ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान मस्जिदों में आग किसने और क्यों लगाई?

    • Author, हुसाम महबूबी
    • पदनाम, बीबीसी फ़ारसी

ईरान में देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के दौरान धार्मिक स्थलों पर हमलों और कई मस्जिदों को आग लगाने की तस्वीरें और वीडियो बड़े पैमाने पर साझा किए गए.

17 जनवरी को ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई ने एक भाषण में दावा किया कि देशव्यापी प्रदर्शनों के दौरान '250 मस्जिदें तबाह' की गई हैं.

उन्होंने इस हरकत में शामिल लोगों को 'दुश्मन सेना' बताते हुए कहा है कि ऐसे "उपद्रवियों का मिशन पवित्र स्थानों, घरों, दफ़्तरों और औद्योगिक केंद्रों पर हमले करना' था."

ईरानी सर्वोच्च नेता के अनुसार "'शरारती तत्वों और ट्रेंड एजेंटों के नेतृत्व में जाहिल लोग इन बुरे कामों और संगीन अपराधों में शामिल हुए."

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ईरान में इंटरनेट की पाबंदी की वजह से मीडिया स्वतंत्र रूप से ऐसी मस्जिदों की संख्या की पुष्टि नहीं कर सका है जिन पर हमले हुए या जिन्हें आग लगाई गई.

इससे पहले ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने एक टेलीविज़न प्रसारण में दावा किया था कि जिन लोगों ने मस्जिदों को आग लगाई, उन्हें 'देश के भीतर और बाहर ट्रेनिंग दी गई थी' और वे 'आतंकवादी' थे.

ईरानी सरकार का मोसाद पर आरोप

यह पहली बार नहीं है कि इस्लामी गणतंत्र ईरान में अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन करने वालों को विदेशी सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े 'दंगाई', 'बाग़ी' और 'आतंकवादी' बताया गया हो.

ईरान के सरकारी मीडिया ने देश में जलाई गई मस्जिदों की तस्वीरें और वीडियो व्यापक स्तर पर प्रसारित किए हैं. इनमें सादक़िया फ़र्स्ट स्क्वायर में स्थित मस्जिद इमाम सादिक़ और तेहरान की अबूज़र मस्जिद वग़ैरा भी शामिल हैं. सरकार ने इन कार्रवाइयों को 'मोसाद के भाड़े के सैनिकों' से जोड़ा है.

फ़्रांस की यूनिवर्सिटी ऑफ़ लोरेन में समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर सईद पैवंदी ने बीबीसी फ़ारसी को बताया कि अभी तक निश्चित तौर पर यह नहीं कहा जा सकता है कि मस्जिदों पर हमले प्रदर्शनकारियों ने ही किए.

इस मामले की चर्चा करते हुए प्रोफ़ेसर पैवंदी अतीत में ईरान में धार्मिक स्थलों पर हुए हमलों के बाद ईरानी सरकार के बयानों का हवाला देते हैं. एक विरोध प्रदर्शन 'ग्रीन मूवमेंट' के नाम से जाना गया. उस दौरान भी प्रदर्शनकारियों पर इसी तरह के आरोप लगाए गए थे.

उनके अनुसार साल 1994 में मशहद में आठवें शिया इमाम की दरगाह पर जानलेवा बम धमाके के बाद "हमने सुरक्षा एजेंसियों के हवाले से ऐसी ही कहानियां सुनीं, लेकिन बाद में साबित हुआ कि उस समय बम धमाके को मुजाहिदीन-ए-ख़ल्क़ संगठन से जोड़ना बिल्कुल ग़लत था.'

प्रोफ़ेसर पैवंदी के मुताबिक़ अगर ईरानी सरकार अपने दावों को सही मानती है तो उसे 'निष्पक्ष लोगों वाली एक जांच समिति' बनानी चाहिए ताकि तथ्य सामने आ सकें.

अली रज़ा मुनाफ़ज़ादा फ़्रांस में इतिहास के शोधकर्ता और लेखक हैं. वह ईरान में मस्जिदों और धार्मिक स्थलों पर हालिया हमलों की प्रकृति और व्यापकता को एक 'नई रिवायत' बताते हैं.

