कुत्तों की तरह बिल्लियों से दोस्ती करो तो सही

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- Author, स्टीफन डाउलिंग
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
कुत्तों में वो क़ुदरती हुनर ही नहीं होता कि वो अपने मूड को छुपा सकें. ख़ुश हुए तो उछल-कूद मचाएंगे. परेशान हुए तो नाक से आवाज़ें निकालेंगे और किसी परिचित को देख कर पूंछ हिलाने लगते हैं. उनके दिल में क्या चल रहा है, ये पता लगाना बहुत आसान है.
कुत्तों की ही तरह बिल्लियां भी अपनी बॉडी लैंग्वेज से संकेत देती हैं. हालांकि उनके इशारों को पकड़ना मुश्किल होता है. बिल्लियों के मूड को भी भांपा जा सकता है. कभी वो पूंछ को उलट-पुलट करती हैं, कभी कान हिलाती हैं तो कभी ग़ुर्राहट से इशारे करती हैं.
आम तौर पर बिल्लियों का म्याऊं करना उनकी तरफ़ से दोस्ताना इशारा माना जाता है. कई बार ये उनकी संतुष्टि का भी संकेत होता है. हालांकि हम हमेशा ऐसा ही मानने की ग़लती नहीं कर सकते.

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बिल्लियां कब चाहती हैं कि उनको अकेला छोड़ दिया जाए, ये बात भी वो इशारों में बता देती हैं.
एक तरफ़ हम अपने प्यारे डॉगी के साथ अपने मज़बूत ताल्लुक़ को आसानी से समझ जाते हैं. लेकिन, हज़ारों बरसों से पाली जाने के बावजूद, बिल्लियों के जज़्बात पकड़ने में आज भी इंसान वैसा ही है, जैसा सदियों पहले था.
कुछ कैट एक्सपर्ट कहते हैं कि बिल्लियां असल में ख़राब पब्लिक रिलेशंस की शिकार हैं. यानी, संकेतों से अपना मूड बताने के मामले में वो बदनाम हो गई हैं. और, उनकी बॉडी लैंग्वेज को समझने के लिए इंसान की तरफ़ से कोशिशें भी कम हुई हैं.

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बिल्लियों को ख़ुदग़र्ज़ क्यों मान लिया जाता है?
बिल्लियां आज़ाद ख़याल होती हैं. वो अक्सर अकेले रहने को तरज़ीह देती हैं. इसकी वजह से उन्हें अलगाववादी या ख़ुदग़र्ज़ मान लिया जाता है.
बिल्लियों के विरोधी उन पर इल्ज़ाम लगाते हैं कि वो तभी दुलार दिखाती हैं, जब उनके पास खाने को नहीं होता.
हालांकि बिल्लियों के मालिक इसे वाहियात कहेंगे. उनका दावा यही होता है कि उनका अपनी बिल्लियों से रिश्ता उतना ही मज़बूत है, जितना किसी कुत्ते का उसके मालिक के साथ होता है.
ऐसे में सवाल ये है कि आख़िर क्यों बिल्लियों की ऐसी छवि बन गई है कि उन्हें अलग-थलग रहने वाला और ग़ैर-दोस्ताना मिज़ाज का माना जाता है. और सवाल ये भी है कि ऐसी बातों में कितनी सच्चाई है?
पहले तो ये बता दें कि भले ही बिल्ली को आज़ाद ख़याल पालतू जानवर माना जाता है. लेकिन, इससे उनकी लोकप्रियता में कोई ख़ास कमी नहीं आई है. ऐसा माना जाता है कि अकेले ब्रिटेन में ही क़रीब एक करोड़ बिल्लियां पालतू हैं.

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हर चौथे घर में बिल्ली!
2012 में हुए सर्वे के मुताबिक़, ब्रिटेन के हर चौथे घर में बिल्ली पाली जाती है.
बिल्लियों की अलग-थलग रहने की छवि का एक संकेत तो उन्हें पालतू बनाए जाने की शुरुआती दिनों से ही मिलता है. कुत्तों के मुक़ाबले ये लंबी प्रक्रिया थी. इस मामले में पहल हमेशा बिल्लियों के ही हाथ में रही थी.
बिल्लियों के पाले जाने के सबसे पहले संकेत मध्य-पूर्व के देशों में मिलते हैं. ये संकेत आज से क़रीब दस हज़ार साल पुराने यानी नियोलिथिक युग के हैं.
उस वक़्त बिल्लियां अपने खान-पान के लिए इंसानों पर इतनी निर्भर नहीं थीं. बल्कि बिल्लियों को प्रोत्साहित किया जाता था कि अपने खाने-पीने का इंतज़ाम वो ख़ुद करें.

