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क्या आप जानते हैं कि रोज़ाना दो लाख लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ जाते हैं
- Author, जूलियस प्रोप्स्ट
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
ये दुनिया बड़ी ज़ालिम है.
ज़माना बहुत ख़राब है.
पहले के लोग अच्छे थे, पहले का वक़्त अच्छा था.
हम अक्सर ये जुमले सुनते रहते हैं. आज के दौर को कोसने में केवल बुज़ुर्ग ही नहीं, बल्कि युवा पीढ़ी भी शामिल है.
पर, क्या वाक़ई ऐसा है?
स्वीडन के मरहूम विद्वान हान्स रोज़लिंग ने अपने तजुर्बे को इस तरह बयां किया था-
विकसित देशों में बहुत से लोगों को ये अंदाज़ा ही नहीं है कि दुनिया पहले के मुक़ाबले कितनी बेहतर हो चुकी है. वो इस हक़ीक़त के ठीक उलट सोचते हैं.
हालांकि, इसमें अचरज की कोई बात नहीं. आज ख़बरों में आपदा, चरमपंथी हमलों, युद्धों और अकाल की ख़बरें छाई रहती हैं. ऐसे में लोगों का ये सोचना लाज़िमी है कि आज का दौर पहले से बहुत बुरा है.
ऐसे में अगर किसी को ये बताया जाए कि आज रोज़ाना दो लाख लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ जाते हैं या फिर रोज़ दुनिया भर में क़रीब तीन लाख लोग बिजली और साफ़ पानी की सहूलत पहली बार हासिल करते हैं, तो, इन पर कौन यक़ीन करेगा?
अमीर मुल्कों में ग़रीब देशों की इन उपलब्धियों की कोई चर्चा नहीं होती. ये कामयाबियां ख़बरों का हिस्सा नहीं बनतीं. लेकिन, जैसा कि हान्स रोज़लिंग ने अपनी किताब 'फैक्टफुलनेस' में लिखा है कि हमें सभी बुरी ख़बरों को एक ख़ास नज़रिए से तौलना चाहिए.
इसमें कोई दो राय नहीं कि भूमंडलीकरण ने विकसित देशों के मध्यम वर्ग की ज़िंदगी में मुश्किलें खड़ी की हैं. लेकिन, ये भी एक हक़ीक़त है कि इस ग्लोबलाइज़ेशन की वजह से लाखों लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर उठ सके हैं. इस तरक़्क़ी का एक बड़ा हिस्सा भारत जैसे दक्षिणी और पूर्वी एशियाई देशों से आया है.
आज दुनिया भर में लोक-लुभावन राजनीति का चलन बढ़ रहा है. पश्चिमी देशों, ख़ास तौर से अमरीका और पश्चिमी यूरोप में ये चलन देखने को मिल रहा है. ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन से अलग होने का फ़ैसला किया. अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने देश को कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों की पाबंदियों से आज़ाद करा लिया.
भारत में मौजूदा केंद्र सरकार हो या राज्यों की सरकारें, किसानों की क़र्ज़ माफ़ी और ग़रीबों को दूसरी सहूलतें मुफ़्त में देने के एलान कर रही हैं. यूरोपीय देशों इटली और हंगरी के चुनावों में भी ऐसे वादे करने वाले नेता चुनाव जीतते हैं. इन देशों के नेता, लोगों से ग्लोबलाइज़ेशन की जवाबदेही से बचाने के वादे पर सत्ता में आए हैं.
पर, जानकार कहते हैं कि हम अगर तरक़्क़ी के फ़ायदे पूरी मानवता में बराबरी से बांटना चाहते हैं, तो इसका एक ही ज़रिया है-भूमंडलीकरण. यानी सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से जुड़कर, क़दमताल मिलाकर साथ चलें. ऐसा न हो कि जर्मनी अपनी दिशा में चले और अमरीका अपनी मर्ज़ी से. फिर, इन देशों की अमीरी से मानवता का भला नहीं होगा.
