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थरुर पिच पर रहें कि जाएं...

राजेश प्रियदर्शीराजेश प्रियदर्शी|बुधवार, 14 अप्रैल 2010, 22:03 IST

देश में हरियाली के लिए ज़िम्मेदार मंत्री क्रिकेट की लहलहाती फ़सल संभाल चुके हैं, जब इतने सारे विदेशी खिलाड़ी आईपीएल में खेल रहे हैं तो विदेश राज्यमंत्री को अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास नहीं होगा?

यूएन में ऊँचे ओहदे पर रह चुके मंत्री जी ने विवादों की लड़ी से जूझने के बाद कहा था कि उन्हें अभी भारतीय राजनीति के 'तौर-तरीक़े' अच्छी तरह सीखने की ज़रूरत है.

शायद उन्होंने शरद पवार और सुरेश कलमाडी जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से नए 'तौर-तरीक़े' सीखे हैं, खेल की सियासत और सियासत का खेल.

ट्विटरी के शौक़ीन मंत्री जी पर आईपीएल के कर्ताधर्ता ललित मोदी ने ट्विटर से ही वार किया, सैकड़ों करोड़ रुपए की नीलामियों में सीधी दख़लंदाज़ी का आरोप लगाया.

विदेश नीति की चिंताओं को दरकिनार करके उन्हें नौ पैराग्राफ़ की सफ़ाई लिखनी पड़ी यानी मामला ट्विटर की शब्द सीमा से बाहर निकल गया.

केरल से ताल्लुक रखने वाले मंत्री जी कोच्चि की टीम को प्रोमोट करने वाले निवेशक मंडल को 'सलाह' दे रहे थे. ललित मोदी को कई बार फ़ोन करने और नीलामी के बाद होने वाली कार्रवाई में देरी पर जवाब-तलब करने की बात उन्होंने ख़ुद स्वीकार की है.

उन पर बेनामी निवेश जैसे आरोप भी लगे हैं जो आम तौर पर सिर्फ़ 'परिपक्व नेताओं' पर ही लगते हैं.

भारत की पढ़ी-लिखी शहरी जनता ने विदेश नीति के जानकार और साफ़-सुथरी छवि वाले इस प्रोफ़ेशनल का मंत्री के रुप में ज़ोरदार स्वागत किया था, लेकिन वे भारतीय राजनीति के 'तौर-तरीक़े' सीखने का वादा शायद पूरा कर चुके हैं.

खेल की राजनीति और राजनीति के खेल दोनों साथ-साथ चलते रहेंगे, मगर मंत्रियों के इस खेल में शामिल होने पर जनता को अंपायर की भूमिका ज़रा मुस्तैदी से निभानी चाहिए.

वे आउट हो गए हैं या उन्हें पिच पर टिके रहना चाहिए?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 00:09 IST, 15 अप्रैल 2010 Rabindra Chauhan, Tezpur, Assam:

    राजेश जी, आपने सही समय पर ब्लॉग लिखकर सही सवाल किया है . अब पानी सर के ऊपर से बहने लगा है. यह अलग बात है कि कुछ राजनेता अपने स्वार्थ के खातिर देश के साथ अप्रत्यक्ष रूप से गद्दारी करते हैं, पर उनपर लगा इल्जाम कभी जनता के सामने नहीं आता. पर जब राजगद्दी पर बैठे नेता की मानसिकता ही देश की जनता की समस्याओं के अनुरूप नहीं तो उसके काम-काज की बातें करना ब्यर्थ है. कैटल क्लास से लेकर क्रिकेट में दांव लगाने तक की गतिबिधियाँ थरूर साहब की मानसिकता को दर्शाती है. ऐसे लोग भारत की मूलभूत समस्याओं पर सेमिनारों में ,सम्मेलनों में बहस करना जानते तो हैं पर उनपर अमल करना नहीं जानते. ऐसे लोगों को संयुक्तराष्ट्र जैसी सम्मानीय एजेंसियों में ही रहना चाहिए.

  • 2. 00:27 IST, 15 अप्रैल 2010 Rakesh Jain:

    राजेश जी, इस लेख को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे आपने यह मान लिया है कि थरूर ही दोषी हैं. मेरे ख्याल से जब तक पूरा मामला सामने नहीं आ जाता कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी. ललित मोदी कोई दूध के धुले तो नहीं.