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अनाज की हिफ़ाज़त के लिए बिल्लियां पाली जाने लगीं
बिल्लियों की मदद से उस समय लोग अपने अनाज के भंडारों और खेतों की हिफ़ाज़त करते थे. तब बिल्लियां इसलिए पाली जाती थीं, ताकि वो चूहों और दूसरे जानवरों को अनाज से दूर रखें.
यानी जब से इंसान ने जंगली बिल्लियों से रिश्ता बनाना शुरू किया, तभी से वो थोड़ी दूरी बनाए रखने वाला था. बिल्लियों के बरक्स, कुत्तों से हमारे आदिम पूर्वजों का ताल्लुक़, नज़दीकी थी.
वो उन्हें शिकार करने में मदद करते थे और फिर उम्मीद करते थे कि शिकार का कुछ हिस्सा उन्हें भी मिले.
आज आपके सोफ़े पर बैठ कर घूरती हुई या फिर ऊंची अल्मारी से निहारती बिल्ली के बहुत से गुण उसके उन पूर्वजों से मिलते थे, जब वो इंसानों की पालतू नहीं थीं.
शिकार करने की ख़्वाहिश, अपने इलाक़े की निगरानी और दूसरी घुसपैठिया बिल्ली को अपने इलाक़े में घुसने से रोकने की आदतें बिल्ली को पालतू बनाए जाने से पहले वाले पुरखों से मिली हैं.
आज भी उन्होंने ये आदतें बरकरार रखी हैं. जबकि, कुत्ते अपने जंगली दौर के गुण भुला चुके हैं. हमने बिल्लियों को पालतू ज़रूर बना लिया है, मगर उनके जंगली दौर के कई गुण अब भी उन में पाए जाते हैं.

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कुत्तों से बिल्लियां अलग कैसे?
इंटरनेशनल कैट केयर की ट्रस्टी कैरेन हायस्टैंड कहती हैं कि, "बिल्लियों को लेकर असल में हम को ग़लतफ़हमियां हैं. कुत्ते और इंसानों के कई गुण मिलते हैं और दोनों लंबे समय से साथ रहते आए हैं. एक तरह से कहें तो इंसानों और कुत्तों का जैविक विकास साथ-साथ हुआ है. जबकि बिल्लियों से हमारा रिश्ता हालिया है. वो एक ऐसे पूर्वज की वंशज हैं, जो सामाजिक प्राणी नहीं है."
हम आज जिन बिल्लियों को पालते हैं, उसकी पूर्वज अफ़्रीका में पायी जाने वाली जंगली बिल्ली है, जो भीड़ से अलग-थलग रहती है. और दूसरी बिल्लियों के क़रीब तभी जाती है, जब उसे यौन संबंध बनाने की ज़रूरत होती है.
कैरेन कहती हैं कि, "तमाम जंगली जानवरों में केवल बिल्लियां ही हैं, जिन्हें इंसान ने पालतू बनाया है. बाक़ी दूसरे जानवर, जिन्हें हम ने पालतू बनाया है, उनका अपनी प्रजाति के दूसरे सदस्यों से कोई न कोई ताल्लुक़ बना रहता है."

