आइंस्टाइन और न्यूटन से क्या सीखना चाहिए?

आइंस्टाइन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, दुनिया भर की महान शख़्सियतों में सबसे ज़्यादा ख़ब्ती शायद मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन थे
    • Author, ज़ारिया गोर्वेट
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

हम महान, क़ाबिल और अक़्लमंद लोगों से बहुत कुछ सीख सकते हैं. उनके काम करने का तरीक़ा और उनकी आदतें ही शायद उन्हें महान बनाती हैं. मगर बहुत से बुद्धिमान लोगों को अजीबो-ग़रीब आदतें भी होती हैं. तो क्या इन्हीं आदतों ने उन्हें इतनी ऊंचाई तक पहुंचाया था?

और क्या मशहूर शख़्सियतों की ऐसी अजीबो-ग़रीब आदतों को सीख कर हम भी उन्हीं की तरह कामयाब हो सकते हैं. पहले आपको कुछ महान शख़्सियतों की ऐसी कुछ आदतों के बारे में बताते हैं. बीसवीं सदी के महान आविष्कारक निकोला टेस्ला हर रात अपने अंगूठों को घुमाने की वर्ज़िश करते थे.

हर पैर के अंगूठे को वो कम से कम सौ बार घुमाते थे. टेस्ला का दावा था कि इससे उनके दिमाग़ की कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं! बीसवीं सदी के महान गणितज्ञ कहे जाने वाले पॉल अर्दोस एम्फेटामाइन नाम के केमिकल की मदद से अंकों की पहेलियां सुलझाते थे.

एक बार एक दोस्त ने पॉल से कहा कि वो एक महीने तक एम्फेटामाइन न लें, तो वो पांच सौ डॉलर देंगे. पॉल ऐसा करने में कामयाब रहे. लेकिन उन्होंने दोस्त से कहा कि उन्होंने गणित को एक महीने पीछे धकेल दिया. इसी तरह महान ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी न्यूटन का अपना ख़ब्त था.

वैज्ञानिकों की आदतें

इमेज स्रोत, Science Photo Library

इमेज कैप्शन, बीसवीं सदी के महान आविष्कारक निकोला टेस्ला हर रात अपने अंगूठों को घुमाने की वर्ज़िश करते थे

न्यूटन की आदतें

वो मानते थे कि इंसान को शादी नहीं करनी चाहिए. सेक्स से दूर रहना चाहिए. माना जाता है कि न्यूटन ने ज़िंदगी भर अपने इस ख़ब्त को निभाया. आज हम न्यूटन के कितने बड़े क़र्ज़दार हैं, बताने की बात नहीं. निकोलस टेस्ला भी ज़िंदगी भर बिना शादी और सेक्स के रहे.

हालांकि बाद में टेस्ला ने दावा किया था कि उन्हें एक कबूतर से मुहब्बत हो गई थी! दुनिया के बहुत से वैज्ञानिकों को ऐसे ख़ब्त रहे हैं. जैसे कि ईसा पूर्व के गणितज्ञ पाइथागोरस को बीन्स के इस्तेमाल से ऐतराज़ था. इसी तरह अमरीकी वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलिन नंगे बदन रहकर एयर बाथ यानी वायु-स्नान किया करते थे.

तो क्या अक़्लमंद लोगों को ऐसे ही ख़ब्त होते हैं? क्या इसी की वजह से वो महानता की पायदान पर इतने ऊंचे दर्जे पर पहुंच पाते हैं? वैज्ञानिक मानते हैं कि किसी के बेहद अक़्लमंद होने की सबसे बड़ी वजह आस-पास का माहौल होता है. रोज़मर्रा की आदतें भी किसी इंसान को महानता की सीढ़ियां चढ़ने में मदद करती हैं.

