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अब मोदी की बारी

सुशील झासुशील झा|सोमवार, 19 अप्रैल 2010, 14:05 IST

थरुर जी को ट्विटर ले डूबा है. ट्विटर मंत्री पर ट्विटर के ज़रिए आरोप लगे और अब वो विदेश राज्य मंत्री से 'नो मंत्री' हो गए हैं..लेकिन ये आईपीएल के बवाल का अंत नहीं है.

थरुर गए अब ललित मोदी की बारी है. थरुर के इस्तीफ़ा देते ही अब मोदी पर राजनीतिक दलों ने निशाना साधना शुरु कर दिया है.

वाम दलों ने आईपीएल की संयुक्त संसदीय समिति से जांच की मांग की है तो कांग्रेस नेता ने कहा कि आईपीएल में काला पैसा लगा है.

कल तक थरुर के इस्तीफ़े की मांग कर रही बीजेपी ने कांग्रेस पर आरोप लगाए कि जब महाराष्ट्र सरकार का बजट घाटे में था तब वो आईपीएल का टैक्स माफ़ कर रही थी

वैसे थरुर ने जैसे ही सफाई देनी शुरु की थी उसी दौरान मोदी के कार्यालय पर छापे पड़े थे. लेकिन असली कहानी अब शुरु हो रही है.

बीसीसीआई से जुड़े लोग, राजनेता, खेल समीक्षक अब सारे लोग आईपीएल और ललित मोदी के पीछे पड़ जाने वाले हैं.

कल तक आईपीएल को सबसे बड़ा खेल आयोजन और ललित मोदी को क्रिकेट का शोमैन बताने वाले अब उनकी जान के पीछे पड़ चुके हैं.

वैसे क्रिकेट की अवधारणा को बदलने में बहुत बड़ा हाथ जगमोहन डालमिया का भी था लेकिन आगे चलकर वो बुरी तरह दरकिनार हुए और अब मात्र कोलकाता क्रिकेट संघ से जुड़े हुए हैं.

ऐसा नहीं है कि मोदी अच्छे मैनेजर नहीं हैं या थरुर में सारी कमियां ही थीं जब उसमें राजनीति का पुट आ जाता है तो फिर अच्छे काम को कौन पूछता है. उनकी पार्टी में ही उनके विरोधी निकल आए.

विदेश राज्यमंत्री के रुप में थरुर का योगदान भी उनका इस्तीफ़ा रोक नहीं पाया. अब थरुर को लग रहा होगा कि विदेश मंत्रालय का काम देखते क्रिकेट और क्रिकेट से जुड़ी राजनीति में न पड़ते तो अच्छा होता.

कुछ ऐसा ही मोदी जी के साथ भी होता दिखता है. बेहतरीन क्रिकेट का आयोजन कर रहे थे. पैसे कमा रहे थे. संक्षेप में ऐश कर रहे थे लेकिन नहीं उन्हें तो किंग बनने का शौक था.

सारी टीमों को अपनी ऊंगली पर नचाना चाहते थे. क्या हुआ. कोच्चि टीम को लेकर जितनी किरकिरी थरुर की हुई उतनी ही मोदी की भी हुई है.

विवाद पैदा हुआ तो बीसीसीआई ने भी साफ़ किया कि वो मामले पर गंभीरता से विचार करेगी. गवर्निंग काउंसिल में बात होगी.

आईपीएल में संयुक्त चेयरमैन बनाने और यहां तक कि नया चेयरमैन बनाने की ख़बरें भी आने लगीं हैं. लेकिन इस बार बीसीसीआई मामला रफा दफा नहीं कर सकेगी.

अब आईपीएल और मोदी जी के कारनामों की भी जांच होगी. और इस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा कि एक आयोजक के रुप में उनका काम कितना अच्छा रहा था.

और क्या पता.. अगर मोदी को आईपीएल से हटाया गया तो उनके लिए राजस्थान क्रिकेट संघ में भी जगह बनेगी या नहीं..

