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गुफा से निकाले गए बच्चों को हो सकती है यह बीमारी
- Author, ज़ारिया गोरवेट
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
थाईलैंड की गहरी गुफा में फंसे 12 लड़के और उनके कोच को तमाम चुनौतियों के बावजूद निकाल लिया गया. गहरी गुफा में उछलते-कूदते, पानी में तैरते-डुबकी मारते गोताखोरों ने सभी 13 लोगों को बहुत चुनौती भरे ऑपरेशन के बाद सुरक्षित निकाल लिया. विशाल सुरंगों वाली इस गुफा में ये 13 लोग 17 दिनों तक फंसे रहे थे.
अब इन सभी लोगों को पास के ही चियांग राय अस्पताल में रखा गया है. बच्चों के मां-बाप और परिजन उनसे मिलने को बेक़रार हैं. मगर अभी डॉक्टर उन्हें बच्चों से नहीं मिलने दे रहे हैं. इस फुटबॉल टीम को एकदम अलग रखा गया है.
मां-बाप अपने बच्चों को दूर से ही शीशे के पार देख सकते हैं. परिजनों को बता दिया गया है कि अभी बच्चों को गले लगाने या छूने की तो वो सोचें भी नहीं. जब उन्हें इजाज़त मिलेगी भी, तो मां-बाप को बच्चों से दो मीटर की दूरी पर खड़े होकर मिलने की मंज़ूरी ही मिल सकेगी. उसमें भी उन्हें बीमारियों से बचाने वाले जैकेट और मास्क पहनने होंगे.
क्यों इतनी एहतियात बरती जा रही?
आख़िर इतने दिनों बाद गुफा से निकाले गए बच्चों को लेकर इतनी एहतियात क्यों बरती जा रही है?
यूं तो थाईलैंड की थाम लुआंग में स्थित गुफाओं के इस जाल को देखने हज़ारों लोग हर साल आते हैं, इसकी छतों से लटकते बर्फ़ीले जाले और दरारों से आती सूरज की किरणें जब भगवान बुद्ध की मूर्ति पर पड़ती हैं, तो जन्नत सरीख़ा एहसास होता है. लेकिन गुफा के भीतर जितना ही जाएंगे, उतना ही ये अच्छा एहसास कम होता जाएगा.
दुनिया भर में गर्म इलाक़ों में पायी जाने वाली ऐसी गुफाएं बेहद ख़तरनाक बीमारियों का अड्डा होती हैं.
इन गुफाओं में एक से एक जीव रहते हैं. इनमें परिंदे, चमगादड़ और चूहे तो होते ही हैं, जो कीटाणुओं के वाहक होते हैं. ये कीटाणु और विषाणु रेबीज़, मारबर्ग और इन्फ़ेक्शन वाले होते हैं. आप गुफा में जैसे-जैसे गहराई में जाएंगे आपका सामना ज़हरीली मकड़ियों, छोटे जीवों और घातक बिच्छुओं से भी होता है. इन जीवों का ख़ून पीकर बसर करने वाले खटमल केव फ़ीवर के कीटाणु लिए फिरते हैं.
घातक मधुमक्खियां
अमरीका के रिक मर्कर नेशनल एसोसिएशन ऑफ़ केव डाइविंग के अध्यक्ष हैं. ये संगठन गुफा के भीतर गोताखोरों की सुरक्षा के लिए काम करता है. रिक कहते हैं कि गुफा के अंदर बहुत सारे जीव मिलते हैं. वो मेक्सिको की एक गुफा का अपना तजुर्बा बताते हैं. उस गुफा के अंदर रिक को प्राणघातक अफ्रीकी मधुमक्खियों का छत्ता मिला था. गुफा में चमगादड़, बिच्छू और दूसरे कई तरह के जीव थे. रिक कहते हैं कि ये सारे जीव तो गुफा के मुहाने पर ही थे. अंदर की दुनिया तो और भी खतरनाक होती है. बैक्टीरिया का ख़याल तो बहुत बाद में आता है.
गुफाओं के अंदर अक्सर पानी भरा होता है. चूने के पत्थर वाली गुफाओं से अक्सर पानी रिसता रहता है. इसकी वजह से काफी नमी होती है. इस नमी में ज़हरीले फफूंद पनपते हैं. वहीं, सतह पर कीचड़, जानवरों का मल और बैक्टीरिया मिलकर एक घातक माहौल तैयार कर देते हैं.
गहरी गुफाओं में इतना अंधेरा होता है कि कई जीवों की तो आंखें ही ख़त्म हो चुकी हैं. कई बार अंतरिक्ष यात्रियों को गुफाओं में ले जाया जाता है, ताकि वो अंतरिक्ष में अंधेरे का सामना करने के लिए ख़ुद को तैयार कर सकें.
गुफाओं में टॉर्च के साथ जाने के बावजूद आप कई बार संकरे रास्तों में गुम हो सकते हैं.
