समुद्र के विशाल हिमखंड को हज़ारों किलोमीटर दूर खींचने का महामिशन क्या है?

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- Author, टिम स्मेडले
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
आर्कटिक से लेकर अंटार्कटिका तक विशाल हिमखंड या आइसबर्ग टूटकर समुद्र में घुल रहे हैं. जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसा हो रहा है, जिससे समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है.
अब इस मुश्किल से एक और परेशानी का हल तलाशने की चर्चा छिड़ी है. इन आइसबर्ग या हिमखंडों को खींच कर उन जगहों पर ले जाने की बातें हो रही हैं, जहां पर पानी की किल्लत है.
जैसे कि दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात या सऊदी अरब.
आप अगर ये सोच कर हैरान हो रहे हैं कि विशाल और भारी हिमखंडों को कैसे खींचकर हज़ारों किलोमीटर दूर ले जाया जाएगा, तो इस बात पर ग़ौर फ़रमाएं- अंटार्कटिका से हिमखंडों के तौर पर जितना पानी टूट कर समुद्र में हर साल मिलता है, वो दुनिया में मीठे पानी की कुल सालाना खपत से भी ज़्यादा है. इस आंकड़े में आर्कटिक से टूटने वाले हिमखंडों को नहीं जोड़ा गया है. अंटार्कटिका या आर्कटिक से जो हिमखंड टूटते हैं, वो शुद्ध मीठा पानी है, जो पिघलकर समुद्र में मिल जाता है और खारा हो जाता है.
हिमखंडों से पानी निकालने का विचार नया नहीं. उन्नीसवीं सदी में बर्फ़ को भारत में भाप वाली नावों के ज़रिए दूसरे ठिकानों तक पहुंचाया जाता था. इसी तरह दक्षिण अमरीकी देश चिली में हिमखंडों को शराब के कारखानों तक पहुंचाया जाता है.
1940 के दशक में स्क्रिप्स ओशियानोग्राफिक इंस्टीट्यूट के जॉन इसाक्स ने प्रस्ताव दिया था कि हिमखंड को खींच कर उस वक़्त सूखे से परेशान, अमरीका के कैलिफ़ोर्निया की प्यास बुझाने के लिए लाया सैन डिएगो तक लाया जाए.
1970 के दशक में सऊदी अरब के राजकुमार प्रिंस मोहम्मद अल फैसल चाहते थे कि अंटार्कटिका से आइसबर्ग को खींचकर भूमध्य रेखा के इस पार यानी सऊदी अरब तक लाया जाए. इस बारे में चर्चा के लिए प्रिंस फैसल ने दो अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस भी आयोजित की थीं. 2010 में यूरोपीय यूनियन के सामने प्रस्ताव रखा गया था कि आइसबर्ग को खींच कर अटलांटिक महासागर स्थित कैनेरी द्वीपों तक लाया जाए क्योंकि वो पानी की किल्लत से जूझ रहे थे.
इन सभी योजनाओं में एक बात आम थी. वो ये कि कोई भी योजना परवान नहीं चढ़ सकी.

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केपटाउन और यूएई के हाल
मगर, ऐसे प्रस्ताव रखने वालों ने हार नहीं मानी. अब नए सिरे से हिमखंडों को खींचने के प्रस्ताव दुनिया के सामने रखे गए हैं. इनमें से एक तो है सूखे की मार झेल रहे दक्षिण अफ्रीकी शहर केपटाउन तक हिमखंड खींच कर लाने की. वहीं, दूसरा प्रस्ताव आइसबर्ग को संयुक्त अरब अमीरात तक लाने का है.
इसी साल केपटाउन, 'डे ज़ीरो' के बेहद क़रीब पहुंच गया था. 'डे ज़ीरो' यानी वो दिन जब शहर को पानी देने वाले सारे स्रोत सूख जाएं. क़रीब 40 लाख की आबादी वाला केपटाउन शहर पानी की राशनिंग कर रहा था. किसी भी इंसान को रोज़ाना 50 लीटर से ज़्यादा पानी इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं थी.
ख़ुशक़िस्मती से बारिश होने की वजह से केपटाउन 'डे ज़ीरो' तक पहुंचने से बच गया. मगर, ख़तरा टला नहीं है. हो सकता है कि ऐसे ही हालात अगले साल फिर बन जाएं.
वहीं, संयुक्त अरब अमीरात के ऊर्जा मंत्री ने देश में पानी के इस्तेमाल को लेकर चिंता ज़ाहिर की है. उन्होंने कहा कि वो आइसबर्ग को संयुक्त अरब अमीरात तक खींच कर लाने पर विचार कर रहे हैं.


