मानसी जोशी: BBC Indian Sportswoman of the Year की नॉमिनी

मानसी जोशी
    • Author, दीप्ति बथिनी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
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शनिवार की एक दोपहर हम हैदराबाद में मानसी गिरीशचंद्र जोशी से उनके घर पर मिले.

वो इस फ्लैट में अपनी दो फ्लैटमेट्स के साथ रहती हैं. मानसी दोपहर का खाना खाते हुए मोबाइल फोन पर मूवी देख रही थीं.

उन्होंने गर्मजोशी से हमें अंदर बुलाया और फिर अपने प्रोस्थेटिक (कृत्रिम पैर) पहनने चली गईं.

वो कहती हैं कि पूरे हफ्ते की कड़ी ट्रेनिंग के बाद शनिवार दोपहर को वो थोड़ा आराम करती हैं.

मानसी कहती हैं, "मैं एक दिन में 7 से 8 घंटे ट्रेनिंग करती हूं. हर रोज़ दोपहर को मैं आराम करती हूं और अपने शरीर को ज़रूरी रेस्ट देती हूं, ताकि मैं शाम को फिर से ट्रेनिंग कर सकूं. शनिवार को मैं सिर्फ सुबह ट्रेनिंग करती हूं. शनिवार और रविवार मैं किताब पढ़ते हुए या बागवानी करते हुए बिताती हूं."

मानसी ने हमारे लिए अदरक वाली चाय बनाने की पेशकश की. किचन के फर्श पर कुछ पानी गिरा हुआ था. मानसी गीले फर्श को साफ करते हुए कहती हैं, "ये मेरे लिए खतरनाक है."

उनकी बनाई अदरक की चाय लेकर हम बातचीत करने बैठ गए.

वीडियो कैप्शन, एक पैर से बैडमिंटन की ऊंचाई पर पहुंचने वाली मानसी जोशी

छह साल की उम्र से बैडमिंटन

30 साल की मानसी गिरीशचंद्र जोशी एक भारतीय पैरा-बैडमिंटन एथलीट है.

उनके पास पैरा-बैडमिंटन चैम्पियनशिप का गोल्ड टाइटल है. उन्होंने अगस्त 2019 में विश्व चैम्पियनशिप जीती थी. वो 2015 से पैरा-बैडमिंटन खेल रही हैं.

2011 में एक दुर्घटना के बाद मानसी ने अपना एक पैर खो दिया था. वो कहती हैं, "बैडमिंटन खेलने और कोर्ट में जाने से मुझे ठीक होने में मदद मिली."

मानसी छह साल की उम्र से बैडमिंटन खेल रही हैं. वो कहती हैं, "अपने छात्र जीवन में डांस, बैडमिंटन समेत कई सारी गतिविधियों में हिस्सा लेती थी."

उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है और सोफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम भी किया है.

दुर्घटना के बाद मानसी ने अपने ऑफिस की ओर से कराई गई एक प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लिया था. मानसी कहती हैं, "तब मुझे एहसास हुआ कि मैं एक पैर से खेल सकती हूं."

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छोटी-छोटी चीज़ों से खुशी

वो कहती हैं कि छोटी-छोटी चीज़ों से उन्हें बहुत खुशी मिलती है. वो एक घटना याद करती हैं, जब वो अपनी बहन के साथ हैदराबाद के गोलकोंडा किला गई थीं.

वो बताती हैं, "मैं पहले भी वहां जा चुकी थी. लेकिन एक दिन, मैं किले के टॉप पर जाना चाहती थी."

किले के ऊपरी हिस्से तक पहुंचने के लिए तीन सौ से ज़्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं.

वो कहती हैं, "मैंने और मेरी बहन ने चढ़ना शुरू किया. मैं बहुत धीरे-धीरे चल रही थी. लेकिन परिवार का यही साथ और प्यार सबसे खास होता है. आखिरकार हम ऊपर पहुंच गए. मैं बहुत खुश थी. जब मैं वो कर लेती हूं, जो पहले नहीं कर पा रही थी, तो इससे मुझे बहुत खुशी मिलती है और उम्मीद जगती है कि मैं और भी बहुत कुछ कर सकती हूं."

बातचीत के दौरान जब मैंने उनके साथ हुई दुर्घटना के बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि वो उससे आगे बढ़ चुकी हैं.

