वो आइडिया जिनसे बदल जाएगी दुनिया

इक्सीसवीं सदी में इंसानी वजूद

इक्कीसवीं सदी में हम बहुत सारी मुश्किलें झेल रहे हैं, जो धरती पर हमारे वजूद को चुनौती दे रहे हैं.

सबसे बड़ी चुनौती है बदलती आबो-हवा और बीमारियां. लेकिन ये ऐसी चुनौतियां नहीं हैं जिनका कोई हल नहीं.

बीबीसी लगातार ऐसे आइडिया की तलाश में दुनिया भर के एक्सपर्ट से बात कर रहा है, जो हमें चुनौतियों से निपटने में मदद करेंगे. जो इक्कीसवीं सदी में इंसान की ज़िंदगी और धरती को बेहतर बनाने में जुटे हैं.

पेश हैं ऐसे ही कुछ तजुर्बे, जो इक्कीसवीं सदी में हमारे लिए बेहतर मिसालें पेश कर रहे हैं.

ब्राज़ील के जंगल

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ब्राज़ील के जंगलों से भरपूर ऑक्सीजन

जंगलों की अवैध कटाई पूरी दुनिया में होती है. लैटिन अमरीकी देश ब्राज़ील में काफ़ी घने जंगल हैं. कहा जाता है कि धरती की कुल ऑक्सीजन का 20 फ़ीसदी हिस्सा ब्राज़ील के जंगल पैदा करते हैं. लेकिन यहां बड़े पैमाने पर जंगलों को साफ़ किया जा रहा है. गुज़रे साल में ही यहां जंगलों को साफ़ करके ख़ाली ज़मीन में 29 फ़ीसदी इज़ाफ़ा किया गया.

एक ही साल में इतने बड़े पैमाने पर जंगों की सफ़ाई का ये आंकड़ा आसमान छूने वाला है. इसे रोकने के लिए गूगल अर्थ ने यहां की स्थानीय जनजातियों के साथ मिलकर काम किया, तो उन इलाक़ों की पहचान ज़्यादा आसानी से हुई, जहां अवैध तरीक़े से जंगल काटे जा रहे हैं. ऐसी कोशिशें दूसरे इलाक़ों में भी की जा सकती हैं.

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कबाड़ का व्यापार

दुनिया भर में बहुत तरह का कबाड़ पैदा होता है. लेकिन इस कबाड़ को फिर से इस्तेमाल के लायक़ बनाया जा सकता है. मिसाल के लिए इंडोनेशिया में कबाड़ को रिसाइकिल करके डॉक्टरों के इस्तेमाल में आने वाला सामान तैयार होता है. ये कबाड़ ज़्यादातर ग़रीब देशों से ख़रीदा जाता है. इससे दो फ़ायदे होते हैं. कबाड़ हटने से प्रदूषण ख़त्म हो जाता है. दूसरे ग़रीब देशों की थोड़ी आमदनी हो जाती है.

इटली से हर साल क़रीब 70 हज़ार टन कबाड़ ऑस्ट्रिया आयात करता है, जहां इसे जलाकर बिजली पैदा की जाती है.

प्लास्टिक फ़्री सोसाइटी बनने पर आज सभी का ज़ोर है. लेकिन प्लास्टिक का इस्तेमाल भी ख़ूब होता है. इसका कचरा भी ख़ूब जमा होता है. भारत तो इसका इस्तेमाल करने वाले देशों की फ़ेहरिस्त में सबसे आगे है. यहां से प्लास्टिक का कचरा जमा करके पक्की सड़कें बनाने में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

रोबोट

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इलेक्ट्रॉनिक कचरा बड़ा मसला

इलेक्ट्रॉनिक सामान का कचरा आज सारी दुनिया के लिए एक बड़ा मसला बन गया है. लेकिन इसका भी निदान है. इस कचरे की रिसाइकिलिंग के बजाय ख़राब इलेक्ट्रॉनिक सामान के अलग अलग हिस्सों से नया सामान तैयार कर सकते है.

कचरे का इस्तेमाल रेल का बुनियादी ढांचा तैयार करने में भी किया जा सकता है. रेलवे कार बनाने में अगर पुराने टायर का इस्तेमाल किए जाएं, तो उसकी उम्र बढ़ जाती है. रेल लाइन के प्रति किलो मीटर के लिए करीब 35 टन कचरे का इस्तेमाल हो सकता है.

आज बहुत से काम रोबोट की मदद से किए जा रहे हैं. जानकारों के मुताबिक़ इनका इस्तेमाल बीमारियों की परख में भी किया जा सकता है. किसी भी बीमारी का पता लगाने के लिए बहुत सी जांच कराई जाती हैं. इसमें वक़्त भी बहुत लगता है. लेकिन रोबोट की मदद से बिना किसी जांच के बीमारी की जड़ तक पहुंचा जा सकता है. गूगल एक डच यूनिवर्सिटी की टीम के साथ मिलकर इस दिशा में काम शुरू कर चुकी हैं.

