बाघों के मामले में ऐसे मिसाल बन सकता है भारत

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    • Author, रीचल न्यूवी
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

कर्नाटक की रहने वाली गोपम्मा नायका को लग रहा था कि कुछ तो गड़बड़ ज़रूर है क्योंकि रात के 11 बज रहे थे और उनके पति हनुमंता अब तक घर नहीं आए थे. वो जंगल में लकड़ियां तोड़ने गए थे. उन्हें एक घंटे पहले ही आ जाना चाहिए था.

परेशान गोपम्मा ने अपने बेटे को भेजा पति को तलाशने के लिए. वो कुछ लोगों को लेकर बांदीपुर टाइगर रिज़र्व के अंदर गए. वो जंगल में कुछ मीटर ही अंदर घुसे थे कि उन लोगों को हनुमंता का आधा खाया हुआ शव दिखा. जिस बाघ ने हनुमंता को मारा था, वो पास में ही बैठा हुआ था.

हनुमंता की मौत की वजह से गोपम्मा पर दोहरी मार पड़ी थी. पति तो चला ही गया था. अब हनुमंता के न रहने पर रोज़ी का सवाल भी खड़ा हो गया था. बेटे को यूनिवर्सिटी की पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी ताकि घर चलाने में मां की मदद कर सके.

गोपम्मा कहती हैं, "जब मेरे पति ज़िंदा थे तब मेरी ज़िंदगी बहुत अच्छी थी. तब मेरा बड़ा बेटा पढ़ाई कर सकता था लेकिन अब मेरे दोनों बेटों को काम करना पड़ रहा है. मुझे डर लगता है. अब मैं बेटों के भरोसे हूं."

तमाम मुश्किलों के बावजूद गोपम्मा को उस बाघ से बिल्कुल शिकायत नहीं है, जिस ने उनके पति को मारा. भारत के तमाम हिंदू परिवारों की तरह ही गोपम्मा का भी ये यक़ीन है कि धरती पर रहने वाला हर जीव इंसान की तरह ही बराबर का हक़दार है.

गोपम्मा को इस बात से भी फ़िक्र नहीं है कि भारत में बाघों की तादाद बढ़ रही है. वो कहती हैं कि उनकी किस्मत में यही लिखा है. उन्हें इस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता कि भारत सरकार बाघों को बचाने का अभियान चला रही है.

अपने पति की तस्वीर लिए गोपम्मा

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इमेज कैप्शन, अपने पति की तस्वीर लिए गोपम्मा.

भारतीय संस्कृति की वजह से आबाद हैं बाघ

ग्रामीण भारत में वन्य जीवों के साथ सह-अस्तित्व का भाव लोगों के दिल में गहराई से बैठा हुआ है. ख़तरनाक जंगली जीवों के साथ रहने की सहिष्णुता भारत की संस्कृति का हिस्सा है.

उल्लास कारंत वाइल्डलाइफ़ कंज़रवेशन सोसाइटी से रिटायर जीव वैज्ञानिक हैं. उल्लास कहते हैं, "आप इस तरह की सहिष्णुता दूसरी संस्कृतियों में नहीं पाते हैं. अगर मोंटाना या ब्राज़ील में बाघ ने किसी इंसान को मार दिया होता तो वो अगले ही दिन पूरे जंगल के जानवरों का सफ़ाया कर देते."

'जियो और जीने दो' की इसी भावना का नतीजा है कि भारत में आज दुनिया भर में सब से ज़्यादा बाघ पाए जाते हैं. दुनिया भर में पाए जाने वाले कुल बाघों में से 70 प्रतिशत जंगली बाघ हिंदुस्तान में ही आबाद है जबकि, पूरी दुनिया के बाघों के इलाक़े का केवल 25 फ़ीसद ही भारत में है.

लेकिन कामयाबी की भी एक क़ीमत चुकानी पड़ती है. जिस तादाद में बाघों की आबादी बढ़ी है, उस अनुपात में बाघों के लिए संरक्षित इलाक़ा नहीं फैला. इसका नतीजा ये हुआ है कि कई बाघ अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए इंसानी बस्तियों में घुस आते हैं. बाघ कई बार पालतू जानवरों को मार डालते हैं. कई बार इंसान भी उनका निशाना बन जाते हैं.

