You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'हम अब खिड़की से तख़्ती हटा रहे हैं': कनाडा के पीएम का भाषण वायरल, चीनी मीडिया बोला- मार्क कार्नी ने चेतावनी दी है
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने मंगलवार को स्विट्ज़रलैंड के दावोस में 'वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम' में 'नए वर्ल्ड ऑर्डर' पर एक भाषण दिया और इस बात पर ज़ोर दिया कि कनाडा जैसे मिडिल पावर वाले देश आपसी सहयोग से लाभ उठा सकते हैं.
यह भाषण ऐसे समय में दिया गया जब रूस, चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों के बीच तनाव बढ़ रहा है और जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सहयोगी देशों पर टैरिफ़ लगाने की धमकी दे रहे हैं.
इसके अलावा अमेरिका नेटो सैन्य गठबंधन के सदस्य देश डेनमार्क से ग्रीनलैंड को हासिल करने की कोशिश कर रहा है.
मार्क कार्नी का दावोस में दिया भाषण वायरल हो रहा है. कई लोग कह रहे हैं कि पहली बार पश्चिम के किसी नेता ने इतना कड़वा सच कहा है.
बीबीसी हिन्दी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
कार्नी ने अपने भाषण में क्या कहा
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा, "हमें यह याद दिलाया जाता है कि हम महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के युग में जी रहे हैं. नियमों पर आधारित व्यवस्था कमज़ोर पड़ रही है. शक्तिशाली देश वही करते हैं जो कर सकते हैं और कमज़ोरों को सहना पड़ रहा है.
1978 में, चेक रिपब्लिक (उस समय चेकोस्लोवाकिया) के बाग़ी नेता वाक्लाव हावेल, जो बाद में राष्ट्रपति बने, ने "द पावर ऑफ़ द पावरलेस" नामक एक निबंध लिखा था. उसमें उन्होंने एक सरल सवाल पूछा- कम्युनिस्ट व्यवस्था ख़ुद को कैसे बनाए रखती थी?
और उनका जवाब एक सब्ज़ी बेचने वाले से शुरू होता है-
हर सुबह, दुकानदार अपनी दुकान की खिड़की में एक तख़्ती लगाता है: 'दुनिया के मज़दूरों, एक हो जाओ.' वह इसमें विश्वास नहीं करता. कोई भी नहीं करता. लेकिन वह फिर भी यह तख़्ती लगाता है. परेशानी से बचने के लिए, वफ़ादारी का संकेत देने के लिए और तालमेल बनाए रखने के लिए.
हर गली में हर दुकानदार यही करता है, व्यवस्था बनी रहती है, सिर्फ़ हिंसा के कारण नहीं बल्कि आम लोगों की उस भागीदारी के कारण, जो ऐसे अनुष्ठानों का पालन करते हैं, जिन्हें वे निजी तौर पर झूठ मानते हैं.
हावेल ने इसे 'झूठ के भीतर जीना' कहा था. व्यवस्था की शक्ति उसकी सच्चाई से नहीं बल्कि इस बात से आती है कि हर कोई ऐसा व्यवहार करता है, मानो वह सच हो. उसकी संवेदनशीलता भी इसी से आती है. जब एक भी व्यक्ति यह अभिनय करना बंद कर देता है, जब दुकानदार अपनी तख़्ती हटा देता है तो भ्रम में दरार पड़ने लगती है.
दोस्तों, अब तख्तियाँ उतार देने का समय आ गया है."
'अब वक़्त आ गया है'
कार्नी ने कहा -
दशकों तक, कनाडा जैसे देश उस व्यवस्था के तहत समृद्ध हुए, जिसे हम नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कहते थे. हम इसके संस्थानों में शामिल हुए, इसके सिद्धांतों की प्रशंसा की और इसका लाभ उठाया. इसी वजह से हम इसके संरक्षण में मूल्यों पर आधारित विदेश नीतियाँ अपना सके.