नई तरह की मशीनों का इस्तेमाल करके ज़मीन का उपजाऊपन और फसल ख़राब होने की वजहों का पता लगाया जा सकता है. ज़्यादा से ज़्यादा पैदावार करने के तरीक़ों पर भी इन मशीनों के ज़रिए रिसर्च की जा सकती है. ये नए प्रयोग भुखमरी की लानत से निजात दिलाने में कारगर साबित होंगे.

साइबर सुरक्षा

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साइबर सुरक्षा बड़ी चुनौती

साइबर सुरक्षा आज सभी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है. हैकिंग के ज़रिए संवेदनशील जानकारियां तक चुरा ली गई हैं. रूस ने इसके लिए व्हाइट हैट हैकर्स का ग्रुप तैयार किया है, जो हैकर्स पर नज़र रखेगा.

वीडियो गेम्स बच्चों को बहुत पसंद आते हैं. लेकिन ये इल्ज़ाम भी लगता रहा है कि वीडियो गेम्स बच्चों में हिंसक मिज़ाज की बुनियाद डालते हैं. लेकिन अमरीका इन वीडियो गेम्स का कूटनीतिक इस्तेमाल कर रहा है. बच्चों को इन गेम्स के ज़रिए अंग्रेज़ी भाषा और अमरीका की संस्कृति से रूबरू कराया जा रहा है.

आपने रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर के बारे में तो सुना ही होगा. लेकिन स्विटज़रलैंड में बड़े-बड़े जलाशय साफ़ करने में इनकी मदद ली जा रही है.

मोबाइल का इस्तेमाल आज हर कोई कर रहा है. लिहाज़ा दुनिया भर में बड़े पैमाने पर मोबाइल बनाए जा रहे हैं. मोबाइल बनाने में इस तरह की चीज़ों का इस्तेमाल होता है, जो धरती पर बहुत कम तादाद में मिलती हैं. ब्रिटिश रिसर्चर ऐसी तकनीक खोजने में लगे हैं, जिससे पता लगाया जा सके कि धरती पर इस तरह की धातुएं और कहां-कहां हैं.

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फलों से भरता पेट

हमारा रहन-सहन और धरती का पर्यावरण को सुधारने में वनस्पति विज्ञान की भी मदद ली जा सकती है. किसान कोशिश कर रहे हैं कि वो कम से कम कीटनाशक इस्तेमाल करें. ऐसे तरीक़ों पर भी काम हो रहा है जिसके ज़रिए आम फसलों को खास फसलों के साथ मिलाकर नई पैदावार की जा सके.

एक रिसर्च के मुताबिक़ पौधों की 28 हज़ार ऐसी नस्लें हैं जिनका इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जा सकता है. लेकिन इनका सिर्फ़ 13 फ़ीसद ही इस्तेमाल होता है. चीन ही ऐसा देश है, जो क़ुदरती दवाओं को पूरी ताक़त से बढ़ावा दे रहा है.

एक अंदाज़े के मुताबिक़ 2020 तक चीन इन्ही जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करके 87 फीसद लोगों को सस्ता और अच्छा इलाज मुहैया कराएगा.

अफ्रीकी देश इथियोपिया में एक ऐसा फल होता है, जो अपने आप में पूरा खाना है. इस फल से ही यहां की बहुत बड़ी आबादी का पेट भरता है. ये फल यहां के लोगों के लिए एक तरह का वरदान है.

ऐसे ही फल दुनिया के दूसरे इलाक़ों में भी ज़रूर होते होंगे. थोड़ी रिसर्च की जाए तो सारी दुनिया को इससे फ़ायदा पहुंच सकता है.

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ऑनलाइन होता हर काम

जंगलों में आग लगना भी एक बड़ी चुनौती है. ये आग अपने साथ जंगलों से मिलने वाली बेशक़ीमती चीज़ें भी तबाह कर देती है. रिसर्च करके ऐसे पौधो को पहचान की जा रही है, जिनमें ख़ुद ही आग लग जाती है. ऐसे पौधों को अगर पनपने से रोका जाएगा, तो जंगलों की आग पर बहुत हद तक क़ाबू पाया जा सकेगा.

आज दुनिया तेज़ी से डिजिटाइज़ेशन की तरफ़ बढ़ रही है. छोटे-छोटे बाल्टिक देश तो इस दिशा में काफ़ी आगे बढ़ चुके हैं. एस्तोनिया ने तो अपना नाम ही ई-एस्तोनिया रख लिया है. ये दुनिया का पहला ऐसा देश हैं जहां हरेक काम ऑनलाइन होता है.

