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'एक दिन वो हिंदुस्तान का हीरा था, अब हर तरफ़ ग़द्दार के नारे': एआर रहमान पर मोहम्मद हनीफ़ का ब्लॉग
- Author, मोहम्मद हनीफ़
- पदनाम, सीनियर जर्नलिस्ट और लेखक
एआर रहमान भी सोच रहे होंगे कि मैं एक इंटरव्यू में अपने दिल की बात कहकर पता नहीं किस मुसीबत में पड़ गया हूँ.
एक दिन वह भारत का हीरा था, पूरी दुनिया में उनकी चर्चा थी. फ़िल्मफ़ेयर, नेशनल अवॉर्ड, गोल्डन ग्लोब, ऑस्कर वाले अवॉर्ड दे-देकर थक गए थे.
इंडिया की सॉफ्ट पावर के सबसे बड़े सिंबल थे. पूरी दुनिया में अपना म्यूज़िक सुनाते थे, लोगों को नचाते थे और फिर 'माँ तुझे सलाम' गाना गाकर इंडिया का झंडा पूरी दुनिया में लहराए जा रहे थे.
इंटरव्यू में यह कह बैठे कि बॉलीवुड में पावर चेंज हो गया है, "मुझे अब काम कम मिल रहा है." हो सकता है कि इसका कारण कम्युनल ही हो. अब सभी उनके पीछे पड़ गए हैं कि जिस थाली में से खा रहे हो उसी में छेद कर रहे हो. हर तरफ़ से ग़द्दार, ग़द्दार के नारे लगने लगे हैं.
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वो बात जो किसी ने नहीं सुनी
उन्होंने माफ़ी भी मांग ली है, फिर भी लोग कह रहे हैं कि अगर तुम्हें इंडिया पसंद नहीं है, तो यहाँ से चले जाओ. उन्होंने इंटरव्यू में एक और बात कही जो किसी को याद नहीं रही या जो किसी ने सुनी नहीं है.
उन्होंने कहा कि "जब मैं पहली बार मुंबई आया था, तो मुझे हिंदी नहीं आती थी और तमिलों के लिए हिंदी सीखना वैसे भी बहुत मुश्किल काम होता है."
"लेकिन सुभाष घई साहब ने मुझे समझाया कि अगर तुम्हें यहीं रहकर काम करना है तो तुम हिंदी सीख लो और मैंने कहा कि मैं हिंदी भी सीखूंगा और एक क़दम आगे बढ़कर उर्दू भी सीख लूंगा." फिर वह कहते हैं, "उसके बाद मैंने पंजाबी भी सीखी क्योंकि मुझे उस्ताद नुसरत फ़तेह अली ख़ान बहुत पसंद थे."
मेरे दिल से निकला कि यह होता है सच्चा फ़नकार, यह है देशों को जोड़ने का सही तरीक़ा. हमारे हर मूड, हर ख़ुशी, हर ग़म, हर जश्न, हर मातम, हर उदासी के लिए एआर रहमान का कोई न कोई गाना मौजूद है. हर भाषा में मौजूद है.
साथ ही उन्होंने वो बात भी की जो पुराने बॉलीवुड डायरेक्टर अनुराग कश्यप और सुभाष घई, राम गोपाल वर्मा सभी करते आए हैं. वो ये कि पहले फ़िल्में फ़नकार बनाते थे, अब कौन सी फ़िल्म बनेगी और किस तरह की फ़िल्म बनेगी, ये फ़ैसले सेठों के बोर्डरूम में होते हैं और ये सारे फ़ैसले अब अकाउंटेंट करते हैं.
साथ ही यह भी कह बैठे कि हो सकता है कि बॉलीवुड में कम्युनलिज़्म भी आ गया हो और अगर यह पॉलिटिक्स में आ गया, शराफ़त में आ गया, प्रॉपर्टी मार्केट में मौजूद है तो हो सकता है कि कुछ हद तक बॉलीवुड में भी आ गया हो.
नाम 'अल्लाह रख्खा रहमान' है
जो लोग उन्हें नाशुक्रे और ग़द्दार कह रहे हैं, वे असल में यह कहना चाह रहे हैं कि हम जानते हैं कि तुम्हारा नाम 'अल्लाह रख्खा रहमान' है. तुम शुक्र करो कि हम तुम्हें वंदे मातरम गाने देते हैं, तुम बस गाया करो, बजाया करो लेकिन तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि तुमने अपना मुंह खोला?
जो लोग ज़्यादा पढ़े-लिखे हैं, वे कह रहे हैं कि दिक्कत यह है कि एआर रहमान में अब पहले जैसी बात नहीं रही है. उसका म्यूज़िक थोड़ा बोरिंग हो गया है, गाने हिट नहीं हो रहे हैं. लेकिन काम की तो एआर रहमान के पास कोई कमी नहीं है. रामायण पर सबसे बड़ी फ़िल्म बन रही है, उसका म्यूज़िक वह दे रहा है. कई इंटरनेशनल फ़िल्मों के लिए भी म्यूजिक दे रहा है.
अभी कितना समय हुआ है जब एक फ़िल्म 'चमकीला' आई थी, और उसका म्यूज़िक भी एआर रहमान ने दिया था, और पूरे पंजाब में हर कोई "मैं हूँ पंजाब.. मैं हूँ पंजाब" गा रहा था. तब किसी ने नहीं कहा कि तुम तमिल हो, तुम पंजाबी फ़िल्म के लिए म्यूज़िक क्यों दे रहे हो.
अगर आपने ग़द्दार-ग़द्दार का राग अलापना है तो अलापते रहो, पहले पांच मिनट रुककर एआर रहमान का कोई गाना सुन लें, जो भी पसंद हो, हर किसी को उनका कोई न कोई गाना पसंद है ही.
अगर आपको उनका कोई भी गाना पसंद नहीं है तो फिर आप अपना बेसुरा राग गाओ. एआर रहमान और आप सब का रब्ब राखा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.