महिलाओं को क्यों कम मिला है विज्ञान का नोबेल

- Author, मैरी के फेनी
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
2018 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार पाने वालों में से एक हैं डोना स्ट्रिकलैंड. किसी भी वैज्ञानिक के लिए नोबेल पुरस्कार जीतना बहुत बड़ी उपलब्धि होती है.
लेकिन, डोना के नोबेल जीतने के बाद मीडिया कवरेज का फ़ोकस इस बात पर ज़्यादा रहा कि डोना, फ़िजिक्स में नोबेल पुरस्कार जीतने वाली तीसरी महिला हैं.
डोना से पहले मारिया गोपर्ट-मेयर ने 60 साल पहले नोबेल जीता था. वहीं, नोबेल जीतने वाली पहली महिला मैरी क्यूरी को ये पुरस्कार 1903 में मिला था.
यानी एक सदी से ज़्यादा लंबे नोबेल के सफ़र में ये तीन महिलाएं ही हैं, जिन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला.
हालांकि इस साल एक और महिला फ्रांसेस आर्नॉल्ड को भी नोबेल मिला. लेकिन फ्रांसेस को ये पुरस्कार केमिस्ट्री में मिला है. इसी वजह से सवाल उठे हैं कि आख़िर भौतिकी में महिलाओं के नोबेल पाने की तादाद इतनी कम क्यों है?
इसकी बड़ी वजह रही है महिलाओं की भौतिक विज्ञान की पढ़ाई में कम साझेदारी और इसमें करियर बनाने में कम दिलचस्पी.

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1903 में मैरी क्यूरी के नोबेल जीतने से लेकर अब तक महिलाओं ने विज्ञान में कामयाबी का लंबा सफ़र तय किया है. लेकिन, अभी भी साइंस में महिलाओं की भागीदारी बहुत कम है. ज़्यादातर रिसर्चर और वैज्ञानिक मर्द हैं.
महिलाओं की नुमाइंदगी दाल में नमक के बराबर ही है.
आज ज़िंदगी के हर मोर्चे पर महिलाएं बराबरी से शामिल हैं. खेल का मैदान हो, राजनीति हो या फिर डॉक्टरी की पढ़ाई. हर क्षेत्र में आप को महिलाएं तरक़्क़ी की सीढ़ियां चढ़ती दिखेंगी.
मगर, क्या वो भौतिकी के रिसर्च में भी महिलाएं बराबर की शरीक़ हैं?
वही पुराने स्टीरियोटाइप
आम तौर पर माना ये जाता है कि महिलाएं गणित पसंद नहीं करतीं. उनकी विज्ञान में कम दिलचस्पी होती है. ये ख़याल रखने वाले सिर्फ़ पुरुष हों ऐसा नहीं है. बहुत सी महिलाएं भी यही सोच रखती हैं.
यही वजह है कि महिलाएं स्टेम एजुकेशन यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ यानी गणित की पढ़ाई में पिछड़ी नज़र आती हैं. समाज में व्यापक रूप से फ़ैली सोच के नतीजे में ही हमें साइंस और गणित के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी नहीं दिखती.
पिछले कुछ दशकों में पश्चिमी देशों ने स्टेम एजुकेशन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की है. कोशिश ये है कि गणित, इंजीनियरिंग और भौतिक विज्ञान में महिलाओं की शिरकत बढ़े. इसके अच्छे नतीजे भी आ रहे हैं.
आज यूनिवर्सिटी में इन विषयों की पढ़ाई को लेकर महिलाओं की दिलचस्पी बढ़ी है. आज मनोविज्ञान और सामाजिक विज्ञान में छात्रों की कुल तादाद का आधा महिलाएं हैं.
अमरीकी इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िजिक्स के मुताबिक़ फिजिक्स की कुल डिग्री में 20 फ़ीसदी लड़कियां हासिल करती हैं, तो 18 प्रतिशत पीएचडी की डिग्री उनके नाम होती है. 1975 में ये तादाद 10 फ़ीसदी और 5 प्रतिशत थी.