हम जानते थे कि नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की कहानी आंशिक रूप से झूठी थी. सबसे शक्तिशाली देश सुविधा होने पर ख़ुद को छूट दे लेते हैं. व्यापार नियम असमान रूप से लागू होते हैं और अंतरराष्ट्रीय क़ानून की कठोरता अभियुक्त या पीड़ित की पहचान पर निर्भर करती है.
अमेरिकी वर्चस्व ने सार्वजनिक चीज़ें उपलब्ध कराईं. जैसे खुले समुद्री मार्ग, एक स्थिर वित्तीय प्रणाली, सामूहिक सुरक्षा और विवाद सुलझाने के ढाँचों का समर्थन. इसलिए हमने खिड़की में तख्ती लगा दी. हमने अनुष्ठानों में भाग लिया और बयानबाज़ी के साथ वास्तविकता के बीच की खाइयों को ज़्यादातर नज़रअंदाज़ किया. यह समझौता अब काम नहीं करता.
मैं स्पष्ट रूप से कहूँ तो हम किसी संक्रमण में नहीं बल्कि एक विध्वंस के बीच हैं.
पिछले दो दशकों में वित्त, स्वास्थ्य, ऊर्जा और जियोपॉलिटिक्स में संकटों की एक कड़ी ने वैश्विक एकीकरण के जोखिमों को उजागर कर दिया है. लेकिन हाल के वर्षों में, महाशक्तियाँ आर्थिक एकीकरण को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगी हैं. टैरिफ़ को दबाव के औजार के रूप में, वित्तीय ढाँचों को जबरदस्ती के साधन के रूप में और सप्लाई चेन के दोहन योग्य कमज़ोरियों के रूप में.
"जब एकीकरण ही आपकी अधीनता का स्रोत बन जाए, तब आप पास्परिक लाभ के झूठ के भीतर नहीं जी सकते.
जिन बहुपक्षीय संस्थानों पर मिडिल पावर वाले देशों ने भरोसा किया, वे ख़तरे में हैं. डब्ल्यूटीओ, संयुक्त राष्ट्र, कॉप और सामूहिक समस्या-समाधान की पूरी संरचना ख़तरे में हैं. परिणामस्वरूप, कई देश इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि उन्हें ऊर्जा, खाद्य, महत्वपूर्ण खनिजों, वित्त और सप्लाई चेन में अधिक रणनीतिक स्वायत्तता विकसित करनी होगी और यह प्रवृत्ति समझ में आती है.
जो देश ख़ुद को खिला नहीं सकता, ऊर्जा नहीं दे सकता या अपनी रक्षा नहीं कर सकता, उसके पास बहुत कम विकल्प होते हैं. जब नियम आपकी रक्षा नहीं करते तो आपको ख़ुद की रक्षा करनी पड़ती है.
एक और सच्चाई है- अगर महाशक्तियाँ नियमों और मूल्यों के दिखावे तक को छोड़ दें और बिना रोक-टोक अपनी शक्ति और हितों का पीछा करें, तो लेन-देन आधारित व्यवस्था से होने वाले लाभों को दोहराना और कठिन हो जाएगा.
हमारा मानना है कि मध्यम शक्ति वाले देशों को साथ मिलकर काम करना चाहिए क्योंकि अगर हम मेज़ पर नहीं हैं, तो हम मेन्यू में हैं.
"मैं यह भी कहूँगा कि महाशक्तियाँ फ़िलहाल अकेले चलने का जोखिम उठा सकती हैं. उनके पास बाज़ार का आकार, सैन्य क्षमता और शर्तें तय करने की ताक़त है. मिडिल पावर वाले देशों के पास नहीं है. लेकिन जब हम किसी प्रभुत्वशाली शक्ति से केवल द्विपक्षीय वार्ता करते हैं, तो हम कमज़ोरी की स्थिति से बातचीत करते हैं. जो दिया जाता है, वही स्वीकार करते हैं. हम एक-दूसरे से ज़्यादा अनुकूल बनने की होड़ में लग जाते हैं.
यह संप्रभुता नहीं है. यह अधीनता स्वीकार करते हुए संप्रभुता का प्रदर्शन भर है.
