वर्ल्ड कप लाएगा झारखंड के सुजीत की ज़िंदगी में बदलाव?

सुजीत मुंडा
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    • Author, मोहम्मद सरताज आलम
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

इस साल नेत्रहीन टी20 वर्ल्डकप में यदि हमारा प्रदर्शन बेहतर होता है और सरकार का सपोर्ट मिलता है तो निश्चित तौर पर हम अगले साल होने वाले ओडीआई वर्ल्डकप को भी जीतेंगे - ये कहना है नेत्रहीन भारतीय टी20 टीम में सिलेक्ट हुए झारखंड के सुजीत मुंडा का.

सुजीत कहते हैं कि, "मैं बी1 कैटेगरी का ब्लाइंड हूं. 2011 में मैंने यूएसए में दो गोल्ड जीते थे. तब मुझे बहुत उम्मीद थी कि सरकार मुझे नौकरी देगी, लेकिन नौकरी न मिलने के बाद मैं निराशा हो गया और मैंने एथलेटिक्स छोड़ दी."

सुजीत कहते हैं, "अब फिर एक बार मौक़ा है जब मैं टी20 वर्ल्डकप टीम के द्वारा देश और राज्य का नाम रोशन करने वाला हूं. ऐसे में सरकार से मुझे बहुत उम्मीदें हैं."

सुजीत मुंडा के कोच शुभम कुमार का मानना है कि ये वर्ल्डकप सुजीत की आने वाली ज़िंदगी बदल देगा. शुभम के अनुसार, पिछली बार वर्ल्डकप जीतने वाली टीम के हर खिलाड़ी को दस लाख रुपए मिले थे. इस बार उम्मीद है कि सभी खिलाड़ी को और अधिक राशि मिलेगी, ऐसा हुआ तो सुजीत की आर्थिक स्थित बदल जाएगी.

सुजीत मुंडा ने अभी तक दुबई, बांग्लादेश और दक्षिण अफ़्रीका जैसे देशों में अपने क्रिकेट का जलवा दिखाया है. बांग्लादेश में पाकिस्तान व भारत के बीच आयोजित हुई 2020 त्रिकोणीय सिरीज़ में सुजीत ने तीन मैच में सात विकेट लिए और 91 रन बनाए थे.

सेंट माइकल नेत्रहीन विद्यालय रांची
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परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी

चार भाइयों में सबसे छोटे सुजीत मुंडा शुरू से ही नेत्रहीन थे. उनके बड़े भाई महेंद्र मुंडा व पिता छोटू मुंडा रांची में दिहाड़ी मज़दूरी करते थे, जिससे उनके परिवार को दो जून की रोटी नसीब होती थी.

जब सुजीत छह साल के हुए तो उनकी मां ने एक संस्था के द्वारा मौसीबाड़ी बस्ती में चलाए जा रहे फ्री एजुकेशन सेंटर में उन्हें पढ़ने के लिए भेजा. वहां वह सामान्य बच्चों के साथ पढ़ने जाते थे.

लेकिन आठ वर्ष की आयु में सुजीत की प्रतिभा से प्रभावित हुए मौसीबाड़ी के एजुकेशन सेंटर ने उनका दाखिला रांची के 'सेंट माइकल नेत्रहीन विद्यालय' में करवा दिया.

सेंट माइकल नेत्रहीन विद्यालय एक अवासीय स्कूल है, जो 110 ब्लाइंड छात्रों को फ्री लॉजिंग-फूडिंग के साथ मुफ्त शिक्षा देता है.

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सुजीत मुंडा व उनकी पत्नी अनीता तिग्गा
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छोड़ दिया था एथलेटिक्स

विद्यालय की प्रिंसिपल सरिता एस तलान कहती हैं, "हमारे स्कूल में जब बच्चे आते हैं तो उनके रुझान पर हम ख़ास ध्यान देते हैं. उनके रुझान के अनुसार काम करने की वजह से हमारे छात्रों की प्रतिभा समय से निखरती है. इसका पूरा श्रेय स्कूल के गेम टीचर देवदास को जाता है."

