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बीमारी होने से पहले ही चेता देगी तकनीक
- Author, लियाह केमिंस्की
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
ख़ुशनुमा दिन था. चटख़ धूप खिली हुई थी. हवा से बसंत की आमद का पैग़ाम मिल रहा था.
मैं, मेलबर्न में अपनी मरीज़ एंजेला (काल्पनिक नाम-असली नाम पहचान छुपाने की ग़र्ज़ से नहीं बताया जा रहा) को गलियारे से अपने कमरे की तरफ़ जाते देख रही थी.
एंजेला कई साल से मेरी मरीज़ थी. लेकिन, उस सुबह मैंने महसूस किया कि चलते वक़्त उसके पैर कांप रहे थे. उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था.
ऐसा लग रहा था कि चलते वक़्त उसके चेहरे पर एक झटका सा लगने का एहसास दिख रहा था. तब, मैंने एंजेला को एक न्यूरोलॉजिस्ट के पास जाने की सलाह दी.
एक हफ़्ते के भीतर ही एंजेला का पार्किंसन्स की बीमारी का इलाज चलने लगा. मैंने, ख़ुद को बहुत कोसा कि मैं एंजेला की इस बीमारी को पहले क्यों नहीं भांप सकी.
अफ़सोस की बात ये है कि मरीज़ों के साथ ऐसा पूरी दुनिया में होता है.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस
ये बड़ी आम सी बात हो गई है. उनके मर्ज़ का पता तभी लग पाता है, जब उनमें किसी बीमारी के लक्षण साफ़ दिखने लगें.
शरीर के संकेत डॉक्टरों को आगाह करते हैं कि कुछ गड़बड़ है.
अगर कुछ ऐसा हो कि मर्ज़ को पहले ही भांप लिया जाए, तो मरीज़ों को जल्द इलाज देकर बहुत सी तकलीफ़ों से बचाया जा सकता है.
उनके मर्ज़ को और बिगड़ने से भी रोका जा सकता है. अब नई तकनीक से इस बात की उम्मीद बंधने लगी है.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से मरीज़ों और डॉक्टरों को आने वाले वक़्त में सेहत बिगड़ने के अंदेशे से आगाह किया जा सकता है.
कई बार तो मर्ज़ की चेतावनी कई साल पहले भी दी जा सकती है. रॉस डॉसन पेशे से फ्यूचर एक्सप्लोरेशन नेटवर्क के भविष्यद्रष्टा हैं.
स्वास्थ्य की देख-रेख
रॉस डॉसन कहते हैं, "भविष्यवाणी करते हैं कि स्वास्थ्य की देख-रेख का मौजूदा सिस्टम बदलने वाला है. अभी हम बीमारी होने पर उसका इलाज करते हैं."
"पर, वक़्त ऐसा आने वाला है जब संभावित बीमारी के प्रति पहले ही आगाह कर दिया जाएगा और हो सकता है कि उस बीमारी को विकसित होने से ही रोक दिया जाए."
"आज लोग लंबी उम्र जीना चाहते हैं. सेहतमंद रहना चाहते हैं. आज हमारे मेडिकल केयर सिस्टम से और बेहतर इलाज की उम्मीद की जा रही है."
"इस अपेक्षा की वजह से ही इलाज के तौर-तरीक़ों में बदलाव आ रहा है."
आज आंकड़ों के एल्गोरिद्म और नई तकनीक की मदद से आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमें ये बता सकता है कि आने वाले वक़्त में हम किस बीमारी के शिकार हो सकते हैं.
हमारे शरीर में आने वाले बारीक़ बदलावों को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस किसी डॉक्टर के मुक़ाबले बहुत पहले से पकड़ सकता है.
दिल के धड़कने की रफ़्तार
इन शारीरिक संकेतों की मदद से मर्ज़ के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है. आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से आज दिल के धड़कने की रफ़्तार मापी जा सकती है.
इससे सांस लेने की प्रक्रिया, शरीर की चाल-फेर और हमारी सांसों में मौजूद केमिकल तक की निगरानी की जा सकती है.
फिर इनके आधार पर नई तकनीक, हमें किसी होने वाली बीमारी के प्रति आगाह कर सकती है.
इसके लिए हमें किसी बीमारी के लक्षण दिखने तक का इंतज़ार करने का जोखिम लेने ज़रूरत नहीं रहेगी.
ऐसा होने की सूरत में डॉक्टर हमें सावधान कर सकेंगे कि हम अपने रहन-सहन में क्या बदलाव लाएं, जिससे वो बीमारी हो ही नहीं.
