You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
एक परेशानी खत्म हुई नहीं कि दूसरी तलाश लेता है दिमाग़, आखिर क्यों?
- Author, डेविड लेवारी
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
कुछ परेशानियां ऐसी होती हैं, जिनसे निकलने की हमारी हर मुमकिन कोशिश नाकाम हो जाती है. आख़िर क्या वजह है इसकी?
हाल में हुई कुछ रिसर्च से इस सवाल का जवाब मिलता दिख रहा है. पता ये चला है कि हमारा दिमाग़ जिस तरह जानकारी को प्रॉसेस करता है, उसी में ऐसी गड़बड़ी है कि जब परेशानी ग़ायब हो जाती है, तब भी हम उसको लेकर परेशान रहते हैं.
मसलन, अपने इलाक़े की निगरानी करने वाले स्वयंसेवकों को ही लीजिए. ये लोग जब भी इलाक़े में संदिग्ध गतिविधियां देखते हैं, तो पुलिस को ख़बर करते हैं. जब कुछ लोग ये काम शुरू करते हैं, तो वो गंभीर अपराधों जैसे डकैती, या किसी पर हमले की ख़बर पुलिस को देते हैं. इन स्वयंसेवकों की मुहिम रंग लाने लगती है. इलाक़े में अपराध कम हो जाते हैं. लेकिन, इन लोगों की फ़िक्र कम नहीं होती.
ये स्वयंसेवक फिर छोटी-मोटी संदिग्ध गतिविधियों को लेकर भी पुलिस को आगाह करने लगते हैं. जैसे कि अगर कोई देर रात नींद में चल रहा है, तो उसे भी संदिग्ध मानकर वो पुलिस बुला लेते हैं.
हमारी ज़िंदगी में ऐसे तमाम हालात आते हैं, जब समस्या कभी ख़त्म ही नहीं होती. वजह साफ़ है. लोग, समस्या कम होने पर उसकी परिभाषा बदलकर उसके लिए फ़िक्रमंद बने रहते हैं. यानी वो अपना लक्ष्य, अपनी मंज़िल को लेकर संशय के शिकार हो जाते हैं. अब जब हर बार परेशानी की परिभाषा ही बदल जाती है, तो हम उसका हल कभी नहीं निकाल सकते.
इस लेख को लिखने वाले डेविड लेवारी ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस मुश्किल को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की.
कैसे की इस चुनौती की तलाश?
डेविड और उनके साथियों ने कुछ स्वयंसेवकों के साथ मिलकर एक तजुर्बा किया. उन्होंने कुछ तस्वीरें दिखाईं और स्वयंसेवकों से कहा कि वो बताएं कि कौन से चेहरे डरावने लग रहे थे.
धीरे-धीरे कर के रिसर्चर्स ने डरावने चेहरे वाली तस्वीरें कम करनी शुरू कीं. मज़े की बात ये है कि जब ये डरावनी तस्वीरें कम हो गईं, तो स्वयंसेवक उन चेहरों को भी डरावना बताने लगे, जिन्हें वो पहले ऐसा नहीं कह रहे थे.
इसके बाद कुछ लोगों को और भी आसान काम दिया गया. उन्हें स्क्रीन पर कुछ धब्बे दिखाए गए. रिसर्च में शामिल लोगों को सिर्फ़ ये बताना था कि वो नीले थे या बैंगनी. मज़े की बात ये रही कि जब नीले धब्बे पूरी तरह से स्क्रीन से ग़ायब कर दिए गए. तो, लोगों ने बैंगनी धब्बों को भी नीला बताना शुरू कर दिया. साफ़ है कि वो ऐसा जान-बूझकर तो नहीं कर रहे थे. उनका दिमाग़ कुछ ऐसी गड़बड़ कर रहा था, जिससे वो बैंगनी को भी नीला बताने लगे.
डेविड और उनके साथियों को लगा कि कहीं ये दिखने वाली चीज़ होने की वजह से धोखा तो नहीं हो रहा. तो, उन्होंने कुछ स्वयंसेवकों को लेख पढ़ने को दिए. उन्हें इन लेखों को पढ़कर ये बताना था कि वो नैतिक रूप से सही थे या ग़लत.
दिमाग से जुड़ी है ये गड़बड़ी
डेविड की टीम को लगा कि नैतिक-अनैतिक का फ़ैसला करने में तो ऐसी गड़बड़ नहीं होनी चाहिए. अब अगर हिंसा ग़लत है, तो है. हालात कोई भी हो, इसे लेकर हमारी सोच तो नहीं बदलनी चाहिए.