उनके अनुसार यह नामुमकिन नहीं है कि प्रदर्शनकारियों ने ऐसे क़दम उठाए हों. उनके मुताबिक़ लोगों की राय है कि मस्जिदें ईरान में चल रही दमनकारी व्यवस्था का प्रतीक हैं. "चूंकि जनता सीधे तौर पर इस्लामी गणतंत्र की सत्ता से लड़ रही है, इसलिए वे उनसे जुड़े संस्थानों और प्रतीकों पर हमला करते हैं."

पिछले 40 वर्षों में मस्जिदें और अन्य धार्मिक स्थल इस्लामी गणतंत्र ईरान की सत्ता के प्रतीक बन चुके हैं. सरकार से जुड़ी कई मस्जिदें रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (पासदारान-ए-इंक़लाब) से जुड़ी 'बसीज मिलिशिया' के सेंटर्स के तौर पर काम करती हैं.

'धार्मिक भावनाएं भड़काने को एक टूल के रूप में इस्तेमाल करना'

सरकार मस्जिदों की तबाही के मुद्दे को प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की वजह के तौर पर क्यों पेश करती है?

प्रोफ़ेसर पैवंदी का मानना है कि इस तरह का 'सरकारी प्रोपेगेंडा' सबसे पहले तो ईरानी सरकार के देश में मौजूद अपने समर्थकों के लिए होता है, और उस ख़ामोश वर्ग के लिए भी, जो अभी तक इस विरोध आंदोलन को देख रहा है लेकिन इसमें शामिल होने से हिचकिचा रहा है.

उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से ऐसी कार्रवाइयों को उजागर करने की ख़ास वजह यह है कि विरोधियों के ख़िलाफ़ 'धार्मिक भावनाएं भड़काई जाएं' और 'उनके मक़सद को शैतानी बता दिया जाए', या प्रदर्शनकारियों को धर्म-विरोधी या अधर्मी घोषित किया जाए."

जर्मनी में रहने वाले धार्मिक विद्वान हसन यूसुफ़ी अश्कवरी ने सरकारी स्तर पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने को 'एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल' करने का हवाला दिया और बीबीसी को बताया कि इस्लामी गणतंत्र ईरान अपने विरोधियों को 'बर्बाद करने' की कोशिश कर रहा है और उन्हें 'इस्लाम, क़ुरान और मस्जिदों का दुश्मन' बनाकर पेश करता है.

हालांकि वह कहते हैं कि यह इकतरफ़ा नहीं है और जिस तरह इस्लामी गणतंत्र ईरान की ओर से धार्मिक भावना भड़काने के लिए मस्जिदों का इस्तेमाल करना ग़लत और निंदनीय है, उसी तरह किसी भी समूह या व्यक्ति की ओर से किसी भी मक़सद के लिए मस्जिदों को तबाह करना या उनमें आग लगाना भी ग़लत क़दम है और इसके 'नकारात्मक नतीजे' हो सकते हैं.

हसन युसूफ़ी अश्कवरी के अनुसार अगर ऐसे क़दम प्रदर्शनकारियों ने उठाए हैं तो यह 'इस्लाम विरोधी रुझान' का प्रतीक है. उनका कहना है कि ईरानी समाज का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक है, और "यह धारणा कि इस्लाम को ईरान में पूरी तरह ख़त्म किया जा सकता है, ऐतिहासिक रूप से एक बड़ी ग़लतफ़हमी है."

इसके साथ ही कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर प्रदर्शनकारियों ने मस्जिद या पवित्र किताब को आग लगाने की कोशिश की है, तो ज़रूरी नहीं कि इन क़दमों को मज़हब पर हमला समझा जाए, बल्कि इन्हें उस संस्था के ख़िलाफ़ प्रतीकात्मक विरोध समझा जा सकता है जो अपना तानाशाही वर्चस्व जायज़ ठहराने के लिए धर्म का इस्तेमाल करती है.

क्रांति से पहले मस्जिदों पर 'जनता ने हमला नहीं किया'

इस्लामी गणतंत्र की स्थापना से पहले भी ईरान की मस्जिदें समाज में अहम भूमिका रखती थीं और कई मामलों में उन्हें उस समय के शासकों का समर्थन भी हासिल था.

मुनाफ़ज़ादा के अनुसार रज़ा शाह पहलवी के शासनकाल में तुर्क सेक्यूलरिज़्म के मॉडल पर चलते हुए ईरानी सरकार धार्मिक शिक्षा पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहती थी और 'किसी न किसी तरह धर्म पर क़ाबू पाना' उसका मक़सद था.

