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क्या इंसान सोचने से ज़्यादा हंसता है?
हंसी इंसान का ऐसा भाव है, जो पूरी दुनिया में ख़ुशी के जज़्बात बयां करने के लिए जानी जाती है.
हर इंसान हंस सकता है. हर हंसी के अलग मायने होते हैं. कोई यूं ही हंस पड़ता है. किसी को गुदगुदी से हंसी आ जाती है. कोई मज़ाक़ कर के ख़ुद ही ठहाका लगा लेता है. तो, कोई दूसरे का जोक सुनकर ज़ोर से हंस पड़ता है. कभी किसी की उपलब्धि पर हंसी आती है. तो, कई बार किसी को मुश्किल में पड़ा देख लोग अपनी हंसी नहीं रोक पाते.
कुल मिलाकर ये कहें कि हंसी का इंसान के समाज और संवाद से गहरा ताल्लुक़ है, तो ग़लत नहीं होगा.
इंसान के सामाजिक प्राणी होने की मज़बूत धुरी है हंसी.
बिना कोई शब्द कहे हम अपने भाव जब हंसी के ज़रिए बयां करते हैं, तो इस दौरान हमारी सीने की नसें फड़क उठती हैं. तभी चेहरे पर हंसी आती है.
यूं तो हम ये जानते-समझते हैं कि हंसी तब आती है, जब हम मसखरेपन की कोई बात सुनते हैं, जैसे कि कोई मज़ाक़ या जोक. लेकिन मामला इतना आसान नहीं. बल्कि हंसी तो साहब वो जज़्बा है, जो बहुत पेचीदा है.
हंसी का समाज के ताने-बाने से गहरा रिश्ता है. ये आस-पास के माहौल के हिसाब से ही निकलती है. अगर हम अकेले हैं, तो बमुश्किल ही हंसते हैं. इसके मुक़ाबले अगर हम दूसरे लोगों के साथ हैं, तो हंसने की उम्मीद क़रीब तीस गुना तक बढ़ जाती है.
आप ये जानकर हैरान रह जाएंगे कि हम लोग सोचने से ज़्यादा हंसते हैं. तमाम रिसर्च से ये बात साबित हो चुकी है. लोगों से बातचीत के दौरान बीच-बीच में हंसी का दखल होता रहता है. हंसी हमारे संवाद का हिस्सा बन जाती है. अगर हम किसी से 10 मिनट बात करते हैं, तो, उस दौरान औसतन पांच बार हंसते हैं. बातचीत के दौरान वो इंसान ज़्यादा हंसता है, जिसने अपनी बात तुरंत ख़त्म की हो.
अक्सर लोग ये सोचते हैं कि वो किसी और की बात पर हंसते हैं. यानी किसी की बात सुनकर प्रतिक्रिया में हंसते हैं. लेकिन ऐसा नहीं है. हक़ीक़त ये नहीं है. अक्सर हम अपनी बात कहकर ही हंस लेते हैं. और औसत निकाला जाए, तो इसकी संभावना ज़्यादा होती है कि हम अपनी बात पर हंसें.
ये तजुर्बे बताते हैं कि कई बार किसी से बात करते हुए हम ख़ुद हंस पड़ते हैं. तो, कई बार दूसरों की बात सुनकर हमें हंसी आ जाती है.
हमारे क़ुदरती रिश्तेदारों में से एक चिंपैंजी पर हुए रिसर्च भी यही कहानी कहते हैं. चिंपैंजी खेल-कूद के दौरान ख़ुद ज़्यादा हंसते हैं. वहीं, जब उन्हें गुदगुदी की जाती है, तो भी वो हंस पड़ते हैं.
अफ़सोस की बात ये है कि इतना गहरा जज़्बात होने और इंसान के सामाजिक प्राणी होने में हंसी के अहम रोल के बावजूद, इस पर ज़्यादा रिसर्च नहीं की गई है. हालांकि अब वैज्ञानिक हंसी को लेकर संजीदा हो गए हैं. कई जगह हंसी पर रिसर्च हो रही है.
इन रिसर्च से हमें ये पता चल सकता है कि इंसान का ज़बानों से क्या नाता है. हमारी भाषाएं कैसे विकसित हुईं, जब हम अपने जज़्बात बिना कुछ कहे भी बयां कर सकते थे. रिसर्च से हमारी जज़्बाती हालत के बारे में भी काफ़ी कुछ पता चल सकता है.
ख़ैर, ये रिसर्च तो होते रहेंगे. आप तो बस...हंसते रहिए...मुस्कुराते रहिए.
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