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'ईवीएम चैलेंज के लिए चार घंटे काफी नहीं'
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत के बाद चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को ईवीएम हैक करने की चुनौती दी.
इस चुनौती को सिर्फ़ दो राजनीतिक दलों राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) ने मंज़ूर किया है.
चुनाव आयोग के मुताबिक शुक्रवार को आवेदन की सीमा ख़त्म होने तक सिर्फ इन्हीं दो दलों ने आवेदन किया.
दिल्ली विधानसभा में ईवीएम से मिलती मशीन पर डेमो देने की वाली आम आदमी पार्टी ने चुनाव आयोग की ओर से दी गई चुनौती को 'ड्रामा' बताते हुए कहा है कि वो इसमें हिस्सा नहीं लेगी.
आम आदमी पार्टी का कहना है कि मशीन के मदरबोर्ड तक पहुंच नहीं होने की स्थिति में पार्टी ऐसी किसी चुनौती को मंज़ूर नहीं करेगी.
आगामी 3 जून को चुनाव आयोग की चुनौती में हिस्सा लेने वाले एनसीपी प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई करने वाली राज्यसभा सांसद वंदना चह्वाण और सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम से बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय ने बात की. पढ़िए उनका क्या कहना है.
'हम कुछ नहीं कर पाएंगे'
वंदना चह्वाण, राज्यसभा सांसद, एनसीपी
चैलेंज के लिए चार घंटे दिए गए हैं.
मशीन हाथ में आने के बाद उसे समझना, उसका अध्ययन करना, डिकोडिंग कैसे करना है, रिवर्स इंजीनियरिंग कैसे करना है, मशीन हैक या टैंपर हो रही है या नहीं - इसका अध्ययन करना इसमें लंबे वक्त की ज़रूरत है. ये सब चार घंटे में हो ही नहीं सकता.
हमने सोचा था कि सभी पार्टियां इसमें हिस्सा लेंगी. ये एक अवसर है जिसमें पहली बार ईवीएम का सेट हैंडल करने का मौका मिलेगा.
अभी तक किसी ने ईवीएम को हैंडल नहीं किया है. कोई नहीं जानता कि उसका सर्किट कैसा है. उसकी कंप्यूटिंग कैसे होती है.
एनसीपी ने इसे एकेडमिक एक्सराइज़ के तौर पर लिया है. हम इसे चुनौती मानकर सफल होने का इरादा नहीं रखते हैं.
हम इन चार घंटों में अध्ययन करने का उद्देश्य लेकर जा रहे हैं.
चुनाव आयोग ने कहा था कि आप चार मतदान केंद्रों की मशीनों की मांग कर सकते हैं.
इन पांच राज्यों में हमारे इक्का-दुक्का ही उम्मीदवार थे. हमने कहा है कि आप हमें कोई भी चार मशीनें दे दीजिए, लेकिन हमने ये शर्त रखी है कि चार दिन पहले हमें बूथ यूनिट का नंबर, कंट्रोल यूनिट का नंबर, बैटरी नंबर और मैमोरी नंबर उपलब्ध कराया जाए.
अगर हमें ये नहीं मिलेगा तो हम तीन तारीख़ को कुछ नहीं कर सकेंगे.
मैं चैलेंज में जाने के पहले ही कहती हूं कि हम इन चार घंटों में कुछ नहीं कर सकेंगे.
अभी दुनिया भर में एक वायरस फ़ैला हुआ है. वो वायरस कहां से आया है यही समझ में नहीं आ रहा है. तमाम विशेषज्ञों के रहते हम ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि इसमें लंबा वक्त लगता है.
इसमें होना ये चाहिए था जैसे पुराने ज़माने में होता था कि 'एक भी स्माल पॉक्स का मरीज़ दिखाइए और हम एक लाख रुपए इनाम देते हैं.'
अगर चुनाव आयोग गंभीर है तो उसे आईटी क्षेत्र के युवाओं को खुली चुनौती देनी चाहिए थी कि आप हैक करके दिखाइए और हम आपको पुरस्कार देंगे.
हम इसमें हिस्सा लेंगे क्योंकि हम चुनाव आयोग को बता सकें कि चार घंटे में ऐसा करना मुमकिन नहीं है. अगर हम नहीं गए तो आगे के लिए मांग कैसे करेंगे. ईवीएम मशीन दुकानों में नहीं मिलती. हमें इसके लिए चुनाव आयोग के पास ही जाना होगा.
ईवीएम मशीन पर हमें भरोसा करना ही चाहिए. होना ये चाहिए कि इसे टैंपर नहीं किया जा सके. लेकिन हाल में पुणे में महानगरपालिका के चुनाव हुए जहां हमने देखा कि जितने वोट पड़े और जितने वोटों की गिनती हुई, उनमें एकरूपता नहीं थी. इस पर सवाल तो उठेंगे ही. इसमें जवाबदेही तय तो होनी ही चाहिए.
'चुनौती से नहीं डरते'
मोहम्मद सलीम, सांसद, सीपीएम
कम्युनिस्ट पार्टी चुनौती से डरती नहीं है. हम हर चुनौती को स्वीकार करते हैं.
दिक्कत ये है कि ये चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच चुनौती का मामला नहीं था.
चुनाव आयोग ख़्वामखा चुनौती के रूप में आ गया.
वोटरों की ओर से शिकायत थी कि ईवीएम को टैंपर किया जा सकता है.
ये बात दीगर है कि कई पार्टियों ने भी ऐसा कहा था, लेकिन उन्होंने चुनौती को स्वीकार नहीं किया.
हमने चुनौती स्वीकार की क्योंकि हम शुरू से कह रहे हैं की पारदर्शिता के लिए पेपर ट्रेल होना चाहिए.
ये स्पष्ट होना चाहिए कि 'हमने ए व्यक्ति को वोट डाला है तो वो ए को ही मिला है.'
पूरे विश्व और हमारे देश में ये बात कई बार उठी है.
आज चुनाव आयोग जिस चुनौती की बात कर रही है वो अधूरी है.
वो मदर बोर्ड में हाथ नहीं लगाने देंगे. वो ईवीएम को पहले देंगे नहीं फिर कहेंगे कि आप दूर से क्या कर सकते हो.
हम चुनाव आयोग पर लांछन नहीं लगा रहे हैं. आज दुनिया में कोई भी तकनीक फुल प्रूफ़ नहीं है. ये मामला सिर्फ़ राजनीतिक नहीं है. ये तकनीक से जुड़ा मामला है. इसमें हमारे प्रतिनिधि और इंजीनियर जाएंगे और चुनाव आयोग को हमारी पार्टी की अपनी समझ की जानकारी देंगे.