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नगदी गिनने का काम: इंसान करे या मशीन
- Author, ब्रायन लुफ़किन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
तकनीक ने ज़माने को बहुत एडवांस बना दिया है. एक वक़्त था जब आप खरीदारी करने जाते थे तो दुकानदार से आपका सामना होता था.
वो एक ही चीज़ की दस क़िस्में आपको दिखाता था. उसमें कोई एक आप पसंद के मुताबिक़ ख़रीदते थे. फिर बिल बनवाने की लाइन में लगते थे.
कुल मिलाकर ख़रीदारी करना एक मुश्किल भरा काम हो जाता था. लेकिन आज मशीनों ने इस मुश्किल को आसान कर दिया है.
आज आप किसी भी स्टोर में जाएं. अपनी मर्ज़ी से समान उठाएं और मशीन के ज़रिए क़ीमत अदा करके अपने घर आ जाएं.
आपको दुकानदार से बातचीत में अपना वक़्त और एनर्जी बर्बाद करने की ज़रूरत नहीं. हालांकि कई बार मशीनें भी परेशान करती हैं.
सेल्फ-सर्विस कियोस्क
मशीनें कभी काम ठीक से नहीं करतीं तो कभी बंद ही हो जाती हैं. लेकिन इस सब के बावजूद लोग मशीनों को ही तरजीह देते हैं.
मशीने लगाने से ना सिर्फ़ ख़रीदारों को बल्कि कंपनियों को भी फ़ायदा हो रहा है. यही वजह है कि ज़्यादातर स्टोर में आज वेंडर मशीनें लगाई जा रही है.
एक अंदाज़े के मुताबिक़ साल 2020 तक सेल्फ-सर्विस कियोस्क का बाज़ार, 18 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है.
साल 2021 तक दुनिया भर में इन मशीनों की संख्या दो लाख चालीस हज़ार से बढ़कर चार लाख अड़सठ हज़ार तक पहुंच जाएगी.
टेस्को और वॉलमार्ट जैसी बड़ी कंपनियों में तो बिल बनाने के लिए कोई कर्मचारी है ही नहीं. वहां सारा काम मशीनों से ही होता है.
मनोवैज्ञानिक कारण
इससे कंपनी का ख़र्च तो बचता ही है, ख़रीदार भी क़तार में लगने बच जाते हैं. बहुत से ख़रीदार तो रोबोटिक मशीन की भी हिमायत करते हैं.
इसके पीछे कई तरह के मनोविज्ञानिक कारण हैं. बहुत बार लोग कई चीज़ों के नाम सही-सही नहीं ले पाते. कई बार दुकानदार भी उनकी बात को सही तरह से समझ नहीं पाता.
ऐसे में उन्हें दुकानदार के सामने शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है. सेल्फ-सर्विस कियोस्क के आ जाने से ये समाजिक टकराव भी कम हुआ है.
इंटरनेट का ज़माना है तो ऑनलाइन शॉपिंग का चलन भी खूब चल पड़ा है.
मिसाल के लिए अगर कोई पिज़्ज़ा ऑर्डर करता है तो उसके साथ और दस तरह की फरमाइश भी कर देता है.
तकनीक का गुलाम
वहीं अगर ऐसा ऑर्डर वो काउंटर पर बैठे शख़्स से करेगा तो हो सकता है उसे वो सब कहने में झिझक महसूस हो.
लिहाज़ा खाने की बदलती आदतें भी मशीनों के ज़्यादा प्रयोग को बढ़ावा दे रही है. इसके अलावा हमारा समाज तकनीक का ग़ुलाम बनता जा रहा है.
कंपनियां अपने और ख़रीदार के बीच किसी तीसरे की दखलअंदाज़ी पसंद नहीं करतीं. इसलिए भी कर्मचारियों की जगह मशीनों को तरजीह दी जाने लगी है.
जानकारों के मुताबिक वेबसाइट, सेल्फ-सर्विस कियोस्क, मोबाइल ऐप वगैरह के आ जाने से बिज़नेस करना बहुत आसान हो गया है.
अगर आपका बाहर का खाना खाने का मन है. लेकिन घर से निकलना नहीं चाहते, तो भी बाहर का खाना खाने की आपकी हसरत घर बैठे ही पूरी हो जाएगी.
ऑनलाइन ऑर्डर
बस एक कॉल कीजिए, या वेब साइट पर जाकर ऑनलाइन ऑर्डर कीजिए, खाना आपके घर पहुंच जाएगा.
लेकिन मशीनें तो मशीनें हैं. कभी भी खराब हो सकती हैं. ऐसे में आप क्या करेंगे. ज़ाहिर है किसी कर्मचारी से ही मदद लेंगे.
इसमें कोई शक़ नहीं कि सेल्फ-सर्विस कियोस्क के बहुत फ़ायदे हैं. लेकिन इसके बावजूद कुछ लोगों को इन्हें चलाना मुश्किल लगता है.
ख़़ास तौर से पुरानी पीढ़ी तो आज भी कैशियर के पास जाकर पेमेंट करने को ही आसान समझती है. वजह साफ़ है.
नई तकनीक से उनकी दोस्ती इतनी गाढ़ी नहीं है जितनी नई पीढ़ी की है.
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