दुनिया भर की महान शख़्सियतों में सबसे ज़्यादा ख़ब्ती शायद मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटाइन थे. तो क्या हम उनकी अजीबो-ग़रीब आदतों से कुछ सीखकर आइंस्टाइन जैसे बन सकते हैं? चलिए पता लगाने की कोशिश करते हैं.

वैज्ञानिकों की आदतें

इमेज स्रोत, Science Photo Library

अक्लमंद होने की वजह

दस घंटे की नींद और छोटी-छोटी झपकिया- हम सबको मालूम है कि अच्छी नींद हमारे दिमाग़ के बेहतर काम करने के लिए बेहद ज़रूरी है. आइंस्टाइन तो रोज़ाना दस घंटे सोते थे. जबकि आज की तारीख़ में एक अमरीकी औसतन 6.8 घंटे ही सोता है.

मशहूर लेखकर जॉन स्टीनबेक का कहना था कि बहुत सी मुश्किलों का हल रात में सोने से निकल आता है. नींद की कमेटी जब रात में बैठती है, तो मुश्किलों को चुटकियों में हल कर देती है. दुनिया के कई बड़े आविष्कर, विज्ञान की कई थ्योरीज़ सोते वक़्त ही ख़यालों में आईं.

मसलन डीएनए की बनावट या आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ स्पेशल रिलेटिविटी. 2004 में जर्मनी की ल्यूबेक यूनिवर्सिट में कुछ लोगों को एक नंबर गेम सिखाने की कोशिश की गई. जिन लोगों को सोने का मौक़ा दिया गया, उन्होंने ये खेल ज़्यादा आसानी से सीख लिया.

जब हम सोते हैं तो हमारा दिमाग़, हल्की नींद से गहरी नींद तक के कई चक्रों से गुज़रता है. हर डेढ़ से दो घंटे में दिमाग़ में हलचल होती है. जब हम सो रहे होते हैं, तो हमारा दिमाग़ बेहद सक्रिय होता है. हम जितनी ही गहरी नींद लेते हैं, दिमाग़ को उतना ही सक्रिय होने का मौक़ा मिलता है.

आइंस्टाइन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, आइंस्टाइन तो काम करते वक़्त भी झपकियां लेते थे, वो हाथ में चम्मच लेकर आराम कुर्सी पर लुढ़क जाते थे

दिमाग की सक्रियता

दिमाग़ का एक हिस्सा जिसे थैलेमस कहते हैं, वो स्विचिंग सेंटर की तरह काम करता है. जो तरह-तरह के सिग्नल हमारे दिमाग़ के अलग-अलग हिस्सों को भेजता है. इसकी मदद से ही हम ठीक से सो पाते हैं. जिन लोगों का दिमाग़ सोते वक़्त ज़्यादा सक्रिय होता है, उनके बारे में कहा जा सकता है कि वो ज़्यादा अक़्लमंद होते हैं.

अब ये साफ़ नहीं है कि सोते वक़्त दिमाग़ की सक्रियता की वजह वो ज़्यादा अक़्लमंद हुए. या फिर वो अक़्लमंद हैं, इस वजह से सोते वक़्त उनका दिमाग़ ज़्यादा सक्रिय रहता है. आइंस्टाइन तो काम करते वक़्त भी झपकियां लेते थे. वो हाथ में चम्मच लेकर आराम कुर्सी पर लुढ़क जाते थे. नीचे वो थाली रखते थे.

ताकि सोने पर जब चम्मच उनके हाथ से छूटे तो थाली पर गिरे. इसकी आवाज़ से वो जाग जाते थे. रोज़ाना की सैर- आइंस्टाइन रोज़ाना टहलने के लिए जाया करते थे. जब वो न्यू जर्सी की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में काम कर रहे थे, तो रोज़ाना वो डेढ़ मील की पैदल सैर पर जाते थे.

