बिहार के गांव में रग्बी खेल रही लड़की कैसे बनी "यंग इंटरनेशनल प्लेयर ऑफ़ द ईयर"

स्वीटी कुमारी
    • Author, नीरज प्रियदर्शी
    • पदनाम, पटना (नवादा) से, बीबीसी हिंदी के लिए
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"सर, रग्बी कैसे खेला जाता है?"

साल 2014 में स्टेट एथलेटिक्स मीट के दौरान रग्बी बिहार के सेक्रेटरी से स्वीटी कुमारी ने यह सवाल तब किया था जब बतौर एथलीट उनकी तेज़ी देखकर सेक्रेटरी ने उन्हें रग्बी खेलने की सलाह दी थी.

स्वीटी बताती हैं कि सेक्रेटरी ने जवाब दिया, "वो जो अंडे जैसा बॉल दिख रहा है, बस उसी को लेकर आगे भागना है और पीछे पास करना है."

अपने गांव से निकल कर पहली बार शहर में दौड़ प्रतियोगिता में भाग लेने पहुंची 14 साल की स्वीटी कुमारी को तब रग्बी के बारे में इससे अधिक कुछ नहीं मालूम था.

लेकिन सेक्रेटरी की सलाह को उन्होंने गंभीरता से लिया. बड़ा भाई अपने कॉलेज के ग्राउंड में रग्बी की प्रैक्टिस करने जाता था. स्वीटी भी प्रैक्टिस में जाने लगीं.

वीडियो कैप्शन, दिल्ली की भास्वती मिश्रा एक कथक नर्तकी हैं

पांच साल बाद आज स्वीटी कुमारी इंटरनेशनल यंग प्लेयर ऑफ़ द ईयर हैं. यह ख़िताब उन्हें वर्ल्ड रग्बी फेडरेशन ने दिया है. इससे पहले उन्हें एशिया रग्बी अंडर 18 गर्ल्स चैंपियनशिप भुवनेश्वर, विमेन सेवेंस ट्रॉफी ब्रुनेई और एशिया रग्बी सेवेंस ट्रॉफी जकार्ता, 2019 में बेस्ट स्कोरर और बेस्ट प्लेयर का अवार्ड मिल चुका है.

बिहार की राजधानी पटना से लगभग 70 किमी दूर बाढ़ प्रखंड के नवादा गांव की रहने वाली स्वीटी आज भी अपने गांव से सटे उसी कॉलेज ग्राउंड पर प्रैक्टिस करने जाती हैं.

स्वीटी कुमारी, रग्बी, बिहार

स्वीटी के प्रैक्टिस ग्राउंड की स्थिति निराशाजनक

स्वीटी कुमारी को प्रैक्टिस करते हुए रिकॉर्ड करने के लिए जब पहली बार हम एएएनएस कॉलेज ग्राउंड पर पहुंचे थे तब सबसे पहला खयाल यही आया था कि दुनिया भर के खिलाड़ियों में सर्वश्रेष्ठ चुनी गई एक खिलाड़ी यहां क्यों प्रैक्टिस करती है?

मैदान में घास न के बराबर था. ऊबड़-खाबड़, ऊंचा-नीचा. एक हिस्से में पंडाल के लिए बांस-बल्ले गाड़े गए थे. एक हिस्से में पानी और कीचड़ था. बाकी जहां-जहां मैदान सूखा था वहां स्थानीय लड़के क्रिकेट खेल रहे थे, कोई मोटरसाइकिल चलाना सीख रहा था तो कोई कार.

जिस हिस्से में पानी जमा था उसी ओर के स्टैंड में लड़कियों का एक समूह जर्सी पहने कतार में बैठा दिखा. पैरों में बूट और जर्सी पर रग्बी बाढ़ लिखा था. उन्हीं में एक वैसी भी लड़की बैठी थी जिसकी जर्सी का रंग बाकियों से अलग था और उसपर रग्बी इंडिया लिखा था. वो स्वीटी कुमारी थीं.

स्वीटी कुमारी

स्वीटी के साथ बाकी लड़कियां इस इंतजार में बैठी थीं कि कब लड़कों का खेल ख़त्म हो, सूखा मैदान मिले कि वे प्रैक्टिस कर सकें.

स्वीटी कहती हैं, "जिस हिस्से में पानी जमा है वही हमारा एरिया है. हमेशा यहीं प्रैक्टिस करते हैं. दो-तीन दिन पहले बारिश हुई थी जिससे पानी लग गया है क्योंकि मैदान का यह निचला हिस्सा है. कल भी इसलिए ही प्रैक्टिस नहीं हो पायी थी क्योंकि मैदान ही खाली नहीं था. आज भी लग रहा है कि लड़के नहीं जाएंगे."