वह कहती हैं कि सुजीत मुंडा ने बतौर नेत्रहीन खिलाड़ी एथलेटिक्स से कैरियर की शुरुआत की. साल 2011 तक इन्होंने विभिन्‍न राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया था.

वहीं सुजीत कहते हैं कि "वर्ष 2011 में जब मैं अमेरिका गया तो वहां मुझे जैवलिन थ्रो व शॉटपुट में गोल्ड मेडल मिला."

भारत वापस आने के बाद दूसरे राज्यों ने गोल्ड जीतने वाले अपने नेत्रहीन खिलाड़ियों को नौकरी दी, लेकिन सुजीत को झारखंड सरकार से नौकरी नहीं मिली. इस वजह से सुजीत डिप्रेशन में चले गए.

2011 में अमेरिका से वापस आने के बाद सुजीत ने मायूस होकर एथलेटिक्स छोड़ दिया. सुजीत अंदर ही अंदर परेशान रहने लगे. उन्होंने अपना पूरा ध्यान हाई स्कूल की पढ़ाई में लगाया और 86 फीसदी अंकों से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की.

सेंट माइकल नेत्रहीन स्कूल की मदद से इंटर की पढ़ाई करने के लिए सुजीत दिल्ली चले गए. इसी दौरान सेंट माइकल नेत्रहीन स्कूल के छात्र गोलू कुमार का चयन भारतीय की ओडीआई की क्रिकेट टीम में हो गया.

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शुभम कुमार, सुजीत मुंडा के क्रिकेट कोच
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क्रिकेट की ओर रुझान कैसे हुआ

सुजीत कहते हैं कि गोलू कुमार साउथ अफ्रीका का दौरा करके जब झारखंड वापस आए तो झारखंड सरकार व झारखंड क्रिकेट बोर्ड ने उनका ख़ूब सत्कार किया. इस ख़बर को सुनने के बाद क्रकेट में मुझे रुचि हुई.

गोलू कुमार को 'क्रिकेट फ़ॉर ब्लाइंड इन झारखंड' संस्था ने निखारा था. इस संस्था को ब्लाइंड लोग ही चलाते थे. सुजीत मुंडा ने संस्था के संस्थापक विवेक कुमार सिंह से मुलाक़ात की.

विवेक कुमार सिंह 'क्रिकेट फ़ॉर ब्लाइंड इन इंडिया' के उपाध्यक्ष भी हैं. वह कहते हैं कि सुजीत 2015 में मेरे पास आए. तब मुझे मालूम हुआ कि सुजीत ने 2011 यूएसए पैरालिंपिक के दौरान जैवलिन थ्रो में वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था.

वो कहते हैं, "मैंने देखा कि सुजीत की आर्म्स बहुत मज़बूत हैं. मैंने उन्हें बताया कि आप अपनी मज़बूत आर्म का फ़ायदा बैटिंग व बॉलिंग में उठाइए. सुजीत ने कोच के साथ अपनी इस ताकत पर खूब काम किया, जिसका परिणाम है कि आज वह भारतीय टी20 टीम का हिस्सा हैं."

'क्रिकेट फ़ॉर ब्लाइंड इन झारखंड' संस्था में क्रिकेट कोच शुभम कुमार कहते हैं, "जब सुजीत हमारे पास आए तब उनको ब्लाइंड क्रिकेट के बारे में कुछ ख़ास जानकारी नहीं थी. विवेक सर और मैंने सुजीत को ब्लाइंड क्रिकेट की बारीकियां सिखानी शुरू की. आज सुजीत बेहतरीन बैट्समैन होने के अलावा बढ़िया गेंदबाज़ हैं."

कोच शुभम कुमार कहते हैं कि "सुजीत के अंदर एक बहुत बड़ी ख़ूबी ये है कि वह आवाज़ के प्रति बहुत अच्छे तरीके से रिस्पांस देते हैं. यदि विकेटकीपर ने रनआउट के लिए अवाज़ दी तो आवाज़ के अनुसार सुजीत विकेट पर सटीक थ्रो करते हुए रन आउट कर देते हैं.