  • 3. 00:59 IST, 15 अप्रैल 2010 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    राजेश जी आप कुंभ जैसे पवित्र पर्व से इस गंदी राजनीति पर कहाँ पहुँच गए. आप इसकी जगह कुंभ मेले पर लिखते तो बेहतर होता. रहा सवाल इस मुद्दे का तो, चाहें वे थरूर हों या मोदी दोनों ही इस मामले में ईमानदार नहीं हैं. यह सब पैसों का खेल है. मुझे लगता है कि बीबीसी को किसी न किसी रूप में क्रिकेट की ख़बरें देनी होती हैं इसलिए आप लिख रहे हैं.

  • 4. 03:13 IST, 15 अप्रैल 2010 kajal:

    शशि थरूर को पिच पर टिके रहना चाहिए.

  • 5. 03:44 IST, 15 अप्रैल 2010 Kumud B Mishra:

    यह भारतीय राजनीति के लिए एक सामान्य बात है. ललित मोदी क्रिकेट में राजनीति करना चाह रहे हैं. मुझे यह समझ में नहीं आ रहा है कि वे शशि थरूर पर आरोप क्यों लगा रहे हैं. लेकिन अगर थरूर आईपीएल में अपना पैसा लगाना चाह रहे हैं तो वे डर क्यों रहे हैं. एक भारतीय नागरिक होने के नाते उनके पास अपने पैसे का निवेश करने का पूरा अधिकार है. उन्हें अपने मंत्रीपद के गरिमा का ख़्याल रखना चाहिए और किसी को भी अपने लाभ के लिए प्रभाव में लेने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

  • 6. 09:46 IST, 15 अप्रैल 2010 Talib Anwer , Amroha ,UP :

    अपने मंत्री पद का दुरुपयोग करते हुए थरूर ने बिना एक पैसे का निवेश किए ही अपनी मित्र सुनंदा पुष्कर को करोड़ रुपए का फायदा कराया है. इतना सब होने के बाद अब प्रधानमंत्री को थरूर पर कार्रवाई के लिए और सुबूतों का इंतजार नहीं करना चाहिए क्योंकि मामला थरूर के अनैतिक आचरण से जुड़ा है. बेहतर यही होगा कि केंद्रीय मंत्री को बेदाग साबित होने तक अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए.

  • 7. 10:08 IST, 15 अप्रैल 2010 arunesh, USA:

    शशि थरूर ने जब संयुक्त राष्ट्र का चुनाव लड़ा था तो भारत की प्रतिष्ठा का इस्तेमाल कर उभरे. वे काफी गंभीर इंसान नज़र आए लेकिन भारत में चुनाव जीतने के बाद वे जो रंग दिखा रहे हैं वह हैरतअंगेज है. रोज किसी न किसी बवाल में उलझ जाते हैं, जबकि उनके पास विदेश मंत्रालय जैसा संवेदनशील मंत्रालय है . कल वे कहीं अपनी फिसलने वाली जुबान से अर्थ का अनर्थ न कर दें. उन्हें ट्विटर पर लिखने का समय तो है लेकिन उन्होंने अपने इलाक़े की समस्याओं के समाधान के लिए कितना समय निकाला है. एक व्यक्ति जो संयुक्त राष्ट्र का चुनाव लड़ चुका हो और जिसे दुनिया की राजनीति की जानकारी हो अगर वह ऐसी हरकत करे तो हैरत होती है.

  • 8. 15:46 IST, 16 अप्रैल 2010 brajkiduniya:

    जो काम बाकी मंत्री रात के अंधेर में करते हैं थरूर साहब वही काम खुलेआम किया है. उन्होंने कोई ग़लती नहीं की है इसलिए उनको इस्तीफा देने की कोई जरूरत नहीं है.

  • 9. 20:48 IST, 16 अप्रैल 2010 मुकेश:

    राजेश जी,
    शशि थरूर आउट हो गए है या पिच पर टिके रहेगें, इसका फैसला तो 'तीसरा अम्पायर' यानी कि सोनिया जी ही करेगीं. पर इतना तो तय है कि उनके पर जरूर कतर दिए जाएंगे या वे जल्द ही 'रिटयरमेंट' की घोषणा करेंगे.

