, 21 अप्रैल 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    मुकेश जी एक बात समझ में नहीं आ रही है कि बीबीसी क्यों आईपीएल और क्रिकेट से आगे नहीं बढ़ रही है. भारत के समाने और कई भी मसले हैं.

  • 8. 19:09 IST, 21 अप्रैल 2010 Ankit :

    मुकेश जी आईपीएल को पारर्दर्शी होने के लिए चार काम होना बेहद ज़रूरी है,एक तो आईपीएल और ललित मोदी की आर्थिक जाँच और ललित मोदी का इस्तीफा,दूसरी सभी टीमो की आर्थिक जाँच,तीसरी बीसीसीआई की इसमे भूमिका और जाँच तथा शरद पवार का इस्तीफा,और चौथी और सबसे ज़रूरी बीसीसीआई और आईपीएल को मिल रही टेक्स राहत ख़त्म करना और इन दोनों को आरटीआई एक्ट के दायरे में लाना,ज़रूरी है की इसमें से भ्रस्टाचार ख़त्म हो,क्रिकेट नहीं,क्यूंकि ये बहोत मज़ेदार खेल है.

  • 9. 19:44 IST, 21 अप्रैल 2010 bannubhayya:

    जितना आसान मोदी का हटाना समझ रहे है उतना है नही,इसकी मिसाल साँप के बिल मे हाथ डालने के समान है, इतने बड़े-बड़े राजनेताओ,उद्योगपतियो, और बीसीसीआई के लोगों के भविष्यफल ओर नकाब खुलेगा, कई थरूर नज़र आएँगे.

  • 10. 21:16 IST, 21 अप्रैल 2010 moshahid bhatouni saharsa :

    जांच हो कर क्या होगा. बड़े लोग हैं बात दबा दी जाएगी. ये सब राजनीति है और नेता लोग अपनी खिचड़ी पका रहे हैं.

  • 11. 21:29 IST, 21 अप्रैल 2010 Mukesh Sakarwal:

    हर भारतीय की तरह मैं भी इस खेल का प्रशंसक हूं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेलों का. मुझे खुशी है कि मैं इस आयोजन को देखकर समय और पैसा बर्बाद नहीं करता. मोदी और अन्य टीमों के मालिको में खेल भावना नहीं है, और वो केवल पैसा बना रहे हैं.

  • 12. 05:36 IST, 22 अप्रैल 2010 kevin chauhan:

    आईपीएल कोई धर्माथ या ग़ैर लाभकारी संस्था नहीं है. तो है कैसे हो सकता है कि उनपर टैक्स की देनदारियाँ न बनती हों. सरकार उनपर टैक्स क्यों नहीं लगा सकती है.यह केवल भारत में ही हो सकता है.

  • 13. 11:03 IST, 22 अप्रैल 2010 Ajay Rai:

    अब तक जो हुआ, सब तो ठीक था. लेकिन अब जो हो रहा है वह ऐसा लगता है कि थरूर के इस्तीफ़े का बदला लिया जा रहा है. यह सब थरूर का नाम जुड़ने से पहले क्यों नहीं किया गया. इस बात को एक मूर्ख इंसान भी समझ सकता है कि कांग्रेस सरकार के इशारे पर बदले की कार्रवाई की जा रही है. इससे एक बात तो तय लग रही है कि मोदी के इस्तीफ़े के बाद मामला शांत हो जाएगा. क्योंकि इससे कांग्रेस का बदला पूरा हो जाएगा.अगर नहीं होता है तो यह कार्रवाई बहुत आगे तक ले जानी होगी. आईपीएल और बीसीसीआई के सभी सदस्यों की जांच कराई जानी चाहिए.इसके बाद ही पता चल पाएगा कि असली दोषी कौन है.

  • 14. 14:57 IST, 22 अप्रैल 2010 brajkiduniya:

    आईपीएल और उसकी टीमों पर जिस तत्परता से छापे मारे जा रहे हैं क्यों वही तेजी और तत्परता तब नहीं दिखाई जाती जब कोइ राजनेता गबन करता है? तब क़ानून को क्यों सांप सूंघ जाता है? क्या मोदी को यह दिन इसलिए नहीं देखना पड़ रहा है क्योंकि उन्होंने एक केंद्रीय मंत्री की कारगुजारियों को जगजाहिर कर दिया? लालू, पवार और दूसरे मोदी के विरोधी पहले अपने दामन में झांक कर देखें फिर वे खुद ही आत्मग्लानी में डूब जाएँगे. सरकार के नियंत्रण वाले खेलों की हालत किसी से छुपी नहीं है. मोदी ने भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों तक पहुँचाया है और उन्हें आईपीएल के आयुक्त पद से नहीं हटाया जाना चाहिए. हाँ,अगर उन्होंने कोइ क़ानून तोडा है तो कानून को अपना काम करने देना चाहिए.

  • 15. 18:04 IST, 22 अप्रैल 2010 brijbihariyadav:

    मेरे लिए बीबीसी सबसे अच्छा है और ये एक अच्छा ब्लॉग है.

  • 16. 18:10 IST, 22 अप्रैल 2010 ashok :

    अगर इस पूरे मामले को शतरंज का खेल माना जाए तो इस खेल में मोदी तो केवल घोड़ा हैं. इसके राजा, हाथी और पेयादे तो कोई और हैं. ज़रूरत इस बात की है कि इस खेल में पर्दे के पीछे कौन है, उसके बारे में पता लगाया जाए.

