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क्या प्लास्टिक संकट से निजात दिला पाएंगे ये 5 तरीके?
- Author, लूसी जोन्स
- पदनाम, बीबीसी अर्थ
इस वक़्त दुनिया जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, उसमें प्लास्टिक से निपटने की समस्या सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.
हर साल क़रीब 1.27 करोड़ टन प्लास्टिक समुद्र में समा जा रहा है.
इसकी वजह से समुद्री जीव-जंतुओं के लिए भयावह साबित हो रहे हैं.
कछुओं की दम घुटने से मौत हो रही है. व्हेलें ज़हर की शिकार होकर मर रही हैं.
प्लास्टिक की इस चुनौती से निपटने का पहला क़दम तो इसका इस्तेमाल कम से कम करना है.
पर, इसके अलावा भी वैज्ञानिक, बढ़ते प्लास्टिक कचरे की चुनौती से निपटने के तरीक़े तलाश रहे हैं, ताकि इस कचरे के राक्षस का सामना किया जा सके.
आज हम आप को पांच ऐसे ही अजूबे नुस्खों के बारे में बताएंगे, जो प्लास्टिक से निपटने में मदद कर सकते हैं.
1. प्लास्टिक गलाने वाला मशरूम
एस्परजिलस ट्यूबिनजेनसिस एक गहरे रंग का चकत्तेदार कुकुरमुत्ता होता है. ये गर्म माहौल में ख़ूब पनपता है.
ऊपर से देखने में इसमें कुछ ख़ास नहीं है. लेकिन, इसकी एक ख़ूबी हमें प्लास्टिक के राक्षस से लड़ने में मदद कर सकती है.
प्लास्टिक की सबसे बड़ी चुनौती होती है कि ये नष्ट नहीं होता या गलता नहीं है.. यही वजह है कि आज ये हमारे शरीर के भीतर तक जगह बना चुका है. ऐसे ज़रिए तलाश किए जा रहे हैं जिससे प्लास्टिक को क़ुदरती तौर पर गलाया जा सके.
पाकिस्तान की क़ायद-ए-आज़म यूनिवर्सिटी के माइक्रोबायोलॉजिस्ट ने इस फफूंद में ऐसे गुण पाए हैं, जो प्लास्टिक को गला सकते हैं.
एस्परजिलस ट्यूबिनजेनसिस से पॉलीयूरेथेन को गलाया जा सकता है.
इस रिसर्च के अगुवा सहरून ख़ान कहते हैं कि, 'इस फफूंद से ऐसे एंजाइम निकलते हैं, जो प्लास्टिक को गलाते हैं. इस गले हुए प्लास्टिक से फफूंद को पोषण मिलता है.'
यानी ये उम्मीद जगी है कि एस्परजिलस ट्यूबिनजेनसिस की मदद से प्लास्टिक को गलाया जा सकता है.
2. समुद्र की सफ़ाई
प्रशांत महासागर में 'द ग्रेट पैसिफ़िक गार्बेज पैच' समुद्र में कचरे का सबसे बड़ा ठिकाना है.
यहां पर 80 हज़ार टन से भी ज़्यादा प्लास्टिक जमा हो गया है. ये कचरा फ्रांस के बराबर इलाक़े में कैलिफ़ोर्निया और हवाई द्वीपों के बीच फैला हुआ है.
नीदरलैंड के 24 बरस के इंजीनियर बॉयन स्लैट की अगुवाई में इस कचरे को साफ़ करने का अभियान छेड़ा गया है. इसे सिस्टम 001 नाम दिया गया है.
ये कचरा जमा करने वाली 600 मीटर लंबी, तैरती हुई मशीन है. जो तीन मीटर की गहराई तक से कचरा जमा करती है.
इस जमा कचरे को हर महीने एक जहाज़ में लाद कर हटाया जाएगा. बॉयन स्लैट की इस परियोजना की तारीफ़ भी हो रही है, और विरोध भी.
किसी को भी नहीं पता कि आगे चल कर क्या होने वाला है.
बॉयन स्लैट कहते हैं कि, 'इस वक़्त तो मैं उम्मीद के साथ आगे बढ़ रहा हूं. हम ने इससे प्लास्टिक जमा कर के ये दिखा दिया है कि ये तकनीक कारगर है.'
3. प्लास्टिक से बनी सड़कें
नीदरलैंड में ही प्लास्टिक से निपटने का एक और नुस्खा आज़माया जा रहा है. यहां प्लास्टिक से सड़कें बनाई जा रही हैं.