वो मुस्कुराते हुए कहती हैं, "अपने एक्सिडेंट के बारे में मीडिया के बार-बार पूछे जाने वाले सवालों से मैं थक चुकी हूं. मुझे लगता है कि मैंने इससे आगे बढ़कर बहुत कुछ हासिल किया है. मैं चाहती हूं कि लोग मुझसे मेरी ट्रेनिंग के बारे में पूछे. जो टेक्निक मैंने सीखी है, उसके बारे में पूछे. लेकिन लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि मुझे अपने एक्सिडेंट के बारे में सबसे पहली चीज़ क्या याद आती है. मैं खुश हूं कि मैं ज़िंदा बच गई थी. इसके अलावा मुझे क्या लगेगा?"

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वो कहती हैं कि हालांकि उनकी बहन का कहना है कि मुझे दुर्घटना से जुड़े सवालों के जवाब तैयार रखने चाहिए ताकि जब लोग मुझ से पूछे मैं जवाब दे सकूं.

चाय का घूट भरते हुए मानसी कहती हैं, "बिल्कुल ये बात करने के लिए भावनात्मक मुद्दा है. लेकिन मैं अपने खेल के बारे में बात करना चाहती हूं और चाहती हूं कि लोग मुझे मेरे आदर्शों के लिए और जिन चैरिटी से मैं जुड़ी हूं, उसके लिए याद रखें."

उन्होंने 2015 में पहली बार पैरा-बैडमिंटन वर्ल्ड चैम्पियनशिप में हिस्सा लिया था. इंग्लैंड में हुई इस चैम्पियनशिप की मिक्सड डबल केटेगरी में उन्होंने रजत पदक जीता था.

यहीं से उनका सफर शुरू हुआ है, जिसके बाद इन्होंने कई चैम्पियनशिपर में मेडल जीते.

मानसी ने 2016 में हुई एशियन पैरा-बैडमिंटन चैम्पियनशिप में महिलाओं की एकल श्रेणी में कांस्य पदक जीता था.

2017 में उन्होंने पैरा-बैडमिंटन वर्ल्ड चैम्पियनशिप में कांस्य पदक जीता.

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2018 में भी उन्होंने थाईलैंड पैरा-बैडमिंटन इंटरनेशनल में कांस्य पदक अपने नाम किया. 2018 में ही हुए एशियन पैरा खेलों में उन्हें कांस्य पदक मिला.

स्विट्ज़रलैंड में 2019 में हुई पैरा-बैडमिंटन वर्ल्ड चैम्पियनशिप में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था.

मानसी जोशी अब इस साल अगस्त में होने वाले टोक्यो पैरालंपिक के लिए तैयारी कर रही हैं.

पैरालंपिक में सिंगल कैटेगरी नहीं होगी, इसलिए मानसी मिक्स्ड डबल्स की ट्रेनिंग ले रही हैं.

वो साल 2018 से हैदराबाद में गोपीचंद अकादमी में ट्रेनिंग ले रही हैं.

पी गोपीचंद उनके कोच भी हैं. वो कई मौकों पर कह चुके हैं कि मानसी ने कई लोगों के लिए एक नई दुनिया के दरवाज़े खोल दिए हैं.

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मानसी के ट्रनिंग सेशन के दौरान हम भी उनके साथ एकेडमी में गए.

उन्होंने वहां पहुंचकर सबसे पहले अपने प्रोस्थेटिक्स (कृत्रिम पैर) बदले. वो बताती हैं, "मैंने अपने प्रोस्थेटिक्स बदल लिए हैं. नए प्रोस्थेटिक्स से मुझे कोर्ट में यहां से वहां जाने में आसानी होती है. एक प्रोस्थेटिक्स में रोज़ाना के कामों के लिए पहनती हूं. दूसरा वाला मैं ट्रनिंग के दौरान और खेलते हुए पहनती हूं. कई बार प्रोस्थेटिक्स की वजह से मेरे टांके दुखने लगते हैं. लेकिन मुझे पता है कि मुझे कब रुक जाना है और कब खेलने के लिए खुदको पुश करना है."

मानसी पहले वार्मअप करती हैं और फिर दृढ़ निश्चय के साथ कोर्ट में उतर जाती हैं. ट्रेनिंग के दौरान वो पूरी मेहनत करती हैं. वो अपने कोच से नई-नई टिप्स मांगती हैं.