स्वीटी और उनकी साथी लड़कियां बताती हैं कि उस ग्राउंड में प्रैक्टिस करते हुए उन्हें सबसे अधिक डर चोटिल होने का रहता है. कई लड़कियां इससे पहले चोटिल हो चुकी हैं.

वे कहती हैं, "एक तो मैदान समतल नहीं है और ना ही घास है, ऊपर से कभी क्रिकेट की गेंद आकर लग जाती है, कभी कोई लड़का टकरा जाता है. कई बार कार और मोटरसाइकिल सीखने वाले बाधा डालते हैं. लेकिन किसी को रोक भी तो नहीं सकते! ये लड़के भी खेलने कहां जाएंगे! आस-पास के पूरे इलाके में यही तो एक ग्राउंड है."

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इमेज स्रोत, SWEETY KUMARI

आज सभी लड़कियां स्वीटी बनना चाहती हैं

स्वीटी के साथ बैठी लड़कियों में दर्जनों ऐसी लड़कियां थीं जो राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट में भाग ले चुकी हैं. आस-पास के गांवों से रोज सुबह-शाम साइकिल चलाकर रग्बी की प्रैक्टिस करने आती हैं. किसी के पिता किसान हैं, किसी के मजदूर. और सब स्वीटी कुमारी बनना चाहती थीं.

लड़कों की ज़मात में जहां सारे क्रिकेट और दूसरे खेल खेल रहे थे, शहर से दूर एक सुदूर गांव जहां के लोग रग्बी के बारे में सिर्फ इतना जानते हैं कि फ़ुटबॉल जैसा एक खेल जिसमें गेंद को पैर से नहीं हाथ से लेकर भागना होता है, वहां गांव में रहने वालीं इन राष्ट्रीय और अंतररराष्ट्रीय स्तर की महिला खिलाड़ियों को ऐसे ग्राउंड में प्रैक्टिस करने के लिए जुटा देखना जहां महिला तो छोड़िए पुरुषों के लिए भी एक अदद शौचालय नहीं था, हमारे लिए बहुत अचरज की बात थी.

स्वीटी और अन्य लड़कियों से बात करते-करते थोड़ी देर में उनके कोच गौरव आ गए. जिन्हें सभी 'भैया' कहकर संबोधित कर रही थीं.

स्वीटी कुमारी

लड़कों से ज़्यादा लड़कियां फोकस्ड

गौरव बाढ़ के ही रहने वाले हैं. पहले एक फ़ुटबॉलर थे. लेकिन अब रग्बी के एक प्रोफेशनल खिलाड़ी है. भारतीय पुरुष टीम के लिए लिए भी खेल चुके हैं. और अब अपने क्लब के जरिए इन लड़कियों को रग्बी की बारीकियां सीखा रहे हैं. उनके क्लब में लड़के भी सीखने आते हैं. लेकिन वे खुद बताते हैं कि लड़कों से ज़्यादा फोकस्ड लड़कियां हैं और अधिक नाम भी कमाया है. स्वीटी कुमारी के कोच भी गौरव ही हैं.

गौरव के कहने पर लड़कों ने रिकॉर्ड करने के लिए मैदान का थोड़ा सा हिस्सा छोड़ दिया. अपने स्टंप्स अलग जगह जाकर लगा लिए. लड़कियां हमें उस छोटी सी ही जगह में रग्बी खेलकर दिखाने लगीं. चारों तरफ लोग इकट्ठा हो गए. स्वीटी भारतीय टीम में विंगर की पोजिशन से खेलती हैं. उस दिन भी उसी पोजिशन से खेल रही थीं. जब अपने हाथ में बॉल लेकर बाकी खिलाड़ियों को चकमा देते हुए बिजली की तेज़ी सी भागतीं तो लोग अपने-आप कहने लगते, "ये लड़की सबसे बीस है. ऐसे थोड़े इंटरनेशनल खेलती है!"

स्वीटी कुमारी

2014 में रग्बी खेलना शुरू करने वाली स्वीटी पहली बार स्टेट मीट खेलने के लिए भुवनेश्वर गई थीं. 2015 में ही भारत की अंडर 15 टीम के लिए चुन ली गईं.

कहती हैं, "फर्स्ट टाइम इंडिया कैंप में गए तो बहुत सिखाया गया. मैं भागना तो जानती थी मगर खेल की बारीकियां नहीं समझती थी. वहां मुझे अलग से जिम्नास्टिक भी सिखाया गया."

