डिजिटल अरेस्टः दिल्ली में एक सप्ताह के भीतर बुज़ुर्गों से 22 करोड़ रुपए की ठगी, स्कैमर तक पहुंचना मुश्किल क्यों?

79 वर्षीय एनआरआई (अनिवासी भारतीय) डॉक्टर इंदिरा तनेजा 24 दिसंबर को दोपहर 12 बजे घर से किसी काम के लिए निकलने की तैयारी कर रहीं थीं. तभी उनके फ़ोन पर अज्ञात नंबर से कॉल आई.

कॉलर और उसके बाद कॉल से जुड़ते रहे लोगों ने ऐसा जाल बुना कि डॉ. इंदिरा और उनके इंजीनियर पति 81 वर्षीय ओम तनेजा इसमें फंसते चले गए और अपने घर में ही क़ैद हो गए.

इस एक कॉल से शुरू हुआ डॉ. इंदिरा और उनके पति ओम तनेजा का ‘डिजिटल अरेस्ट’ 15 दिन तक चला. इस दौरान उनके बैंक खातों से 14.85 करोड़ रुपए ट्रांसफ़र करवा लिए गए.

दिल्ली पुलिस ने इस स्कैम से जुड़े तीन लोगों को गिरफ़्तार किया है और स्कैम नेटवर्क से जुड़े बाक़ी लोगों को पकड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं.

दिल्ली के ग्रेटर कैलाश 2 इलाक़े में रहने वाले इस एनआरआई दंपती के साथ हुई ठगी की जांच चल ही रही थी कि इसी इलाक़े में रहने वाली एक और बुज़ुर्ग विधवा कारोबारी से क़रीब सात करोड़ रुपए डिजिटल अरेस्ट का ऐसा ही तरीक़ा अपनाकर ठग लिए गए.

सात दिनों के भीतर दिल्ली के पॉश इलाक़े में सामने आई इन दो घटनाओं ने भारत में बढ़ते साइबर अपराध को लेकर गई गंभीर सवाल खड़े किए हैं.

इन मामलों की जांच कर रही दिल्ली पुलिस की इंटेलिजेंस फ्यूज़न एंड स्ट्रेटेजिक ऑपरेशंस यूनिट के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर रजनीश गुप्ता ने बीबीसी से कहा है कि पुलिस साइबर अपराधियों को पकड़ने का हर संभव प्रयास कर रही है.

हालांकि, वह यह भी कहते हैं कि इस नेटवर्क से जुड़े शीर्ष लोगों तक पहुंचना एक बेहद मुश्किल और जटिल काम है.

रजनीश गुप्ता कहते हैं, “डिजिटल अरेस्ट जैसा कुछ नहीं होता है, ये साइबर अपराधियों का लोगों को ठगने का एक तरीक़ा है. कोई भी क़ानून से जुड़ी एजेंसी या भारत की कोई भी अथॉरिटी किसी को भी घर में क़ैद नहीं करती है, ना ही वीडियो कॉल पर कोई सुनवाई होती है. इस तरह का कॉल कभी भी किसी के पास भी आए तो तुरंत उसे काट दें और जिस नंबर से ये कॉल आया है उसे संचार साथी एप के माध्यम से रिपोर्ट कर दें, यही इस तरह की गतिविधियों को रोकने का सबसे कारगर तरीक़ा है.”

साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं, “डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर स्कैम अब एक संगठित सिंडिकेट के तहत चल रहे हैं, आमतौर पर इससे जुड़े शीर्ष लोग देश के बाहर होते हैं, ऐसे में पुलिस के मौजूदा तरीक़ों से उन तक पहुंचना बहुत मुश्किल काम है. पुलिस अभी बस उन लोगों तक पहुंच पा रही है जिनके बैंक खातों का इस्तेमाल साइबर अपराधों में हो रहा है.”

कैसे हुआ क़रीब 22 करोड़ का ‘डिजिटल अरेस्ट’ स्कैम

डॉ. इंदिरा को 24 दिसंबर की दोपहर आया वो कॉल और उसके बाद पंद्रह दिनों तक चले घटनाक्रम का एक-एक पल याद है.

वो बिना दिमाग़ पर ज़ोर डाले बताती हैं, “उधर से कहा गया, हम ट्राई (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरटी ऑफ़ इंडिया) से बात कर रहे हैं, आपका फ़ोन नंबर काट दिया जाएगा, आपके ख़िलाफ़ 26 शिकायतें हैं, अश्लील कॉल की गई हैं.”

डॉ. इंदिरा ने जैसे ही कॉलर की बात को गंभीरता से लिया उधर से अगला आरोप उन्हें सुना दिया गया. उनसे कहा गया, “आपने मनी लॉन्ड्रिंग की है, आपके पास ब्लैक मनी है और आपके ख़िलाफ़ अरेस्ट वॉरंट है.”

