ग्राउंड रिपोर्ट: ''हर जगह पानी ही पानी लेकिन पीने को एक बूंद नहीं''

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- Author, प्रमिला कृष्णन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, तमिल सेवा
"मैडम, मेरे पति की लीवर ट्रांसप्लांट सर्जरी हुई थी. क्या आप हमें सुरक्षित जगह पर पहुंचाने में मदद कर सकती हैं? आप एक चैनल के साथ काम करती हैं न?"
मुश्किल समय में एक पत्रकार को एक 'रक्षक' के तौर पर देखा जाता है.
मैं बीते एक हफ़्ते से बाढ़ की ख़बरों को कवर करने के लिए केरल में हूं. जब मैं रिपोर्टिंग करने यहां आई थी तब मुझे नहीं पता था कि मैं भी बाढ़ पीड़ित बन जाउंगी.
60 साल से ज्यादा उम्र की एक महिला ने जब मुझसे मदद मांगी तो मेरी आंखों में आंसू थे और मैंने उन्हें गले लगा लिया.
मैंने उनसे कहा, "मां मैंने कलेक्टर ऑफ़िस को सूचना दे दी है, आप फ़िक्र न करें. हम बचा लिए जाएंगे."
लेकिन स्थानीय विधायक ने मुझे बताया कि एक मरीज़ को बचाकर ले जाना संभव नहीं है क्योंकि बाढ़ का पानी इस इलाक़े और पड़ोसी इलाक़े में कम होने का नाम नहीं ले रहा है और सात मंज़िला होटल को छोड़कर जाना असुरक्षित है क्योंकि राहत शिविरों में लोग भरे हुए हैं.
व्यस्त बचाव कार्य के बीच एर्नाकुलम निर्वाचन क्षेत्र के युवा विधायक हिबी एदन ने मुझे बताया, "आपका होटल एक द्वीप बन चुका है. हम तुरंत बचा नहीं सकते हैं लेकिन मैं आप तक खाना पहुंचाने की कोशिश करूंगा."
मेरे होटल में पीने का पानी नहीं है और निचले तल पर बारिश का पानी भर चुका है. यहां मेरे साथ मौजूद तकरीबन सौ लोग पानी का स्तर कम होने की आशा लगाए हुए हैं ताकि पानी पहली मंज़िल तक न पहुंचे.
होटल के मैनेजर ने कहा, "पीने का पानी कम है. हमारे होटल के क़रीब वाले राहत शिविर में पीने के पानी की कमी है. हमारे पास कोई विकल्प नहीं है."
हम सभी सूरज उगने और बारिश रुकने का इंतज़ार कर रहे हैं.

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मदद के लिए रोते लोग
पिछले तीन दिनों से मैं यहां लोगों को ले जाते ट्रक, लोगों को एयरलिफ़्ट करते हेलिकॉप्टर, दमकलकर्मी और नाव में जाते स्थानीय लोगों को देख रही हूं. हज़ारों लोग संघर्ष कर रहे हैं और मैं अपनी आंखों से लोगों को मदद के लिए रोते हुए देख सकती हूं.
रिपोर्टिंग के पहले दिन मैंने इडुक्की ज़िले के पीड़ितों से बात की. ये एक पहाड़ी इलाक़ा है जहां पर कई भूस्खलन की घटनाएं हुईं. यहां पर मैंने राहत शिविर और एक स्थानीय चर्च का दौरा किया.
परिजन को खो चुके बच्चे, अपना इकलौता घर खो चुके बूढ़े लोग, नुकसान से दुखी युवाओं की तस्वीर मेरे ज़हन में ताज़ा हैं. मैं जब उनसे मिली तो उन्होंने कोई सवाल नहीं पूछा लेकिन उनके चेहरे अभी भी मेरे दिमाग़ में घूम रहे हैं. उन्हें सांत्वना देने के लिए मेरे पास कोई जवाब, कोई शब्द नहीं हैं.
सालि एक ऐसी ही बाढ़ पीड़ित हैं जिन्होंने मुझसे बात की, ''हर साल भारी बारिश होती है और कुछ भूस्खलन भी होते हैं. इडुक्की में मेरा जन्म हुआ है और वहीं मैं पली-बढ़ी हूं. मैंने देखें की यहां बहुत ज़्यादा बारिश होती है. लेकिन, इस बार मेरे माता-पिता घर में फंस गए और भूस्खलन के कारण घर गिरने से घायल हो गए. मुझे उनके शव तक नहीं मिल पाए.''
दो दिनों तक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में जाने के बाद मैं तीसरे दिन कोच्चि पहुंची क्योंकि इडुक्की में इंटरनेट कनेक्शन नहीं था और मैं न्यूज़ रिपोर्ट नहीं भेज सकती थी.