1970 के दशक से लेकर आज तक आइसबर्ग को खींच कर लाने के जो भी प्रस्ताव आए हैं, उनके पीछे वही चेहरे हैं. कैम्ब्रिज के स्कॉट पोलर इंस्टीट्यूट के प्रोफ़ेसर पीटर वढाम्स, नॉर्वे के पोलर इंस्टीट्यूट के डॉक्टर ओलाव ओरहीम. और 1970 के दशक में प्रिंस फैसल की योजना से जुड़े रहे फ्रेंच इंजीनियर जोर्स मूजेन.
पीटर वढाम्स ने जब स्क्रिप्स इंस्टीट्यूट में काम करना शुरू किया, तभी उन्हें 1940 के दशक में दिए गए जॉन इसाक्स के प्रस्ताव के बारे में पता चला. वढाम्स कहते हैं कि, 'जॉन इसाक्स के प्रस्ताव को सऊदी अरब के प्रिंस फ़ैसल ने आगे बढ़ाया और पूछा कि क्या हम दो हिमखंड खींच कर सऊदी अरब तक ला सकते हैं? ऐसा संभव नहीं क्योंकि हमें हिमखंडों को अंटार्कटिका से खींच कर भूमध्य रेखा के इस पार लाना होगा, जहा मौसम गर्म है. आइसबर्ग पिघल जाएंगे. लेकिन, चूंकि प्रिंस फैसल के पास पैसा था, तो किसी ने उन्हें ना नहीं बोला. प्रिंस ने इस बारे में दो इंटरनेशनल कांफ्रेंस भी आयोजित कीं. इसमें वढाम्स, मोजिन और ओरहीम के प्रस्तावों पर चर्चा हुई. बहुत से लोगों ने ये माना कि हिमखंडों को खींच कर लाना संभव है. शर्त ये है कि ये सर्द इलाक़ों में ही ले जाए जा सकते हैं. पूरा मिशन कम वक़्त में पूरा करना होगा. सऊदी अरब का प्रोजेक्ट नाकाम रहा. मगर, हम ने कभी भी इस विचार को दिमाग़ से पूरी तरह नहीं निकाला.'

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कैसे ले जाएगा हिमखंडों को हजारों किलोमीटर दूर
2010 में वढाम्स, मोजिन और ओरहीम फिर से इकट्ठे हुए. ओरहीम कहते हैं कि क़रीब चालीस साल तक उनका मोजिन से कोई संपर्क नहीं था. इतने लंबे समय मे विज्ञान बहुत आगे निकल चुका होता है. मगर इस मामले में कोई ख़ास रिसर्च नहीं हुई थी.
2010 में मोजिन ने फ्रेंच कंपनी डसो सिस्टम्स की मदद से कंप्यूटर की मदद से हिमखंडों को खींच कर लाने के प्रस्ताव का थ्री-डी मॉडल तैयार कराया. सैटेलाइट ट्रैकिंग सिस्टम की मदद से अनुमान लगाने की कोशिश की गई कि आख़िर आइसबर्ग को खींच कर हज़ारों किलोमीटर दूर ले जाने की योजना में कितना दम है.
नतीजा ये निकला कि, अगर 6 हज़ार हॉर्स पावर की ताक़त वाले जहाज़ की मदद ली जाए, तो 70 लाख टन वज़नी आइसबर्ग को उत्तरी ध्रुव के क़रीब स्थित न्यूफाउंडलैंड से कैनेरी द्वीप तक लाने में 141 दिन लगेंगे. इस दौरान इसे खींचने वाला जहाज़ 4000 टन ईंधन खाएगा. वहीं, इतने दिनों में 70 लाख टन वज़नी हिमखंड पिघल कर 40 लाख टन का रह जाएगा.' जोड़-घटाव और नफ़ा-नुक़सान का हिसाब लगाने के बाद भी ये मुनाफ़े का सौदा है. मगर ये सब कुछ कंप्यूटर के मॉडल की बात है. हक़ीक़त नहीं.