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:54 IST, 19 अप्रैल 2010 Afsar Abbas Rizvi "ANJUM":

    सुशील जी, जब खेलों में राजनीति घुस आए तो यही होता है. आज थरूर जी ने और ख़ुद ललित मोदी ने क्रिकेट का कितना नुक़सान किया है ये वे ख़ुद नहीं जानते हैं. कल तक इसी टूर्नामेंट को आसमान की बुलंदियों तक ले जाने वाले मोदी जी पूरी भैंस के साथ खोया बनाना चाहते थे सो ये हश्र तो होना ही था. आज क्रिकेट में पैसा राजनीति और सट्टे की घुस पैठ इतनी बढ़ चुकी है कि पता ही नहीं चल पाता है कि अगले ही पल क्या होने वाला है. मोदी जी जैसे जैसे पैसा कमा रहे थे और क्रिकेट को इतने ऊंचे मक़ाम तक ले गए थे उससे लगता था कि वो एक कुशल शासक है, लेकिन उन्होंने भी वही ग़लती कर दी जो आज के नेता करते हैं कि खोया खाने के चक्कर में पूरी भैंस ही कड़ाही में डाल दी. अब क्रिकेट और ख़ास तौर से आईपीएल का क्या हाल होता है.

  • 2. 17:03 IST, 19 अप्रैल 2010 Devesh:

    आप इन दोनों के एक भी अच्छे काम का उल्लेख कर देते तो हमें भी उनके बारे में कुछ पता चल जाता.

  • 3. 17:09 IST, 19 अप्रैल 2010 Ibrahim kumbhar Islamabad:

    मोदी के ख़िलाफ़ करवाई हो या ना हो आपने तो शुरु करवा दी है, आप के ब्लॉग से लग ऐसा रहा जैसे कि आप की कोई पुरानी दुश्मनी हो, ख़ैर शशि थरूर का इस्तीफ़ा आने से एक बात तो नज़र आती है कि अब भी कुछ लोग हैं जो आरोपों कि बुनियाद पर इस्तीफ़ा दे कर ख़ुद को सफ़ाई के लिए पेश कर देते हैं और ये अच्छी परंपरा हैं, अक्सर हमें इस मामले में यूरोप की ही मिसाल दी जाती है कि वहाँ केवल आरोपों की वजह से प्रधानमंत्री भी इस्तीफ़ा देने में देर नहीं करते, सुना तो बहुत है लेकिन इस्तीफ़ा देते किसी को देखा नहीं, इसलिए शशि थरूर का इस्तीफ़ा इस बात को साबित करता है कि यहां भी ऐसे नेता हैं जो यह परंपरा बरक़रार रखना चाहते हैं इसलिए इस्तीफ़े के मामले पर शशि को बधाई देनी चाहिए के जहाँ कुर्सी के लिए लाखों करोड़ों की बोली लगती है वहाँ इसने आरोप लगने पर इस्तीफ़ा दे दिया है, हम मीडिया को बीच में नहीं लाते कि उस की वजह से शशि इस्तीफ़े पर मजबूर हुए, यह सच है कि थरूर साहिब को मीडिया ने ही मजबूर किया कि वो यह क़दम लें. अब मैं आता हूँ अपने देश की ओर, पाकिस्तान में ये बहुत कम हैं. यहां मंत्री से ले कर प्रधानमंत्रियों तक पर आरोप लगते रहते हैं लेकिन मुझे याद नहीं कि किसी ने इस्तीफ़ा दिया हों,य हां तो ये रिवाज है, जितना बड़ा आरोप उतनी ज़ोर से कुर्सी को पकड़ना है. आप ने मोदी की बात की हैं अपनी बात पर क़ायम रहना हम मोदी के इस्तीफ़े का इंतज़ार करेंगे आपकी तरह.

  • 4. 18:19 IST, 19 अप्रैल 2010 शशि सिंह :

    माफ़ी चाहुंगा लेकिन आईपीएल तो बहाना है थरूर को तो जाना ही था. बस एक सही मौक़े की तलाश थी जो आईपीएल ने दिला दी. अब कारण भी बताना पड़ेगा... भई, कांग्रेस में रहकर सोनिया गांधी को राजमाता न मानकर सिर्फ़ पार्टी प्रमुख मानने वाला व्यक्ति भला कब तक बच सकता है? रही बात ललित मोदी की तो निश्चित जानिए उन्हें बचाने वाले बहुत हैं सरकार में. क्योंकि अगर वो डूबे तो कई और चेहरे बेनक़ाब हो सकते हैं.