डच शहरों ज़्वोले में साइकिल चलाने के लिए प्लास्टिक से सड़कें बनाई जा रही हैं. इस सड़क बनाने में प्लास्टिक की बोतलों, कपों और पैकेजिंग के दूसरे सामान इस्तेमाल हो रहे हैं.
इस वक़्त सड़क को बनाने में लगे कुल सामान का 70 फ़ीसद हिस्सा प्लास्टिक है. लेकिन, आगे चल कर पूरी तरह प्लास्टिक से ही सड़कें बनाने का इरादा है.
इसे बनाने वाली कंपनी कहती है कि ये पूरी तरह से रिसाइकिल किया गया प्लास्टिक इस्तेमाल कर रही है. इसे बनाने में कम भारी मशीनों की ज़रूरत होती है. ईंधन भी कम ख़र्च होता है. यानी के पर्यावरण के लिए भी मुफ़ीद है.
अभी ज़्वोले शहर में प्लास्टिक से बनी पहली सड़क की लंबाई 30 मीटर है. इसमें 2 लाख 18 हज़ार प्लास्टिक के कपों और 5 लाख प्लास्टिक बोतलों का इस्तेमाल हुआ है. इसी महीने में प्लास्टिक से एक और सड़क बनाने की योजना है.
4. प्लास्टिक की जगह समुद्री खतरपतवार का इस्तेमाल
प्लास्टिक के ख़िलाफ़ जंग लड़ने के लिए इंजीनियर और डिज़ाइनर दूसरे तत्वों के विकल्प आज़मा रहे हैं, जिनमें खाने-पीने के सामान को पैक किया जा सके.
ऐसे बायोप्लास्टिक को फिर से इस्तेमाल हो सकने वाली क़ुदरती चीज़ों से बनाया जा रहा है. जैसे कि वनस्पति तेल, कसावा स्टार्च और लकड़ियों की छाल.
इंडोनेशिया की कंपनी इवोवेयर पैकेजिंग का सामान समुद्री खरपतवार से बना रही है. ये कंपनी स्थानीय समुद्री खरपतवार उगाने वाले किसानों के साथ मिलकर ऐसी पैकेजिंग तैयार करती है, जिसमें बर्गर और सैंडविच पैक हो सकें.
कॉफ़ी में मिलाने वाले पाउडर की पैकिंग की जा सके. इस खरपतवार से बने पैकेट को गर्म पानी में घोला जा सकता है. अब इस पैकेजिंग का इस्तेमाल साबुन पैक करने में भी हो रहा है.
कंपनी का दावा है कि ये पूरी तरह से कचरा मुक्त विकल्प है. पैकेजिंग को भी लोग खा सकते हैं. ये पोषक भी है और पर्यावरण के लिए मुफ़ीद भी.
5. सामाजिक प्लास्टिक
प्लास्टिक से समुद्रों को भारी नुक़सान हो रहा है. कहा जा रहा है कि 2050 तक समुद्र में मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक होगा.
इस कचरे को समुद्र में जमा होने से रोकने के लिए जो एक नुस्खा आज़माया जा रहा है, वो है प्लास्टिक बैंक का.
इस कंपनी के लोग ज़्यादा पैसे देकर जनता से इस्तेमाल हुआ प्लास्टिक ख़रीदते हैं.
इसके बदले में पैसे के अलावा रोज़मर्रा के सामान जैसे ईंधन, चूल्हे या दूसरी तरह की सेवाएं देते हैं.
इस प्रोजेक्ट से लोगों को समुद्र में जा रहे प्लास्टिक को रोकने का बढ़ावा मिलता है. लोगों की आमदनी भी हो जाती है. सड़कें साफ़ होती हैं.
प्लास्टिक बैंक का मक़सद प्लास्टिक को इतना क़ीमती बना देना है कि लोग इसे फेंकने से बचें.
इस जमा किए गए प्लास्टिक को कंपनी बड़े कारोबारियों को बेच देती है, जो इसकी तीन गुनी तक क़ीमत अदा करते हैं.
प्लास्टिक बैंक फिलहाल हैती, ब्राज़ील और फिलीपींस में काम कर रहा है.
जल्द ही ये भारत, दक्षिण अफ्रीका, पनामा और वेटिकन में भी सेवाएं शुरू करने वाला है.
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