अश्विनः भारतीय टीम का एक ऐसा स्पिनर, जो हर टेस्ट में अलग दिखता है

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- Author, मनोज चतुर्वेदी
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
रविचंद्रन अश्विन को मौजूदा दौर में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्पिनरों में तो शुमार किया जाता ही है. पर उनके बारे में कहा जाता है कि वह लगातार सीखने में विश्वास रखते हैं. लगातार सीखने की चाहत के कारण उनके ऊपर ज़रूरत से ज़्यादा सोचने वाले गेंदबाज़ का ठप्पा भी लगा हुआ है.
अश्विन ने जब ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ नागपुर टेस्ट में दूसरी पारी में 37 रन पर पांच विकेट निकालकर भारत को तीसरे ही दिन पारी से जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई तो भारतीय कप्तान रोहित शर्मा ने उनके बारे में कहा, "अश्विन जब भी टेस्ट क्रिकेट में खेलते हैं तो हर बार अलग ही गेंदबाज़ नज़र आते हैं."
रोहित की यह टिप्पणी, उनके हमेशा सीखते रहने वाले नज़रिये को दर्शाती है.
वह हमेशा अपनी गेंदबाज़ी में कुछ नया करने में विश्वास रखते हैं और इसके लिए वह नए प्रयोग करते हैं और इस कारण उन्हें कई बार आलोचनाओं का शिकार भी होना पड़ता है.
मुझे याद है कि कई बार उनके ऊपर यह आरोप लगा है कि वह जिस ऑफ स्पिन गेंदबाज़ी के लिए जाने जाते हैं, वह कई बार करते ही नहीं हैं.

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इस तरह जुड़ी कैरम बॉल
यह कहा जाता है कि वह अपने पड़ोसी को टेनिस खेलते देखते थे और उसे देखकर ही उन्होंने कैरम बॉल ईजाद की.
उन्होंने अपनी गेंदबाज़ी में लेग स्पिन गेंदों को भी जोड़ा है. अपनी इस खूबी की वजह से ही उन्हें बाएं और दाहिने हाथ से खेलने वाले दोनों बल्लेबाज़ों को गेंदबाज़ी करने में कोई दिक्कत नहीं होती है.
अश्विन की गेंदबाज़ी को देखकर कई बार लगता है कि वह गेंदबाज़ी कौशल को तो मांजते रहते ही हैं, साथ ही उनके गेंदबाज़ी कौशल में साइंस का भी खासा योगदान है.
वह हमेशा विकेट के स्वभाव को परखने के बाद ही यह तय करते हैं कि किस गति से गेंदबाज़ी की जाए.
इसकी वजह से कई बार ऐसा होता है कि वह पहले दिन काफी समय विकेट को समझने में निकाल देते हैं और फिर उसके बाद पूरी लय में गेंदबाज़ी करके बल्लेबाज़ों को अपने निशाने पर लेते हैं.
यही वजह है कि वह कई बार पारी की शुरुआत में सफलता हासिल नहीं कर पाते हैं पर पारी की प्रगति होने पर बेहद खतरनाक बन जाते हैं.

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देश का सफलतम गेंदबाज़ बनने का है माद्दा
भारतीय टेस्ट क्रिकेट की यदि बात करें तो अनिल कुंबले 619 विकेट लेकर पहले स्थान पर हैं. उन्होंने यह विकेट 132 टेस्ट मैचों में प्राप्त किए हैं और वह विकेट लेने के मामले में मुरलीधरन (800), शेन वार्न (708) और एंडरसन (678) के बाद चौथे नंबर पर हैं.
अश्विन को कुंबले का रिकॉर्ड पार करने के लिए 156 विकेट की ज़रूरत है. वह ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ दिल्ली टेस्ट के बाद अब तक 463 विकेट ले चुके हैं और यह उनका 90वां टेस्ट है.
अश्विन यदि कुंबले की तरह 132 टेस्ट खेलने में सफल रहे, तो वह निश्चय ही देश के सफलतम गेंदबाज़ बन सकते हैं. लेकिनअश्विन को 42 और टेस्ट मैच खेलने के लिए कुछ नहीं तो तीन-साढ़े तीन साल और क्रिकेट खेलनी होगी और वह इतना खेल पाते हैं या नहीं, यह तो भविष्य ही बताएगा.

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अश्विन की जडेजा के साथ जोड़ी है कमाल
यह कहा जाता है कि गेंदबाज़ों को जोड़ियों में ज़्यादा सफलताएं मिलती हैं. हमारे यहां स्पिन जोड़ियों की बात करें तो प्रसन्ना-बेदी, कुंबले-हरभजन सिंह की जोड़ी बेहद सफल रही हैं.
इसी तरह अश्विन और जडेजा की जोड़ी ने ऐसा कहर ढाया है कि भारत पिछले एक दशक से घर में टेस्ट क्रिकेट में अजेय बना हुआ है.
भारत के 2012 में इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट सीरीज़ हारने के बाद अगले ही साल यानी 2013 फरवरी में अश्विन और जडेजा की जोड़ी बनी. इस जोड़ी ने आपस में 53 विकेट लेकर भारत को 4-0 से सीरीज़ जिता दी.
इसके बाद से भारत ने अब तक घर में कोई टेस्ट सीरीज़ नहीं हारी है. उसे सिर्फ दो टेस्ट मैचों में ही हार मिली है.
रविचंद्रन अश्विन और रविंद्र जडेजा की जोड़ी का दिल्ली टेस्ट 38वां है, जिसमें अब तक अश्विन ने 220 और जडेजा ने 182 विकेट निकाले हैं. पर घर से बाहर इस जोड़ी ने सिर्फ छह टेस्ट ही साथ खेले हैं और 45 विकेट निकालने में सफलता मिली है.
अश्विन टेस्ट की तरह भले ही वनडे और टी-20 में सफलता के झंडे नहीं गाड़ सके हैं. उन्होंने 113 वनडे मैचों में 151 विकेट और 65 टी-20 मैचों में 72 विकेट निकाले हैं. पर मौजूदा समय में वह आईसीसी विश्व कप में खेलने के दावेदार बने हुए हैं.