हालांकि इंसानों पर बाघ कम ही हमला करते हैं. हर साल 40 से 50 लोग बाघों के शिकार बनते हैं. इनके मुक़ाबले हर साल भारत में 350 से ज़्यादा लोग हाथियों के शिकार होते हैं. लेकिन हाथियों की वजह से मरने को लोग कार हादसे जैसा ही मानते हैं. लेकिन अगर बाघ इंसानों को मारते हैं तो इंसान अलग तरह के ख़ौफ़ के शिकार हो जाते हैं.

उन्हें लगता है कि आदमख़ोर बाघों को न मारा गया तो वो इंसान के अस्तित्व के लिए ही ख़तरा बन जाएंगे. बहुत सी जगहों पर बाघों के प्रति सहिष्णुता का भाव ख़त्म हो रहा है और बाघों को चुन-चुन कर मारा जा रहा है.

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'हर बाघ आदमख़ोर नहीं होता'

हर बाघ आदमख़ोर नहीं होता. उल्लास कारंत का मानना है कि हर साल केवल 10 से 15 बाघों में ही आदमख़ोर होने की प्रवृत्ति देखी जाती है और जब भी किसी बाघ के आदमख़ोर होने का पता चलता है, तो उसे पहले शिकार के बाद से ही मारने की मुहिम शुरू हो जाती है. ताकि उसे अगले इंसान का शिकार करने से पहले ही मार दिया जाए. जानकार आदमख़ोर बाघों से निपटने के इसी तरीक़े को तरज़ीह देते हैं.

उल्लास कहते हैं कि अगर आप बाघों की आबादी बढ़ते देखना चाहते हैं तो ऐसा करना ज़रूरी है. वरना हर इंसान बाघ का दुश्मन बन जाएगा. यही सोच भारत के वन्यजीव क़ानून में भी झलकती है. इसके मुताबिक़, किसी जंगली जानवर के आदमख़ोर होने की सूरत में अधिकारी उसे मारने का आदेश जारी कर सकते हैं.

भारत के नेशनल टाइगर कंज़रवेशन अथॉरिटी के अतिरिक्त निदेशक अनूप कुमार कहते हैं कि अगर कोई बाघ वाक़ई आदमख़ोर बन गया है तो उससे निपटने के लिए पहले से तय नियम हैं, जिसके तहत उसका ख़ात्मा किया जाता है. लेकिन भारत के शहरी इलाक़ों में सक्रिय जीवों के अधिकार के लिए काम करने वाले लोग इस तरीक़े से सहमत नहीं हैं और उनकी लॉबी बहुत ताक़तवर है. इनका कहना है कि भले ही किसी बाघ ने कितने भी इंसानों का शिकार कर लिया हो, उसे पकड़ कर क़ैद में रखने की कोशिश करनी चाहिए. या फिर उन्हें कहीं और ले जाकर छोड़ देना चाहिए.

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बाघों और इंसानों का संघर्ष यानी सियासी फ़ुटबॉल

हालांकि उल्लास कारंत जैसे वन्यजीव संरक्षण से जुड़े रहे लोग कहते हैं कि ऐसे तरीक़े कारगर नहीं हैं. वो कहते हैं कि बाघों और इंसानों का संघर्ष बहुत जल्द सियासी फ़ुटबॉल बन जाता है. सरकार विरोधाभासी दबावों से जूझती है और आदमख़ोर जानवर इंसानों का शिकार करते रहते हैं.

ऐसी सूरत में अक्सर स्थानीय लोग आदमख़ोर बाघों से अपने तरीक़े से निपटते हैं. फिर उनके निशाने पर न केवल आदमख़ोर बाघ होता है बल्कि सारे ही बाघ उनके ग़ुस्से के शिकार बन जाते हैं. फिर वो वन विभाग को भी अपना दुश्मन मानने लगते हैं और वन्य जीवों के संरक्षण का मामला भी उनके ग़ुस्से का शिकार होता है.

ऐसे संघर्ष की स्थिति में अगर बाघों की तादाद कम नहीं भी होती है तो वो जस की तस बनी रहेगी. हालात ज़्यादा बिगड़े तो इंसान की बदले की भावना की वजह से सारे बाघ मारे जाएंगे.

