वो तस्वीरें जो अंतरिक्ष को जीवंत कर देती हैं

    • Author, स्टीफ़न डॉवलिंग
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

आप और हम कभी चांद पर गए तो नहीं लेकिन उसके दर-ओ-ज़मीन की तस्वीरें हम सभी ने देखी हैं.

ये तस्वीरें अब से 50 साल पहले हमारे सामने आई थीं.

नासा के अपोलो प्रोग्राम के तहत 1969 में जब सबसे पहले इंसान चांद पर पहुंचा तो उसने वहां की तस्वीरें कैमरे में क़ैद की और हम सबको चांद का दीदार कराया.

उस वक़्त इन तस्वीरों के बारे में बहुत कुछ लिखा गया.

ये तस्वीरें मिसाल बन गईं. लेकिन इनमें एक कमी थी.

ये तस्वीरें चांद का अक्स तो पेश करती थीं लेकिन तस्वीर और उसे देखने वाले के बीच रिश्ता नहीं बनाती थीं. बेजान सी लगती थीं.

चांद की थ्री-डी तस्वीरें

तस्वीरों की इस कमी को महसूस किया ब्रिटेन के म्यूज़िक बैंड 'क्वीन' के ब्रायन मे ने.

उन्होंने स्टीरियो फ़ोटोग्राफ़ी के ज़रिए इनमें नई जान डाल दी है. इन तमाम तस्वीरों को थ्री-डी फ़ॉर्मेट में तैयार करके एक किताब की शक्ल में पेश किया.

चांद की थ्री-डी वाली तस्वीरों की ये पहली किताब है.

स्टीरियो फ़ोटोग्राफ़ी एक ख़ास तरह की फ़ोटोग्राफ़ी है जिसमें एक ही तस्वीर के कई प्रिंट मिलाकर उसे जीवंत बनाया जाता है.

यानी इन तस्वीरों को देखकर लगता है कि आप उस जगह पर मौजूद हैं.

ब्रायन मे गिटारिस्ट हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वो स्टीरियो फ़ोटोग्राफ़ी का शौक़ भी रखते हैं और एस्ट्रोफ़िज़िक्स में उन्होंने डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की है और अपने जुनून को उन्होंने अपना पेशा बना लिया है.

लंदन में उनकी अपनी पब्लिशिंग कंपनी है जिसका नाम है लंदन स्टीरियोस्कोपिक कंपनी.

इनकी कंपनी में महारानी विक्टोरिया के दौर से लेकर चांद पर जाने वाले हर एक एस्ट्रोनॉट के सफ़र की सीरीज़ थ्री-डी फॉर्मेट में मौजूद है.

ब्रायन की कंपनी में थ्री-डी तस्वीरों का निजी म्यूज़ियम है, जहां उनकी तराशी हर तस्वीर मौजूद है. इस म्यूज़ियम से ब्रायन की बचपन की यादें जुड़ी हैं.

क्या होती है स्टीरियोस्कोपिक तस्वीर?

दरअसल, इस म्यूज़िम की प्रेरणा उन्हें बचपन में ही मिली थी. ब्रायन जब सात साल के थे उन्होंने अनाज के एक पैकेट पर दो तस्वीरें एक साथ देखी थीं.

जब उन्होंने इन तस्वीरों को स्टीरियो ग्लास के साथ देखा तो वो इन्हें इस तस्वीर के तीन आयाम नज़र आए.

इसके बाद उन्होंने स्टीरियो ग्लास ख़रीद लिया और इससे उन्होंने एक दरियाई घोड़े की तस्वीर देखी जिसका मुंह खुला हुआ था.

स्टीरियो ग्लास से ये तस्वीर देखने पर उन्हें लगा कि ये दरियाई घोड़ा तो उनकी नज़र के सामने ही खड़ा महसूस हो रहा है.

यहीं से उनके दिल में स्टीरियो फ़ोटोग्राफ़ी के लिए लगाव पैदा हो गया. उनके म्यूज़ियम में आज भी अनाज का वो पैकेट, दरियाई घोड़े वाला कार्ड और स्टीरियो ग्लास मौजूद है जिसने उन्हें इस ख़ास क़िस्म की फोटोग्राफ़ी के लिए जुनूनी बना दिया था.