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महिलाओं के आगे चुनौतियां
यानी आज फ़िजिक्स, इंजीनियरिंग और गणित में महिलाएं रिसर्च कर रही हैं. पढ़ा रही हैं. करियर बना रही हैं.
गणित और भौतिकी की पढ़ाई में महिलाओं की चुनौतियां क्या हैं?
स्टेम एजुकेशन में महिलाओं की साझेदारी इसलिए तेज़ी से नहीं बढ़ पा रही है कि समाज की सोच इसके ख़िलाफ़ है. पूरी व्यवस्था ही ऐसी है कि महिलाओं को इन विषयों में आगे बढ़ने में कई चुनौतियां झेलनी पड़ती हैं.
गणित और भौतिकी के रिसर्च कर रही महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले पैसे कम मिलते हैं. साइंस में काम कर रही महिलाओं को रिसर्च के साथ अपनी ज़िंदगी की चुनौतियों का तालमेल बैठाने में भी मुश्किल आती है. भौतिकी और गणित की रिसर्च में कई साल लगातार मेहनत करनी पड़ती है. ऐसे में कई बार महिलाएं बच्चों और परिवार की ज़िम्मेदारी के चलते पिछड़ जाती हैं.
फिर, जहां मर्दों का बोलबाला हो, वहां काम करने में महिलाएं अलग-थलग महसूस करती हैं. उनका अपने साथियों से उस तरह का जुड़ाव नहीं हो पाता, जैसा किसी महिला सहकर्मी के साथ हो सकता है. वो लैब की संस्कृति से ख़ुद को कटा हुआ महसूस करती हैं.
अब जब स्टेम एजुकेशन में महिलाओं की कुल भागीदारी ही 15 फ़ीसदी हो, तो वो अपने लिए संसाधनों, मौक़ों और अवार्ड के लिए क्या वक़ालत कर पाएंगी?
नतीजा ये होता है कि इन विषयों में महिलाएं अल्पसंख्यक हो जाती हैं. हाशिए पर होने की वजह से उन पर काम का दबाव होता है. कम महिला साथी होने की वजह से महिलाओं की नेटवर्किंग कमज़ोर होती है.
बच्चों और परिवार की ज़िम्मेदारी की वजह से महिलाओं को कई बार कांफ्रेंस जाने में दिक़्क़त होती है.
महिलाओं की इन चुनौतियों से निपटने में मदद के लिए यूनिवर्सिटी और सरकारी संस्थाएं काम कर रही हैं. लेकिन, ऐसा पश्चिमी देशों में ही हो रहा है. कोशिश ये होती है कि परिवार के लिए मददगार नियम-क़ायदे बनें.
लोगों को चुनने और आगे बढ़ाने में पारदर्शिता हो. महिला रिसर्चर्स को मेंटरिंग और सहयोग मिले. उनके रिसर्च के लिए अगर वक़्त की पाबंदी हटानी पड़े तो वो भी हटाई जाए.
ऐसे क़दमों के मिलेजुले नतीजे सामने आए हैं. यूनिवर्सिटी और लैब के आस-पास बच्चों की देखभाल के लिए चाइल्ड केयर सेंटर खोले जाने की वजह से महिलाएं अब बच्चों की फिक्र छोड़कर रिसर्च पर ध्यान दे पा रही हैं. लेकिन, इससे समाज का ध्यान उन पर ज़्यादा पड़ रहा है.
नतीजा ये होता है कि बड़े रिसर्च के बजाय महिलाओं पर क्लास में पढ़ाने वाली पोज़िशन लेने का दबाव बढ़ जाता है.
मर्दवादी सोच
हम सब के ज़हन में नोबेल विजेता वैज्ञानिकों की जो तस्वीर है, वो मर्दवादी है. हम महिला वैज्ञानिकों का तसव्वुर ही नहीं कर पाते हैं. 97 फ़ीसदी नोबेल विजेता मर्द रहे हैं.
महिलाओं के प्रति ये भेदभाव कई बार अनजाने में होता है, तो कई बार जान-बूझकर भी उनकी अनदेखी होती है.
मर्दवादी सोच के चलते अक्सर क़ाबिल महिलाओं को वज़ीफ़े देने से लेकर रिसर्च के लिए आगे बढ़ाने तक में अनदेखा किया जाता है. काम-काज का माहौल ऐसा होता है कि महिलाएं उपेक्षित महसूस करती हैं.
कोई अगर महिलाओं के लिए सिफ़ारिशी चिट्ठी लिखता भी है, तो उसे शक की नज़र से देखा जाता है.
फिर, रिसर्च के क्षेत्र में मर्द अपने समुदाय के रिसर्च पेपर का ज़िक्र ज़्यादा करते हैं. महिलाओं की उपलब्धियों को पहचान मिलने में दोगुनी मेहनत लगती है.
अगर महिलाएं विश्व स्तर की वैज्ञानिक बन भी जाती हैं, तो भी उन्हें वो पहचान नहीं मिल पाती, जो किसी पुरुष वैज्ञानिक को आसानी से हासिल होती है. महिलाओं को गेस्ट लेक्चर के लिए कम बुलाया जाता है. ख़बरों में महिला वैज्ञानिकों का ज़िक्र कम होता है.
नोबेल के लिए कैसे लिया जाता है महिलाओं का नाम?
एक और बात होती है कि जब भी मर्द वैज्ञानिकों का ज़िक्र होता है, तो उनका सरनेम लिया जाता है. लेकिन महिला वैज्ञानिकों का ज़िक्र उनके पहले नाम से ही होता है. रिसर्च कहती है कि इस वजह से भी महिलाओं को कम कर के आंका जाता है.
ऐसे माहौल में डोना स्ट्रिकलैंड का फिजिक्स का नोबेल जीतना बहुत बड़ी उपलब्धि है.
डोना कहती हैं कि उन्हें ये एहसास भी बहुत देर से हुआ कि फ़िजिक्स का नोबेल बहुत कम महिलाओं ने जीता है. लेकिन, हम तो पुरुषों के रचे समाज में रहते हैं. इसलिए इसमें चौंकाने वाली कोई बात भी नहीं है.
विज्ञान में पुरुषों का बोलबाला कोई नई बात नहीं. लेकिन स्टेम एजुकेशन में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर अगली आधी सदी में हम ये तस्वीर बदल सकते हैं.
पश्चिमी देश तो ऐसा कर रहे हैं. लेकिन, भारत जैसे विकासशील देश में शायद ये तस्वीर बदलने में एक सदी और गुज़र जाए.
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