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शुक्रवार, 20 मार्च, 2009 को 18:49 GMT तक के समाचार
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चुनाव ज़रूरी है या आईपीएल


जब क्रिकेट, ग्लैमर और पैसे की चकाचौंध एक साथ आ जाए तो भला राजनीति कहाँ पीछे रहने वाली?

जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं, आईपीएल की कहानी में नित नया मोड़ आ रहा है जो शायद इसके इतने सारे दावेदारों में से कुछ के हितों के अनुरुप हो.

हम में से अधिकांश लोग भूल जाते हैं कि इतने सारे दावेदार ही स्टारों से भरे इस टूर्नामेंट को लेकर उभरे विवाद की जड़ में हैं.

मैं ये बात नहीं समझ पा रहा हूँ कि आख़िर आम चुनाव के दौरान आईपीएल मैचों को लेकर गृह मंत्री पी चिदंबरम की चिंताओं से किसी को कोई समस्या क्यों है?

ख़ास कर लाहौर की घटना के बाद खिलाड़ियों और दर्शकों की सुरक्षा के लिहाज से ये बिल्कुल सही चिंता है लेकिन आईपीएल प्रायोजकों और नेताओं के बीच रणभूमि बन गया है.

यहाँ तक कि इसने ललित मोदी को देश की सत्ता के सामने खड़ा कर दिया है जो कुछ पाने की इच्छा रखने वाले 'नए भारत' के प्रतीक के रुप में देखे जा रहे हैं.

किससे समझौता?

ये समझा जा सकता है कि आईपीएल रुपी फल का स्वाद सभी चखना चाहते हैं लेकिन क्या यह चुनाव के दौरान सुरक्षा इंतज़ामों से समझौता कर होना चाहिए?

 ये समझा जा सकता है कि आईपीएल रुपी फल का स्वाद सभी चखना चाहते हैं लेकिन क्या यह चुनाव के दौरान सुरक्षा इंतज़ामों से समझौता कर होना चाहिए?

जिसे भी बोलने का मौका मिल रहा है वो आईपीएल के बारे में ज़्यादा चिंतित लगता है और इस कड़ी में लगता है कि स्वतंत्र और भयमुक्त वातावरण में मतदान करने के भारतीय नागरिकों के अधिकार हमारे लिए मायने नहीं रखते.

ये सब शुरु हुआ चिदंबरम की खिल्ली उड़ाने वाले ललित मोदी के बयान के साथ जिसमें उन्होंने कहा कि आईपीएल समय से होगा और आईपीएल के पास अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त धन है.

इसके बाद हमें बताया गया कि कैसे आईपीएल राष्ट्रीय अभिमान से जुड़ा है और टूर्नामेंट न करा पाना बाकी दुनिया को ये संदेश देगा कि भारत कमज़ोर राष्ट्र हो गया है.

और अब ये ख़तरा पैदा हो गया है कि पूरी बहस कहीं कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच लड़ाई की रेखा न खींच दे क्योंकि उन सभी राज्यों को सुरक्षा देने में कोई दिक्क़त नहीं महसूस हो रही है जहाँ भाजपा का शासन है.

मुद्दा

ये स्पष्ट है कि अगर सरकार आईपीएल के पक्ष में गर्दन नहीं हिलाती है तो भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बनाएगी.

चिदंबरम की चिंताएँ वाजिब हैं

मध्यवर्गीय शहरी मतदाताओं की बड़ी तादाद शायद भाजपा की जेहन में हो जिसका अंदाज़ा मुझे तब हुआ जब मेरे ही एक रिश्तेदार ने आईपीएल विरोधी होने के लिए मुझ पर फब्तियाँ कसी.

उनकी दलील थी, "हमें चुनाव की चिंता क्यों करनी चाहिए? क्या आप मायावती का शासन चाहते हैं? कृपया हमारे शाम के मनोरंजन का इंतज़ाम होने दीजिए, हम इस तरह की राजनीति से ऊब चुके हैं."

ऊपर से मीडिया के विश्लेषणों ने इस मुद्दे को इतनी हवा दे दी है कि सरकार भी असमंजस में पड़ गई होगी.

अगर सरकार कहती है कि टूर्नामेंट नहीं हो सकता तो वो अक्षम कही जाएगी और अगर टूर्नामेंट के दौरान सुरक्षा में ज़रा सी भी चूक हुई तो उसे चुनाव में इसकी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.

आईपीएल सरकार के गले की फाँस भले ही बन गया हो लेकिन सुरक्षा चिंताओं को हल्के में लेना किसी के हित में नहीं होगा - न देश के और न क्रिकेट के.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

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