45 दिन लंबी तलाश और 8 मीटर की दूरी से आदमख़ोर बाघिन का शिकार

इमेज स्रोत, AFP
- Author, पद्मा मीनाक्षी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले दो साल से अवनि की तलाश जारी थी.
छह साल की अवनि, एक आदमख़ोर बाघिन थी. कथित तौर पर 13 लोगों की जान लेने वाली बाघिन को दो नवंबर यानी शुक्रवार को मार दिया गया.
लेकिन इस आदमख़ोर बाघिन का शिकार किया किसने?

इमेज स्रोत, INDIAN FORESTRY DEPT
देश के इकलौते मान्यता प्राप्त शिकारी
आदमख़ोर का शिकार किया, असग़र अली ने. कौन हैं ये असग़र अली?
असग़र अली हैदराबादी नवाबों के शाही परिवार की चौथी पीढ़ी के वंशज हैं. वो हैदराबाद के मान्यता प्राप्त शिकारी शफ़त अली ख़ान के बेटे हैं. शफ़त अली ख़ान का ये दावा है कि वो पूरे देश में इकलौते मान्यता प्राप्त शिकारी हैं.
महाराष्ट्र वन्य विभाग ने अवनि को मारने के लिए एक ऑपरेशन चला रखा था. आंकड़ों के मुताबिक़, जून 2016 के बाद से अवनि ने रालेगांव जंगल में 13 लोगों का शिकार किया था.
इस आदमख़ोर बाघिन का शिकार करने का ज़िम्मा वन्य विभाग ने शफ़थ अली को ही सौंपा था, ये कारनामा उन्होंने नहीं किया लेकिन उनके साथ उनकी टीम में शामिल बेटे ने ये कारनामा कर दिखाया.
अब इस मामले का दिलचस्प पहलू यही है कि बेटा असगर मान्यता प्राप्त शिकारी नहीं है लिहाजा उसकी मौजूदगी पर सवाल भी उठ रहे हैं, यही वजह है कि आधिकारिक तौर पर असगर अपनी कामयाबी पर बात करने के लिए उपलब्ध भी नहीं हैं.

इमेज स्रोत, shAfat khan
अवनि को मारे जाने के बाद जहां यवतमाल गांव के लोगों ने पटाखे फोड़कर खुशियां मनाईं, वहीं इसकी काफी आलोचना भी हो रही है. केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी और वन्यजीव अधिकारों के लिए काम करने वाले बहुत से कार्यकर्ताओं ने इस पूरे ऑपरेशन पर सवाल उठाए हैं.
बहुत सी कोशिशें हो गई थीं बेकार
ऐसे में बीबीसी ने असगर के पिता शफ़थ से बात की. उन्होंने शिकार के प्रति अपने जुनून, आदमख़ोर बाघिन अवनि को मारने के लिए चलाए गए ऑपरेशन और अपने करियर की उपलब्धियों के बारे में विस्तार से बताया.
वे बाघिन का मारे जाने के तर्कों को न्यायसंगत बताते हैं. उन्होंने बताया कि पिछले डेढ़ महीने से पशु चिकित्सकों की टीम के साथ बाघिन को पकड़ने की कोशिश की जा रही थी लेकिन सारी कोशिशें बेकार गईं. उन्हें बाघिन को मारना पड़ा क्योंकि बाघिन उसी जगह पहुंच गई थी, जहां उसने सितंबर में दो लोगों को मारा था.
उन्होंने बताया, "वो वन्य विभाग अधिकारी के बिल्कुल क़रीब, सिर्फ़ 8 मीटर की दूरी पर थी, इंसानी ज़िंदगी को बचाने के लिए उन्हें उसे मारना ही पड़ा. विशेषज्ञों की टीम पिछले दो सालों से इस बाघिन की तलाश कर रही थी, लेकिन सारी कोशिशें बेकार जा रही थीं."
शफ़त अली ख़ान हैदराबाद के नवाबों के ख़ानदान से आते हैं, जिन्हें शिकार करने का गुण और योग्यता अपने पुरखों से विरासत में मिली है.