इन आरोपों ने डॉ. इंदिरा को डरा दिया. स्कैमर को जैसे ही अहसास हुआ कि डॉ. इंदिरा ने इन झूठे आरोपों को गंभीरता से लिया है, उन्हें एक फ़र्ज़ी एफ़आईआर नंबर देते हुए कहा गया, “हम आपके कॉल को पुलिस अधिकारी को ट्रांसफर कर रहे हैं, कोलाबा साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन के ड्यूटी अफ़सर से बात करें.”

डॉ. इंदिरा से कहा गया कि वो कथित पुलिस अधिकारी से बात करें और क्लियरेंस सर्टीफ़िकेट हासिल करें. उन्हें वीडियो कॉल से जोड़ा गया. उस तरफ़ जो व्यक्ति बैठा था उसने पुलिस अधिकारी की वर्दी पहन रखी थी और उसके पीछे पुलिस से जुड़े प्रतीक चिन्ह थे.

फ़र्ज़ी पुलिस अधिकारी ने उनसे कहा, “आप अपराधी नहीं हैं, आप संदिग्ध हैं, जांच के बाद आपको छोड़ दिया जाएगा.”

डॉ. इंदिरा को लगा कि जो व्यक्ति उनसे बात कर रहा है वह उनकी मदद करना चाहता है. उन्होंने उसकी बातों पर भरोसा कर लिया.

डॉ. इंदिरा बताती हैं, “उन्होंने मुझसे पूछा घर में कौन-कौन है, मैंने उन्हें बता दिया. जब उन्हें पता चल गया कि हम बुज़ुर्ग दंपती घर में अकेले रहते हैं तब उन्होंने हमारी पहचान से जुड़े दस्तावेज़ लिए, हमारे बैंक खातों की जानकारी ली और हमारे बारे में अन्य जानकारियां जुटाईं.”

डॉ. इंदिरा कहती हैं, “वो लोग बहुत आत्मीय होकर बात कर रहे थे और बार-बार भरोसा दे रहे थे कि एक बार आरबीआई (भारतीय रिज़र्व बैंक) पैसों की जांच पूरी कर ले तो सभी रक़म लौटा दी जाएगी,”

डॉ. इंदिरा कहती हैं, “मुझे लग रहा था कि मैं किसी वास्तविक पुलिस अधिकारी से बात कर रही हूं जो देश सेवा कर रहा है. उसने बताया कि जिन लोगों ने 500 करोड़ से अधिक की मनी लॉन्ड्रिंग की है वे राष्ट्र के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं और यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है. हमें इस तरह से झांसे में लिया गया कि हमें लग रहा था कि यदि हम इन लोगों की बात नहीं सुनेंगे तो हम देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करेंगे.”

'हमें लगा कि हम राष्ट्र की सुरक्षा में सहयोग कर रहे हैं'

डॉ. इंंदिरा तनेजा और उनके पति इंजीनियर ओम तनेजा क़रीब 11 साल पहले अमेरिका से भारत लौटे थे. उन्होंने भारत में समाज सेवा के लिए एक ट्रस्ट खोला और कई स्कूलों के साथ काम किया.

डॉ. इंदिरा बताती हैं, “हम पूरा जीवन अमेरिका में बिताकर सेवा करने के लिए भारत लौटे थे, हम अपनी मातृभूमि के लिए कुछ करना चाहते थे. जब ठगों ने हमें राष्ट्र की सुरक्षा के लिए ख़तरा बताया तो हमें लगा कि हमें सहयोग करना चाहिए.”

उनके साथ स्कैम कर रहे लोगों ने पंद्रह दिनों तक उनकी वीडियो कॉल के ज़रिए निगरानी की. उन्हें पता होता कि उनके फ़ोन में कब बैट्री ख़त्म होने वाली है और किस समय वो क्या करते हैं.

डॉ. इंदिरा कहती हैं, “हमसे कहा गया कि जिन अपराधियों की जांच वो कर रहे हैं और मनी लॉन्ड्रिंग के जिस मामले से हमारा नाम जुड़ा है, उसमें शामिल लोग बहुत ख़तरनाक़ हैं, उनके पास हमारी और अमेरिका में रह रहे हमारे बच्चों के बारे में जानकारी है और अगर उन्हें इस जांच के बारे में कुछ पता चला तो हमारी और हमारे बच्चों की जान को ख़तरा हो सकता है.”

आईआईटी दिल्ली के टॉपर रहे और अमेरिकी सरकार और संयुक्त राष्ट्र समेत कई नामचीन संस्थानों के साथ काम कर चुके इंजीनियर ओम तनेजा कहते हैं, “शुरुआत में मुझे शक़ हुआ, लेकिन जब हमारी जान को ख़तरा बताया गया तो हम उनकी बात मानते चले गए.”