अभी कैनेरी द्वीपों पर समुद्र के पानी को साफ़ कर के सप्लाई होती है. ये महंगा सौदा है. प्रदूषण भी होता है. पानी से निकले अवयव, आस-पास के समुद्री जीवों को मार देते हैं.
मोजिन और वढाम्स ने अपना कंप्यूटर मॉडल और ये प्रस्ताव यूरोपीय यूनियन के सामने रखा. मगर इसे तवज्जो नहीं दी गई.
उधर, संयुक्त अरब अमीरात के नेशनल एडवाइज़र ब्यूरो के प्रमुख अब्दुल्ला अलशेही चाहते हैं कि अंटार्कटिका से आइसबर्ग खींचकर फारस की खाड़ी तक लाया जाए, जिससे यूएई में पानी की बढ़ती मांग को पूरा किया जा सके. अलशेही कहते हैं कि वो चार करोड़ टन वज़नी आइसबर्ग को खींच कर संयुक्त अरब अमीरात के पूर्वी तट तक लाना चाहते हैं. क्योंकि ये इतना विशाल होगा कि इसे दुबई बंदरगाह तक नहीं लाया जा सकता.
दिक़्क़त ये है कि इतने गर्म माहौल वाले पानी में ये हिमखंड कितने दिन टिकेगा, इसका कोई अंदाज़ा नहीं. लेकिन अलशेही अगले साल ऑस्ट्रेलिया में एक पायलट प्रोजेक्ट आज़माना चाहते हैं.
वढाम्स और ओरहीम जैसे उत्साही लोग भी इसे लेकर बहुत उम्मीद नहीं रखते.

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'आइसबर्ग को अंटार्कटिका से खींच कर केपटाउन लाना मुमकिन है'
हिमखंड से पानी निकालने की जो योजना हक़ीक़त में आज़माई जा सकती है, वो है केपटाउन तक इसे खींच कर लाने की. ये जगह अंटार्कटिका से उतनी दूर नहीं है, जितने दूसरे ठिकाने. फिर यहां का मौसम और आस-पास का समंदर भी ठंडा रहता है.
मोजिन और ओरहीम के इस प्रोजेक्ट से जुड़े हैं कैप्टेन निक स्लोएन. वो केपटाउन की मैरीन इंजीनियरिंग कंपनी रिजॉल्व मैरीन से जुड़े हैं. कैप्टेन निक को समंदर में फंसी चीज़ें निकालने का उस्ताद माना जाता है. 2014 में उन्होंने ही इटली के जहाज़ कोस्टा कॉनकॉर्डिया को सीधा कर दिया था.
कैप्टेन निक कहते हैं कि, 'आइसबर्ग को अंटार्कटिका से खींच कर केपटाउन लाना मुमकिन है. हमने सैटेलाइट की मदद से एक मॉडल का अध्ययन किया है. दक्षिणी अटलांटिक महासागर में स्थित गो आइलैंड से 8.5 करोड़-10 करोड़ टन वज़नी आइसबर्ग को खींच कर केपटाउन लाया जा सकता है.' ये कैनेरी द्वीप तक हिमखंड लाने के प्रोजेक्ट से दस गुना बड़ा मिशन होगा. कैप्टेन निक कहते हैं कि, 'आर्कटिक के हिमखंड अंटार्कटिका के हिमखंडों से अलग होते हैं. वो मेज की तरह से समतल होते हैं. ठोस होते हैं. अंदर की तरफ़ वो ज़्यादा ठंडे होते हैं.' केपटाउन तक हिमखंड लाने का मिशन 80-90 दिन का होगा. 20 हज़ार हॉर्सपावर क्षमता वाले सुपरटैंकर की मदद से इसे खींच कर केपटाउन लाया जा सकता है.
गो आइलैंड से एक समुद्री धारा चलती है. ये बेहद सर्द है और इसकी रफ़्तार भी तेज़ है. इसे सर्कमपोलर करेंट के नाम से जानते हैं. ये समुद्री धारा अंटार्कटिक के इर्द-गिर्द हिम खंडों की रिंग रोड जैसी है. इसी के क़रीब से गुज़रती है बेंगुएला करेंट. जो गो आइलैंड से होकर दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन के क़रीब तक आती है. यानी इन समुद्री धाराओं के सहारे हिमखंडों को तैरा कर केपटाउन लाया जा सकता है. कैप्टन निक कहते हैं कि ताक़तवर टैंकरों का काम सिर्फ़ हिमखंड का ट्रैक बदलना होगा. ठीक वैसे ही, जैसे किसी तेज़ रफ़्तार ट्रेन का ट्रैक बदला जाता है.

