जहां मुठ्ठी भर सब्ज़ी के लिए झोले में नोट जाता है

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- Author, मैथ्यू विकेरी
- पदनाम, बीबीसी फ्यूचर
सरकार देश की अर्थव्यवस्था को कैशलेस बनाना चाहती है. डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा दिया जा रहा है. लोगों को नकद लेन-देन से गुरेज करने को कहा जा रहा है. पिछले साल नवंबर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का एलान किया, तो उसका एक मक़सद देश में नकद रहित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना था.
मगर, तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद हमारे देश में नकदी के प्रति लोगों का लगाव कम नहीं हुआ है. नोटों की कमी दूर होते ही नकद लेन-देन कमोबेश वापस उसी स्तर पर पहुंच गया है, जितना 8 नवंबर 2016 से पहले था.
हमारे यहां कैशलेस इकोनॉमी की सरकार की पुरज़ोर कोशिश भी नाकाम है. मगर, एक देश ऐसा भी जहां सरकार के बिना कोशिश किए हुए ही देश कैशलेस होता जा रहा है. ये देश न तो भारत की तरह तेज़ी से बढ़ता हुआ बाज़ार है. न ही तकनीकी क्रांति का गवाह. पर, इस देश के लोग आज 80 फ़ीसद लेन-देन कैशलेस तरीक़े से कर रहे हैं.

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ठेला गाड़ी में लादकर लोग ले जाते हैं नोट
इस देश का नाम है सोमालीलैंड. उत्तरी अफ्रीका में अदन की खाड़ी के क़रीब स्थित सोमालीलैंड 1991 में सोमालिया से अलग होकर नया देश बना था. हालांकि अब तक किसी देश ने इसे मान्यता नहीं दी है. मगर करीब 40 लाख की आबादी वाला ये देश खुदमुख्तार जम्हूरियत का दावा करता है.
सोमालीलैंड बेहद गरीब देश है. यहां से सबसे बड़ा निर्यात ऊंटों का होता है. आधा इलाक़ा रेतीला है. बाक़ी हिस्सा अक्सर सूखे का शिकार रहता है. नतीजा, सोमालीलैंड में भयंकर ग़रीबी है.
यहां की करेंसी शिलिंग है, जिसकी कोई औक़ात नहीं. एक अमरीकी डॉलर के लिए आपको 9 हज़ार शिलिंग के नोट देने होंगे. सोमालीलैंड की शिलिंग के पांच सौ और हज़ार के नोट चलन में हैं. आप को एक सिगरेट भी लेनी होगी, तो पांच सौ या हज़ार का नोट चाहिए होगा. झोला भर सब्ज़ी ख़रीदने के लिए झोला भरकर नोट ले जाने होंगे.
अगर सोमालीलैंड में किसी ने कहीं कोई गहना ख़रीदने की सोची तो उसे ठेला गाड़ी में लादकर शिलिंग के नोट ले जाने होंगे.
आप ये जानकर हैरान होंगे कि यहां पर एक पहिए वाली ठेला गाड़ी ख़ूब चलती है. राजधानी हर्गीशा के बाज़ारों में आप को अक्सर लोग ठेला गाड़ी पर नोट लादकर चलते हुए मिल जाएंगे.
मुद्रा के अवमूल्यन और करेंसी के रद्दी में तब्दील होने की वजह से सोमालीलैंड में ज़्यादातर लोग कैशलेस लेन-देन करते दिखेंगे. आपको सिगरेट लेनी हो, यहां की प्रिय ड्रग खट लेनी हो, या फिर कपड़े-लत्ते. आप हर चीज़ का पेमेंट मोबाइल से कर सकते हैं.
सोमालीलैंड में आपको भिखारी भी मोबाइल से लेन-देन करते दिखेंगे. वजह ये है कि छोटी-मोटी ख़रीदारी के लिए भी आपको झोला भर कर नोट चाहिए. अब इतना पैसा लादकर कोई कहां तक चले? इसलिए सोमालीलैंड में आज अस्सी फ़ीसद कारोबार कैशलेस हो गया है.
चाहे फुटपाथ पर सब्ज़ी और कबाड़ बेचने वाला हो या फिर चमकती दुकानों में बैठे धन्ना सेठ. कहीं भी चले जाएं, सोमालीलैंड में आप को बस अपने मोबाइल से दुकानदार का मोबाइल नंबर और कोड दर्ज करना है. पैसे आपके अकाउंट से दुकानदार के खाते में चले जाएंगे.