  • 5. 00:05 IST, 20 अप्रैल 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    शशी सिंह ने बहुत शानदार और अच्छे विचार लिखे हैं. ललित मोदी का कुछ भी नहीं बिगड़ेगा क्योंकि उनकी पहुँच बहुत ऊँची है और उनके हाथ क़ानून से लंबे हैं. तभी तो वे आईपीएल के नाम पर अरबपति बन गए. उसके नाम पर भारतीय संस्कृति और युवाओं को बरबाद कर रहे हैं. इसके लिए जितना ललित मोदी जिम्मेदार हैं उतना ही बीबीसी भी जिम्मेदार है.

  • 6. 00:51 IST, 20 अप्रैल 2010 sanjay kumar:

    इंटरनेट ने दुनिया को काफी छोटा बनाकर रख दिया है. इसके जरिए करोड़ों लोग आपस में जुड़ जाते हैं. इसका फ़ायदा यही है लेकिन शशि थरूर के साथ जो हुआ, वह इसका नुक़सान है. ट्विटर के जरिए अपनी बात लोगों तक पहुँचाने वाले थरूर को ट्विटर के जंग में ही अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी. आईपीएल विवाद का आगाज क्या हुआ थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. संयुक्त राष्ट्र छोड़कर देश की सेवा करने वाले शरूर ने विदेश राज्यमंत्री रहते हुए कोई ख़ास योगदान दिया हो ऐसा तो नहीं दिखा लेकिन अपनी जुबान के जरिए वे लगातार कांग्रेस और सरकार के लिए परेशानी पैदा करते रहे. अब उनके जाने से कांग्रेस को भी राहत मिली होगी. राजनीति से कभी वास्ता न रखने वाले थरूर को इसकी बारीकियों और पेचेंदगियों का कोई ख़ास अनुभव नहीं था लेकिन इस एपीसोड के बाद उनके राजनीतिक ज्ञान में बढ़ोतरी हुई होगी और वे भारतीय राजनीति की रवायत से वाकिफ हुए होंगे.
    जिस तरह एक विवाद के बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दिया और काग्रेस सरकार ने उनसे इस्तीफा देने को कहा यह एक अच्छी परंपरा है. उम्मीद है कि इस परंपरा को राजनीतिक दल आगे भी जारी रखेंगे और खेल को राजनीति से जोड़ने वाले ऐसे विवाद से ख़ुद को अलग रखेंगे.

  • 7. 02:26 IST, 20 अप्रैल 2010 Kamlesh Kumar:

    आज का विचार, नेता बने रहना है तो आपको मीडिया की भाभी बनके रहना होगा, माँ बनने की कोशिश न करें.

  • 8. 11:06 IST, 20 अप्रैल 2010 akram:

    मेरी समझ में यह नहीं आता है कि सबकुछ ट्विटर पर ही बताने की क्या ज़रूरत थी ललित मोदी को. फ्रेंचाइजी में किसका-किसका हिस्सा है, इससे उनको क्या मतलब. मोदी को आम खाने से मतलब रखना चाहिए पेड़ गिनने से नहीं.

  • 9. 11:54 IST, 20 अप्रैल 2010 himmat singh bhati:

    ये बुद्धीजीवी, राजनेता, नामचीन खिलाड़ी और मीडिया आईपीएल पर अब क्यों आंसू बहा रहे है. उस समय ये आंखों पर पट्टी बांध कर क्यों बैठे हुए थे जब टीवी पर खुलेआम खिलाड़ियों की बोलियाँ लगाई जा रही थीं. उस समय नहीं दिखाई दे रहा था कि यह खेल नहीं बल्कि पैसे बनाने का खेल शुरू हो रहा है. पर लगता यह है कि सत्ता की केंद्र संसद ही इंडियन पार्लियामेंट लिमिटेड कंपनी बनकर विदेशियों की तरह राज करते हुए अपनी हुकूमत चला रही है. महँगाई कम नहीं कर रही है, टैक्स पर टैक्स लगा रही है. वह देश के विकास की बात को लेकर, सरकारी कर्मचारियों को छठवाँ वेतन आयोग के सिफारिशों के समान वेतन देकर और ग़रीबों को मनरेगा के जरिए पैसा देकर, इस तरह लोग सरकार पर आश्रित हो रहे हैं. सरकार इस खेल में मगन है. इसका फ़ायदा उठाकर पैसे वाले, अभिनेता और नेताओं ने मिलकर इंडियन पैसा बनाओ लिमिटेड (आईपीएल) का गठन किया. इसी लालच में थरूर को जाना पड़ा लेकिन और लोग भी जाते दिख रहे हैं.ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि सरकार मीडिया और आयकर विभाग पहले क्यों नहीं चेता. इसमें सबसे ज्यादा मूर्ख तो आम जनता बनी जो क्रिकेट को धर्म के रूप में देख रही है. उसकी इस कमजोरी का फ़ायदा आईपीएल ने उठाया. थरूर के बाद अब मोदी की बारी और फिर सरकार की बारी. पर लगता है कि मीडिया की बारी कभी नहीं आने वाली है. आईपीएल कांड से हर्षद मेहता की याद ताजा हो रही है.