यूं तो बुज़ुर्गों की आदत होती है कि पहले का ज़माना अच्छा था, जैसे जुमले कहें. पर, सच्चाई ये है कि दुनिया आज जितनी अच्छी पहले कभी न थी. मानवता का आर्थिक इतिहास कहता है कि हाल के कुछ दशकों से पहले दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा बहुत ग़रीबी में जीवन बिताता आया है. इंसानियत के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है कि आर्थिक तरक़्क़ी के फ़ायदे दुनिया के ग़रीबों तक पहुंच रहे हैं.
हम इन सात आंकड़ों से आप को बताते हैं कि क्यों दुनिया आज पहले से बेहतर है. आज से कुछ दशक पहले के मुक़ाबले भी हम बेहतरी के कितनी पायदान चढ़ चुके हैं.
1. औसत उम्र लगातार बढ़ रही है
जिस वक़्त यूरोप में औद्योगिक क्रांति हुई, उस वक़्त भी यूरोपीय देशों की आबादी की औसत उम्र 35 साल ही थी. इसका ये मतलब नहीं कि ज़्यादातर लोग इस उम्र के आते-आते मर जाते थे. बल्कि, उस वक़्त नवजात बच्चों की मौत इतनी ज़्यादा होती थी कि औसत उम्र बहुत कम हो जाती थी.
बच्चों को जन्म देते वक़्त महिलाओं की मौत हो जाने की घटनाएं आम हुआ करती थीं. चेचक और प्लेग जैसी बीमारियां हज़ारों लोगों को एक साथ ख़त्म कर देती थीं. आज अमीर देशों में तो इन बीमारियों का पूरी तरह से ख़ात्मा हो चुका है. इंसान की जान लेने वाली और भी कई बीमारियों को तरक़्क़ी के पहिए ने हमेशा के लिए दफ़्न कर दिया है.
2. बच्चों की मौत की दर लगातार घट रही है
एक सदी पहले की ही बात करें, तो अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में भी 100 में से दस बच्चों की मौत पैदा होने के फ़ौरन बाद हो जाती थी. लेकिन, मेडिकल साइंस की तरक़्क़ी और जनता के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं के विकास के चलते अमीर देशों में नवजात बच्चों की मौत अब न के बराबर होती है.
इसी तरह, ब्राज़ील और भारत जैसे विकासशील देशों में आज बच्चों की मौत की दर बहुत कम रह गई है. आज भारत और ब्राज़ील में नवजात बच्चों की मृत्यु दर एक सदी पहले के अमीर देशों की दर से बहुत कम हो चुकी है.
3. आबादी बढ़ने की रफ़्तार धीमी हो रही है
आज बहुत से देशों में जनसंख्या विस्फोट की बात होती है. अर्थशास्त्री कहते हैं कि आबादी बढ़ने की दर पर लगाम लगनी चाहिए. लेकिन, सच तो ये है कि पिछले कुछ दशकों में दुनिया भर में आबादी बढ़ने की दर घटी है. संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फंड का अनुमान है कि इस सदी के आख़िर तक दुनिया की आबादी 11 अरब के आस-पास पहुंचकर स्थिर हो जाएगी.
ब्राज़ील, चीन और कई अफ्ऱीकी देशों में जनसंख्या की विकास दर बहुत ही कम रह गई है. विकसित देशों में आबादी बढ़ने की इस दर को हासिल करने में औद्योगिक क्रांति के बाद भी 100 साल लग गए थे. मगर, कई विकासशील देशों ने आबादी बढ़ने की रफ़्तार पर एक-दो दशकों में ही क़ाबू पा लिया.