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इस पानी का ख़रीदार कौन होगा
केपटाउन में जिस समुद्री ठिकाने पर इस हिमखंड को रोक कर रखे जाने की योजना है, वहां भी मौसम सर्द रहता है. ये जगह केपटाउन शहर से 40 किलोमीटर दूर है. वहां से टैंकर या पाइपलाइन के ज़रिए पानी शहर तक पहुंचाया जा सकेगा.
बड़ी शर्त ये है कि इस पानी का ख़रीदार होना चाहिए. फिलहाल केपटाउन प्रशासन इस पर दांव लगाने को तैयार नहीं. केपटाउन के अधिकारी ज़ैन्थिया लिम्बर्ग कहते हैं कि ये बड़ी पेचीदा योजना है. जोखिम बहुत है और ये केपटाउन के लिए महंगा पड़ेगा. फिलहाल वो दूसरे स्रोतों से शहर की पानी की ज़रूरतें पूरी करने के विकल्पों पर ही ग़ौर कर रहे हैं.
मगर कैप्टेन निक स्लोएन और उनके साथी निराश नहीं हैं. केपटाउन का पानी सप्लाई का सिस्टम दक्षिण अफ्रीका की केंद्र सरकार के अधीन है. कैप्टेन निक कहते हैं कि वो ज़मीन से पानी निकालने के मुक़ाबले ग्लेशियर का पानी इस्तेमाल करने की बात नहीं कर रहे हैं. ज़मीन से, किसी नदी से पानी लेना बहुत आसान और सस्ता है. वो तो बस ऐसे स्रोतों की मदद के लिए एक और विकल्प देना चाहते हैं.
अपनी योजना को मंज़ूर कराने के लिए निक ने नया दांव खेला है. उन्होंने हिमखंड खींच कर लाने का सारा निवेश स्विस कंपनी वाटर विज़न प्लस से लेने का प्रस्ताव रखा है. इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका के दो बैंक और एक बीमा कंपनी भी इसमें साझीदार होगी. यानी सरकार को हिमखंड खींच कर लाने का ख़र्च नहीं उठाना होगा. जब आइसबर्ग केपटाउन पहुंच जाएगा, तो इससे निकले पानी की क़ीमत ज़रूर केपटाउन प्रशासन को चुकानी होगी. ये पानी के दूसरे स्रोतों के मुक़ाबले सस्ता रहेगा. केपटाउन की सरकार को निवेश का जोखिम भी नहीं उठाना होगा.


