भारत-चीनः उतार-चढ़ाव के साठ वर्ष
पहली अप्रैल भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ है. एक अप्रैल, 1950 को भारत चीन के साथ कूटनयिक रिश्ते क़ायम करने वाला दूसरा गैर-कम्युनिस्ट राष्ट्र बना.
हिंदी-चीनी भाई-भाई के उन्माद भरे दिनों के बाद, 1962 में हुई लड़ाई ने इन दोनों देशों के बीच के भाईचारे का अंत कर दिया.
अगस्त 1976 में दोनों देशों ने पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल किए और बेइजिंग और नई दिल्ली में राजदूतों की नियुक्ति की. यह दुनिया के लिए एक संकेत था कि दोनों देशों के संबंध धीरे-धीरे सुधार की ओर बढ़ रहे हैं.
जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी फ़रवरी, 1979 में बेइजिंग गए जबकि उनके समकक्ष हुआंग हुआ जून, 1981 में भारत आए.
भारत और चीन के जटिल और तनावपूर्ण संबंधों में एक मोड़ दिसंबर, 1988 में आया जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी चीन की यात्रा पर गए. सीमा विवाद पर बातचीत के लिए एक संयुक्त कार्यगुट की स्थापना हुई-यानी, दोनों देशों के बीच के मतभेद सुलझाने के लिए एक कार्यप्रणाली विकसित की गई.
इस यात्रा के लगभग 22 साल गुज़र जाने के बाद भारत-चीन संबंधों में भारी बदलाव आया हालाँकि अधिकारियों और बड़े पैमाने पर मीडिया के स्तर पर संशय बरक़रार रहा.
सीमा विवाद के निपटारे के लिए जून, 2003 में विशेष प्रतिनिधियों की नियुक्ति और एक नई कार्यप्रणाली विकसित करने के बावजूद विवाद जारी है. अब तक इन विशेष प्रतिनिधियों के बीच बैठकों के 13 दौर हो चुके हैं लेकिन दोनों देश अभी किसी समझौते पर पहुँचने से कोसों दूर हैं.
हालाँकि जो बदला है वह है दोनों देशों के विकास की तेज़ गति. चीन के लिए जबकि यह कोई नई या अनहोनी बात नहीं है, भारत की अर्थव्यवस्था में प्रगति ने एशिया और बाक़ी दुनिया को उसकी ओर ध्यान देने के लिए विवश ज़रूर किया है.
इसके अलावा, द्विपक्षीय व्यापार का दायरा भी बदला है. चीन के वाणिज्य मंत्री चेन देमिंग ने हाल ही में कहा कि दोनों देशों के बीच व्यापार मात्र 2.9 अरब डॉलर से बढ़ कर 2008 में 51.8 अरब डॉलर हो गया है. 43 प्रतिशत की वार्षिक विकास दर की बदौलत यह 18 गुणा बढ़ौतरी है.
चेन ने यह भी कहा कि चीनी कंपनियों ने भारत में 11.1 अरब डॉलर की लागत वाली इंजीनियरिंग परियोजनाओं पर काम पूरा किया है.
इस बात में कम ही संदेह है कि दोनों देश 2009 में जिस तनाव का सामना कर रहे थे उसके बजाय अब व्यापार में बढ़ौतरी की वजह से संबंधों में कुछ स्थिरता ज़रूर आई है.
हालाँकि, दिसंबर, 2009 में कोपेनहेगन सम्मेलन में अभूतपूर्व सहयोग से वे बादल काफ़ी हद तक छंट गए हैं जो दोनों देशों के संबंधों पर मंडरा रहे थे.
हो सकता है प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और चीन के प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ ने यह अपेक्षा न की हो कि पर्यावरण मामले पर सहयोग दोनों देशों के रिश्तों के मौसम को भी बेहतर बना देगा.
अब जबकि विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और फिर बाद में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल चीन की यात्रा पर जाएँगे, दोनों देशों के राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ पर काफ़ी धूमधड़ाका होगा.
लेकिन, सच तो यह है कि दुनिया के इस संभवतः सबसे महत्वपूर्ण रिश्ते पर अगर कुछ असर डालेगा तो वह कोई ठोस आधार ही होगा, दिखावा या शोशेबाज़ी नहीं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें
आंकड़ों का बहुत अच्छा संग्रह है. मैं अमित बरुआ जी से इस विषय पर और प्रखर विश्लेषण की उम्मीद कर रहा था.