  • 10. 22:23 IST, 16 अप्रैल 2010 himmat singh bhati:

    राजेश जी मुझे लगता यह है कि आपकी सोच भी उन नेताओं की तरह है जो कब्र में पैर लटकाएँ हुए हैं और फिर भी सुख और मोह नहीं छोड़ना चाहते है. वे नए चेहरों को जगह नहीं देना चाहते हैं. उनकी सोच दकियानूसी है. रही बात मोदी की तो वे पक्का बिजनेसमैन हैं.

  • 11. 02:52 IST, 17 अप्रैल 2010 Ankit :

    क्या कोई मंत्री उद्योगपति नहीं हो सकता? मंत्री होने के लिए उसे पुरानी गरीबी का सबूत देना पड़ेगा! वो यूएन में काम कर चुके और विदेश नीति के अच्छे जानकर हैं, उन्हें पद से नहीं जाना चाहिए. आईपीएल दिखता है उससे कई ज्यादा बड़ा खेल है, इसमें कोई एक या दो लोग ज़िम्मेदार नहीं हो सकते..मीडिया मनमोहन सिंह की विदेश यात्रा से भी ज्यादा और बेवजह ऐसे मामलों को तूल दे रही है..

  • 12. 08:07 IST, 17 अप्रैल 2010 BALWANT SINGH HOSHIARPUR PUNJAB :

    क्रिकेट के खेल का दूसरा पहलू अब कुछ वर्षों से आम लोगों के बीच खुलकर सामने आया है? कहाँ इसे "जेंटलमेन खेल" का दर्जा हासिल था और कहाँ अब जमाखोरी, घूसखोरी और बंदरबांट का अड्डा बनकर रह गया है? आम क्रिकेट प्रेमी भूख प्यास की प्रवाह किए बग़ैर अपने - अपने टी.वी. सेट के सामने घंटों पंक्तियों में धक्के खाने के बाद दर्शक दीर्घा में पहुंचकर मैच की शोभा बढ़ाते हैं लेकिन अब पता चलता है कि सब पहले से ही सुनिश्चित होता है तो खेलप्रेमियों के पास ठगा सा मुहं लेकर बैठने के सिवाय कोई चारा नहीं है? या तो इस खेल को अपने खेल - प्रेम के हिसाब के रूप में इस भ्रष्टाचार के खेल को अर्श से फर्श तक पहुंचाएं? शशि थरूर जैसे लोग जिनका विवादों से चोली - दामन का साथ रहा हो तो चाणक्य नीती भी ऐसे लोगों के लिए यही कहती है कि ऐसे लोग राज व् राजनीती के लिए अनुपयुक्त और घातक हैं? एक अच्छे राजा को ऐसे वज़ीरों से तौबा करनी चाहिए? शशी थरूर अपने आप जांए? ऐसा हो नहीं सकता? क्योंकि ऐसा कार्य करने वाले मंत्रीमंडल में वे पहले व्यक्ति नहीं हैं! सूची बहुत लंबी है? तो शशी थरूर ऐसा करने में पहल करें यह सोचना बेबकूफ़ी होगी!

  • 13. 12:49 IST, 17 अप्रैल 2010 raza husain:

    मेरे हिसाब से जब किसी खेल में बेशुमार पैसा आ जाता है तो वह खेल भ्रष्टाचार में बदल जाता है. भारत में और भी खेल हैं उन खेलों में कोई इस प्रकार के विवाद नहीं खड़े हो रहे हैं. अगर क्रिकेट में से भ्रष्टाचार हटाना है तो आईसीसी को आईपीएल पर प्रतिबंध लगाना होगा.

  • 14. 23:53 IST, 17 अप्रैल 2010 rakesh ranjan:

    ये सिर्फ़ राजनीति है.

  • 15. 11:24 IST, 19 अप्रैल 2010 mahesh bohra:

    थरूर विदेश सेवा में काफ़ी माहिर हैं लेकिन भारतीय राजनीत में अच्छे नहीं हैं.

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