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सुजीत मुंडा अपने परिवार के साथ
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पाकिस्तान के क्रिकेटर

टी20 वर्ल्डकप की तैयारी के लिए बेंगलुरु में आयोजित 56 खिलाड़ियों के कैम्प के दौरान शुभम कुमार हेड कोच थे. वह कहते हैं कि इस वर्ल्‍डकप में कुल आठ टीमें हैं. लेकिन हम तीसरी बार वर्ल्डकप चैंपियन बन सकते हैं. वैसे पिछली बार की रनर पाकिस्तान टीम भी बहुत मज़बूत दावेदार है.

पाकिस्तान के ख़िलाफ़ खेलने में कैसा महसूस होता? इस सवाल को सुनते ही सुजीत उत्साहित हो गए. वह कहते हैं, "पाकिस्तान भी दूसरी टीमों की तरह ही है. लेकिन सबसे अधिक मज़ा पाकिस्तान के साथ खेलने और उन्हें हराने में आता है."

शुभम कुमार का मानना है कि पाकिस्तान के ब्लाइंड खिलाड़ियों का करियर भारत के खिलाड़ियों से अधिक सुरक्षित है.

वो कहते हैं, "पाकिस्तान टीम के खिलाड़ियों को प्रति महीने तीस से चालीस हज़ार रुपए सैलरी मिलती है, जबकि भारत में ऐसा नहीं है. इसलिए सरकार और बोर्ड को पहल करनी चाहिए ताकि नेत्रहीन खिलाड़ियों को नौकरी मिले और प्रतिभाओं के साथ न्याय हो."

सुजीत मंडा

आशियाना उजाड़ दिए जाने की आशंका

सुजीत मुंडा रांची की मौसीबाड़ी बस्ती में रहते हैं. ये जगह भारत सरकार के उपक्रम 'हैवी इंजीनियरिंग कार्पोरेशन लिमिटेड' की ज़मीन पर बसी है. लगभग तीस साल पहले बसी इस बस्ती में 700 से अधिक घर हैं, जिनमें रहने वाले अधिकांश लोग आदिवासी हैं और खूंटी ज़िले से यहां आकर बसे हैं.

सुजीत की पत्नी अनीता तिग्गा के अनुसार, मौसीबाड़ी बस्ती कंपनी की ज़मीन पर कभी अवैध तरीके से बसी थी. इसलिए अतिक्रमण के नाम पर बस्ती को उजाड़ दिए जाने का ख़तरा हमेशा बना रहता है.

अनीता तिग्गा कहती हैं, "कंपनी के द्वारा ये ज़मीन कभी भी वापस ली जा सकती है. ऐसी अवस्था में मेरे परिवार को बेघर होने का खतरा है. मौसीबाड़ी बस्ती के अंदर पतली-पतली सड़कें तो पक्की हैं. लेकिन ज़्यादातर घरों की दीवारें कच्ची मिट्टी से बनी हैं. इन घरों में छत के नाम पर एस्बेस्टस की छत है."

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प्रिंसिपल सरिता एस तलान
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सुजीत का परिवार

दरअसल छब्बीस वर्ष पहले सुजीत मुंडा का जन्म इसी बस्ती के एक छोटे से कमरे में हुआ था. विवाह के बाद अनीता सुजीत की पत्नी बन कर इसी घर में आईं. अब सुजीत अपनी नेत्रहीन पत्नी व दो बच्चों के साथ यहीं रहते हैं. उनके दोनों बच्चे सामान्य हैं.

सुजीत के पास घर के नाम पर लगभग एक कमरा है जिसकी छत एस्बेस्टस से बनी है, जबकि दीवारें पक्की ईंट की हैं. कमरे में एक चौकी पड़ी है जिसके नीचे ज़रूरी सामान रखा है. कमरे में जगह की इस क़दर कमी है कि ज़रूरी सामान दीवारों पर टांगे गए हैं. सुजीत के कमरे की स्थिति को देखने के बाद उनके घर की माली हालत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

सात साल की आराधना मुंडा सुजीत की बेटी हैं. सुजीत उसे प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे हैं. लेकिन पैसों की तंगी की वजह से सुजीत अपने पांच साल के बेटे आदर्श का अब तक स्कूल में दाख़िला नहीं करवा सके हैं.