मशहूर जीव वैज्ञानिक डार्विन भी रोज़ाना 45 मिनट तक टहला करते थे. अब इसके क्या फ़ायदे हैं? टहलना सिर्फ़ सेहत के लिए फ़ायदेमंद नहीं. इससे याददाश्त बेहतर होती है. क्रिएटिव होने के लिए खुली हवा में टहलना बहुत कारगर होता है. लेकिन ऐसा क्यों है भला?

आइंस्टाइन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, क्या हम उनकी अजीबो-ग़रीब आदतों से कुछ सीखकर आइंस्टाइन जैसे बन सकते हैं

बेहतर याददाश्त

ऊपरी तौर पर तो ऐसा लगता है कि टहलने से दिमाग़ सोचने का काम ठीक से नहीं कर पाता. उसे टहलने के दौरान संतुलन बनाए रखने में ध्यान लगाना पड़ता है. लेकिन असल में होता ये है कि टहलने के दौरान दिमाग़ के कुछ हिस्से आराम करने लगते हैं.

दिमाग़ इस दौरान सोचने के लिए एकदम नया तरीक़ा अपनाता है. दिमाग़ के जिस हिस्से की मदद से हमारी याददाश्त बेहतर होती है. हम फ़ैसले ले पाते हैं और ज़बान को समझ पाते हैं, वो अपनी सक्रियता थोड़ी कम कर देते हैं. इस दौरान हम गहरी सोच के दौर से गुज़रते हैं. दिमाग़ ये काम डेस्क पर बैठे हुए नहीं कर पाता.

स्फैगेट्टी खाना- आख़िर तेज़ दिमाग़ लोग खाते क्या हैं? आइंस्टाइन के बारे में कहा जाता है कि उन्हें स्फैगेट्टी बहुत पसंद थी. असल में हमारे दिमाग़ को काम करने के लिए ढेर सारी एनर्जी चाहिए. दिमाग़ का वज़न हमारे शरीर के कुल वज़न का दो फ़ीसद ही होता है.

मगर वो शरीर की कुल एनर्जी का बीस फ़ीसद चट कर जाता है. दिमाग़ को आसानी से मिलने वाली उर्जा चाहिए, और लगातार चाहिए. आज कार्बोहाइड्रेट के ज़्यादा इस्तेमाल से बचने की सलाह दी जाती है. मगर इंसान के दिमाग़ का ये सबसे पसंदीदा एनर्जी का सोर्स है.

आइंस्टाइन

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ये बात आइंस्टाइन की मौत के सात साल बाद दुनिया को पता चली कि तंबाकू का कैंसर से गहरा नाता है

केमिकल की मदद

दिमाग़ ग्लूकोज़ जैसे आसानी से उर्जा देने वाली चीज़ों को ज़्यादा पसंद करता है. ग्लूकोज़ जैसे कार्बोहाइड्रेट के सिवा उर्जा के किसी और स्रोत जैसे प्रोटीन को दिमाग़ तभी इस्तेमाल करता है जब उसे एनर्जी की सख़्त ज़रूरत होती है.

इंसान का शरीर अपनी एनर्जी की ज़रूरत का एक हिस्सा वसा या फैट के तौर पर बचाकर रखता है. मगर दिमाग़ को बचत जैसी चीज़ पर यक़ीन नहीं. इसीलिए कई बार होता ये है कि दिमाग़ को अचानक ही बहुत ज़्यादा एनर्जी की ज़रूरत हो जाती है.

ऐसी सूरत में शरीर के दूसरे हिस्सों से ग्लायकोजेन जैसे केमिकल की मदद से वो अपनी ये ज़रूरत पूरी करता है. अक्सर जब हम खाना नहीं खाते तो हमारा दिमाग़ चकराने लगता है. ऐसा इसीलिए होता है कि दिमाग़ को ज़रूरी एनर्जी नहीं मिलती, तो वो बेसब्र हो जाता है.