इसी महीने कैप्टेन निक, ओरहीम और मोजिन ने दक्षिण अफ्रीकी सरकार के जल अनुसंधान आयोग के सामने अपने प्रस्ताव को रखा. आयोग के डॉक्टर शफ़ीक एडम्स कहते हैं कि प्रस्ताव में तो दम है. मगर वो अभी इसे हरी झंडी देने के बजाय इसके नफ़ा-नुक़सान का अंदाज़ा लगा रहे हैं. कैप्टेन निक कहते हैं कि अब इस साल तो इस प्रोजेक्ट पर काम करना नामुमकिन है. सरकार से हरी झंडी मिलने पर अगले साल इस पर काम हो सकता है.
लेकिन, हिमखंडों को धकेलने का काम करने वाली कई कंपनियां इस योजना को हंसी में उड़ा देती हैं. उत्तरी अटलांटिक महासागर में तेल के कुओं के क़रीब आने वाले हिमखंड धकेलने वाली कंपनियां कहती हैं कि आइसबर्ग को इतनी दूर खींचना नामुमकिन है. ऐसी दो कंपनियां हैं सी-कोर और अटलांटिक टोइंग.

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कितने ईंधन की ज़रूरत
सी-कोर की कॉरपोरेट कम्युनिकेशन मैनेजर द्रेइद ग्रीन-लोनो कहती हैं कि इंजीनियरिंग के लिहाज़ से इस योजना को हक़ीक़त बनाना नामुमकिन है. इसमें इतना ईंधन लगेगा कि पर्यावरण को बचाना तो दूर हम उसे और नुक़सान पहुंचाएंगे.
लोनो कहती हैं कि अब तक किसी आइसबर्ग को धकेलने का सबसे लंबा मिशन जो उन्होंने सुना है, वो 24 घंटे चला था. वहीं अटलांटिक टोइंग के शेल्डन लेस कहते हैं कि इतने विशाल आइसबर्ग को खींचने में रोज़ाना 40-50 टन ईंधन जलेगा. यानी 100 दिन तक चलने वाले मिशन में 5000 टन से ज़्यादा ईंधन लगेगा. इतने ईंधन में एक औसत कार धरती का 1767 बार चक्कर लगा सकती है.
न्यूफाउंडलैंड की मेमोरियल यूनिवर्सिटी के स्टीव ब्रुने कहते हैं कि रेगिस्तानी मुल्कों तक आइसबर्ग खींच के ले जाना ऐसा ख्वाब है, जो कभी पूरा नहीं हो सकता. इंजीनियरिंग की जो चुनौतियां हैं, सो हैं ही, इसमें इतना ईंधन लगेगा कि इसका ख़र्च ही कोई नहीं उठाना चाहेगा.
वैसे सी-कोर और अटलांटिक टोइंग के इंजीनियर मानते हैं कि अंटार्कटिका के हिमखंड को खींच कर केपटाउन ले जाने पर विचार किया जा सकता है. पीटर वढाम्स भी मानते हैं कि ओलाव ओरहीम और निक की योजना में दम है. अटलांटिक की ठंडी समुद्री धाराएं इस में मददगार होंगी.
ओरहीम कहते हैं कि अंटार्कटिका से हर साल 1 लाख 40 हज़ार से ज़्यादा आइसबर्ग टूटते हैं. ये ताज़े पानी की ऐसी खेप है, जो कभी ख़त्म नहीं होगी. सारा पानी अभी समंदर में पिघल जाता है. इनमें से एक या दो हिमखंड हम केपटाउन तक लाना चाहते हैं.
निक स्लोएन दक्षिण अफ्रीका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला का वो बयान याद दिलाते हैं-हर चीज़ तब तक नामुमकिन दिखती है, जब तक वो हो नहीं जाती.
शायद, केपटाउन से आइसबर्ग खींचने के महामिशन का कामयाब आग़ाज़ हो.
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