बीबीसी ने जब आदर्श मुंडा से पूछा कि पापा जब बाहर खेलने जाते हैं तो आपके लिए क्या ले कर आते हैं? बड़ी मासूमियत से आदर्श मुंडा ने जवाब दिया "पापा वापस आएंगे तो मैं 'गुलगुले' खाऊंगा."

बेटे की कही बात पर अनीता तिग्गा ने कहा "जब सुजीत दूसरे शहरों से खेलकर लौटते हैं तब उनके लिए पकवान के तौर पर वह मीठे गुलगुले बनाती हैं."

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मां के गुज़र जाने के बाद पत्नी रखती हैं ख़्याल

सुजीत मुंडा अपनी सफ़लता का श्रेय दो महिलाओं को देते हैं, एक उनकी मां और दूसरी उनकी पत्नी. सुजीत के नेत्रहीन होने की वजह से उनकी मां और पिता को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. लेकिन उनकी मां हमेशा उनके साथ ढाल की तरह खड़ी रहीं.

सुजीत कहते हैं, "बचपन से ही मां ने मेरी ज़रूरतों को पूरा किया. यही वजह है कि मैंनै हमेशा सफ़लता हासिल की."

अनीता तिग्गा कहती हैं, "सुजीत की मां के गुज़र जाने के बाद से मैं उनकी ज़िम्मेदारी उठाने के लिए तैयार रहती हूं. ऐसा इसलिए क्योंकि मैं भी सुजीत की तरह नेत्रहीन हूं, मैं उनकी ज़रूरतों को आसानी से समझ सकती हूं."

सुजीत के तीनों भाई सामान्य हैं और टेंट हाउस में दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं. उनका काम भी रेगुलर नहीं रहता और वे अपने परिवार के साथ अलग रहते हैं.

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सुजीत की मां का देहांत 2018 में हो गया. जबकि उनके पिता छोटू मुंडा की आयु पैंसठ साल है. वो अपने बड़े बेटे के साथ रहते हैं.

वो कहते हैं, "दिहाड़ी मज़दूरी कर के चार बेटों की परवरिश करने में बहुत मुश्किल हो रही थी. इन बच्चों में सुजीत नेत्रहीन था, लेकिन आज वह मिसाल बन गया है."

हालांकि छोटू मुंडा को वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिलने का मलाल भी है. वो कहते हैं कि उम्र अधिक होने के कारण अब वह मज़दूरी नहीं कर सकते.

बीबीसी ने उनसे पूछा कि उन्हें पेंशन क्यों नहीं मिलती, तो छोटू मुंडा ने जवाब दिया, "आप ही बताइए पेंशन कैसे मिलेगी, कहां अप्लाई करना पड़ेगा, कैसे करना पड़ेगा. यहां तो कोई बताने वाला नहीं है."

उनके जवाब में सवाल छिपा है कि इन लोगों में जागरुकता की कमी क्यों है? और ऐसा तब है जब उनकी बस्ती झारखंड विधानसभा से मात्र दो से तीन किलोमीटर की दूरी पर मुख्यमार्ग के निकट है. दूसरी तरफ़ झारखंड सरकार का "आपकी योजना - आपकी सरकार - आपके द्वार" अभियान भी राज्यभर में सुर्खियां बटोर रहा है.

अनीता तिग्गा कहती हैं, "समस्याएं और भी हैं, जैसे राशन कार्ड में सिर्फ मेरे पति और मेरा नाम है. बहुत मिन्नतें करने के बाद भी मेरे बेटे व बेटी का नाम राशन कार्ड में नहीं जोड़ा गया, इसलिए चार लोगों के परिवार में केवल दो सदस्यों का राशन दस किलो चावल आता है."

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अनीता कहती हैं कि हमारे घर में न तो शौचालय है और न ही पानी की सुविधा.

अनीता व सुजीत मुंडा को दिव्यांग भत्ते के तौर पर एक-एक हज़ार रुपए मिलते हैं. यानी कुल दो हज़ार रुपए मिलते हैं जिससे बेटी की पढ़ाई और घर का ख़र्च चलता है.

