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नितिन नबीन को बीजेपी की कमान लेकिन ये हैं पाँच बड़ी चुनौतियां
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अटल बिहारी वाजपेयी जब 1968 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने तो उनकी उम्र महज 44 साल हो रही थी.
लालकृष्ण आडवाणी भी 46 साल की उम्र में 1973 में जनसंघ के अध्यक्ष बने थे. 1977 में भारतीय जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हो गया. लेकिन यह विलय तीन साल से ज़्यादा नहीं चला. छह अप्रैल 1980 को भारतीय जनता पार्टी बनी और पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी बने.
तब बीजेपी कांग्रेस का विकल्प बनने की कोशिश कर रही थी. 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को केवल दो सीटें मिलीं.
इस चुनावी नतीजे को लेकर बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी किताब 'माई कंट्री माई लाइफ़' में लिखा है, ''इस चुनावी नतीजे ने हमें वहाँ पहुँचा दिया था, जहां हम जनसंघ के ज़माने में 1952 के पहले चुनाव में थे. इस चुनावी नतीजे के बाद अटल जी ने दो प्रश्न रखे थे- क्या 1977 में जनसंघ को जनता पार्टी में मिलाना और फिर 1980 में जनता पार्टी से अलग हो जाने का निर्णय ही पार्टी की हार कारण बना? दूसरा सवाल यह कि क्या बीजेपी को फिर से जनसंघ हो जाना चाहिए?''
बीजेपी अब इन दोनों सवालों से बहुत आगे निकल चुकी है और 45 वर्ष से ज़्यादा का सफ़र तय कर चुकी है. नितिन नबीन का जन्म बीजेपी के जन्म से क़रीब दो महीने बाद 23 मई 1980 को हुआ था. अब उन्हीं नितिन नबीन के पास बीजेपी की ज़िम्मेदारी है.
45 साल के नितिन नबीन को बीजेपी की कमान मिली तो उनकी उम्र की चर्चा काफ़ी हुई लेकिन बीजेपी से पहले जनसंघ में भी ऐसा होता रहा है.
अटल से नितिन नबीन तक
नितिन नबीन बीजेपी के अध्यक्ष तब बने हैं, जब बीजेपी ऐतिहासिक रूप से बहुत मज़बूत है. आज बीजेपी की 240 लोकसभा सीटें हैं और 21 राज्यों में बीजेपी या उसकी अगुआई वाले गठबंधन एनडीए की सरकार है. राज्यसभा में भी बीजेपी के 99 सांसद हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नितिन नबीन के सामने कोई चुनौती नहीं होगी?
नीना व्यास लंबे समय तक अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिन्दू' के लिए बीजेपी को कवर करती थीं. उनका मानना है कि बीजेपी जब सरकार में होती है तो अध्यक्ष पद का महत्व हाँ में हाँ मिलाने से ज़्यादा नहीं होता है.
नीना व्यास कहती हैं, ''यह बात मैं केवल 2014 के बाद वाली बीजेपी की नहीं कर रही हूं. 2014 से पहले भी चलती अटल-आडवाणी की ही थी. सारे फ़ैसले पीएमओ में होते थे. पार्टी का भी और सरकार का भी. 2002 में नरेंद्र मोदी को जब गुजरात का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया तो उस वक़्त के बीजेपी अध्यक्ष जना कृष्णमूर्ति को पता भी नहीं था. कुशाभाऊ ठाकरे तो आडवाणी की सहमति के बिना कुछ नहीं कर पाते थे. बंगारू लक्ष्मण की हालत तो उनसे भी ख़राब थी. तब अटल-आडवाणी से अलग मुरली मनोहर जोशी थोड़ी ठीक स्थिति में थे.''
नीना व्यास कहती हैं, ''मेरा कहने का मतलब यह है कि नितिन नबीन के लिए फ़िलहाल अमित शाह और मोदी ही चुनौती हैं और वही समाधान भी.''
नितिन नबीन के अध्यक्ष बनने को दो तरीक़ों से देखा जा रहा है. बीजेपी से सहानुभूति रखने वाले लोगों का कहना है कि यह ऐसी पार्टी है, जहाँ आम कार्यकर्ता भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन सकता है. दूसरी तरफ़ बीजेपी के आलोचकों का कहना है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह जो चाहते हैं, पार्टी में वही होता है.