महाशक्ति प्रतिस्पर्धा की दुनिया में, बीच के देशों के पास एक विकल्प है: मिलकर एक तीसरा रास्ता बनाएँ, जिसका प्रभाव हो. हमें कठोर शक्ति के उदय से इतना अंधा नहीं होना चाहिए कि हम यह भूल जाएँ कि वैधता, ईमानदारी और नियमों की शक्ति तब भी मज़बूत रहेगी, अगर हम उसे मिलकर इस्तेमाल करें. यहीं मैं फिर हावेल की ओर लौटता हूँ. मध्यम शक्तियों के लिए "सच में जीने" का क्या अर्थ है?
पहला, इसका अर्थ है वास्तविकता का नाम लेना. नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को ऐसे न पुकारें मानो वह अभी भी वैसी ही काम कर रही हो. उसे वही कहें जो वह है.
दूसरा, इसका अर्थ है, एकरूपता से काम करना. मित्रों और प्रतिद्वंद्वियों दोनों पर समान मानक लागू करना. जब मध्यम शक्तियाँ एक दिशा से आने वाले आर्थिक दबाव की आलोचना करती हैं लेकिन दूसरी दिशा से आने पर चुप रहती हैं, तो हम खिड़की में तख्ती लगाए रखते हैं.
तीसरा, इसका अर्थ है, उस व्यवस्था का निर्माण करना, जिसमें हम विश्वास करने का दावा करते हैं न कि पुराने ढाँचे की वापसी का इंतज़ार करना. ऐसे संस्थान और समझौते बनाना जो सचमुच वैसा ही काम करे जैसा बताया जाता है और उस दबाव को कम करना जो ज़बरदस्ती को संभव बनाता है.
यह एक मज़बूत घरेलू अर्थव्यवस्था बनाने से शुरू होता है. यह हर सरकार की तात्कालिक प्राथमिकता होनी चाहिए.
कनाडा के पास वह है, जो दुनिया चाहती है. हम एक ऊर्जा महाशक्ति हैं. हमारे पास महत्वपूर्ण खनिजों का विशाल भंडार है. हमारे पास दुनिया की सबसे शिक्षित आबादी है. हमारे पेंशन फ़ंड दुनिया के सबसे बड़े निवेशकों में एक हैं. दूसरे शब्दों में, हमारे पास पूँजी और प्रतिभा है. हमारे पास निर्णायक कार्रवाई करने की अपार राजकोषीय क्षमता वाली सरकार भी है और हमारे पास वे मूल्य हैं, जिनसे बहुत से लोग आकांक्षा रखते हैं.
कनाडा एक ऐसा बहुलतावादी समाज है जो काम करता है. हमारा सार्वजनिक विमर्श ऊँची आवाज़ वाला, विविध और स्वतंत्र है. हमारे पास एक और चीज़ है: जो हो रहा है, उसकी समझ और उसी के अनुरूप कार्रवाई करने का संकल्प. हम समझते हैं कि यह विध्वंस अधिक की माँग करता है. यह दुनिया को जैसी है, वैसी मानकर ईमानदारी से सामना करने की माँग करता है.
तो हम खिड़की से तख्ती हटा रहे हैं.
हम जानते हैं कि पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आने वाली. हमें उसका शोक नहीं मनाना चाहिए. नॉस्टेल्जिया कोई रणनीति नहीं है. लेकिन हमें विश्वास है कि इस टूटन से हम कुछ बड़ा, बेहतर, मज़बूत और अधिक न्यायपूर्ण बना सकते हैं. यही मध्यम शक्तियों का काम है, वे देश जिन्हें किलों की दुनिया से सबसे अधिक नुक़सान होगा और वास्तविक सहयोग से सबसे अधिक लाभ मिल सकता है.
शक्तिशाली देशों के पास उनकी शक्ति है. लेकिन हमारे पास भी कुछ है: दिखावा बंद करने की क्षमता, वास्तविकताओं को नाम देने की क्षमता, अपने घर में अपनी ताक़त बनाने की क्षमता और मिलकर कार्रवाई करने की क्षमता. यही कनाडा का रास्ता है. हम इसे खुले तौर पर और आत्मविश्वास के साथ चुनते हैं और यह रास्ता हर उस देश के लिए खुला है जो हमारे साथ इसे अपनाने को तैयार हैं."