उल्लास कहते हैं कि बाघों की आबादी बढ़ाने के लिए हमें ये समझना होगा कि हर बात जो बाघों के हित में हो ज़रूरी नहीं कि वो किसी आदमख़ोर बाघ के लिए भी मुफ़ीद हो. वो कहते हैं कि आदमख़ोर बाघों को मारने के सिवा कोई और विकल्प नहीं है.

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कामयाबी की क़ीमत

किसी को नहीं पता है कि एक ज़माने में भारत के जंगलों में कितने बाघ घूमते थे लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इनकी संख्या अगर लाखों में नहीं तो हज़ारों में तो यक़ीनन थी. उनकी आबादी घटने का सिलसिला सदियों पहले शुरू हुआ था. अमीर लोग उनका शिकार करते और ग़रीबों के लिए वो फ़ायदे का सौदा थे.

एक इतिहासकार का आकलन है कि 1875 से 1925 के बीच भारत में 80 हज़ार से ज़्यादा बाघों का शिकार किया गया था. बाघ जिन जानवरों को मारकर अपना पेट भरते थे, उनके भी शिकार की वजह से बाघों पर दोहरी मार पड़ी.

20वीं सदी के मध्य तक भारत से एशियाई नस्ल वाले चीते विलुप्त हो चुके थे और एशियाई शेरों की आबादी भी कमोबेश ख़त्म हो गई थी. बाघ भी ख़त्म ही हो जाते, अगर 1971 उस वक़्त की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने शिकार पर पाबंदी न लगाई होती. इसीलिए इंदिरा गांधी को अक्सर वन्यजीवों का सबसे बड़ा मसीहा कहा जाता है. उन्होंने वन्यजीव संरक्षण से जुड़े क़ानूनों को सख़्त बनाया. और देश में कई टाइगर रिज़र्व और टाइगर टास्क फ़ोर्स का भी गठन किया.

बैंगलोर के सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ़ स्टडीज़ की मुख्य संरक्षक कीर्ति कारंत कहती हैं कि इंदिरा गांधी ने उसी दौर में ये क़दम उठाए, जब रैशेल कार्सन यूरोप में वन्य जीवों के संरक्षण के लिए मुहिम चला रही थीं. लोगों को इसका एहसास होना शुरू हुआ था कि क़ुदरत ख़तरे में है और हम शिकार का ये सिलसिला अब जारी नहीं रख सकते हैं लेकिन इन क़दमों का फ़ौरी असर नहीं हुआ.

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जब शुरू हुई बाघों की गिनती

1980 के दशक में उल्लास कारंथ ने जब इंजीनियरिंग को छोड़ कर वन्यजीव संरक्षण का काम शुरू किया तो भारत में केवल 2500 बाघ बचे थे. उल्लास को शुरू से ही बाघों से लगाव था. उन्होंने ही बाघों के संरक्षण की देशव्यापी मुहिम शुरू की.

सबसे पहले भारत के बचे हुए बाघों की गिनती की गई. 1991 में उल्लास ने बाघों की गिनती का एकदम नया तरीक़ा ईजाद किया. कैमरे से बाघों के पैरों के निशान पकड़े जाते थे. हर बाघ के पैरों के निशान अलग होते हैं. उन्हें पता चला कि एक वक़्त में पूरे भारत में पाए जाने वाले बाघ अब इस के 67 प्रतिशत इलाक़े से ख़त्म हो गए थे.

पता ये चला कि चूंकि वो जानवर जैसे हिरन और गौर भी ग़ायब हो गए थे. इनका शिकार बाघ करते थे और इनकी आबादी कम होने की वजह से बाघों की आबादी भी बढ़ नहीं पा रही थी.

1990 के दशक से उल्लास ने बाघों के संरक्षण का वैज्ञानिक तरीक़ा अपनाया. उन जीवों के संरक्षण पर भी ज़ोर दिया जाने लगा, जिन का शिकार कर के बाघ अपना पेट भरते थे.

बाघों की आबादी वाले गांवों के लोगों को दूसरी जगह ले जाकर बसाया गया. जब चीन में बाघों के अंगों की मांग बढ़ी तो बाघ के शिकार में फिर तेज़ी आई. इस अवैध शिकार का मुक़ाबला करने के लिए, उल्लास ने शिकारियों के ख़िलाफ़ कार्यक्रम चलाने शुरू किए.