सबसे ज़्यादा हौसला बढ़ाने वाली बात ये है कि नई तकनीक, हमारे शरीर के उन संकेतों को भी पढ़ सकती है, जो आम डॉक्टर की निगाह में नहीं आ पाते.
आपकी सेहत की झांकी
बहुत से ऐसे संकेत होते हैं, जिनके ज़रिए हमारा शरीर हमें सावधान करता है कि सुधर जाओ, वरना ये बीमारी हो सकती है.
रॉस डॉसन इसके लिए कई रिसर्च का हवाला देते हैं, जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से की गई हैं.
हम अपने पल्स रेट की लगातार निगरानी कर के ये पता लगा सकते हैं कि कहीं हम दिल के दौरे के शिकार तो नहीं होने वाले.
एक ऐसे रिसर्च से पल्स रेट में कुछ ऐसे बदलाव पकड़े गए, जो दिल के डॉक्टर तक नहीं पकड़ पाए थे. गूगल की तरफ़ से हाल ही में एक रिसर्च की गई.
इस में पाया गया कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से जुटाए गए आंकड़ों की मदद से ये बताया जा सकता है कि किसी को दिल का दौरा पड़ सकता है.
गूगल की रिसर्च टीम ने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को इस बात की ट्रेनिंग दी कि वो लोगों के रेटिना को स्कैन करे.
रोज़मर्रा के बर्ताव की निगरानी
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस वाली मशीन ने 2 लाख 84 हज़ार 335 मरीज़ों की आंखों के रेटिना स्कैन किए. रेटिना में जो ख़ून की नलियां होती हैं.
उनकी बारीक़ी से पड़ताल कर के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मशीन ने जाना कि किसी दिल के मर्ज़ का संकेत वहां से कैसे मिल सकता है.
सीरियाई मूल की अमरीकी वैज्ञानिक दीना कताबी इस कोशिश में जुटी हैं कि नई तकनीक हमें वक़्त से पहले ही पार्किंसन्स, डिप्रेशन जैसी बीमारियों के प्रति आगाह कर दे.
शारीरिक तकलीफ़ों की इस फेहरिस्त में एफिसेमा, हृदय रोग और डिमेंशिया जैसी बीमारियां भी शामिल हैं.
दीना ने एक ऐसी मशीन बना ली है, जो किसी घर में हल्की तरंगे छोड़ती है.
ये चुंबकीय तरंगें, उस घर में रहने वालों के शरीर पर पड़ती हैं, तो उससे मिले संकेत, वापस मशीन को भेजती हैं.
हालात बयां कर सकती है...
इस मशीन के ज़रिए कताबी, उस घर के लोगों के शरीर में आ रहे मामूली से मामूली बदलावों को भी नोटिस कर सकती हैं.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से चलने वाली ये मशीन, दीवारों के पार भी लोगों की हरकतों पर नज़र रखती है.
इन वायरलेस संकेतों से दीना कताबी को किसी घर में रहने वालों की तमाम आदतों, नींद लेने के तरीक़ों और शरीर के हाव-भाव की बारीक़ से बारीक़ जानकारी मिल जाती है.
ये मशीन एक साथ कई कमरों में रहने वालों के ऊपर निगाह रख सकती है. अगर कोई इंसान गिर जाता है, तो ये मशीन उसका इशारा कर देती है.
दीना कताबी की ये आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस से लैस मशीन लोगों की दिल की धड़कनों के संकेत से उनके जज़्बाती हालात बयां कर सकती है.
धड़कनों का हिसाब-किताब
दीना कहती हैं, "हमें अपने शरीर के संकेत नंगी आंखों से नहीं दिखते. लेकिन ये चुंबकीय किरणें, हर छुपे हुए इशारे को पकड़ लेती है."
"ये मशीन दीवारों के पार जाकर भी किसी इंसान के शरीर से अहम जानकारियां जुटा लेती है. बारीक़ बदलाव भी इसकी तरंगों से नहीं बचते."
तो, इसका फ़ायदा ये है कि अगर किसी इंसान को कोई बीमारी होने वाली है, तो ये मशीन शरीर में आने वाले बदलावों से काफ़ी पहले ही बीमारी के संकेत दे देगी.
हम में से बहुत से लोग आज ऐसे ऐप या मशीनें इस्तेमाल करते हैं, जो हमारी चाल-फेर से लेकर दिल की धड़कनों का हिसाब-किताब रखती हैं.
इनसे जुटाए गए आंकड़ों की समीक्षा कर के आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमें किसी भी होने वाली बीमारी के प्रति आगाह कर सकता है.
जैसे-जैसे दुनिया की आबादी उम्रदराज़ हो रही है, वैसे-वैसे हमें ऐसी तकनीक की मदद लेनी होगी.