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जहां खोया सम्मान, वहीं झंडे गाड़े
अश्विन के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत ही पक्के इरादे वाले खिलाड़ी हैं.
करियर के शुरुआती दिनों में ही उनके ऊपर विदेशी धरती पर सफलता नहीं प्राप्त कर पाने का ठप्पा लग गया था. यह बात 2013 के दक्षिण अफ्रीकी दौरे की है.
इस दौरे के जोहांसबर्ग में खेले गए टेस्ट में अश्विन ने 42 ओवरों में 108 रन देकर भी वह विकेट से महरूम बने रहे. परिणाम स्वरूप उन्हें आगे के टेस्ट मैचों की टीम से बाहर कर दिया गया.
वह अपने ऊपर लगे इस टैग को 2018 के दक्षिण अफ्रीकी दौरे पर हटाने में सफल हो गए थे. इस दौरे के केपटाउन में खेले गए टेस्ट में भारत ने पहले सिर्फ पेस गेंदबाजों को खिलाने का विचार बनाया. लेकिन आखिर में विकेट से घास कटती देखकर अश्विन को टीम में शामिल कर लिया गया.
उन्होंने पहली पारी में चार विकेट निकाले और सबसे सफल साबित हुए. इसके बाद से टीम प्रबंधन का उनके ऊपर हमेशा भरोसा बना रहा.
अश्विन की गेंदबाज़ी में बदलाव आया कैसे
असल में 2013 के दौरान वनडे क्रिकेट में कलाई वाले स्पिनरों पर भरोसा किया जाने लगा था और अश्विन उन दिनों सिर्फ टेस्ट मैचों में खेल रहे थे. इस दौरान ही उन्होंने अपनी गेंदबाज़ी में लेग स्पिन गेंदबाज़ी शामिल की.
अश्विन ने उस समय बताया था कि उन्हें उस समय इंग्लिश काउंटी क्रिकेट में खेलने का बहुत फायदा मिला. वहां खेलने के दौरान साथी गेंदबाज़ों ने ऐसे विकेट जहां स्पिन को मदद नहीं मिलती, वहां कैसे गेंदबाज़ी की जाए, यह सिखाया.
इसका उन्हें भविष्य के विदेशी दौरों पर फायदा मिला.

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चोट ने बदली तकदीर
क्रिकेट जगत के सामने आज अश्विन के रूप में बेहतरीन स्पिनर का खड़ा होना, एक चोट का परिणाम माना जा सकता है.
अश्विन असल में बल्लेबाज़ बनने की खातिर क्रिकेट में आए थे. वह 14 साल की उम्र तक ओपनर के तौर पर खेलते थे. लेकिन चोट के कारण आठ महीने तक क्रिकेट से दूर रहने के बाद जब वह लौटे तो टीम में उनके ओपनर वाली जगह किसी अन्य खिलाड़ी ने ले ली थी.
इससे अश्विन निराश थे. लेकिन मां के कहने पर उन्होंने गेंदबाज़ी करनी शुरू की. आज वह हमारे सामने दुनिया के दिग्गज स्पिनर के तौर पर खड़े हैं.
अश्विन का इंजीनियर बनने में भी चोट का हाथ है.
उन्होंने 2005 में इंजीनियरिंग में एडमिशन ले लिया था और 2006 में उनका तमिलनाडु रणजी टीम में चयन हो गया.
यह वह दौर था, जब उनके लिए क्रिकेट और पढ़ाई में सामंजस्य बैठाने में दिक्कत हो रही थी. लेकिन इसी दौरान कलाई में चोट लगने की वजह से क्रिकेट से बनी दूरी का उन्होंने पढ़ाई में इस्तेमाल करके इंजीनियरिंग पूरी कर ली.

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पहले खेलते थे फुटबॉल
यह कहा जाता है कि अश्विन बचपन में फुटबॉल खेला करते थे. वह एक मैच में नए जूते पहनकर खेल रहे थे. मैच में वह सिर और सीने पर गेंद लेकर अपने जूते खराब होने से बचाए रहे.
लेकिन मैच पेनल्टी शूट आउट तक खिंच गया.
टीम के साथियों ने अश्विन को पेनल्टी लेने भेजा, पर वह जूते खराब नहीं करने के चक्कर में पेनल्टी से चूक गए.
इसके बाद उन्होंने क्रिकेट को अपनाया और पेस गेंदबाज़ी करने लगे. इस दौरान स्कूल के कोच के कहने पर उन्होंने स्पिन गेंदबाज़ी शुरू की. और आज वह इस मुकाम पर हैं.
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