  • 10. 17:19 IST, 20 अप्रैल 2010 brajkiduniya:

    जब भी कोई व्यक्ति सरकार पर हाथ डालेगा तो उसे इसी तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ेगा. शशि थरूर जब विमान के इकॉनमी क्लास में यात्रा करने वालों को जानवर मानते हैं तो धरती पर विचरण करने वाले देशवासियों को न जाने क्या मानते होंगे? उनके जैसे अक्खड़ और बदमिजाज को मंत्री बनाना ही ग़लत था. मोदी की तो बस यहीं गलती है कि उन्होंने इस राजनेता को नंगा करके रख दिया लेकिन बीसीसीआई और आईपीएल में इतना दम नहीं है कि वह सरकार की नाराजगी को झेल सके. वैसे भी सरकार अब टकराव के मूड में है.

  • 11. 00:05 IST, 21 अप्रैल 2010 BALWANT SINGH PUNJAB:

    ट्विटर पर लिखना ग़लत नहीं है. सवाल यह रहा था कि कौन और किसके लिए लिख रहा था. अगर शशी थरूर भारतीय राजनीति के फ्लेवर को बदलना चाहते थे तो इनमें बुरा ही क्या था? शशी थरूर साहब विदेशों में बहुत कुछ सीखकर आए थे. हमारे नेताओं को उनसे कुछ तो सीखना चाहिए था? लेकिन ये लोग तो ठहरे पुराने चावल? शशी थरूर साहब भारतीय राजनीति के लिए बने ही नहीं थे? खैर निपटाना तो सबको बारी-बारी है ही क्योंकि सरकार की कुंभकर्ण की नींद जो खुल चुकी है. क्योंकि अपने चहेतों को खूब समय दे दिया कि ज़रूरी सबूतों को गायब करो? फिर छापे डलवाओ? क्या सरकार इससे पहले नहीं जानती थी कि यह सब कितने समय से चल रहा था? तो अब इतनी हाय- तौबा क्यों मची है?

  • 12. 17:52 IST, 24 अप्रैल 2010 आलोक मिश्र, नोएडा:

    कौन जाने कब किसकी बारी आती है. अब बारी आए भी तो क्या फ़र्क पड़ता है थोड़ा सी किरकिरी ही तो हुई है. क्रिकेट की सेवा में जो मेवा है वो हर छोटे से लेकर बड़े नेता को दावत खाने का न्यौता देने के लिए काफ़ी है. क्रिकेट के खेल में वैसे ही बहुत पैसा है, यहां मेरा आशय केवल भारत से है, जिस पर आईपीएल तो कुबेर का खज़ाना ही है समझिए. हां, सीधे-सीधे तो परोसी थाली कोई हटाता नहीं और इतने बवाल के बाद भी इस्तीफ़ा देने से मना करके मोदी ने इस बात को सही साबित किया है. दो-चार दिनों में इस आईपीएल और मोदी दोनों ही मामलों की तस्वीर साफ हो जाएगी. हिंदी की एक कहावत याद आती है कि भूत बातों से नहीं मानते. मेरा मानव प्रजाति संबंधी ज्ञान भी कमजोर है फिर भूतों की प्रजातियों के बारे में, जिससे कभी सामना ही नहीं हुआ, कहना ही क्या. फिर भी क्रिकेट-प्रेमी जनता के साथ कब तक ठगी का धंधा चलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता.

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