बुज़ुर्गों की मदद
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ 2050 तक दुनिया की कुल आबादी के 20 फ़ीसद लोग 60 साल से ज़्यादा उम्र के होंगे.
दीना कहती हैं, "आज बड़ी तादाद में उम्रदराज़ लोग अकेले रहते हैं, उनकी देख-भाल करने वाला कई नहीं होता. उनकी सुरक्षा की फ़िक्र होती है."
"ऐसे में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इन बुज़ुर्गों की मदद कर सकता है. इस मशीन से बुज़ुर्गों को होने वाली किसी बीमारी के संकेत पहले पता चल जाएंगे."
"तो उनका बेहतर इलाज हो सकेगा. या बीमारी के शिकंजे से ही बचा जा सकेगा."
नई रिसर्च बताती है कि आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमारे चेहरे पर आने वाले मामूली बदलावों से होने वाली बीमारी का पता लगा सकता है.
अमरीका की स्टार्ट अप कंपनी एफडीएनए ने एक ऐप विकसित किया है, जिसका नाम है-फेस2जीन. ये ऐप संभावित जेनेटिक बीमारियों का पता पहले लगा सकता है.
शक्ल से पता चलेगी बीमारी
ये ऐप आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस तकनीक का इस्तेमाल करता है. लोगों के चेहरे की पड़ताल से ये जेनेटिक बीमारियों के बारे में बता सकता है.
इस ऐप को 17 हज़ार से ज़्यादा लोगों के जेनेटिक डिसऑर्डर से जुड़े डेटा की मदद से ट्रेनिंग दी गई है.
फेस2जीन ऐप ने अब तक जितने लोगों की बीमारियों की भविष्यवाणी की है, उनमें से 91 प्रतिशत सही पायी गई हैं.
अब जेनेटिक बीमारियों के बारे में पहले से पता चलने पर, इनका इलाज समय पर हो सकता है. सभी बीमारियों के संकेत शरीर के बाहरी हिस्सों से ही नहीं मिलते.
इसीलिए तो कई दशकों से डॉक्टर एक्सरे से लेकर एमआरआई स्कैन तक का इस्तेमाल कर के बीमारी के बारे में पता लगाते हैं.
आपके दिमाग़ की निगरानी
अमरीका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के रेडियोलॉजिस्ट बेन फ्रैंक बरसों तक ऐसा करते रहे हैं.
उन्होंने अब तमाम स्कैन को इकट्ठा कर के उनसे मिलने वाले दूसरी बीमारियों के संकेत ढूंढने का बीड़ा उठाया है.
आम तौर पर पीईटी स्कैन की मदद से डॉक्टर शरीर के भीतर मौजूद कैंसर के ट्यूमर का पता लगाते हैं.
लेकिन, शरीर के भीतर की इन तस्वीरों में लोगों के और भी राज़ छुपे होते हैं, जिनकी अनदेखी की जाती है. बेन फ्रैंक ने एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है.
इसके तहत वो अपनी टीम के साथ इन पीईटी स्कैन में दूसरी बीमारियों के संकेत ढूंढ रहे हैं. क्या इन स्कैन में दिमाग़ के भीतर होने वाले बदलावों के संकेत मिल सकते हैं?
क्या इनसे ये पता लगाया जा सकता है कि किसी को 65 साल की उम्र में अल्झाइमर की बीमारी होने का ख़तरा है.
भविष्य में होने वाली बीमारियां
इन बेकार पड़े पीईटी स्कैन की मदद से ऐसे एल्गोरिद्म तैयार किए जा रहे हैं, जिनकी समीक्षा कर के बेन फ्रैंक की टीम दूसरी बीमारियों के संकेत निकालेगी.
जैसे कि अगर ज़हन के किसी हिस्से में ग्लूकोज़ की खपत ज़्यादा दिख रही है, तो उसका क्या मतलब हो सकता है.
क़रीब 40 मरीज़ों के पीईटी स्कैन की मदद से बेन की टीम ने कई लोगों को 6 साल पहले ही आगाह कर दिया कि उन्हें अल्झाइमर की बीमारी होने वाली है.
बेन फ्रैंक के इस पायलट प्रोजेक्ट से उम्मीद जगी है कि लोगों के दिमाग़ के स्कैन से उन्हें भविष्य में होने वाली बीमारियों का पता कई साल पहले ही लगाया जा सकता है.
बेन फ्रैंक कहते हैं, "कंप्यूटर किन्हीं दो चीज़ों के बीच रिश्ता चुटकी बजाते खोज सकते हैं. यही काम करने में इंसान की पूरी उम्र खप जाती है."