एक और बुज़ुर्ग महिला को ठगा

इन 15 दिनों के दौरान स्कैम कर रहे ठगों ने उनके 7 बैंक खातों में 8 ट्रांजैक्शन के ज़रिए कुल 14.85 करोड़ रुपए ट्रांसफ़र करवाए. जिन खातों में पैसा भेजा गया वो पश्चिम बंगाल से लेकर गुजरात, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में थे.

रजनीश गुप्ता के मुताबिक़, “ये स्कैमर देशभर में फैले बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं. पीड़ित के अकाउंट से पैसा ट्रांसफ़र होते ही उसे तुरंत दूसरे खातों में डायवर्ट कर दिया जाता है. ऐसे में यदि पुलिस को समय पर जानकारी ना मिले तो इस पैसे को रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है. इस मामले में हम 20 प्रतिशत तक ही पैसा फ़्रीज़ करने में कामयाब रहे हैं. कई बार साइबर अपराध जल्दी रिपोर्ट हो जाता है तो हम तीस से पचास फ़ीसदी तक भी पैसे को खातों में रोक पाते हैं.”

दिल्ली के ग्रेटर कैलाश 2 इलाक़े में अकेली रहने वाली कारोबारी मीनाक्षी गुप्ता के साथ हुए क़रीब सात करोड़ रुपए के डिजिटल अरेस्ट मामले में अभी पुलिस कोई गिरफ़्तारी नहीं कर सकी है.

इस मामले की पुष्टि करते हुए रजनीश गुप्ता कहते हैं, “इस बार भी हमें जानकारी देर से मिली, हम अपराधियों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं.”

मीनाक्षी गुप्ता को ठगने के लिए भी बिलकुल वैसा ही तरीक़ा अपनाया गया जिस तरीक़े से एनआरआई दंपति को ठगा गया.

डॉ. इंदिरा तनेजा कहती हैं, “मैं बार-बार पैसा ट्रांसफ़र करने के लिए बैंक जा रही थी, हम अपराधियों के प्रभाव में थे और डरे हुए थे, बैंक के अधिकारियों को कम से कम अलर्ट होना चाहिए था.”

रजनीश गुप्ता कहते हैं, “बैंक ये तो जांच करता है कि जो पैसा निकालने आ रहा है वो कौन है, सही व्यक्ति है या नहीं, उसकी पहचान की पूरी पुष्टि करता है लेकिन जिस खाते में पैसा भेजा जा रहा है, उसे लेकर जांच नहीं की जाती है. संदेह होने पर यदि बैंक मैनेजर अलर्ट करते तो ये स्कैम रोके जा सकते थे.”

वहीं साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं, “अब फोकस सिर्फ अपराधी पकड़ने पर नहीं, बल्कि पीड़ित का पैसा वापस दिलाने पर होना चाहिए. अगर आरबीआई के जरिए बैंकों की जवाबदेही तय हो और बड़े ट्रांजैक्शन में डिफर्ड पेमेंट सिस्टम आए, तो डिजिटल अरेस्ट जैसे मामलों में नुकसान काफी हद तक रोका जा सकता है.”

हज़ारों बैंक खातों में भेजा गया पैसा

साइबर ठगी के इन मामलों की जांच कर रही दिल्ली पुलिस के मुताबिक़ एनआरआई दंपति के खातों से सात अलग-अलग बैंक खातों ट्रांसफ़र करवाए गए 14.85 करोड़ रुपए को पहले 940 खातों में भेजा गया और फिर आगे बारह हज़ार से अधिक अकाउंट में ट्रांसफ़र कर दिया गया.

रजनीश गुप्ता के मुताबिक़, “जिन लोगों को अभी तक गिरफ़्तार किया गया है ये वो लोग हैं जिन्होंने अपने बैंक खाते साइबर अपराधियों को उपलब्ध करवाए थे. आगे की कड़ियां जोड़ी जा रही हैं. ये स्कैमर कई लेयर में पैसा ट्रांसफ़र करते हैं. पकड़े जाने वाले कई लोग ऐसे होते हैं जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनका खाता साइबर अपराध में इस्तेमाल हो रहा है. वो थोड़े से लालच में आ जाते हैं और बड़े अपराध का हिस्सा बन जाते हैं.”

वहीं साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं, “डिजिटल अरेस्ट और बड़े साइबर फ्रॉड अब स्टैंड-अलोन अपराध नहीं रहे. ये संगठित साइबर सिंडिकेट्स द्वारा चलाए जा रहे मल्टी-लेयर ऑपरेशन हैं, जहां पैसा पहले कुछ खातों में जाता है और फिर सैकड़ों से होते हुए हजारों खातों में बिखेर दिया जाता है.”