उनका मानना है कि भले ही इस्लामी गणतंत्र ईरान के इतिहासकार यह आरोप लगाने की कोशिश करते हैं कि पहलवी शासन में मस्जिदों पर हमले किए गए, हक़ीक़त यह है कि कुछ मामलों में सरकार ने 'मस्जिदों की मदद' की.

इतिहास के शोधकर्ता मुनाफ़ज़ादा के अनुसार मोहम्मद रज़ा शाह पहलवी के शासनकाल में मस्जिदें 'कम्यूनिस्ट काफ़िरों के ख़िलाफ़ लड़ने' की जगहें थीं और "दरअसल, मोहम्मद रज़ा शाह की नज़र में कम्युनिस्ट धार्मिक लोगों से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक थे."

हालांकि, हसन यूसुफ़ी अश्कवरी की नज़र में क्रांति से पहले मस्जिदों के निर्माण को सरकार का 'समर्थन' या 'प्रोत्साहन' नहीं समझा जा सकता. उनका मानना है कि क्रांति से पहले इस्लाम के फैलाव और बढ़ती आबादी के मद्देनज़र मस्जिदों की संख्या में बढ़ोतरी 'बिल्कुल स्वाभाविक' थी.

मुनाफ़ज़ादा के अनुसार क्रांति से पहले सरकार ने मस्जिदों को कभी निशाना नहीं बनाया, चाहे ऐसी मस्जिदें सरकार समर्थित हों या न हों.

पारंपरिक जगहों का वैचारिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल

विशेषज्ञों के अनुसार अपने स्थायी और पारंपरिक उद्देश्य के लिहाज़ से ईरान की मस्जिदों में एक बड़ा बदलाव देखा गया है. पहले उन्हें सिर्फ इबादत और आध्यात्मिक मामलों की जगह समझा जाता था.

क्रांति से पहले बहुत से उलेमा (धर्मगुरुओं) ने लोगों को सरकार के ख़िलाफ़ उकसाने के लिए मस्जिदों का इस्तेमाल किया. मिसाल के तौर पर इस्लामी गणतंत्र के मौजूदा सुप्रीम लीडर अली ख़ामेनेई ने मशहद की 'करामत मस्जिद' सहित कई मस्जिदों में भाषण दिए और उनके भाषणों की बातें सरकार के लिए चिंता का विषय बनती थीं.

क्रांति से पहले के माहौल और 'राजनीतिक पाबंदियों' का हवाला देते हुए हसन यूसुफ़ी अश्कवरी कहते हैं कि उस वक़्त 'मस्जिदें संघर्ष का केंद्र बन चुकी थीं' और क्रांति के बाद भी इराक़ के साथ आठ साल के युद्ध के मोर्चों पर सेना इकट्ठा करने और मदद करने में मस्जिदें ही संघर्ष का मुख्य केंद्र रहीं.

हालांकि, अगर हम यह मान लें कि दोनों दौर में मस्जिदें 'संघर्ष का केंद्र' रही हैं, तो साल 1979 की क्रांति के बाद मस्जिदों को दी जाने वाली मदद क्रांति से पहले की मदद के बराबर नहीं है.

इस्लामी गणतंत्र ने मस्जिदों की मदद के लिए सरकारी संस्थान बनाए हैं और ग़ैर-सरकारी वित्तीय संसाधनों के अलावा सरकारी बजट के प्रोजेक्ट्स में भी मस्जिदों के लिए रक़म दी गई है.

हसन यूसुफ़ी अश्कवरी इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इस्लामी इतिहास में धार्मिक मामलों के अलावा भी 'मुसलमानों के सैन्य, राजनीतिक, यहां तक कि आर्थिक' मामलों के लिए मस्जिदों का इस्तेमाल किया जाता था.