कार्नी के भाषण की चर्चा
सोशल मीडिया पर मार्क कार्नी के भाषण को काफ़ी सराहा जा रहा है. द इकोनॉमिस्ट मैगज़ीन के वॉल स्ट्रीट एडिटर माइक बर्ड ने भाषण को 'दुर्लभ अपवाद' बताया है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, "आमतौर पर राजनीतिक भाषणों का स्तर इतना गिर चुका है कि उन्हें सीधे पढ़ने की बजाय सिर्फ़ उनकी रिपोर्टिंग देखना ही काफ़ी माना जाता है, लेकिन कार्नी का दावोस में दिया गया भाषण एक दुर्लभ अपवाद है."
डच इतिहासकार और लेखक रुत्गर ब्रैगमेन ने कार्नी के भाषण के अंश को शेयर करते हुए लिखा, "कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का भाषण बेहद प्रभावशाली, असाधारण और पूरी तरह बेबाक था. काश, हमारे पास ऐसे यूरोपीय नेता होते."
भारतीय पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी इस भाषण की तारीफ़ की है. उन्होंने एक्स पर लिखा, "दावोस में तहलका मचाने वाला यह भाषण इस समय हर जगह चर्चा में है. कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी पूरे शहर की बातचीत का विषय बने हुए हैं. सबक़ साफ़ है: जो लोग दबंगों के सामने खड़े होते हैं, उनका सम्मान किया जाता है, न कि उन लोगों का जो ताक़त के आगे झुक जाते हैं."
आम लोगों के अलावा चीन से भी इस भाषण पर प्रतिक्रिया आई है. चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने मार्क कार्नी के भाषण की क्लिप को एक्स पर शेयर किया है.
ग्लोबल टाइम्स ने लिखा, "कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने मंगलवार को स्विट्ज़रलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम में एक बेहद अहम भाषण दिया. इसमें उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के 'टूटने के दौर' से गुज़र रही है और मध्यम ताक़त वाले देशों से सिद्धांतों के साथ-साथ व्यावहारिक रहने की अपील की."
"कार्नी की इस टिप्पणी ने पश्चिमी मीडिया का ध्यान तुरंत खींचा. कई पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने इस भाषण को हाल के वर्षों में अमेरिका के क़दमों के बाद दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी व्यवस्था के कमजोर पड़ने पर एक तीखा संकेत माना."
मैक्रों भी ख़फ़ा
दावोस में फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी कहा कि सारे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों को पैरों तले रौंदा जा रहा है.
इमैनुएल मैक्रों ने कहा, ''ऐसा लगता है कि सबसे ताक़तवर लोगों का क़ानून ही मायने रखता है. साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएँ फिर से उभर रही हैं. रूस का यूक्रेन के ख़िलाफ़ छेड़ा गया आक्रामक युद्ध, जो अगले महीने अपने चौथे वर्ष में प्रवेश करेगा, इसका स्पष्ट उदाहरण है. मध्य पूर्व और अफ्रीका के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष जारी हैं."
"यह एक ऐसे विश्व की ओर भी बदलाव है, जहाँ प्रभावी सामूहिक शासन नहीं है, जहाँ बहुपक्षवाद को उन शक्तियों द्वारा कमज़ोर किया जा रहा है जो या तो उसमें बाधा डालती हैं या उससे मुँह मोड़ लेती हैं.''
इमैनुएल मैक्रों ने कहा, ''मैं ऐसे कई उदाहरण गिना सकता हूँ, जहाँ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ कमज़ोर हुई हैं या उन्हें छोड़ दिया गया है. जब हम इस स्थिति को देखते हैं, तो यह स्पष्ट रूप से बेहद चिंताजनक समय है, क्योंकि हम उस ढाँचे को नष्ट कर रहे हैं, जिसके ज़रिये हम हालात को सुधार सकते थे और अपनी साझा चुनौतियों का समाधान कर सकते थे.'
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.