स्कूली बच्चे

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रंग लाईं कोशिशों

इन तमाम कोशिशों का नतीजा ये हुआ कि बाघों की आबादी बढ़ने लगी. दक्षिणी पश्चिमी भारत का मालेनाद इलाक़ा बांदीपुर टाइगर रिज़र्व इलाक़े में ही आता है. यहीं पर गोपम्मा के पति को बाघ ने मारा था. आज इस इलाक़े में 400 बाघ रहते हैं. आज से 25 साल पहले यहां केवल 100 बाघ बचे थे.

जैसे ही शिकारी जानवरों की संख्या बढ़ती है, उनका इंसानों से संघर्ष होना तय होता है. ख़ास तौर से युवा जानवर जब अपना अलग इलाक़ा बनाने लगते हैं, वो पालतू जानवरों का शिकार करते हैं. कई बाघ इंसानों पर भी हमले करने लगते हैं.

उल्लास कहते हैं, "आम तौर पर बाघ इंसानों से डरते हैं लेकिन जब उन्हें लगता है कि कोई इंसान कमज़ोर स्थिति में है तो उनका डर ख़त्म हो जाता है. फिर उन्हें लगता है कि 'बिना पूंछ वाले इन बंदरों' को पकड़ना तो बहुत आसान है."

स्वस्थ बाघों की आबादी में भी हर साल 15-20 प्रतिशत बाघ मर ही जाते हैं. उनकी जगह नए बच्चे जन्म लेते हैं. इन बाघों में से बहुत कम ही आदमख़ोर होते हैं. ऐसे में उनका ख़ात्मा कर के बाक़ी बाघों को इंसान का दुश्मन बनने से बचाया जा सकता है.

सांकेतिक तस्वीर

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आदमख़ोर बाघों की समस्या से कैसे निबटें?

उल्लास कहते हैं कि एक भी बाघ को मारने का विरोध करने वाले लोगों को समझना चाहिए कि अगर सरकार आदमख़ोर बाघों से बचने का तरीक़ा नहीं निकालेगी तो आम लोग फिर ख़ुद ही उससे निपटेंगे और ये तरीक़ा बाघों के लिए ज़्यादा नुक़सानदेह साबित होगा. फिर लोग शिकारियों की मदद ले कर इन बाघों को मरवाएंगे. शिकारी फिर आदमख़ोर को मारने के नाम पर दूसरे बाघों का शिकार करेंगे और वो पैसे देकर स्थानीय लोगों का मुंह बंद रखेंगे.

2013 में बांदीपुर टाइगर रिज़र्व के पास दो हफ़्ते में बाघ ने तीन लोगों को मार डाला था. इससे नाराज़ स्थानीय लोगों ने वन विभाग के एक दफ़्तर को आग लगा दी थी और उनकी एक गाड़ी भी जला दी थी.

आदमख़ोर बाघों की समस्या का सबसे अच्छा उदाहरण टी-1 (अवनि) नाम की बाघिन थी, जिसे नवंबर 2018 में गोली मार दी गई थी. इससे पहले क़रीब दो साल तक उसका आतंक एक बड़े इलाक़े में फैला रहा था. इस बाघिन ने कम से कम 13 लोगों को मार डाला था.

2015 की शुरुआत में इस बाघिन ने रिहाइशी इलाक़ों का रुख़ करना शुरू किया था. पहले इस ने पालतू जानवरों को मारा. फिर ये आदमख़ोर हो गई. इस बाघिन की पहली शिकार 60 बरस की एक महिला थी. तीन महीने बाद इसने एक आदमी को मार डाला और अगले ही दिन उस ने एक और इंसान का शिकार किया.

जल्द ही चीफ़ वाइल्डलाइफ़ वार्डेन ने इस बाघिन को पकड़ने का आदेश जारी कर दिया.

अवनि की तस्वीर लिए प्रदर्शन करते लोग

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बाघिन अवनी के ख़ात्मे की कहानी

भारत में वन्यजीव संरक्षण के बहुत से कार्यकर्ता शहरी इलाक़ों में सक्रिय हैं. इनके पास बहुत ताक़त भी है. असल में समस्या ये भी है कि बाघों को पकड़ कर रखा भी कहां जाए. भारत के चिड़ियाघरों की हालत बहुत ख़राब है. वहां किसी जानवर को रखना उसे उम्र क़ैद की सज़ा देने जैसा है.