विश्लेषक मानते हैं कि साइबर अपराध अब संगठित गिरोह की तरह चल रहे हैं और इनके पीछे अपराधियों के बड़े सिंडिकेट है. पुलिस को आशंका है कि साइबर अपराध से जुटाया जा रहा पैसा कई अन्य सेक्टर में खपाया जा रहा है.

डॉ. इंदिरा तनेजा दावा करती हैं कि डिजिटल अरेस्ट स्कैम हो जाने के बाद उनके पास कई ऐसे लोगों के फ़ोन आए जिनका दावा था कि उनके बैंक खाते इस स्कैम की जांच की वजह से बंद हो गए हैं.

डॉ. इंदिरा कहती हैं, “कई लोगों ने फ़ोन करके बताया कि वो सिर्फ़ ऑनलाइन गेमिंग करते हैं, उनके खातों में कुछ पैसे आए थे और बैंक ने हमारे मामले की वजह से उनके बैंक खाते बंद कर दिए हैं.”

रजनीश गुप्ता कहते हैं, “ऐसी संभावना है कि साइबर ठगी से जुटाया जा रहा पैसा दूसरे सेक्टर में लगाया जा रहा है. हालांकि अभी हम इस बारे में पुख़्ता तौर पर कुछ नहीं कह सकते हैं.”

वहीं विश्लेषकों के मुताबिक़, ठगी के पैसों को ऐसे लोगों के खातों में भेजा जा रहा है जो ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े हैं.

पवन दुग्गल कहते हैं, “ऑनलाइन गेमिंग आज मनी लॉन्ड्रिंग के लिए एक बेहद फर्टाइल ग्राउंड बन चुका है. देश में बड़ी संख्या में लोग कंपल्सिव गेमिंग के शिकार हैं. ऐसे लोगों के खातों में फ्रॉड का पैसा भेज दिया जाता है, बाद में पुलिस उन तक पहुंचती है और वे खुद हैरान रह जाते हैं कि उनका खाता क्यों फ्रीज हो गया.”

सरकार का दावा- लाखों संदिग्ध खाते ब्लॉक किए गए

डिजिटल अरेस्ट जैसे साइबर फ्रॉड मामलों पर लगाम कसने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) के तहत एक ऑनलाइन ‘सस्पेक्ट रजिस्ट्री’ तैयार की है.

गृह मंत्रालय के अधीन भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) द्वारा विकसित इस प्रणाली के जरिए सितंबर 2024 से 1 अगस्त 2025 के बीच करीब 13 लाख संदिग्ध डिजिटल लेनदेन रोके गए, जिससे ₹5,111 करोड़ से अधिक की संभावित ठगी को टाला जा सका.

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में 3.54 लाख से अधिक बैंक खातों को फ्रीज किया गया, जबकि 11 लाख से ज्यादा यूनिक संदिग्ध खातों की पहचान की गई.

फिलहाल देश के 61 बैंक और वित्तीय संस्थान इस सस्पेक्ट रजिस्ट्री से जुड़े हैं, जहां साइबर अपराधियों से जुड़े मोबाइल नंबर, बैंक खाते, ई-मेल आईडी और अन्य पहचानकर्ता डाटा साझा किए जाते हैं. इन आंकड़ों के आधार पर बैंक संदिग्ध खातों में होने वाले लेनदेन पर रीयल-टाइम निगरानी कर पा रहे हैं.

सरकार का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट सहित अधिकांश साइबर ठगी के मामलों में वित्तीय धोखाधड़ी शामिल होती है और देश को हर महीने हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है.

डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन साइबर ठगी के बढ़ते मामलों के बीच केंद्र सरकार ने संसद में इन अपराधों पर लगाम लगाने के दावों को दोहराया है.

12 मार्च 2025 को राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में गृह मंत्रालय ने बताया कि राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP), सस्पेक्ट रजिस्ट्री और 1930 साइबर हेल्पलाइन के जरिए हजारों करोड़ रुपये की वित्तीय धोखाधड़ी को रोका गया है.

सरकार ने कहा, “NCRP और अन्य समन्वित तंत्रों के माध्यम से साइबर अपराध से जुड़ी लाखों शिकायतों पर कार्रवाई की गई है और संदिग्ध खातों में होने वाले लेनदेन पर समय रहते रोक लगाई गई है.”

मंत्रालय के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट जैसे अधिकांश साइबर अपराध मामलों में वित्तीय धोखाधड़ी प्रमुख तत्व होती है, जिसे रोकने के लिए बैंकों और जांच एजेंसियों के बीच रीयल-टाइम सूचना साझा की जा रही है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.