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नहीं थी तैयारी
अगले दिन इडुक्की में उस जगह भूस्खलन की तस्वीरें आई जहां मैं एक दिन पहले ठहरी थी. जिस होटल में मैं रुकी थी वो दूसरी जगहों से पूरी तरह कट गया. मुझे पता चला कि कोच्चि एयरपोर्ट भी अस्थायी तौर पर बंद हो गया है.
कोच्चि में बाढ़ से हालात ख़राब हो गए. यहां पर मेट्रो स्टेशनों में भी पानी भर गया है. 90 सालों में ये पहला मौका है जब कोच्चि में ऐसी बाढ़ आई है. यहां के निवासी ऐसी परिस्थिति के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं थे.
कंपनीपड़ी में लोगों को अपार्टमेंट से निकलने का अनुरोध कर रहे एक बचाव अधिकारी ने कहा, ''अमीर लोग अपना घर छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्हें अपनी ज़िंदगी से ज़्यादा अपनी संपत्ति की चिंता है. हम उन्हें मना नहीं सके.''
बचाव दल की गोद में छोटे-छोटे बच्चे थे जो अपनी मां के लिए बिलख रहे थे. वहीं, उनकी माएं एक नायलॉन की रस्सी के सहारे किनारे पर पहुंचने की कोशिश कर रही थीं. कुछ बुजुर्गों को जल्दी-जल्दी में नाइट ड्रेस में ही बाहर आना पड़ा था. वो ये बताते हुए रो पड़े कि उन्हें अपनी दवाइयां लेने का भी समय नहीं मिला.
जब मैं अपने होटल वापस पहुंची तो मुझे पता चला कि मैं होटल से नहीं निकल सकती हूं क्योंकि बाढ़ के पानी का स्तर बहुत बढ़ गया है.

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सैंकड़ों बच्चे प्रभावित
चौथे दिन मैं किसी तरह पास के राहत शिविर में गई. यहां मैं मिनी एलदोरा से मिली, एक नौजवान राजनेता जो नेदुम्बसेरी में पंचायत की अध्यक्ष हैं. वो लोगों की हालत के बारे में पूछ रही थीं कि उन्हें खाना मिल पा रहा है या नहीं और क्या किसी को इलाज की जरूरत है.
मिनी एलदोरा ने बताया, ''यहां कई डॉक्टर मौजूद हैं क्योंकि वो अपना घर खो चुके हैं. मैं लोगों को अच्छा खाना और देखभाल उपलब्ध कराने की कोशिश कर रही हूं. लेकिन, मुझे नहीं पता कि नेदुम्बसेरी के सारे लोग बच पाए हैं या नहीं. सैकड़ों बच्चे प्रभावित हैं. मुझे दुख है कि मैं अपनी पंचायत के सभी लोगों को बचा नहीं सकी.''
अब यहां पेट्रोल पंप ढूंढना और बाढ़ के पानी में आगे बढ़ना हमारे लिए मुश्किल हो गया था.

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हाइवे पर नाव
हालांकि, वो दिन आ ही गया जब हम कहीं नहीं जा सके. पांचवे दिन हमारे होटल की पहली मंजिल तक पानी भर आया. बिजली चली गई और फोन लाइन खराब हो गई.
मैं सिर्फ होटल की छत पर जाकर बचाव कार्य देख सकती थी. होटल में जनरेटर की मदद से सुबह और शाम आधे घंट के लिए बिजली आ रही है और उससे मैं किसी तरह अपना मोबाइल चार्ज कर सकती थी.
होटल ने हमारे लिए खाने का इंतजाम किया और आगे भी इंतजाम करने की कोशिश का वादा किया.
होटल से मुझे सुनाई दे रहा है कि बाढ़ पीड़ितों को राहत शिविरों तक पहुंचाने वाले लॉरी ड्राइवरों का लोग हौसला बढ़ा रहे हैं. मूसलाधार बारिश के कारण ड्राइवर खुद रास्ता नहीं देख पा रहे हैं. बाढ़ में फंसे लोग उन्हें रास्ता बता रहे हैं. लोगों को बचाने के लिए कोच्चि हाइवे पर नावें आ चुकी हैं.
छठे दिन यहां पानी ख़त्म हो चुका है. मेरे दिमाग में एक पुरानी कहावत आ रही है, ''हर जगह पानी ही पानी लेकिन पीने को एक बूंद नहीं.''
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