लेकिन आरएसएस और बीजेपी की राजनीति पर क़रीब से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक नीलांजन मुखोपाध्याय नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने को ऊपर के दोनों तर्कों के बीच में देखते हैं.
वह कहते हैं, ''ये बात सही है कि बीजेपी में लगभग अनजान कार्यकर्ताओं को भी पार्टी में ऊपर तक आने का मौक़ा मिलता है. नितिन नबीन ने बहुत लोगों को साइडलाइन तो नहीं किया है लेकिन ओवरटेक ज़रूर किया है. लेकिन ओवरटेक करने की उनकी क्षमता न तो राष्ट्रीय स्तर पर उभरकर सामने आई थी और न ही उनके गृह राज्य बिहार में प्रदेश स्तर पर. दूसरी तरफ़ वाजपेयी और आडवाणी जब जनसंघ के अध्यक्ष इस उम्र में बने थे तो वे ख़ुद को साबित कर चुके थे. ऐसे में यह बात भी दुरुस्त नज़र आती है कि नितिन नबीन का चयन इसलिए हुआ क्योंकि वह अमित शाह और नरेंद्र मोदी के वफ़ादार हैं.''
आरएसएस की पसंद और नापंसद
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की नियुक्ति में देरी को आरएसएस के कथित रूप से समहत नहीं होने से जोड़ा जा रहा था. नितिन नबीन के बारे में कहा जा रहा है कि वह ऐसे व्यक्ति हैं, जिनका न संघ विरोध कर सकता है और न बीजेपी के भीतर उनकी स्वीकार्यता को लेकर कोई विवाद है.
नीना व्यास मानती हैं कि नितिन नबीन बीजेपी अध्यक्ष के रूप में कोई पहली पसंद नहीं रहे होंगे लेकिन बीजेपी में कई बार लो प्रोफ़ाइल रहना आपके हक़ में चला जाता है.
नीना व्यास कहती हैं, ''बीजेपी के अध्यक्ष के लिए एक बड़ी चुनौती यह भी होती है कि वह आरएसएस से अच्छा समन्वय बनाकर रखे. मेरा आकलन है कि बीजेपी का कोई भी अध्यक्ष ऐसा नहीं हुआ है, जिस पर आरएसएस की असहमति रही हो. 2005 में आरएसएस के कारण ही आडवाणी को बीजेपी का अध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा था.''
दरअसल, 2005 में बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी पाकिस्तान गए थे. आडवाणी कराची में जिन्ना के मज़ार पर गए थे और उन्हें श्रद्धांजलि दी थी.
आडवाणी ने जिन्ना को श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें सेक्युलर और हिन्दू-मुस्लिम एकता का राजदूत बताया था.
आडवाणी ने जिन्ना की तारीफ़ में वहाँ के रजिस्टर पर लिखा था, ''ऐसे कई लोग हैं, जिन्होंने इतिहास में अमिट छाप छोड़ी है. लेकिन बहुत कम लोग हैं, जिन्होंने इतिहास बनाया है. क़ायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना उन कम लोगों में से एक हैं.''
हालांकि नितिन नबीन की पृष्ठभूमि आरएसएस वाली नहीं रही है. इन्होंने पढ़ाई भी सेंट माइकल हाई स्कूल पटना से की है और दिल्ली के कर्नल सत्संगी किरण मेमोरियल पब्लिक स्कूल से इंटमीडिएट की पढाई की है. नितिन नबीन भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा में राष्ट्रीय महासचिव ज़रूर रहे हैं.
हालांकि 2014 के बाद की बीजेपी में यह बहुत मायने नहीं रखता है कि किस व्यक्ति की पृष्ठभूमि क्या रही है. कांग्रेस से बीजेपी में आने वाले लोग भी मुख्यमंत्री तक बने.
नितिन नबीन की चुनौतियां
भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय महासचिव के रूप में नितिन नबीन ने संगठनात्मक कौशल का प्रदर्शन किया था. कहा जाता है कि नवंबर 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में बीजेपी के सह-प्रभारी के तौर पर नबीन ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को ख़ास तौर पर प्रभावित किया, जब पार्टी ने भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ कांग्रेस को हराकर अप्रत्याशित जीत दर्ज की.