टी-1 बाघिन को पकड़ने की हर मुहिम नाकाम रही. वो अक्सर जाल को चकमा दे जाती थी. गश्ती दलों को गच्चा दे जाती थी. जब उसने अपना सातवां शिकार बनाया तो लोगों का धैर्य जवाब दे गया. स्थानीय लोगों ने उस बाघिन को अपने-अपने गांवों में घुसने तक पर रोक लगा दी. स्थानीय लोगों ने वन विभाग के कई गार्डों को पीट भी दिया.

इन हालात से निपटने के लिए महाराष्ट्र के वन विभाग की उप संरक्षक अभार्णा महेश्वरम ने महिलाओं की एक टीम बनाकर भेजना शुरू किया. उन्हें लगा कि महिला गार्डों से स्थानीय लोग भी कम उलझेंगे और नाराज़ लोगों से ये महिला गार्ड भी अच्छे से निपट सकेंगी.

अभार्णा कहती हैं कि जब भी जंगली जानवरों का इंसानों से संघर्ष होता है तो ये समुदायों का भी संघर्ष होता है और वन्यजीव संरक्षण में स्थानीय लोगों की भागीदारी बहुत ज़रूरी है.

फरवरी 2018 तक टी-1 बाघिन नौ लोगों का शिकार कर चुकी थी. फिर भी बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे गोली मारने पर रोक लगा दी. इस दौरान बाघिन के दो बच्चे भी हो गए थे और वो भी इंसानों के शिकार में मां की मदद करने लगे थे.

2018 के अगस्त महीने में 24 दिनों के अंदर टी-1 ने तीन इंसानों को मार डाला था. जब सरकार ने बाघिन और उसके बच्चों को पकड़ने या गोली मार देने का आदेश जारी किया तो कई लोग इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए.

इस हंगामे के बीच सरकार ने शफ़ात अली ख़ान नाम के शिकारी को भी टी-1 को पकड़ने या मारने के अभियान का हिस्सा बना लिया. शफ़ात के बेटे असगर अली ख़ान को इस मुहिम में शामिल होने की इजाज़त नहीं मिली. फिर भी वो इस में जुड़ गए.

उल्लास कहते हैं कि शफ़ात जैसे शिकारियों की शोहरत ऐसे ख़तरनाक जानवरों के शिकार के अभियान से जुड़ने की वजह से होती है. लेकिन वन्यजीवों के संरक्षण के लिए काम करने वाले लोग ऐसे शिकारियों के सरकारी अभियान का हिस्सा बनने से नाराज़ होते हैं. वन विभाग के पास अपने ही 80, हज़ार वन सुरक्षाकर्मी हैं, जिनमें से कई शानदार शिकारी हैं.

एक रात असगर को फ़ोन आया कि टी-1 को देखा गया है. वो अपने पिता को बताए बग़ैर ही उसके शिकार के लिए निकल पड़े. उन्होंने बाघिन को देखा तो बेहोशी के इंजेक्शन से निशाना लगाया. असगर ने बाद में बताया कि इससे नाराज़ बाघिन जब उनकी तरफ़ झपटी, तो उन्होंने उसे अपनी राइफ़ल से गोली मार दी.

इस पर महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश में काफ़ी हंगामा हुआ. ग्रामीणों ने तो अवनि नाम की इस बाघिन के मारे जाने पर पटाखे छोड़ कर जश्न मनाया लेकिन मेनका गांधी जैसी जीव संरक्षण के लिए काम करने वाले लोगों ने कहा कि ये अवनि का क़त्ल है. काफ़ी दिनों तक #JusticeForAvni ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा.

पोस्टमॉर्टम से पता चला कि अवनि को बगल से गोली मारी गई थी. यानी उस समय नहीं, जब असगर के मुताबिक़ वो हमला कर रही थी. बेहोशी का इंजेक्शन भी उसके मरने के बाद ही उसकी टांग में चिपकाया गया मालूम हुआ. हालांकि इस अपराध के लिए किसी को सज़ा नहीं मिली.

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आदमख़ोर बाघ पीड़ितों को नहीं मिल पाता मुआवज़ा

वन्यजीव संरक्षण के लिए ज़रूरी है कि किसी आदमख़ोर के शिकार परिवार को पूरा हर्ज़ाना मिले. सरकारी नियम ये है कि हर इंसान के बाघ या ऐसे ही जानवर के शिकार होने पर, उसके परिजनों को पांच लाख रुपए दिए जाने चाहिए. इसी तरह पालतू जानवरों के भी मारे जाने पर मुआवज़ा मिलना चाहिए. लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता.