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कैशलेस कैसे हों
सोमालीलैंड में दो कंपनियां मोबाइल बैंकिंग की सुविधा दे रही हैं. पहली कंपनी है ज़ाड. वहीं दूसरी का नाम है, ई-दहाब. यही दोनों कंपनियां सोमालीलैंड के नागरिकों को मोबाइल के ज़रिए बैंकिंग की सुविधाएं देती हैं.
सोमालीलैंड में न तो क्रेडिट कार्ड का ज़्यादा चलन है और न ही डेबिट कार्ड का. सिर्फ़ मोबाइल के ज़रिए ही यहां की अर्थव्यवस्था कैशलेस हो गई है. देश के ज़्यादातर नागरिक निरक्षर हैं. मगर बुनियादी फ़ोन सेट के ज़रिए वो भी आसानी से भुगतान कर लेते हैं. बस, लोगों को मोबाइल नंबर और दुकानदार का कोड डायल करना होता है.
राजधानी हर्गीशा में गहने बेचने वाली ईमान अनीस कहती हैं कि ज़्यादा सामान लेना हो तो आप को नोट को ठेला गाड़ी पर लादकर लाना होगा. अब ये काम कोई आसान तो है नहीं. इसीलिए, लोग मोबाइल बैंकिंग पसंद करते हैं. आसान भी है और फटाफट लेन-देन हो भी जाता है.
पिछले दो-तीन साल में ही सोमालीलैंड में मोबाइल से पेमेंट पांच फ़ीसद से बढ़कर क़रीब अस्सी फ़ीसद तक पहुंच गया है. आप को अगर भिखारियों को भी मदद करनी है तो आप मोबाइल से उन्हें पैसे दे सकते हैं.

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सूखे से बदहाल
पिछले कई साल से सोमालीलैंड सूखे का शिकार है. ऐसे में शहरों में काम करने वालों के लिए कैशलेस इकोनॉमी वरदान साबित हो रही है. लोग आसानी से गांव में रहने वाले अपने परिजनों को पैसे भेज पाते हैं. गांवों में भी साठ फ़ीसद से ज़्यादा लोग अब मोबाइल के ज़रिए ही लेन-देन कर रहे हैं.
यहां तक कि कई कंपनियां तो अब मोबाइल से ही तनख़्वाह भी दे रही हैं. सोमालीलैंड में 16 बरस से ज़्यादा की उम्र वाले 88 फ़ीसद लोगों के पास मोबाइल फ़ोन है. उनके लिए फ़ोन अब बातचीत का भी ज़रिया है, और उनका निजी बैंक भी है.
सोमालीलैंड ही नही, अफ्रीका के कई देशों में कैशलेस अर्थव्यवस्था तेज़ी से पैठ बना रही है. घाना, तंज़ानिया, युगांडा में भी मोबाइल बैंकिंग क्रांति आ गई है. इसी तरह केन्या में भी बड़ी तादाद में लोग M-pesa के ज़रिए भुगतान कर रहे हैं.
वैसे कुछ लोग कैशलेस अर्थव्यवस्था से नाराज़ हैं. वो कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग की सुविधा देने वाली निजी कंपनियां जमकर भ्रष्टाचार कर रही हैं. वो कैशलेस नोट छाप रही हैं. इससे महंगाई बढ़ रही है. अर्थव्यवस्था का हाल बदतर होता जा रहा है. ये लोग सोमालीलैंड की सरकार से अपील कर रहे हैं कि वो मोबाइल बैंकिंग करने वाली कंपनियों पर लगाम लगाएं.
अब सोमालीलैंड की मुद्रा यानी शिलिंग की कोई क़ीमत नहीं, तो नोटों की अदला-बदली करने वाले भी परेशान हैं. वो सिर्फ़ डॉलर में नोट बदलते रहे हैं. पर अब मोबाइल पर ही लेन-देन हो जाने की वजह से उनका धंधा भी मंदा पड़ रहा है.
ऐसे ही एक शख़्स हैं सोमालीलैंड की राजधानी हर्गीशा के मुस्तफ़ा हसन. मुस्तफ़ा कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग भ्रष्ट है. इससे काला धन बढ़ रहा है. मुस्तफ़ा कहते हैं कि मोबाइल बैंकिंग के बढ़ते चलन की वजह से कोई भी सोमालीलैंड की करेंगी यानी शिलिंग का इस्तेमाल नहीं कर रहा है. इससे देश का बहुत नुक़सान हो रहा है. हालांकि मुस्तफ़ा भी मानते हैं कि मोबाइल बैंकिंग से लोगों की ज़िंदगी आसान हो गई है.
वहीं, कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें नकद ख़रीदारी ही पसंद है. हर्गीशा के ही रहने वाले अब्दुल्ला कहते हैं कि जेब में मोबाइल होने का मतलब है आपकी जेब में बैंक है. ये चोरी भी हो सकता है. इसीलिए अब्दुल्ला हमेशा नकद लेन-देन ही करते हैं.
अब्दुल्ला कहते हैं कि वो शायद मरते दम तक मोबाइल बैंकिंग का इस्तेमाल न करें.
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