भारत और चीन के बीच संबंधों में उतार-चढ़ाव अक्सर देखे जाते हैं. अमित जी बहुत अच्छा लिखा है आपने भारत-चीन संबंधों की 60वीं वर्षगांठ पर.
मगर चीन हमसे हर क्षेत्र में दो क़दम आगे हैं. यह हमारे लिए एक कड़वा सच है.
अच्छा है...इस देश में किसी को सानिया की शादी और बच्चन पर बवाल के अलावा भी कुछ लिखने को सूझा...
अमित बरुआ जी ने भारत और चीन के संबंधों का अच्छा आकलन किया है. लेकिन मुझे लगता है कि इसे और विस्तार दिया जाना चाहिए था.
अगर राजीव गाँधी अभी ज़िंदा होते तो आज तस्वीर कुछ और होती. हम इस विषय पर और लेख पढ़ना चाहते है.
अरे ये ब्लॉग है या प्रतियोगिता दर्पण की जानकारी. ये तो सामान्य ज्ञान में तेज़ दसवीं का छात्र बता सकता है. हे 'हिंदू' के विश्लेषक आप तो कूटनयिक और पड़ोसी संबंधों (विदेश नहीं) के जानकार माने जाते थे. क्या हुआ आपकी मेधा को.
चीन आज हमसे ज़्यादा ताक़तवर है. हमें और ज़्यादा शिक्षित और ताक़तवर बनने की ज़रूरत है.
दोनों देशों के रिश्तों में आज भी कोई खास बदलाव नहीं आया है. (अगर हम मीडिया के रिपोर्ट को अलग रखे तो.) जैसा आपने कहा कि 22 सालों से सिर्फ बातचीत हो रही है. पेचिदा मुद्दे कम नहीं हो रहे हैं बल्कि बढ़े हैं, जैसे अरुणाचल प्रदेश के प्रधानमंत्री की यात्रा के बारे में चीन का रुख हो या फिर चीन का बाँध बनाना या फिर कश्मीर में अलग से वीज़ा देना या फिर अलगाववादी से बातचीत करना. मतलब आपसी रिश्तों में दोनों के संबधों में कुछ नया या अच्छा नहीं हो रहा है. कोपेनहेगन वैश्विक मामला है, इससे इतनी सारी उम्मीदें सही नहीं है और व्यापार तो भारत का पाकिस्तान के साथ भी बढ़ा है, भले ही ये चीन की तुलना में कम हो पर ये कोई ठोस शुरुआत नहीं कहा जा सकता है.
यह अच्छा विश्लेषण है. इसके लिए धन्यवाद.
भारत और चीन दो सामानांतर रेखाएं हैं जो किसी भी बिंन्दु पर मिल ही नहीं सकतीं.व भारत जहाँ दुनिया को शांति का सन्देश देता आया है वहीँ चीन जंग और प्यार में सबकुछ जायज़ है की नीति में विश्वास करता है. हमारे यहाँ करेंसी नोट पर गाँधी की तस्वीर है तो वहां माओ की. गाँधी और माओ उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव हैं.
चीन से हमलोग डरते क्यों हैं? इसलिए कि वे हमारे राज्य जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश पर अपना हक़ जता रहा है. हमारी सरकार को चीन खुली चुनौती दे रहा है लेकिन डरने बात नहीं है क्योंकि भारत वर्ष 1962 का भारत नहीं है.
इतने गंभीर मुद्दे पर जानकारी और राय के लिए धन्यवाद. आपसे ऐसी जानकारी की ही उम्मीद की जाती है.
अमितजी आपके विश्लेषण में प्रवाह की कमी है. आप जैसे विशेषज्ञ से सिर्फ और सिर्फ आकड़े की उम्मीद नहीं थी.
चीन की नीतियों की चर्चा किए बैग़र ये विश्लेषण अधुरा लगता है. क्योंकि चीन एक ऐसा देश है जिसका अपना गुप्त योजना होता है, खास कर जब दूसरे मुल्कों की ज़मीन हथियाने की बात हो. जो ग़लती नेहरू ने किया था उसे फिर से नहीं दोहराना चाहिए.