लेकिन, लेख पढ़ने का तजुर्बा करने वाले लोगों के साथ वही हुआ, जो तस्वीरें देखने वालों के साथ हुआ था. वो लोग एक के बाद एक उन लेखों को भी बाद में अनैतिक ठहराने लगे, जिन्हें उन्होंने पहले ऐसा नहीं समझा था.
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ये मामला हमारे दिमाग़ से जुड़ा हुआ है. हमारा ज़हन जिस तरह से जानकारियों की कांट-छांट और पड़ताल करता है, उसमें ही ऐसी गड़बड़ है कि हम परेशानियां ख़त्म होने पर नई तलाश लेते हैं.
यही वजह है कि जब लोग डरावने चेहरे देखते हैं. और उसके बाद कम डरावने चेहरे देखते हैं, तो वो फिर ऐसे चेहरों को भी डराने वाला समझने लगते हैं, जिन्हें देखकर पहले उन्हें डर नहीं लगा था. वजह साफ़ है कि दिमाग़ ने हाल ही में कुछ कम डरावनी शक्लें देखी थीं. तो, ज़हन के लिए डरावने चेहरे की परिभाषा का दायरा बढ़ गया. यानी सामान्य शक्लों के बीच हल्का डरावना चेहरा भी लोगों को गंभीर रूप से डराने वाला लगा.
दिमाग़ करता है आलस
मसला ये है कि नई जानकारी की बाढ़ आने पर हमारा दिमाग़ आलस से काम लेता है. वो पड़ताल का दायरा नहीं बढ़ाता. सोचता है कि कौन इतनी मेहनत करे. अभी कुछ शक्लें देखी हैं, जो थोड़ी डरावनी लग रही थीं. सो, ये कम डरावनी शक्लें भी उसे डराने वाली लगने लगती हैं. हमारा दिमाग़ ये आलस इसलिए करता है क्योंकि इसमें मेहनत और एनर्जी कम लगती है.
अब देखिए न, आपके लिए ये याद करना आसान है कि आपके भाई-बहनों में सबसे लंबा कौन है. उसकी लंबाई कितनी है, ये याद रखने का काम मुश्किल है.
और मुश्किल काम भला कौन करना चाहता है?
विकास की प्रक्रिया में इंसान का ज़हन ऐसे विकसित हुआ है कि हालिया जानकारी से इंसान अपना बचाव कर सकता है. या, अपनी ज़रूरत पूरी कर सकता है.
ऐसे में दिमाग़ को लगता है कि पुराने ख़तरों की जानकारी को निकालकर उनकी नए ख़तरों की तुलना करने की ज़हमत उठाने की ज़रूरत नहीं है.
अक्सर हमारा काम इनसे चल जाता है. जैसे कि, अगर हम सोच रहे हैं कि दिल्ली और मुंबई के बढ़िया रेस्टोरेंट कौन से हैं. तो, इनके बारे में दिमाग़ को कम मेहनत करनी पड़ेगी. वहीं हम दिल्ली के अलग-अलग इलाक़ों में बढ़िया रेस्टोरेंट के बारे में सोचेंगे, तो ज़हन पर ज़्यादा बोझ पड़ेगा.
तो बॉस का दिमाग़...
तो, अगर आप बॉस हैं और किसी का अप्रेज़ल करने जा रहे हैं, तो, उसके पूरे साल के काम को पैमाना बनाकर फ़ैसला कीजिए. वरना, हो सकता है कि आप सिर्फ़ हालिया उपलब्धियों के बारे में सोचेंगे, तो, उसके साथ नाइंसाफ़ी करें.
इंसान के ज़हन को आज कल तमाम पेचीदे मसलों के फ़ैसले करने होते हैं. आपसी रिश्तों का मामला हो. पेशेवर ज़िंदगी हो या निवेश से जुड़े मसले. इसलिए हमें अपनी सोच के पैमाने स्थिर रखने होंगे. वरना हम उन चेहरों को भी डरावना समझने लगेंगे, जिन्हें पहले ठीक-ठाक मानते थे.
(नोट- ये स्टोरी मूल अंग्रेज़ी स्टोरी का अक्षरश:अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए कुछ प्रसंग जोड़े गए हैं.)
(बीबीसी फ़्यूचर पर इस स्टोरी को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी फ़्यूचर की बाकी ख़बरें यहां पढ़ सकते हैं.)
ये भी पढ़ें:
(बीबीसी हिन्दी एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक कर सकते हैं. हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)