अगले वर्ष उन्हें छत्तीसगढ़ में लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी का प्रभारी नियुक्त किया गया, जहां पार्टी ने राज्य में सभी सीटें जीत लीं. जुलाई 2024 में उन्हें राज्य का पार्टी प्रभारी बनाया गया.
1. 2026 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव
अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन के सामने इस साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, पुदुचेरी और केरल में विधानसभा चुनाव होंगे. इनमें से किसी भी राज्य में बीजेपी के लिए लड़ाई आसान नहीं है.
लेकिन असली चुनौती 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करना होगा. ये चुनाव ऐसे समय में होंगे, जब देश परिसीमन की प्रक्रिया से गुज़र रहा होगा. लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण लागू किया जा रहा होगा. ऐसे में नए अध्यक्ष को बदले हुए राजनीतिक माहौल के अनुरूप पार्टी को तैयार करना होगा.
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान संसद से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के अनुसार, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण उस परिसीमन के बाद लागू होगा, जो इस अधिनियम के लागू होने के बाद कराई जाने वाली पहली जनगणना के आधार पर किया जाएगा.
कहा जा रहा है कि मोदी सरकार का मक़सद 2029 के आम चुनावों में महिला आरक्षण को लागू करने का है. सरकार ने जनगणना शुरू करने की अधिसूचना पहले ही जारी कर दी है. यह एक मार्च 2027 की स्थिति के मुताबिक़ देश की जनसंख्या का आकलन प्रस्तुत करेगी. इसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया के लिए मंच तैयार हो जाएगा.
2. नेतृत्व की चुनौतियां
नरेंद्र मोदी की उम्र 2029 के लोकसभा चुनाव में 80 साल के क़रीब पहुँच जाएगी. ऐसे में बीजेपी का नेतृत्व मोदी के बाद कौन करेगा, इस सवाल से भी नितिन नबीन को जूझना पड़ेगा. 2013 में नरेंद्र मोदी को जब बीजेपी के चुनाव अभियान की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी तो यह बहुत सहमति से नहीं हुआ था. आडवाणी ने सार्वजनिक रूप से इसका समर्थन नहीं किया था.
नरेंद्र मोदी के बाद अमित शाह को बीजेपी में नंबर दो की हैसियत के रूप में देखा जाता है. लेकिन अमित शाह की स्वीकार्यता पर सर्वसम्मति बनाने की चुनौती बनी रहेगी. 'बीजेपी में मोदी के बाद कौन' सवाल का जवाब योगी आदित्यनाथ के रूप में भी लोग देते हैं. लेकिन कहा जाता है कि योगी की बीजेपी संगठन में वैसी पकड़ नहीं है, जैसी अमित शाह की है.
नीना व्यास कहती हैं, ''योगी बहुत लोकप्रिय हैं लेकिन संगठन की भीतर उन्हें संघर्ष करना पड़ेगा. दूसरी तरफ़ अमित शाह की संगठन में बहुत अच्छी पकड़ है लेकिन योगी चुनौती देंगे तो लोगों के बीच उन्हें संघर्ष करना पड़ेगा.''
नीलांजन मुखोपाध्याय कहते हैं कि बीजेपी में शीर्ष के नेतृत्व के बाद नीचे का नेतृत्व ग़ायब है और भविष्य में बीजेपी को इस संकट से जूझना पड़ेगा.
मुखोपाध्याय कहते हैं, ''इस बात से शायद ही कोई इनकार कर सकता है कि मोदी के बाद के नेतृत्व के लिए अमित शाह बनाम योगी की स्थिति बन सकती है. इस तरह की कशमकश 2013 में भी बीजेपी के भीतर देखने को मिली थी, जब आडवाणी वाली टीम से बीजेपी बाहर आई. नितिन नबीन अमित शाह की पसंद हैं लेकिन योगी के साथ उनके संबंध कैसे होंगे, ये भी मायने रखता है.''
3. संगठन के स्तर पर चुनौतियां
नितिन नबीन की पहचान संगठन के व्यक्ति के रूप में ही है और कहा जाता है कि बीजेपी अध्यक्ष बनने में उनकी इस पहचान की अहम भूमिका रही है.
