दिमाग़ के दान की अपील कर रहे हैं वैज्ञानिक

वैज्ञानिकों ने कहा है कि लोग अपनी मौत के बाद रिसर्च के लिए दिमाग़ का दान करें.
वैज्ञानिकों का कहना है कि उनके पास अवसाद और आघात से उभरे तनाव के शिकार लोगों के दिमाग़ नहीं हैं जिससे शोध प्रभावित हो रहा है.
वो वैसे मस्तिष्क की बात कर रहे हैं तो 'पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर' के शिकार हुए हों.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इसी वजह है कि लोग ये समझ ही नहीं पाते हैं कि इस तरह की बीमारी ब्रेन वायरिंग यानी मस्तिष्क संरचना में बदलाव की वजह से होती है.
वो कहते हैं कि मनुष्य का मस्तिष्क एक बेहद ख़ूबसूरत लेकिन एक जटिल संरचना है. इसमें वैसे ही विकास और बदलाव होते हैं जैसे जैसे हममें बदलाव और विकास होता है. हमारे शरीर का यह अंग हमारे व्यवहार और सोच की भौतिक उपस्थिति है.
हाल के वर्षों में शोधकर्ताओं ने दिमाग़ के आकार और मानसिक और तंत्रिका संबंधी रोगों के बीच लिंक (संबंध) खोजा है.

दुनिया के सबसे बड़े ब्रेन बैंकों में से एक है बोस्टन स्थित मैकलीन अस्पताल, जहां तीन हज़ार से ज़्यादा मस्तिष्क संरक्षित हैं.
इसमें से अधिकांश सैंपल मानसिक और तंत्रिका संबंधी विकारों वाले हैं. लेकिन इसके बावजूद वैज्ञानिकों का मानना है कि यह सैंपल शोध के लिए काफी नहीं हैं.
इसीलिए दुनिया भर के वैज्ञानिक अपील कर रहे हैं कि पार्किंसन, अलज़ाइमर समेत सभी मानसिक विकारों के नए इलाजों की ईजाद के लिए लोग दिमाग़ दान करें.
मैकलीन अस्पताल के प्रमुख वैज्ञानिक अधिकारी डाक्टर कैरी रैसलेर के मुताबिक, ''कई मानसिक और तंत्रिका संबंधी रोगों के नए ईलाज वैज्ञानिकों की पकड़ में आ चुके हैं लेकिन ब्रेन टिशू की कमी के चलते इनका विकास रूका हुआ है.''

प्रो. सबीना के अनुसार, "अगर लोगों सोचते हैं कि कि जिन्हें कोई मानसिक रोग नहीं है उन्हें इसके दान करने की क्यों ज़रूरत है तो उनकी सोच जीव विज्ञान के दृष्टीकोण से ग़लत है.'