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क्या बिल्लियों को समझ सका है इंसान?
तो, जब बिल्ली एकाकी जीवन जीने वाली जानवर है, तो इस बात में काफ़ी दम है कि हम उसके इशारों को ही ग़लत समझते आए हैं.
कैरेन कहती हैं कि, "चूंकि बिल्लियां आत्मनिर्भर होती हैं और अपना ख़याल रख सकती हैं. इसीलिए आज पालतू जानवरों के तौर पर उनकी लोकप्रियता बढ़ती जा रही है. लेकिन, उनका रहन-सहन हमारे मुताबिक़ है या नहीं, ये अलग सवाल है. इंसान अक्सर ये उम्मीद करते हैं कि बिल्लियों का बर्ताव कुत्तों जैसा हो, लेकिन वो वैसी नहीं हैं."
बिल्लियों के जज़्बात और उनकी सामाजिकता पर रिसर्च भी बहुत कम हुई है. हालांकि हाल के दिनों में ये रिसर्च बढ़ रही है. लेकिन, अभी ये शुरुआती दौर में ही है. इन रिसर्च से ये संकेत मिलते हैं कि बिल्लियों का इंसानों के प्रति बर्ताव पेचीदा रहा है.
कैरेन कहती हैं कि, "बिल्लियों के बर्ताव में बहुत उतार-चढ़ाव देखे जाते हैं. इनमें कुछ रोल तो उनके जीन्स का है और कुछ, इंसानों के नज़दीक जाने के शुरुआती छह से आठ हफ़्तों के उनके अनुभव पर आधारित होता है. अगर शुरुआती दौर में उन्हें ये महसूस होता है कि उनका तजुर्बा अच्छा है, तो वो इंसानों को पसंद करने लगती हैं और उनके साथ ज़्यादा वक़्त बिताना पसंद करती हैं."
इंसानों को देखकर बिल्लियां क्यों भागती हैं?
बिल्लियों को पालतू बनाने का भी अलग आयाम है. वो अक्सर इंसानों से छुप कर रहती हैं, या फिर उन्हें देखते ही दूर भागती हैं.
इस दौरान उनका बर्ताव अक्सर अपने जंगली रिश्तेदारों जैसा ही होता है. मध्य पूर्व के देशों और जापान में बिल्लियों के झुंड, मछली मारने वालों के गांव में आबाद होते देखे गए हैं.
अक्सर उनके स्थानीय लोगों से ऐसे ताल्लुक़ हो जाते हैं कि वो उनके हाथ से आराम से खाना ले लेती हैं. तुर्की के शहर इस्तांबुल में आवारा बिल्लियों को लोग खिलाते-पिलाते हैं और उनका ख़याल रखते हैं. आज ये बिल्लियां इस्तांबुल की पहचान का हिस्सा बन गई हैं. हाल ही में इस्तांबुल की बिल्लियों पर एक डॉक्यूमेंट्री भी बनी है.
फिर वो बिल्लियां हैं, जो हमारे साथ रहती हैं. लेकिन, इनके और इंसान के संबंध का अलग पहलू है. कुछ बिल्लियां दूरी बनाए रखती हैं, जबकि कुछ ऐसी भी होती हैं जो इंसानों के देख कर उनके क़रीब आती हैं.
पालतू बिल्ली से रिश्ते मज़बूत कैसे बनाए इंसान?
तो, जब हम अपनी पालतू बिल्लियों से मज़बूत रिश्ता बनाना चाहते हैं तो हमें किन बातों पर ग़ौर करना चाहिए?
कुत्तों की ही तरह, बिल्लियां भी अपने बहुत से इशारे, आवाज़ न निकाल कर अपने शरीर के माध्यम से देती हैं.
बिल्लियों के बर्ताव पर रिसर्च करने वाली क्रिस्टिन वाइटेल कहती हैं कि, "बहुत से लोगों के लिए, अपने डॉगी के मुक़ाबले, बिल्लियों की बॉडी लैंग्वेज समझना मुश्किल होता है. और इस में बिल्लियों की कोई ग़लती नहीं है."
कुत्तों-बिल्लियों में बुनियादी फ़र्क़
असल में कुत्तों और बिल्लियों के बीच एक बुनियादी गुण का फ़र्क़ है, जिसकी वजह से कुत्ते इंसानों के ज़्यादा क़रीब आ गए.
ब्रिटेन की पोर्ट्समाउथ यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में पाया गया है कि कुत्तों ने इंसानों के नवजात बच्चों की नक़ल करना सीख लिया है. इसी वजह से अक्सर वो इंसानों की तवज्जो और उनका प्यार पाने में कामयाब रहते हैं.
इसकी वजह उनकी भौंहों के नीचे एक मांसपेशी का विकास होना है. जिसकी वजह से पालतू कुत्ते ऐसा मुंह बना लेते हैं कि मासूम लगने लगते हैं.
कुत्तों के जंगली रिश्तेदारों यानी भेड़ियों की भौंहों के नीचे ये मांसपेशी नहीं पायी जाती है.
और, बिल्लियों में यही मांसपेशी विकसित नहीं हो पायी है. इसका नतीजा ये हुआ है कि उनके निहारने को हम घूरना समझ बैठते हैं.
बिल्ली के इन ख़ास इशारों के क्या हैं मायने?
दो बिल्लियों का एक-दूसरे को घूरने का मतलब ये माना जाता है कि जल्द ही दोनों में झगड़ा होने वाला है. लेकिन, धीरे-धीरे आंखें चमकाते हुए देखने वाली बिल्ली असल में ये संकेत देती है कि वो आपसे मुहब्बत करती है.
बिल्ली का अपने सिर को एक तरफ़ झुकाना भी बेरुख़ी नहीं, बल्कि उनके सुकून का संकेत होता है.
क्रिस्टिन, अमरीका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च का हवाला देती हैं. जिस में कुत्तों और बिल्लियों को उनके मालिक कमरे में बंद करके चले गए.
जब वे लौटे तो वो बिल्लियां जो अपने आप को महफ़ूज़ महसूस करती थीं, उन्होंने अपने मालिकों का ख़ैरमकदम किया और फिर कमरे में घूमने-टहलने लगीं.
कुत्तों ने भी यही किया. रिसर्चर्स के मुताबिक़ ये इन कुत्ते-बिल्लियों का अपने मालिक से सुरक्षित किस्म का लगाव कहा जा सकता है.
यानी जब उनका मालिक लौटा, तो उन्होंने अपने बर्ताव से उसके साथ मज़बूत जज़्बाती रिश्ते का इज़हार किया.