इमेज स्रोत, shafat khan
बीबीसी को उन्होंने बताया कि अपने पिता और दादा के साथ मिलकर जंगली जानवरों को मारना सीखा है और देशभर में बहुत से ऐसे ऑपरेशन को भी अंजाम दिया है जिसमें इंसानी ज़िंदगी को बचाने के लिए जंगली जानवर का शिकार करना पड़ा.
शिकार सिर्फ़ शौक के लिए नहीं...
ख़ानदानी शिकारी होने के बारे में वो बताते हैं, "पुराने दौर में शाही परिवारों में शिकार सिर्फ़ वक़्त बिताने के लिए नहीं किया जाता था. शिकार करने का एक मक़सद संरक्षण करना भी होता था. ये जंगलों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ था क्योंकि आज़ादी से पहले वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम जैसा कोई क़ानून नहीं था."
स्वतंत्रता से पहले की अथाह वन्य संपदा का ज़िक्र करते हुए वो कहते हैं, "पुराने समय में जंगल की संपत्ति का दोहन करने के लिए राजनेताओं और तस्करों के बीच कोई साठ-गांठ नहीं थी."
शफ़त कहते हैं कि जो जगहें आज के समय में राष्ट्रीय पार्क हैं, वो गुज़रे सालों में शाही परिवारों के लिए शिकार की जगहें हुआ करती थीं. वो बांदीपोर राष्ट्रीय अभ्यारण्य का ज़िक्र करते हुए ये दलील देते हैं.

इमेज स्रोत, shafat khan
आंकड़ों का हवाला देते हुए वो कहते हैं कि आज़ादी के पहले भारत में क़रीब 20 हज़ार बाघ थे लेकिन 1972 मे इनकी संख्या घटकर 1800 रह गई.
वो कहते हैं कि साल 1972 में जब तक वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम आया तब तक इंसान और जानवरों की आबादी का अनुपात काफी हद तक बढ़ चुका था और मौजूदा समय में इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष का मूल कारण यही है.
ट्रैक्टर से बाघ कुचल दिया पर सब चुप हैं

इमेज स्रोत, shAfat khan
अवनि के मारे जाने पर पर्यावरणविद और जानवरों के अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने नाराज़गी जताई है, लेकिन शफ़त थोड़ा अलग सोचते हैं.
उनका कहना है कि अवनि की मौत एक गोली से हुई, वो लंबे समय तक तड़पी नहीं, लोग उसके मारे जाने पर सवाल उठा रहे हैं लेकिन बीते रविवार को जिस तरह एक बाघ को गांववालों ने ट्रैक्टर से कुचल-कुचलकर मार डाला, उस पर कोई सवाल नहीं उठा रहा. इस मसले पर हर किसी ने अपनी ज़ुबान सिल रखी है.
शफ़त ख़ान, महाराष्ट्र में साल 2017 में ज़हर की वजह से और इलेक्ट्रिक शॉक लगने की वजह से हुई 18 बाघों की मौत पर दुख जताते हुए कहते हैं कि इस पर किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया.
अवनि, शिकार और विवाद

इमेज स्रोत, Getty Images
ऑपरेशन के बारे में वो बताते हैं कि जंगल के मुख्य संरक्षक ही इस तरह के ऑपरेशन को शुरू करने के लिए उत्तरदायी होता है. अवनि को मारने के लिए उनके चयन को लेकर उठे विवाद पर वो कहते हैं कि वो देश के इकलौते आधिकारिक शूटर हैं. शफ़त को अपने बेटे असगर अली को ऑपरेशन में बतौर शार्प शूटर रखने के लिए भी विरोधों का सामना करना पड़ रहा है.
इस पर वो कहते हैं कि उनके बेटे के पास वो सारी योग्याताएं हैं जो इसके लिए ज़रूरी थीं. इसलिए वो उसे अपने साथ लेकर इस ऑपरेशन पर गए.
शफ़त मानते हैं कि भारत में वन्य जीवों के लिए मौजूद क़ानूनों और नियमों में बदलाव की बहुत ज़रूरत है ताकि वन्य जीवन बचा रहे.
वो कैबिनेट मंत्री मेनका गाधी के आरोपों को भी ग़लत बताते हैं. वो उनके ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा करने पर विचार कर रहे हैं.
वन्य जीव कार्यकर्ताओं ने बाघिन को बचाने का अभियान चलाया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि अगर फ़ॉरेस्ट रेंजर्स को गोली मारने पर मजबूर होना पड़ा तो वह इसमें कोई दख़ल नहीं देगा.
ये भी पढ़ें....
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