गुफा में गोता लगाने की एक्सपर्ट हेज़ेल बार्टन कहती हैं कि थाईलैंड में फंसे बच्चों को हिस्टोप्लाज़्मोसिस नाम की बीमारी ज़रूर हो गई होंगी. हेज़ेल कहती हैं कि गर्म इलाकों में पाई जाने वाली गुफाओं में ये बीमारी बहुत आम है.
ये बीमारी चिड़ियों और चमगादड़ों के मल पर उगने वाली फफूंद से होती है. इसे एंटी फ़ंगल दवाओं से ठीक किया जा सकता है. मगर ये दवाएं कई महीने तक लेनी पड़ती हैं. कई बार तो पूरे एक साल तक इसकी दवा लेनी पड़ती है.
हिस्टोप्लाज़्मोसिस ऐसी बीमारी है कि हर 20 में से एक बच्चे की मौत हो जाती है. इसके शिकार आठ फ़ीसद वयस्क भी मौत का शिकार बन जाते हैं. जिनकी सेहत कमज़ोर है, उनके लिए ये जानलेवा साबित हो सकती है.
इसी साल अमरीका के फ्लोरिडा में 53 बरस के एक आदमी की हिस्टोप्लाज़्मोसिस से मौत हो गई थी. पहले तीन चार दिन तो तमाम टेस्ट के बावजूद उसकी बीमारी का पता नहीं चला. जब तक हिस्टोप्लाज़्मोसिस के नतीजे आते, तब तक वो चल बसा.
चमगादड़ का मल
बदकिस्मती से गुफाओं में जाने पर किसी को भी हिस्टोप्लाज़्मोसिस की बीमारी बहुत जल्दी पकड़ सकती है. हेज़ेल बार्टन के पति को भी ये बीमारी एक गुफा के अंदर जाने पर हो गई थी.
गुफाओं में पाया जाने वाला एक और बैक्टीरिया लेप्टोस्पाइरा भी बहुत घातक हो सकता है. ये गुफा के ज़हरीले पानी में पाया जाता है. अगर आपकी चमड़ी पर कोई घाव है तो इसके ज़रिए ये बैक्टीरिया आपके शरीर में घुस सकता है. इसका असर आंखों, मुंह, नाक और फेफड़ों पर पड़ सकता है.
लेप्टोस्पाइरा से 'वील्स' नाम की बीमारी हो जाती है. ये बीमारी हल्के बुखार जैसे लक्षण से शुरू होती है. 5 से 15 फ़ीसद मामलों में ये गंभीर हालत में पहुंचा देती है. अंदरूनी अंगों से खून निकलने लगता है और कई अंग काम करना बंद कर सकते हैं. इस बीमारी से कई देशों में लोगों के मरने की ख़बरें भी आई हैं. 2005 में लेप्टोस्पाइरा से मलेशिया के एक गुफा गोताखोर की मौत हो गई थी, जबकि उसे एंटीबायोटिक दवाएं दी जा रही थीं.
थाईलैंड की गुफा में फंसे बच्चों को सबसे ज़्यादा मेलियोइडोसिस नाम की बीमारी से ख़तरा है. ये दक्षिण पूर्वी एशिया और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया की गुफाओं में घुसने वाले बहुत से लोगों को हो चुकी है. हर साल क़रीब 1 लाख 65 हज़ार लोग इसकी चपेट में आते हैं. इनमें से 89 हज़ार की मौत हो जाती है.
इस बीमारी के होने से कई चुनौतियां सामने आती हैं. ये ज़मीन पर पाए जाने वाले बैक्टीरिया से होती है. रोज़मर्रा के काम के दौरान भी ये बीमारी हो सकती है. इसकी पहचान बहुत मुश्किल होती है क्योंकि इसके लक्षण कई दूसरी बीमारियों जैसे खांसी और बुखार से मिलते हैं.
थाईलैंड की गुफा से निकाले गए बच्चे अभी तमाम तरह के टेस्ट से गुज़र रहे हैं. हो सकता है कि वो कई ऐसी बीमारियों के बैक्टीरिया साथ लाए हों, जिनके लक्षण अगले 21 दिनों में दिखें. अगर उन्हें इन्फेक्शन हो भी गया है, तो उनके ठीक होने के लिए पूरा मौक़ा है. उन्हे गुफा में रहने के दौरान ही एंटीबायोटिक दिए जा रहे थे.
अगर कोई भी गुफा के भीतर की दुनिया देखने की तैयारी में है, तो उसे एहतियातन कुछ क़दम उठाने चाहिए. सिर्फ रबर के बूट पहनने से ही आप चमड़ी में बैक्टीरिया को घुसने से रोक सकते हैं.
हेज़ेल बार्टन कहती हैं कि हर गुफा इतनी ख़तरनाक नहीं होती. कई गुफाओं में तो अंटार्कटिका की बर्फ़ में पाए जाने वाले बैक्टीरिया से भी कम कीटाणु होते हैं.
लेकिन थाईलैंड के बच्चे जिस गुफा में फंसे थे, वो गहरी, संकरी और गर्म इलाक़े वाली गुफा है, जहां पर तमाम बीमारियों के कीटाणु छुपे हो सकते हैं.
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