नितिन नबीन अपने पिता की मौत के बाद 2006 में पहली बार पटना पश्चिम से विधायक बने थे. तब नितिन ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे थे. यानी राजनीति में उनका आना अचानक ही हुआ था. लेकिन नितिन नबीन ने ख़ुद को साबित किया और पांचवीं बार विधायक बने. बिहार सरकार में अभी मंत्री भी हैं.
चिमनभाई पटेल इंस्टिट्यूट के निदेशक डॉ हरि देसाई को लगता है कि नितिन नबीन को संगठन के स्तर पर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
देसाई कहते हैं, ''बीजेपी भी आलाकमान की पार्टी हो गई है. जब शक्ति का केंद्रीकरण होता है तो संगठन अपने अनुशासन के हिसाब से काम न करके आलाकमान के इशारों पर करता है. ऐसे में नितिन नबीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह आलाकमान की सुनें या संगठन के अनुशासन को तवज्जो दें. अगर बीजेपी में संगठन मज़बूत हो जाएगा तो किसी एक की मुट्ठी में सारा नियंत्रण नहीं हो पाएगा.''
कोलकाता यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर हिमाद्रि चटर्जी कहते हैं कि बीजेपी की मशीनरी और संगठन बहुत व्यापक तो है ही लेकिन जटिलताएं भी हैं, ऐसे में नितिन नबीन के लिए संगठनों को दुरुस्त रखने की राह बहुत आसान नहीं होगी.
हिमाद्रि चटर्जी कहते हैं कि नितिन नबीन के लिए सबसे मुश्किल है, दक्षिण भारत में संगठनों को मज़बूत करना.
4. बदलती जियोपॉलिटिक्स
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक परिस्थितियां तेज़ी से बदली हैं. भारत के पक्ष में बहुत चीज़ें नहीं हैं. भारत न चाहते हुए भी चीन से चीज़ें सामान्य कर रहा है.
बीजेपी ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (सीपीसी) के साथ अपना संवाद फिर से शुरू किया है, जो 2009 के बाद पहली बार हुआ है. इसी महीने एक चीनी प्रतिनिधिमंडल पार्टी नेताओं से मुलाक़ात के लिए दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय पहुंचा था.
ट्रंप ने पहले से ही भारत के ख़िलाफ़ 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगा रखा है और ईरान से व्यापार करने पर 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है. ऐसे में सत्तारूढ़ दल होने के नाते बीजेपी इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती. नए पार्टी अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन को भी इन वास्तविकताओं से दो चार होना पड़ेगा.
प्रोफ़ेसर हिमाद्रि चटर्जी कहते हैं, ''भारत में कभी भी गंभीर आर्थिक संकट गहरा सकता है और बीजेपी के लिए विकास के नैरेटिव बनाए रखना आसान नहीं होगा. हमारी ग्रोथ जितनी होनी चाहिए, उतनी है नहीं. बहुत बड़ी चुनौती है कि भारत की आर्थिक वृद्धि के वितरण का लोकतंत्रीकरण कैसे किया जाए. भारत की बहुसंख्य आबादी अगले 10 साल में जवान नहीं रहने वाली है. अगले 10 सालों में भारत को जितनी तरक्की करनी है, कर लेनी होगी. इसके बाद बहुत मुश्किल स्थिति होगी. आने वाले समय में बीजेपी के लिए ये सबसे बड़ी चुनौती होगी.''
5. वैचारिक और सांस्कृतिक द्वंद्व
बीजेपी के हर नेतृत्व के लिए हमेशा से कुछ चुनौतियां समान रही हैं. भारत की भाषायी और सांस्कृतिक बहुलता को जोड़ने की चुनौती हमेशा से बीजेपी के लिए रही है.
दक्षिण और पूरब में हमेशा से बीजेपी के लिए यह समस्या रही है. बीजेपी के उत्तर और पश्चिम के नेताओं के लिए दक्षिण और पूरब की सांस्कृतिक और भाषायी बहुलता चुनौती रही है. इस चुनौती से नितिन नबीन को भी टकराना होगा.
इसके अलावा मज़बूत क्षेत्रीय और जाति आधारित पार्टियां भी बीजेपी के लिए चुनौती रही हैं. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में बीजेपी को इन दोनों चुनौतियां का सामना करना पड़ेगा. नितिन नबीन को इससे निपटने के लिए कोई आसान तरीक़ा मिल जाएगा, ऐसा लगता नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.