स्वीटी कुमारी, रग्बी, बिहार

जब अंडर-16 के कैंप में नहीं हुआ सेलेक्शन

2016 में अंडर-16 के लिए फ़ाइनल कैंप में स्वीटी की सेलेक्शन नहीं हो पाया. लेकिन फिर से अंडर-17 के लिए खेलने दुबई गईं. बताती हैं, "पहली बार खेलने के लिए देश से बाहर गई थी. शुरू में डर लग रहा था. वहां दूसरे देशों की गोरी-गोरी, लंबी-लंबी लड़कियां थीं. हमारा प्रदर्शन ठीक-ठाक रहा. टीम फोर्थ पोजिशन पर रही. लेकिन मेरे प्रदर्शन को सबने सराहा. तभी पहली बार मुझे अमरीका के कोच माइक फ्रायड से मिलने का मौका मिला था. उन्होंने हमें कुछ ज़रूरी बातें बतायी जिससे मेरा गेम और अच्छा हुआ."

स्वीटी के दुबई जाने के वाकये के साथ एक और कहानी जुड़ी है. जिसे बताने के दौरान थोड़ी शर्मा जाती हैं.

कहती हैं, "पापा को तभी पहली बार पता चला था कि मैं रग्बी खेलती हूं और इस स्तर पर खेलती हूं. क्योंकि मैंने जब उन्हें दुबई जाने के लिए पासपोर्ट बनवाने को कहा था तब वे आश्चर्यचकित हो गए थे. उन्हें यक़ीन ही नहीं हो रहा था कि मैं रग्बी खेलने के लिए दुबई जाऊंगी. पर मेरे कोच ने और रग्बी बिहार के अधिकारियों ने पापा से बात की. मेरा पासपोर्ट बना. और जब मैं जा रही थी तब उन्हें बोलकर गई थी कि मेरा मैच टीवी पर आएगा, आप देखना."

स्वीटी कुमारी

स्वीटी के परिवार को पहले पता नहीं था

स्वीटी के पिता दिलीप चौधरी एक इंश्योरेंस कंपनी के एजेंट हैं. मां आंगनबाड़ी में सेविका हैं. कुल छह भाई-बहन हैं. जिनमें स्वीटी तीसरे नंबर पर हैं. बड़ा भाई जो पहले रग्बी की प्रैक्टिस किया करता था अब पटना में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है.

स्वीटी कुमारी हमें खुद अपने घर ले गईं. तीन कमरों वाला एक छोटा से घर के हॉल में बैठकर माता-पिता भाई-बहन सारे सर्दी से बचने के लिए आग सेक रहे थे.

हॉल की दीवारों पर जिधर भी नज़र जाती मेडल्स टंगे दिखते, दर्जनों शील्ड, ट्रॉफियां और प्रशस्ति पत्र सजा कर रखे थे. सभी स्वीटी के थे. पिता दिलीप चौधरी बेटी को अवार्ड में मिले अब तक सभी चीजों को बड़े फ़ख़्र से दिखा रहे थे, उनके बारे में बता रहे थे. घर आते ही स्वीटी अपनी छोटी बहन के साथ खेलने लग गईं.

पिता दिलीप चौधरी कहते हैं, "ये सबकुछ इस लड़की की मेहनत से हुआ है. हमारा इसमें सिर्फ यही योगदान है कि हमनें इसको पैदा किया है."

स्वीटी कुमारी अपने परिवार के साथ

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'सबका नज़रिया बदल गया'

स्वीटी आज न केवल भारत की बल्कि एशिया की पहली महिला रग्बी खिलाड़ी बन गई हैं जिन्हें 'इंटरनेशनल यंग प्लेयर ऑफ़ द ईयर' का अवार्ड मिला है. इस कामयाबी के बाद से उनके परिवार का जीवन कितना बदल गया है?

"कुछ नहीं बदला है सिवाय इस बात के कि आज मेरी बेटी की वजह से लोग मुझे जानने लगे हैं. समाज में इज्जत बढ़ गई है. मीडिया वाले हमारे घर आ रहे हैं. स्वीटी का नाम छप रहा है. और अब तो थोड़े-बहुत पैसे भी लाने लगी है जो उसे पुरस्कार में मिलते हैं."

ये बात स्वीटी के पिता बोल रहे थे. लेकिन स्वीटी बोल रही थीं कि अब उनके प्रति सबका नज़रिया बदल गया है. वो जो कहती हैं घरवाले उसे मान लेते हैं.

स्वीटी एक उदाहरण देकर इसे समझाती हैं, "पहले जब मैं घर में महंगे बूट की डिमांड करती थी तब सब मिलकर समझाते थे कि इससे कम पैसे में भी तो बूट मिल सकता है. अब पापा ख़ुद से सबसे महंगा बूट लाकर देते हैं ताकि मेरी प्रैक्टिस सबसे अच्छी हो सके."

बीबीसी स्पोर्ट्स वूमन, BBC SPORTSWOMAN

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