'ना जलेगा, ना पिघलेगा': कहानी प्लास्टिक के आविष्कार की

"अगर मैं गलत नहीं हूं तो मेरा ये अविष्कार (बैकेलाइट) भविष्य के लिए अहम साबित होगा."

बेल्जियम मूल के अमरीकी वैज्ञानिक लियो बेकलैंड ने ये शब्द प्लास्टिक का अविष्कार करने के बाद 11 जुलाई, 1907 को अपने जर्नल में लिखे थे.

बेल्जियम में पैदा होने वाले लियो बेकलैंड एक मोची के बेटे थे. लियो के पिता अशिक्षित थे और उन्हें अपनी तरह ही जूते बनाने के धंधे में लाना चाहते थे.

वे समझ नहीं पा रहे थे कि लियो पढ़-लिखकर आख़िर क्या करना चाहते हैं.

मां ने लियो को पहुंचाया अमरीका

लेकिन लियो की मां के मन में अपने बेटे को लेकर अलग ही सपने बस रहे थे. लियो ने 13 की उम्र में अपने पिता के साथ काम करना भी शुरू कर दिया था.

मां के प्रोत्साहन पर लियो ने रात की शिफ़्ट में चलने वाले स्कूल में पढ़ना शुरू कर दिया.

इसके बाद आगे बढ़ते हुए लियो ने घैंट यूनिवर्सिटी में स्कॉलरशिप भी जीत ली.

लियो ने सिर्फ़ 20 साल की उम्र में केमिस्ट्री में डॉक्टरेट की और अपने टीचर की बेटी से शादी करके अमरीका पहुंच गए.

अमरीका पहुंचते ही नाम और धन कमाना शुरू

लियो ने न्यू यॉर्क पहुंचकर नाम और धन कमाना शुरू कर दिया था. शुरुआत में फ़ोटोग्राफ़िक प्रिंटिंग पेपर से बहुत पैसा कमाया.

इसके बाद न्यू यॉर्क में हडसन नदी के किनारे पर एक घर खरीदा. बेकलैंड ने अपना समय बिताने के लिए अपने इस घर में एक लैब बनाई.

यही वह घर था जहां पर 1907 में उन्होंने फ़ॉरमलडेहाइड और फ़ेनॉल जैसे केमिकलों के साथ समय बिताते हुए प्लास्टिक का अविष्कार किया.

इसे उन्होंने बैकेलाइट कहा.

इस सफ़लता के बाद बेकलैंड ने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

टाइम मैगज़ीन के कवर पर लियो बेकलैंड

टाइम मैगज़ीन ने अपने कवर पर लियो बेकलैंड की तस्वीर छापी.

ख़ास बात ये थी कि पत्रिका ने लियो की तस्वीर के साथ उनके नाम की जगह लिखा..."ये ना जलेगा और ना पिघलेगा."

बेकलैंड ने जब ये कहा था कि उनका अविष्कार भविष्य के लिए अहम है तो वह गलत नहीं थे.

क्योंकि प्लास्टिक ने बहुत जल्दी अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी.

प्लास्टिक के साथ एक दिन

विज्ञान से जुड़े विषयों पर लिखने वाली वरिष्ठ पत्रकार सूज़न फ्रीनकेल ने प्लास्टिक पर एक किताब "प्लास्टिक: अ टॉक्सिक लव स्टोरी" लिखी है.

इस किताब में फ्रीनकेल ने प्लास्टिक के साथ बिताए हुए एक दिन का ज़िक्र किया है.

उन्होंने लिखा है कि वो एक पूरे दिन ऐसी कितनी चीजों के संपर्क में आईं जो प्लास्टिक की बनी हुई थीं.

इनमें प्लास्टिक के लाइट स्विच, टॉयलेट सीट, टूथब्रश और टूथपेस्ट ट्यूब शामिल थे. ऐसी चीजों की संख़्या 196 थी.

इसके साथ ही गैर-प्लास्टिक चीजों की संख़्या 102 थी.

कितनी बड़ी है प्लास्टिक की दुनिया?

दुनिया में कितनी प्लास्टिक बनती है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि हम अपने पूरे तेल उत्पादन का 8 फ़ीसदी हिस्सा प्लास्टिक उत्पादन में लगाते हैं.

बैकेलाइट कॉरपोरेशन ने प्लास्टिक के प्रचार के लिए कहा कि इस अविष्कार से मानव ने जीव, खनिज और सब्जियों की सीमा के पार एक नई दुनिया खोज ली है जिसकी सीमाएं अपार हैं.

ये बात अतिश्योक्ति जैसी लगती है. लेकिन ये बात पूरी तरह सच थी.

वैज्ञानिकों ने इससे पहले भी प्राकृतिक तत्वों को विकसित करने या उनकी नकल बनाने के बारे में सोचा था.