  • 17. 11:34 IST, 23 अप्रैल 2010 himmat singh bhati:

    आईपीएल के वर्तमान जनक तो शरद पवार हैं और जगमोहन डालमिया इससे पहले के जनक थे. जिसे ललित मोदी ने हथिया लिया और अपने दिमाग से पैसा बनाने का खेल खेला. इस खेल से हर किसी ने पैसा बनाया यहां.

  • 18. 12:14 IST, 23 अप्रैल 2010 D.S.Rajput:

    जाँच ज़रूर होना चाहिए और इसे आईपाएल तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए. इसमें नेताओं और फ्रेंचाईजी की भी जाँच होनी चाहिए. आईपीएल अब खेल नहीं बचा अब यह काले धन के कारोबार का खेल बन गया है.

  • 19. 16:46 IST, 23 अप्रैल 2010 HIMMAT SINGH BHATI:

    ये बुद्धीजीवी, राजनेता, नामचीन खिलाड़ी और मीडिया आईपीएल पर अब क्यों आंसू बहा रहे है. उस समय ये आंखों पर पट्टी बांध कर क्यों बैठे हुए थे जब टीवी पर खुलेआम खिलाड़ियों की बोलियाँ लगाई जा रही थीं. उस समय नहीं दिखाई दे रहा था कि यह खेल नहीं बल्कि पैसे बनाने का खेल शुरू हो रहा है. पर लगता यह है कि सत्ता की केंद्र संसद ही इंडियन पार्लियामेंट लिमिटेड कंपनी बनकर विदेशियों की तरह राज करते हुए अपनी हुकूमत चला रही है. महँगाई कम नहीं कर रही है, टैक्स पर टैक्स लगा रही है. वह देश के विकास की बात को लेकर, सरकारी कर्मचारियों को छठवाँ वेतन आयोग के सिफारिशों के समान वेतन देकर और ग़रीबों को मनरेगा के जरिए पैसा देकर, इस तरह लोग सरकार पर आश्रित हो रहे हैं. सरकार इस खेल में मगन है. इसका फ़ायदा उठाकर पैसे वाले, अभिनेता और नेताओं ने मिलकर इंडियन पैसा बनाओ लिमिटेड (आईपीएल) का गठन किया. इसी लालच में थरूर को जाना पड़ा लेकिन और लोग भी जाते दिख रहे हैं. ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि सरकार मीडिया और आयकर विभाग पहले क्यों नहीं चेता. इसमें सबसे ज्यादा मूर्ख तो आम जनता बनी जो क्रिकेट को धर्म के रूप में देख रही है. उसकी इस कमजोरी का फ़ायदा आईपीएल ने उठाया. थरूर के बाद अब मोदी की बारी और फिर सरकार की बारी. पर लगता है कि मीडिया की बारी कभी नहीं आने वाली है. आईपीएल कांड से हर्षद मेहता की याद ताजा हो रही है. लेकिन अफ़सोस है कि कुछ समय बाद ये बातें हवा हो जाएंगी.

  • 20. 16:15 IST, 24 अप्रैल 2010 deepak Kumar:

    क्रिकेट को तीन-चार साल के लिए बंद कर देना ही इसका उपाय है.

  • 21. 19:25 IST, 24 अप्रैल 2010 namrata:

    आदरणीय मुकेश शर्मा आपके ब्लॉग में तो वही घिसी पिटी बात है जो हर अख़बार, टीवी चैनल पर बताई जा रही है. हम सब जानते हैं की आईपीएल एक मजेदार चीज़ है. फिर आप कहना क्या चाहते हैं ये समझाने का कष्ट करे. क्योंकि मज़ा तो हम सब को खेल और विज्ञापन दोनों में ही आता है. आम लोगों की यही राय है.

  • 22. 17:04 IST, 26 अप्रैल 2010 IBRAHIM KUMBHAR ISLAMABAD:

    आप ने भी कहा कि जब तक मोदी को नहीं हटाते मैं अपनी बात से पीछे नहीं हटेंगे, लो आप को बधाई हो मोदी की नौकरी तो हुई खत्म अप किस की बारी है. अगर अब भी भारतीय क्रिकेट नहीं सुधरी तो हम सारा दोष आप को देंगे, क्योंकि आप ने ही शशि के बाद सब से बड़ा दोषी मोदी को कहा था, अब आप सुधार के दिखाए भारतीय क्रिकेट को.

  • 23. 17:18 IST, 29 अप्रैल 2010 ZIA JAFRI:

    बात निकली है मगर दब जाएगी. शशि थरूर और मोदी दोनों ने नहीं सोचा था कि अंजाम पद गंवाने जैसा होगा. मेरा सवाल सिर्फ़ ये है कि पिछले किसी घोटाले में किसी को सज़ा मिली है? बस याद रखें सत्ता का रुप बदलता है लेकिन शासन का तरीक़ा नहीं.

  • 24. 00:49 IST, 13 मई 2010 Sanndep Dobriyal:

    एक अच्छे मुद्दे को घिसे-पिटे लहजे में दोहराया है आपने. कुछ ख़ास नहीं लगा.

  • 25. 19:42 IST, 20 मई 2010 Rakesh mishra:

    जब आप ख़ुद ही कह रहे हैं कि 'लगता ही नहीं कि ये बात दूर तक जाएगी' तो फिर आपने इतना लंबा लेख क्यों लिखा. आपको ख़ुद अपने लिखने पर भरोसा नहीं है तो हमें क्या होगा. अब कुछ नया लिखिए.

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