बेहतरीन विश्लेषण....इस मुद्दे पर और लेख भी आने चाहिए. आंकड़ो और तथ्यों के साथ साथ कुछ तार्किक सुझाओं का समावेश हो तो और अच्छा लगेगा.. इस लेख के लिए बधाई..
बहुत ख़ूब!
इन सब का ही नतीजा है कि गल- बाहें डाल कर पीठ पीछे एक -एक इंच ज़मीन हथयाई जा रही है? इस बात का लिहाज़ नहीं दिखाया कि यह उन्हीं बौद्ध की भूमि है जिन्होंने पूरे विश्व को शान्ति की राह पर चलाया. अफ़सोस कि उन्हें मानने वाले ही पथभ्रष्ट हो गए? इसलिए इतिहास गवाह है जब पड़ोसी की नीयत खोटी हो तो दोस्ती किस काम की ? कहने लिखने को तो बहुत कुछ है ?
महात्मा बुद्ध, गांधी जी और शांति का भारत-चीन संबंधों में ज़िक्र न हो सका. चीन ने पिछले 30 वर्षों में काफ़ी कुछ हासिल किया है और इसी कारण वह अपनी श्रेष्ठता की मांसिकता से ग्रसित है. भारत को अपनी दूरदर्शिता, सावधानी और संकल्प के साथ उसके बराबर आना है. चीन व्यापार को लेकर काफ़ी गंभीर है और वह अमरीका से उसका बाज़ार छीन कर दुनिया में पहला स्थान हासिल करना चाहता है. जो भी चीन को उसके लक्ष्य के हासिल करने में सहायता दे सकता है चीन उसे अपना मित्र समझता है, फ़िलहाल पाकिस्तान को मित्र मानता है. भारत अपने आपको संत महात्मा समझता है चाटुकार नहीं. भारत की यह छवि पसंद नहीं की जाती है और समस्याओं के सामाधान में काफ़ी समय लग जाता है. जय हिंद.
हिंदुस्तानी लोग अब चीनी कम खाते हैं. चीन... ये चीन क्या है.
चीन-भारत में अच्छे संबंध होने चाहिए लेकिन इसके लिए सिर्फ़ भारत की ही पहल मायने नहीं रखती.
आज ही हमारे यहाँ के अख़बारों में एक खबर छपी है. उसका लब्बोलुवाब यह है कि चीन की प्लास्टिक की थैलियाँ हिंदुस्तानी कारोबारियों को चूना लगा रही हैं. इस देश में किस जगह चीन नहीं है यह तो बताएँ? द्विपक्षीय संबंध क्या इसी तरह मजबूत होते हैं?
भारत-चीन संबंधों का सुधरना फिलहाल दूर है. हां, एक बात तय है कि संबंधों को अगर सुधारना है तो कम्युनिस्ट चीन की तरफ से ईमानदार प्रयास किए जाने होंगे. मीडिया के पेज भरने से इन संबंधों में आई खटास दूर नहीं की जा सकती है. संबंधों को सामान्य समझने की ग़लती भारत को भी नहीं करनी चाहिए. इन प्रयासों का यथार्थ यह है कि एक पुरानी दीवार पर रंग-रोगन कर चिकना बनाया जा रहा है, दीवार को मज़बूत बनाने का प्रयास इसे कतई समझने की भूल नहीं की जानी चाहिए. खासतौर पर तब जबकि बीच-बीच में प्रकाशित चीनी मानचित्रों में भारत के प्रांत या हिस्से चीनी या पाकिस्तानी क्षेत्र के रूप में दिखाए जाते हों. कुछ महीनों पहले अरुणाचल विधानसभा चुनावों के अवसर पर भारतीय प्रधानमंत्री के प्रदेश दौरे पर चीन ने बड़ा हो हल्ला मचाया. पाकिस्तान को चीन से मिल रही शह और भारतीय माओवादियों को नरसंहार के लिए हथियार मुहैया करना आदि ऐसे मसले हैं जो भारत के कलेजे में खंज़र की तरह चुभे हुए हैं. ऐसे में भारत एक बार फिर भरोसा करने का जोखिम मोल नहीं ले सकता. विश्व के दो सबसे अधिक आबादी वाले और पड़ोसी देशों की नियति में साथ चलना या आपसी सहयोग नहीं लिखा है. इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं चीनी साम्यवाद है जिसने वहां के लोगों को भी मौलिक अधिकारों से वंचित कर रखा है.