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जीत में भी रॉडिक का ग़ुस्सा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
विंबलडन में तीसरी वरीयता प्राप्त एंडी रॉडिक कभी-कभी कुछ ज़्यादा ही चीखते-चिल्लाते हैं. दूसरे दौर के मैच में अच्छी ख़ासी स्थिति में थे. लेकिन बेचैन थे. ग़ुस्सा दिखाना, अंपायर पर टिप्पणी करना, बॉल ब्वॉय पर खीझना- ये सब हुआ एक आसान मैच में. दूसरे दौर के इस मैच में उनके सामने थे कम अनुभवी थाईलैंड के दनई उडोमचोक. दो सेट में शानदार जीत हासिल करने वाले रॉडिक कोर्ट पर इतने बेचैन दिख रहे थे कि पूछिए मत. दर्शक उनकी विशेष टिप्पणी का लुत्फ़ भी उठा रहे थे. लेकिन तीसरे सेट में रॉडिक को इसका नुक़सान भी हुआ. उनकी सर्विस भी ब्रेक हुई और मैच टाई ब्रेकर में गया. ख़ैर रॉडिक जीते और अपने बेचैन शिष्य पर हँसते-हँसते जिमी कॉनर्स ने कोर्ट छोड़ा. अब इसके बाद उन्होंने रॉडिक को क्या गुरुमंत्र दिया होगा- ये तो आने वाले मैच देखकर ही पता चलेगा. ***************************************************************** हिंगिस के लिए मारामारी मार्टिना हिंगिस जबसे वर्षों बाद अंतरराष्ट्रीय कोर्ट पर लौटीं हैं, उनमें ग़जब का आत्मविश्वास दिख रहा है. विंबलडन में तीसरे दिन उनका मैच एक छोटे कोर्ट पर हो रहा था.
मैं जब उस कोर्ट के पास से गुज़रा तो सोचा, चलो थोड़ी देर उनके आत्मविश्वास का नज़ारा देख लूँ. लेकिन हालात बेकाबू थे. अरे..रे...रे आप अन्यथा ना समझे. बेकाबू इसलिए नहीं थे कि मार्टिन हिंगिस कोर्ट पर कुछ उल्टा-सीधा कर रही थीं. दरअसल उस कोर्ट में मैच देखने वालों इतनी बड़ी संख्या में जुट गए कि प्रबंधकों ने लोगों से लाइन लगाने को कहा. इस लाइन में छोटे, बड़े, बूढ़े, जवान, महिलाएँ- सब थे. हिंगिस का मैच देखने की इतनी बेताबी इन तीन दिनों में तो मैंने किसी मैच में नहीं देखी. शानदार जीत के बाद जब हिंगिस कोर्ट से जाने लगी, तो प्रशंसकों ने काफ़ी दूर तक उनका पीछा किया. जी हाँ, ऑटोग्राफ़ लेने के लिए. उनमें से कुछ सफल रहे और कुछ...आप समझ ही गए होंगे. ***************************************************************** बड़े काम वाले विंबलडन प्रतियोगिता जितनी बड़ी है, उतनी ही बड़ी है व्यवस्था में जुटे लोगों की संख्या. कोर्ट पर एक बार में क़रीब 15 लोग काम करते हैं. इनमें अंपायर के साथ-साथ बॉल ब्वॉय या गर्ल भी शामिल हैं.
इनके काम में इतना समन्वय और तालमेल रहता है कि पूछिए मत. कभी-कभी तो ये रोबोट की तरह व्यवहार करते हैं. बिल्कुल नपे-तुले अंदाज़ में. किस समय उठना है. कैसे आउट कॉल करनी है. कैसे खिलाड़ियों को गेंद देनी है और कैसे उनकी सेवा में जुटना है. अगर आप किसी कोर्ट पर मैच देख रहे हों, तो मैच के अलावा इन लोगों के काम कर नज़र रखना एक ख़ूबसूरत एहसास है. कभी-कभी किसी लाइंसमैन की तेज़ कॉल पर दर्शक दीर्घा में हँसी के फ़व्वारे छूट पड़ते हैं तो कभी-कभी उन्हें खिलाड़ियों के ग़ुस्से का सामना भी करना पड़ता है. जो भी हो, इनके काम की दाद तो देनी ही पड़ेगी. ***************************************************************** विंबलडन तो संगम है... हर बड़ी प्रतियोगिता में प्रेस के लिए ख़ास इंतज़ाम होता है और जब बात विंबलडन की हो तो पूछना ही क्या. दुनियाभर के प्रेस को अच्छी जगह मिले और प्रतियोगिता को अच्छा कवरेज मिले, इसकी इतनी अच्छी व्यवस्था बहुत कम देखने को मिलती है.
प्रेस सेंटर में आपको दुनिया भर की भाषाओं के पत्रकार मिल जाएँगे और इनकी संख्या में इतनी कि आपको अंदाज़ा ही नहीं हो पाएगा कि आप ब्रिटेन में हैं या कहीं और. शायद यही विंबलडन के चरित्र को भी ऊँचा उठा देती है. दुनियाभर की भिन्न-भिन्न भाषाओं के बीच खेलों की चर्चा से पुल बनता है प्रेस सेंटर में. जापानी खिलाड़ी का मैच हो, तो आपको उनका बॉयोडेटा ढूँढ़ने की आवश्यकता नहीं. प्रेस सेंटर में थोड़ा भटक लें, तो जापानी पत्रकार आपकी सहायता के लिए पूरी तरह तैयार मिलेंगे. और रूसी खिलाड़ी हों तो रूस के पत्रकार. भई विंबलडन का प्रेस सेंटर तो संगम है दुनियाभर की कई भाषाओं का. |
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