प्लास्टिक से पहले प्लास्टिक की तरह की चीज सेल्युलाइड सामने आई थी जो पौधों पर निर्भर थी.

बेकलैंड इलेक्ट्रिक इंसुलिन में प्रयोग होने वाले रेसिन शैलेक का विकल्प तलाश रहे थे जोकि झिंगुरों से निकलता था.

लेकिन बेकलैंड जल्द ही समझ गए कि उनका अविष्कार बेकैलाइट शैलेक रेसिन के विकल्प बनने से भी बेहतर प्रयोग किया जा सकता है.

प्लास्टिक - हज़ारों प्रयोग वाली चीज

बेकैलाइट कॉरपोरेशन प्लास्टिक ने प्रयोग को प्रचलित करने की कोशिश में इसे हज़ारों तरह से प्रयोग किया जा सकने वाला पदार्थ भी कहा.

प्लास्टिक का प्रयोग टेलिफोन, रेडियो, बंदूकों, कॉफ़ी पॉट, बिलियर्ड बॉल से लेकर गहनों में भी होने लगा.

बेकलैंड की सफ़लता के बाद दुनिया भर की साइंस लैबों से प्लास्टिक के तरह-तरह के रूप सामने आने लगे.

इनमें पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाली पॉलीस्टारेन, नायलॉन, पॉलिथायलेन जैसी चीजें शामिल थीं.

द्वितीय विश्व यूद्ध के बाद दुनिया के सामने प्लास्टिक के बने हुए बर्तन आने लगे.

लेकिन प्लास्टिक की छवि ज़्यादा दिनों तक रोमांचित करने वाली नहीं रही.

बदलते वक्त के साथ बदलती छवि

साल 1967 में आई फ़िल्म द ग्रेजुएट में प्लास्टिक को लेकर एक अहम बातचीत है.

फ़िल्म के मुख्य किरदार बेंजामिन ब्रेडॉक जब वृद्ध पड़ोसी से अपने पेशे से जुड़ी राय मांगने पहुंचते हैं तो उनके पड़ोसी काफ़ी देर तक एक कोने में घूरते हुए कहते हैं, "सिर्फ़ एक शब्द...प्लास्टिक"

फ़िल्म का ये डायलॉग ख़ासा मशहूर हुआ क्योंकि इसने प्लास्टिक की बदलती हुई छवि को सहेजने की कोशिश की थी.

वृद्ध पड़ोसी ने जब प्लास्टिक के क्षेत्र में जाने का सुझाव दिया तो वो इसलिए क्योंकि उस पीढ़ी की नज़र में अब भी प्लास्टिक के अंदर संभावनाएं थीं.

लेकिन युवा बेंजामिन के लिए प्लास्टिक एक सतही और नकली चीज़ थी.

लेकिन यह अब भी ठीक सलाह ही थी क्योंकि एक शताब्दी बाद इसका उत्पादन 20 गुना बढ़ गया है. अगले 20 सालों में ये एक बार फ़िर दोगुना हो जाएगा.

प्लास्टिक से जुड़े पर्यावरणीय ख़तरे अक्सर सामने आते रहते हैं.

जमीन में समाने के साथ प्लास्टिक के केमिकलों के भूजल से मिलने का ख़तरा रहता है.

समुद्र में पहुंचने पर जलीय जीवों के इससे नुकसान होने का ख़तरा पैदा होता है.

लेकिन प्लास्टिक के अपने पर्यावरणीय फायदे भी हैं. मसलन, प्लास्टिक से बनी गाड़ियां लोहे की गाड़ियों की तुलना में कम ईंधन खाती हैं.

बेकार रिसाइकलिंग स्तर

प्लास्टिक से बनी चीज़ों में आपने त्रिकोण के साथ एक से सात के बीच में कुछ नंबर देखे होंगे. इन्हें रेसिन पहचान कोड कहा जाता है जो रिसाइकलिंग में मदद करते हैं.

ये कोड ट्रेड एसोशिएसन ने बनाए हैं.

ऐसे में अगर प्लास्टिक इंडस्ट्री आगे बढ़कर रिसाइकलिंग पर गंभीर हो सकती है तो सरकारें भी कुछ कर सकती हैं.

प्लास्टिक की रिसाइकलिंग को लेकर ताईवान एक सफल उदाहरण है. ताइवान ने ताइपेई के नागरिकों के लिए प्लास्टिक को रिसाइकल करना आसान बना दिया है.

प्लास्टिक रिसाइकलिंग के तकनीकी समाधान?

हाल ही में एक आविष्कार हुआ जो आपके प्लास्टिक कचरे को 3D प्रिंटर के फ़िलामेंट में बदल देता है.

इसके साथ ही प्लास्टिक कचरे को एग्रीकल्चर वेस्ट और नैनो पार्टिकल के साथ जोड़कर नए मैटेरियल को बनाने को लेकर प्रयोग जारी हैं.

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