पहली बार जब उन्होंने कैमरा ख़रीदा और उससे स्टीरियो इमेज तैयार करनी सीखी तो सबसे पहले उन्होंने अपने पिता की तस्वीरें उतारी थीं.

लंदन स्टीरियोस्कॉपिक कंपनी थ्री-डी फ़ोटोग्राफ़ी वाली बहुत सी किताबें छाप चुकी है.

नासा वाली तस्वीरों का थ्रीडी वर्ज़न

लेकिन चांद के सफ़र वाली थ्री-डी तस्वीरों वाली ये किताब कुछ ख़ास है. इस किताब को तैयार करने में ब्रायन मे की मदद की है, उनकी दोस्त क्लॉडिया मैन्ज़नी ने.

क्लॉडिया नासा आर्काइव में काम कर चुकी हैं. उन्होंने नासा की लाइब्रेरी से चुन-चुनकर वो तस्वीरें निकालीं जिनका थ्री-डी रिज़ल्ट ज़्यादा बेहतर हो सकता था.

शुरुआती दौर में जितने लोग चांद पर गए उनके साथ हाईटेक कैमरे नहीं गए थे.

बाद में जाने वाले एस्ट्रोनॉट अपने साथ कुछ अच्छे कैमरे लेकर गए. इनमें कई कैमरे थ्री-डी रिज़ल्ट वाले भी थे.

फिर बाद में कंप्यूटर की मदद से इन्हें और बेहतर बनाया गया लेकिन ब्रायन इस फ़ार्मूले को बहुत पहले ही आज़मा चुके थे.

दरअसल, क़ुदरत ने इंसान को थ्री-डी तकनीक के साथ ही पैदा किया है. हमारी दोनों आंखें एक ही चीज़ की अलग-अलग तस्वीर लेती हैं. और दिमाग़ इन अलग-अलग तस्वीरों को एक दूसरे पर रखकर उसे एक बना देता है और उनका थ्री-डी प्रिंट तैयार करता है.

इसीलिए हमें हर चीज़ अपने ओरिजनल साइज़ और शक्ल में नज़र आती है. थ्री-डी तकनीक बिल्कुल इसी तरह काम करती है.

अंतरिक्ष यात्रियों ने सीखा तस्वीर खींचना

पहले चांद पर जाने वालों को स्टीरियो फ़ोटोग्राफ़ी की बुनियादी ट्रेनिंग दी गई थी ताकि उनकी ली गई तस्वीरों का बाद में थ्री-डी प्रिंट तैयार किया जा सके.

अपोलो मिशन-11 के तहत चांद पर जाने वाले माइकल कॉलिन्स का कहना है कि उन्होंने एक ही जगह की कई एंगल से तस्वीर ली थी.

लेकिन ये सब उन्होंने जानबूझकर नहीं किया था. वो स्टीरियो फ़ोटोग्राफ़ी के बारे में जानते भी नहीं थे.

लेकिन उनकी हाज़िर दिमाग़ी की वजह से ऐसी तस्वीरें मिल गईं जिन्हें स्टीरियो तकनीक के ज़रिए थ्री-डी बना दिया गया.

ब्रायन का कहना है कि उन्होंने चांद पर जाने वाले पहले शख़्स नील आर्मस्ट्रॉन्ग के साथ काफ़ी समय बिताया है.

उनसे हर तरह के मसले पर बात होती थी, लेकिन चांद पर गुज़ारे गए वक़्त के दिनों की बात बहुत कम होती थी. ब्रायन मे को इस बात का मलाल है.

उनका कहना है कि अगर उन्होंने नील आर्मस्ट्रॉन्ग से उनके तजुर्बों के बारे में बात की होती तो शायद वो तस्वीरों को और बेहतर तरीक़े से पेश कर पाते.

अपोलो 13 प्रोजेक्ट के तहत चांद पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट जिम लॉवेल का कहना है कि चांद की सरज़मीन की ये तस्वीरें सच्चाई के सबसे ज़्यादा नज़दीक हैं.

इन्हें देखकर लगता है आप चांद पर मौजूद हैं. स्टीरियो फ़ोटोग्राफ़ी वाली तस्वीरों की ये अब तक की बेहतरीन किताब है.

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