उसे फ़ौरन कुछ खाने को चाहिए होता है. ऐसी हालत में हम अक्सर ठीक से सोच नहीं पाते. ऐसे मौक़ों पर चीनी हमारे दिमाग़ को फ़ौरी राहत देती है. लेकिन हमारे कहने का ये मतलब नहीं कि आप स्फैगेट्टी या कार्बोहाइड्रेट से भरे दूसरे व्यंजन छककर खाना शुरू कर दें.

वीडियो कैप्शन, भविष्य के वैक्सीन की खोज

तंबाकू का कैंसर से नाता

हमें अपने दिमाग़ को इस बात के लिए राज़ी करना होगा कि वो शुगर के अलावा दूसरी चीज़ों से भी एनर्जी हासिल करे. थोड़े वक़्त की कोशिशों के बाद दिमाग़ को एनर्जी के दूसरे सोर्स की आदत हो जाती है. तंबाकू पीना- आइंस्टाइन सिगार के शौक़ीन थे.

वो यूनिवर्सिटी कैंपस में अक्सर धुएं के छल्ले उड़ाते चलते थे. तो क्या उनके महान होने की एक वजह से उनका धूम्रपान करना भी थी? इस बात को पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता. हालांकि आइंस्टाइन तो सड़क पर पड़े हुए सिगरेट के टुकड़े उठाकर भी उनके तंबाकू को अपने सिगार में भर लेते थे.

लेकिन ये बात चालीस और पचास के दशक की थी, तब दुनिया को ये मालूम नहीं था कि तंबाकू का कैंसर से गहरा नाता है. ये बात आइंस्टाइन की मौत के सात साल बाद दुनिया को पता चली. आज हम सब जानते हैं कि स्मोकिंग सेहत के लिए कितनी नुक़सानदेह है. फेफड़ों के कैंसर से इसका सीधा ताल्लुक़ है.

साथ ही स्मोकिंग की वजह से दिमाग़ में नई कोशिकाएं बननी बंद हो जाती हैं. दिमाग़ का एक हिस्सा यानी कोर्टेक्स पतला हो जाता है. स्मोकिंग से दिमाग़ को ठीक से ऑक्सीजन नहीं मिल पाती. मगर एक हैरानी भरा रिसर्च भी है.

वीडियो कैप्शन, खारा पानी बनेगा पीने लायक

धूम्रपान की लत

अमरीका में क़रीब बीस हज़ार किशोरों पर हुए सर्वे के मुताबिक़ जिन लोगों को धूम्रपान की लत थी, वो पंद्रह साल बाद ज़्यादा अक़्लमंद इंसान बने. हालांकि ब्रिटेन में हुए एक सर्वे के मुताबिक़, स्मोकिंग करने वालों का आईक्यू कम होता है. बिना मोजों के रहना- आइंस्टाइन की तमाम सनकों में से एक था उनका जुराबें न पहनना.

उन्होंने बताया था कि अक्सर उनके मोजे अंगूठे के पास से फट जाते थे. इसका हल उन्होंने ये निकाला कि मोजे पहनना ही बंद कर दिया. अब अक़्लमंदी में इस बात का कितना रोल होता है, इस पर रिसर्च होनी बाक़ी है.

हां एक रिसर्च से ये ज़रूर पता चला है कि जो लोग फॉर्मल के बजाय कैज़ुअल पहनकर टेस्ट देने जाते हैं, उनकी नाकामी की आशंका ज़्यादा रहती है. हालांकि ख़ुद आइंस्टाइन की नज़र में अक़्लमंद होने का सबसे बड़ा नुस्खा है सवाल करते रहना. वो कहते थे कि इंसान को सवाल पूछने नहीं बंद करने चाहिए.

तो साहब, ये वो ख़ब्त हैं जो आइंस्टाइन को थे. अब आपको लगता है कि इनमें से कुछ आदतें अपनाकर आप उन जैसे महान बन सकते हैं, तो कोशिश करके देख लें. हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं.

(बीबीसी फ़्यूचर पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी फ़्यूचर कोफ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)