गोपम्मा ने भी एक जूनियर अधिकारी से मुआवज़े की बात की थी. उसने भरोसा भी दिया कि गोपम्मा को मुआवज़ा मिलेगा. लेकिन, एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि उसका पति तो जंगल में अवैध रूप से घुसा था. इसलिए गोपम्मा मुआवज़े की हक़दार नहीं है. आख़िर मे गोपम्मा ने इसे भी अपनी क़िस्मत मान कर संतोष कर लिया.

ग़रीब परिवारों के पालतू जानवरों का मारा जाना भी आर्थिक रूप से बहुत नुक़सानदेह होता है. कई बार तो ये किसी इंसान की मौत से भी ज़्यादा झटका देने वाला होता है. एक सर्वे से पता चला है कि पालतू जानवरों के शिकार के पीड़ितों में से केवल 31 फ़ीसद को ही सरकारी मुआवज़ा मिल पाता है. इस में लंबी काग़ज़ी प्रक्रिया के साथ-साथ भ्रष्टाचार का भी बड़ा हाथ होता है.

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'वाइल्डसेवा' कर रही है मदद

इसीलिए 2015 में कीर्ति और उनके साथियों ने मिल कर 'वाइल्डसेवा' नाम से एक कल्याणकारी संस्था शुरू की है. जो ऐसे लोगों की मदद करती है, जिनके जानवरों को जंगली जीव मारकर खा जाते हैं. आज ये संस्थान 600 गांवों के क़रीब पांच लाख लोगों की मदद कर रही है. पहले जहां लोगों को मुआवज़ा पाने में 277 दिन लग जाते थे. वहीं, अब वाइल्डसेवा की मदद से ये काम 60 दिनों में ही हो जाता है.

ये पालतू जानवरों के लिए शेड बनाने में भी लोगों की मदद करती है ताकि बाघ उनका शिकार न कर सकें. हालांकि अभी भी ये अभियान कर्नाटक के एक छोटे से हिस्से तक ही सीमित है.

तमाम प्रयासों के बावजूद आज भी भारत में बाघ अपने लिए रहने लायक़ जगह में से 10-15 फ़ीसद इलाक़े में ही पाए जाते हैं. पिछले 20 वर्षों से इनकी संख्या 3,000 के आस-पास रुकी हुई है.

हालांकि सरकार ने हाल ही में एक बयान जारी कर के दावा किया था कि 2006 से अब तक हर साल बाघों की संख्या छह प्रतिशत की दर से बढ़ रही है.

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मिसाल बन सकता है भारत

हालांकि इन आंकड़ों पर उल्लास जैसे जानकारों को ही भरोसा नहीं है. वन्यजीव संरक्षण के अमरीकी विशेषज्ञ जेम्स निकोल्स कहते हैं कि भारत के पास पैसा भी है और उसके संरक्षकों को बाघों की आबादी बढ़ावे का तरीक़ा भी पता है. ऐसे में भारत या तो बाघों के संरक्षण की इस मामूली उपलब्धि पर ख़ुश हो ले. या फिर वो दुनिया में सरंक्षण के सभी अभियानों के लिए मिसाल बन जाए और बाघों की संख्या बढ़ाकर 10 या 15 हज़ार तक भी बढ़ा सकता है.

भारत में जानवरों की विविधता के लिए काफ़ी अवसर हैं लेकिन यहां केवल पांच प्रतिशत ज़मीन ही जैव विविधता के लिए आरक्षित है, जबकि अमरीका और चीन में ये तादाद 15 प्रतिशत है.

उल्लास सवाल उठाते हैं कि क्या सरकार के पास ये इच्छाशक्ति है कि वो वन्यजीवों की तादाद बढ़ाने के लिए मुहिम छेड़े? हालांकि वो ये भी कहते हैं कि 1970 के निराशाजनक दौर से आज की स्थिति बेहतर है और ये इस बात की मिसाल भी है कि सरकार अगर चाहे तो बाघों की संख्या में काफ़ी इज़ाफ़ा संभव है.

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