4. विकसित देशों की विकास दर बढ़ रही है
अमरीका और पश्चिमी यूरोप, जो तकनीक के मामले में बहुत आगे हैं, वो आज दो प्रतिशत सालाना की दर से तरक़्क़ी कर रहे हैं. उनकी ये विकास दर पिछले 150 सालों से बनी हुई है. इसका मतलब ये है कि इन देशों में औसत आमदनी हर 36 साल में दोगुनी हो जाती है.
इस दौरान बीसवीं सदी के तीसरे देश में ग्रेट डिप्रेशन जैसी भयंकर आर्थिक मंदी भी आई. और 2008 की मंदी का झटका भी दुनिया ने झेला. लेकिन, लंबे वक़्त की बात करें, तो तरक़्क़ी की रफ़्तार कमोबेश यही रही है.
चीन और भारत जैसे कम आमदनी वाले देश तो बहुत तेज़ी से तरक़्क़ी कर रहे हैं. इस वजह से ये देश अर्थव्यवस्था के मामले में बहुत जल्द पश्चिमी देशों के स्तर पर पहुंच जाएंगे. लंबे वक़्त तक अगर किसी देश की विकास दर 10 प्रतिशत के आस-पास रहती है, तो आम लोगों की आमदनी सात सालों में दोगुनी हो जाती है. अब ये उपलब्धि अगर ग़रीब जनता के साथ साझा की जाती है, तो अच्छी ख़बर ही है.
5. वैश्विक ग़ैर-बराबरी में कमी आई है
भूमंडलीकरण की वजह से बहुत से देशों में आर्थिक असमानता बढ़ी है. लेकिन, पिछले सात दशकों के औसत को देखें, तो इसमें कमी आई है. इसकी वजह है कि विकासशील देशों में करोड़ों लोग ग़रीबी रेखा से ऊपर उठे हैं. इनमें चीन और भारत का नाम सबसे आगे है.
बहुत से विकासशील देशों में रहन-सहन का स्तर बेहतर हुआ है. बुनियादी सुविधाओं तक बड़ी आबादी की पहुंच हुई है. औद्योगिक क्रांति के बाद हम पहली बार उस मुक़ाम पर हैं, जहां दुनिया की आधी आबादी को मध्यम वर्ग कहा जा सकता है.
6. आज ज़्यादा लोग लोकतांत्रिक देशों में रहते हैं
मानवता के इतिहास में लंबा दौर ऐसा रहा है जब जनता को ज़ुल्म ढाने वाली अलोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में रहना पड़ा है. लेकिन, आज दुनिया की आधी आबादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहती है. आज जितने लोग अलोकतांत्रिक देशों में रहते हैं, उनमें से 90 फ़ीसद तो केवल चीन में रहते हैं.
इस बात से ऐसा लगता है कि आर्थिक तरक़्क़ी से जनता के लिए लोकतांत्रिक निज़ाम के दरवाज़े खुलते हैं.
7. दुनिया में अब कम जंगें हो रही हैं
मानवता का इतिहास ख़ूनी संघर्ष का रहा है. सन् 1500 से लेकर अब तक की बात करें, तो दुनिया की दो बड़ी ताक़तें लगातार एक-दूसरे से जंग में उलझी रही हैं.
बीसवीं सदी ने तो ख़ास तौर से बेहद हिंसक दौर देखा. जब दो दशकों के भीतर दो-दो विश्व युद्ध हुए, जिनमें करोड़ों लोग मारे गए. लेकिन, दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दुनिया आम तौर पर शांति के दौर में जी रही है.
पश्चिमी यूरोप में पिछली तीन पीढ़ियों ने कोई भी युद्ध नहीं देखा है. यूरोपीय यूनियन और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे संगठनों की मौजूदगी से विश्व में स्थिरता आई है.
तो, ये कहकर कोसना बंद कीजिए कि ज़माना ख़राब हो गया है. सच ये है कि आज दुनिया पहले के मुक़ाबले काफ़ी बेहतर हुई है.
(यह लेख बीबीसी फ़्यूचर की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी फ़्यूचर के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)
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