कोर्ट में मानसी पूरे फोकस के साथ और बेहतर करने की कोशिश करती हैं. कोर्ट में वो वर्ल्ड चैम्पियन नहीं होतीं. वो वहां उसी स्टूडेंट की तरह ट्रेनिंग करती हैं को सीखने के लिए दृढ़ है.

मानसी कहती हैं, "ट्रेनिंग सेशन मेरे लिए बहुत अहम हैं. मैं नई तकनीक सीखती हूं, उसे करने की कोशिश करती हूं और फिर अपने खेल में उस टेक्निक को लागू करती हूं."

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वो कहती हैं, कि उनके परिवार और दोस्तों के बाद, "ये एकेडमी ही है जिसकी वजह से वो आज इस मुकाम पर हैं. साथ ही मेरे स्पॉन्सर बहुत ही सपोर्टिव हैं."

जब हम ट्रेनिंग सेशन के लिए उनकी एकेडमी गए, तो एक युवक उनके पास ऑटोग्राफ के लिए आया.

मानसी ने उससे नाम पूछा और पूछा कि वो क्या पढ़ाई कर रहा है. फिर पेपर पर साइन कर दिया.

वो कहती हैं, "उन्होंने अच्छा लगता है जब युवा उनके पास आते हैं."

मानसी कहती हैं कि टूर्नामेंट के लिए उन्हें सिर्फ शारीरिक तौर पर तैयारी नहीं करनी होती.

वो कहती हैं, "मुझे कई चीजों की प्लेनिंग करनी पड़ती है. मुझे हिसाब लगाना पड़ता है कि मेरी यात्रा कितनी लंबी होगी. उसके हिसाब से मैं अपने ब्रेक्स प्लान करती हूं कि ट्रेवल के वक्त मुझे कितनी देर के लिए बैठना है. मुझे अपने बैठने की व्यवस्था की प्लेनिंग पहले से करनी पड़ती है."

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मानसी बताती हैं कि ज़्यादातर एयरपोर्ट्स पर सिक्यूरिटी स्क्रीनिंग के लिए उनसे प्रोस्थेटिक्स उतारने के लिए कहा जाता है, जिसके लिए उन्होंने कई बार लिखित शिकायत की है.

वो कहती हैं, "हर बार ये संभव नहीं होता कि मैं अपने प्रोस्थेटिक उतार दूं और जांच होने तक एक पैर पर खड़ी रहूं. कभी-कभी लोगों के लैपटॉप और हैंडबैग के साथ अपने प्रोस्थेटिक को सिक्यूरिटी के लिए स्कैन होते देखना बहुत अजीब लगता है. अगर कोई नेशनल हॉलीडे हो तो ये और बुरा हो जाता है. कई बार सिक्यूरिटी ऑफिसर मेरे पास आकर कहते हैं कि उन्होंने मुझे न्यूज़ में देखा है, लेकिन फिर भी मुझे इस प्रक्रिया से गुज़रना होता है. मुझे लगता है, इसके लिए जागरुकता की ज़रूरत है."

मानसी हैदराबाद में अकेली रहती हैं. वो अकेडमी जाने के लिए रोज़ कैब या ऑटो लेती हैं. वहां से उन्हें कोर्ट पहुंचने के लिए कुछ सीढ़िया चढ़नी पड़ती है. वो कहती हैं कि लोगों को ये समझने की ज़रूरत है कि खेल सिर्फ प्रतियोगिताओं के लिए होते हैं.

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इमेज कैप्शन, वोग इंडिया पत्रिका के लिए मानसी जोशी की तस्वीर

वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि हर किसी को कोई ना कोई स्पोर्ट खेलना चाहिए. ये ज़रूरी है. तभी हम बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग कर पाएंगे. जब हर इंसान एक स्पोर्ट खेलेगा, तभी सरकार खुली जगहों और प्लेग्राउंड्स के बारे में सोचेगी."

मानसी कहती हैं, "मैं गुस्सा नहीं होती हूं. मैं चहती हूं कि मुझे अपने आदर्शों के लिए याद रखा जाए. मुझे मेरे खेल के लिए याद रखा जाए."

बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ द ईयर अवार्ड

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