"ऐसे में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस हमें मौक़ा देता है कि हम उसे लाखों मरीज़ों के आंकड़े दिखाकर, उनमें से बीमारी के लक्षण पहचानना सिखा दें."
"अगर मर्ज़ का पता पहले चल जाएगा, तो मरीज़ों को समय से पहले असरदार इलाज मिल सकेगा."
बोलने के अंदाज़ में भी छुपे हैं कई राज़
एमआरआई और पीईटी स्कैन से सिर्फ़ अल्झाइमर नहीं, बल्कि दूसरी बीमारियों के संकेत तलाशे जा सकते हैं.
स्कैन और तस्वीरों से हमें बीमारियों के संकेत मिलते हैं. फिर भी हमारी दिमाग़ी सेहत से जुड़ी जानकारी इनसे निकालना ज़रा मुश्किल है.
दुनिया भर में दिमाग़ी बीमारियां बढ़ रही हैं. आज दुनिया की 25 प्रतिशत आबादी किसी न किसी ज़हनी बीमारी से जूझ रही है. कई देशों में तो हालात बहुत बिगड़ गए हैं.
ये विकलांगता के पीछे बहुत बड़ा कारण है. इस चुनौती से निपटने में भी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस मददगार हो सकता है. हम लोग जब बोलते हैं, तो ख़ास अंदाज़ होता है.
कुछ शब्दों का चुनाव हमारी ज़हनी हालत की तरफ़ इशारा करता है.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को हज़ारों लोगों के बात करने के अंदाज़ के आंकड़े दिए जाएं, तो उसमें से वो बीमारी के लक्षण खोज सकने में सक्षम है.
डिप्रेशन के शिकार
इसकी मिसाल है, एली नाम की वर्चुअल डॉक्टर. इसे अमरीका कि सदर्न कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में विकसित किया जा सकता है.
ये वर्चुअल डॉक्टर किसी मरीज़ के चेहरे के 60 हिस्सों से ऐसे संकेत पकड़ सकता है, जो उसके डिप्रेशन के शिकार होने या दूसरी दिमाग़ी बीमारी होने का इशारा करते हैं.
कोई इंसान बोलने से पहले कितनी देर रुक कर सोचता है. वो बैठता कैसे है. और कितनी बार सिर हिलाता है.
इन सब आंकड़ों की मदद से एली किसी व्यक्ति की दिमाग़ी हालत बता सकता है. दुनिया भर में मनोवैज्ञानिकों की भारी कमी है.
कई बार वो उस वक़्त नहीं मिल पाते, जब किसी को उनकी सलाह की ज़रूरत होती है. ऐसे में एली जैसे वर्चुअल डॉक्टर लोगों के लिए मसीहा साबित हो सकते हैं.
अब तो ऐसे बॉट्स विकसित किए जा चुके हैं, जो इंसानों से किसी आम इंसान की तरह ही बात करते हैं. ऐसे ही एक बॉट-वाईसा को विकसित किया गया है.
मुश्किल फ़ैसले
वाइसा की सहायता से लोगों की ज़हनी कैफ़ियत को मज़बूती दी जा सकती है. ये बॉट लोगों से मुश्किल सवाल कर के उनकी दिमाग़ी हालत का पता लगाता है.
फिर थेरेपिस्ट उस इंसान की मदद करते हैं. अब ये सभी तकनीकें मिलकर अगर काम करेंगी, तो किसी इंसान की भविष्य की सेहत की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है.
मौजूदा मेडिकल साइंस आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के आगे बौनी साबित होगी. किसी डॉक्टर के पास रूटीन चेक-अप के लिए जाना, प्रागैतिहासिक काल की घटना बन जाएगा.
सवाल ये है कि हम अपनी सेहत को किस हद तक किसी मशीन के हवाले करने को तैयार हैं? मशीनें तो संवेदनाओं से परे होती हैं. उनके अंदर एहसास नहीं होते.
उनके लिए किसी भी इंसान से जुड़ी जानकारी महज़ एक आंकड़ा है. एक एल्गोरिद्म है.
कंप्यूटर से उम्मीद
तो, शायद आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के दौर में भी हम बीमार होने पर अपने पास एक हमदर्दी रखने वाले डॉक्टर की ज़रूरत महसूस करें.
लेकिन, ये तय है कि इस डॉक्टर की ज़रूरत ही न पड़े, ऐसी सूरत आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से बन सकती है.
कुल मिलाकर, हम किसी कंप्यूटर से ये उम्मीद भले न करें कि वो कुछ महसूस करे.
पर हम उससे ये तो जान ही सकते हैं कि हम जो महसूस कर रहे हैं, क्या उस में कोई राज़ छुपा है.
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