अगर सभी देश इसी फार्मूले पर काम करेंगे तो वो दिन दूर नहीं जब आपका देश भी पूरी तरह से डिजिटाइज़ेशन की दुनिया का हिस्सा बन जाएगा. भारत भी अब दिशा में आगे बड़ रहा है. सरकार का डिजिटाइज़ेशन पर काफ़ी ज़ोर है.

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विंड एनर्जी से चलती सभी ट्रेन

नीदरलैंड में लगभग सभी रेलगाड़ियां पवन ऊर्जा से ही चलती हैं. नीदरलैंड्स इस महत्वकांक्षी लक्ष्य को 2018 तक हासिल करना चाहता था लेकिन उसने इस साल की शुरुआत में ही इसे पा लिया.

क़ुदरती संसाधनों के बेजा इस्तेमाल से बचने के लिए बहुत से तरीक़ों पर काम जारी है. यूरोपीय यूनियन हवा और पानी की काई साफ़ करने के लिए सस्ते और आसानी से लगाई जाने वाली मशीन बनाने पर काम कर रहा है.

व्यापार के लिए बड़े-बड़े जहाज़ों का इस्तेमाल होता है. लेकिन ये जहाज़ पर्यावरण के लिए मुफ़ीद नहीं हैं. लिहाज़ा यूरोपीय यूनियन ऐसे जहाज़ बनाने पर विचार कर रहा है जिन्हें बाद में रिसाइकिल किया जा सके. इसके लिए स्टील की जगह फ़ाइबर का इस्तेमाल किया जाएगा.

बढ़ती आबादी एक बड़ा मसला है. जो देश रक़बे के लिहाज़ से छोटे हैं, वहां तो ये मसला और पेचीदा हो जाता है. ज़मीन पर दबाव बढ़ने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों पर भी इसका असर पड़ता है. जापान इस मुश्किल से निपटने के लिए तालाबों और नदियों के ऊपर बड़े-बड़े सोलर प्लांट लगा रहा है.

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नहीं रहेंगे मच्छर

अमरीका के ह्यूस्टन शहर में ऐसे सेंसर लगाए जाने की दिशा में काम हो रहा है जो ज़ीका वायरस फ़ैलाने वाले मच्छरों की पहचान कर उन्हें ख़त्म कर देंगे. माइक्रोसॉफ़्ट इस काम में एक अहम रोल निभा रहा है.

बच्चों को साफ़ सफ़ाई की अहमियत और एड्स जैसी बीमारी के कारण समझाने के लिए कठपुतलियों का बख़ूबी इस्तेमाल किया जा रहा है. दुनिया की क़रीब 40 फ़ीसद आबादी के पास साफ़ शौचालय नहीं हैं. बंगलादेश और भारत में तो लोगों को शौचालय इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा है.

ऐसे शौचालय बनाने और उनका इस्तेमाल करने पर ज़ोर दिया जा रहा है जिससे गंदगी भी ना फ़ैले और ख़र्चा भी कम हो.

मोबाइल का इस्तेमाल आज हर कोई कर रहा है. लंदन की एक कंपनी ने पूर्वी अफ़्रीक़ा में करीब 85 हज़ार सोलर पावर वाली बैटरी बांटे हैं. जिसका इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर लोग एक दूसरे से जुड़े हैं.

हार्ट अटैक

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बीमारियों के इलाज का अनूठा तरीका

बेरोज़गारी ख़त्म करने के लिए भी क़दम उठाए जा रहे हैं. फ़िनलैंड ने एक स्कीम शुरू की है जिसके तहत बेरोज़गार नागरिकों की तलाश करके उन्हें काम दिया जाता है.

लंदन में एक और शुरुआत की गई है, जिसके तहत लोगों को अपना थूक लैब में देने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. इससे ये पता लगाया जा सकेगा कि किस में एंटीबायोटिक से लड़ने की ताक़त सबसे ज़्यादा है. एक हज़ार नमूनों में सिर्फ़ दो ही नमूनों में इससे लड़ने की ताक़त सबसे ज़्यादा पाई गई है.

लिंफ़ोमा और ल्यूकेमिया जैसी बीमारियों का इलाज आसान नहीं है. लेकिन ख़ून की कोशिकाओं में सुधार करके हड्डियों में ही ऐसे सेल पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जिससे इन बीमारियों का सस्ता और टिकाऊ इलाज मुमकिन हो सके.

2035 तक दुनिया की 40 फीसदी आबादी हाईटेक शहरों में रहने लगेगी. इसके लिए हर घंटे में 4 हज़ार हाऊसिंग यूनिट की ज़रूरत पड़ेगी. इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए 3-डी प्रिंटिग का इस्तेमाल किया जा सकता है.

धरती को रहने के लिए एक अच्छा मक़ाम बनाना ज़रूरी है. अगर सभी लोग अपना सहयोग देंगे तो ये काम मुमकिन हो सकता है.

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