सेंट माइकल नेत्रहीन विद्यालय में दाख़िला मिलने के बाद सुजीत को ये भत्ता मिलना शुरू हुआ. कोविड के दौरान लगे पहले लॉकडाउन के समय उनको नौ महीने तक ये राशि नहीं मिली. उसके बाद सुजीत ने सरकारी विभाग के चक्कर काटे.

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सेंट माइकल स्कूल में दख़िला मिलने के बाद सुजीत एथलेटिक्स में पार्टिसिपेट करते थे. वहीं उनकी मुलाकात अनीता तिग्गा से हुई.

दोनों स्कूल की तरफ से खेलने के लिए कई राज्यों में साथ गए. बातचीत व अच्छे व्यवहार के कारण सुजीत अनीता की तरफ आकर्षित हुए.

अनीता कहती हैं, "सुजीत इज़हार नहीं कर रहे थे लेकिन मुझे आभास हो गया था, इसलिए मैंने स्वयं ही विवाह का प्रस्ताव रख दिया जिसे सुनकर सुजीत तैयार हो गए. 2013 हमने परिवार की रज़ामंदी से शादी कर ली. शादी के बाद मैंने एथलेटिक्स छोड़ दी."

अनीता कहती हैं कि "एथलेटिक्स के दौरान मैंने कई राज्य जैसे दिल्ली, हरियाणा का दौरा किया. उस दौरान मैंने रनिंग, शॉटपुट, डिस्कस थ्रो में भाग लिया. शॉटपुट में मुझे गोल्ड मिला था."

ब्लाइंड क्रिकेट के अपने नियम हैं

ब्लाइंड क्रिकेट में इस्तेमाल होने वाली बॉल प्लास्टिक से बनी होती है. इसके भीतर बिअरिंग डाली जाती है ताकि इससे निकलने वाली आवाज़ से खिलाड़ी इसका अंदाज़ा लगाकर फील्डिंग या बैटिंग कर सकें.

गेंदबाज़ अंडरआर्म गेंद फेंकते हैं जबकि पिच की लम्बाई नॉर्मल क्रिकेट पिच की तरह होती है.

विकेटकीपर बी2 या बी3 कटैगरी से होते हैं, जिनमें थोड़ा विज़न होता है, इसलिए वही बॉलर को गाइड करते हैं. बी1 श्रेणी के क्रिकेटर पूरी तरह ब्लाइंड होते हैं. बैटिंग करते हुए वो जो भी रन लेते हैं उसका दोगुना काउंट किया जाता है.

अब तक कुल पांच ब्लाइंड वर्ल्ड कप खेले गए हैं जिनमें 2014 और 2018 ओडीआई वर्ल्डकप भारत ने जीता है. जबकि भारतीय टीम ने 2012 और 2017 में हुए दोनों 'ब्लाइंड टी-20' वर्ल्ड कप जीते हैं.

टी20 वर्ल्डकप के लिए भारतीय टीम का चयन हो चुका है. इस टीम के ब्रांड एंबेसडर भारत के पूर्व क्रिकेटर युवराज सिंह होंगे.

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खिलाड़ियों का बी1 कैटेगरी (पूरी तरह से नेत्रहीन), बी2 कैटेगरी (2-3 मीटर की दूरी का विज़न) और बी3 कैटेगरी (3-6 मीटर का विज़न) में चयन किया गया है.

टीम में बी1 कैटेगरी में ललित मीना राजस्थान से, प्रवीण कुमार शर्मा हरियाणा से, सुजीत मुंडा झारखंड से, नीलेश यादव दिल्ली से, सोनू गोलकर मध्य प्रदेश से, सोवेंदु महता पश्चिम बंगाल से लिए गए हैं.

बी2 कैटेगरी में अजय कुमार रेड्डी और वेंकटेश्वर राव दुन्ना आंध्र प्रदेश से, नकुल बदनायक ओडिशा से, इरफ़ान दीवान दिल्ली से एवं लोकेश कर्नाटक से हैं.

वहीं बी3 में तोमपाकी दुर्गा राव और ए रवि आंध्र प्रदेश से, सुनील रमेश व प्रकाश जयरामैया कर्नाटक से, दीपक मलिक हरियाणा से और धीनगर पुदुचेरी से हैं.

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