हालांकि, प्रोफ़ेसर सईद पैवंदी सावधान करते हैं कि ऐसे काम, ख़ास तौर पर आधुनिक दौर में, मस्जिद की सामाजिक हैसियत को कमज़ोर करते हैं. "मज़हबी सरकार मस्जिदों के नेटवर्क को अपने संगठन का हिस्सा बनाती है. मस्जिदों के इमाम सरकार पर ज़्यादा निर्भर करते हैं और मस्जिदें सरकार की नीति को बढ़ावा देने और सरकार का समर्थन करने की जगह बन चुकी हैं. इसी वजह से इस्लामी सरकार से असंतोष और उसकी नाकामी ने समाज के महत्वपूर्ण हिस्सों और मस्जिद के बीच दरार पैदा कर दी है."

प्रोफेसर सईद पैवंदी ख़ास तौर पर इस्लामी गणराज्य ईरान में सरकार और धार्मिक स्थलों के बीच सैन्य संबंधों की आलोचना करते हैं. "सरकार से जुड़ी फ़ोर्सेज़ की गतिविधियां मस्जिदों से ही चलाई जाती हैं."

कुछ ईरानियों को ऐसा लगता है कि मस्जिदें अब पवित्रता का प्रतीक नहीं रहीं. साल 2023 की सीएनएन की एक रिपोर्ट में महसा अमीनी आंदोलन के विरोध प्रदर्शनों में इस्तेमाल होने वाले ख़ुफ़िया हिरासत केंद्रों का पता चला था, जिनमें से कुछ मस्जिदें भी थीं. कई स्रोतों ने पुष्टि की थी कि मशहद शहर सहित क़ैदियों को इन जगहों पर रखा गया और टॉर्चर का शिकार बनाया गया.

मदरसों पर 'प्रतीकात्मक' हमले

हाल के प्रदर्शनों में मस्जिदों के साथ-साथ धार्मिक मदरसों पर हमलों की ख़बरें भी आईं. सईद पैवंदी का मानना है कि ऐसे हमले "बहुत प्रतीकात्मक हैं और कम से कम समाज के एक महत्वपूर्ण हिस्से और धार्मिक सरकार के बीच भरोसे की कमी को दर्शाते हैं."

कुछ विद्वान ईरान की मौजूदा स्थिति की तुलना इतिहास के वैसे दौर से करते हैं जब प्रदर्शन करने वाले लोग धर्म और सत्ता के गठजोड़ से नाख़ुश थे.

मुनाफ़ज़ादा कहते हैं कि ईरान में मस्जिदों पर हमले की तुलना क्रांतिकारियों के चर्चों पर हमले और फ़्रांस की क्रांति के दौरान धार्मिक प्रतीकों के विनाश से की जा सकती है. वह हमले 'बादशाही, सामंतवाद और धर्म के ख़िलाफ़ युद्ध' के नाम पर किए गए.

वह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि शब्द 'वैंडलिज़्म' (तबाही या तोड़-फोड़) धार्मिक नेता हेनरी ग्रेगोइर ने गढ़ा था, जो एक क्रांतिकारी थे.

फ़्रांसीसी क्रांति के बाद संसद ने एक क़ानून पास किया जिसके मुताबिक़ चर्च को राज्य के अधीन कर दिया गया. मुनाफ़ज़ादा के अनुसार, "क्रांतिकारी चाहते थे कि धार्मिक कट्टरपंथ ख़त्म किया जाए और धर्म को राज्य के मातहत किया जाए."

साल 1905 में फ़्रांस में 'लाइसिते' (धर्मनिरपेक्षता) क़ानून मंज़ूर हुआ जो धर्म और राज्य को अलग करने का आधार बना, लेकिन साथ ही धार्मिक इमारतों और संस्थानों की सुरक्षा सरकार के सुपुर्द की गई और अब फ़्रांस में प्रदर्शनकारी अपना विरोध जताने के लिए धार्मिक स्थलों पर हमले नहीं करते.

क्या ईरान में भी लोगों और धार्मिक स्थलों के बीच इस तरह की समझबूझ पर दोबारा सोचा जा सकता है? हसन यूसुफ़ी अश्कवरी कहते हैं कि मज़हबी सरकार के तहत तमाम नागरिकों में, जिनमें अन्य धर्मों को मानने वाले भी शामिल हैं, 'क़ानूनी समानता' क़ायम करना मुमकिन नहीं.

उनका कहना था कि अगर इस्लामी गणराज्य का पतन होता है और भविष्य की सरकार ऐसी समानता पर क़ायम रहे तो 'धर्म और धार्मिक स्थलों की पवित्रता भी बरक़रार रहेगी.'

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