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बिल्लियों के बर्ताव को जानें
क्रिस्टिन कहती हैं कि अक्सर इंसानों की उम्मीदें ही जानवरों के बर्ताव पर भारी पड़ जाती हैं. इसी वजह से बिल्लियों से कुत्तों जैसा बर्ताव करने की अपेक्षा की जाती है. जैसे कि वो हमें ध्यान दें.
जब हम घर पहुंचें तो वो हमसे लिपट जाएं. ऐसा कर के हम उन्हें अपने क़ुदरती बर्ताव से अलग व्यवहार करने को मजबूर करते हैं.
कैरेन कहती हैं कि ऐतिहासिक रूप से बिल्लियों का बर्ताव ऐसा नहीं रहा है. बहुत से जानकारों तक को बिल्लियों का असल मिज़ाज पता नहीं होता. वो उनकी बॉडी लैंग्वेज को समझ नहीं पाते.

अगर बिल्लियां आपके शरीर से अपने बदन को रगड़ें?
मसलन, बिल्लियों का अपने मालिक के शरीर से अपना बदन रगड़ने को ही देखें. इसका ये मतलब माना जाता था कि बिल्लियां अपने इलाक़े की हद तय कर रही हैं. जैसे कि जंगली बिल्लियां पेड़ों से अपने बदन को रगड़ कर करती हैं.
लेकिन, जब वो इंसानों के साथ ऐसा करती हैं, तो ये उनका लगाव दिखाने का संकेत होता है. बिल्ली असल में अपने बदन की बू को इंसानों के शरीर में भेजती है और आपके शरीर की बू को अपने बदन से लगाती है.
ऐसा ही जंगली बिल्लियां भी दूसरी बिल्लियों के साथ करती हैं, जब दोनों के बीच बॉन्डिंग होती है. ये असल में दोनों के बदन की बू को मिलाकर एक ऐसी बू तैयार करने के इरादे से किया जाता है, जो दोस्तों और दुश्मनों में फ़र्क़ बताए.

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क्या कहती है बिल्लियों की यह खामोशी?
कैरेन कहती हैं कि सहज भाव से बैठी बिल्ली आप से क़रीबी ताल्लुक़ बनाने की इच्छा जताती है.
वो बड़े सलीक़े से रहना पसंद करती हैं. अपना खाना-पानी समय और सही जगह पर चाहती हैं और गंदगी को दूर करने से ख़ुश हो जाती हैं.
जब उनकी ज़रूरत की हर चीज़ सही तरीक़े से होती है, तो फिर वो इंसानों से ताल्लुक़ बनाने की कोशिश करती हैं.
तो, अगली बार जब आप घर पहुंचें और देखें कि आपकी प्यारी बिल्ली सोफ़े से आप को निहार रही है, या फिर जम्हाई ले रही है, तो निराश मत हों.
असल में वो ख़ामोशी से ये कह रही होती हैं कि आप को देख कर उन्हें अच्छा लगा.
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