वक़ार से पहली बाज़ी हारकर बादशाह बने सचिन!

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- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तारीख़ 15 नवंबर.
ये तारीख़ इतिहास में कई वजहों से याद की जाती होगी, लेकिन क्रिकेट की दुनिया में इसे साल 1989 की वजह से याद किया जाता है, जब पाकिस्तान में कराची के नेशनल स्टेडियम में दो बेहद प्रतिभाशाली खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया.
ये थे भारत के सचिन रमेश तेंदुलकर और पाकिस्तान के वक़ार यूनुस मैतला. सचिन तब 16 साल के थे और वक़ार एक दिन बाद ही 18 साल के होने वाले थे.
नेशनल स्टेडियम में पाकिस्तानी गाना गा रहे थे और झूम रहे थे.
पाकिस्तान ने पहली पारी में 409 रन बनाए थे और अब जवाब देने की बारी कृष्णमचारी श्रीकांत की अगुवाई में खेल रही भारतीय टीम की थी.
इमरान ख़ान, वसीम अकरम और वक़ार की पेस बैटरी के अलावा धाकड़ स्पिनर अब्दुल क़ादिर की मौजूदगी से पाकिस्तानी टीम का आक्रमण बेहतरीन था.

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क्रिकेट प्रेमियों की नज़र
41 रन पर ही भारत के चार विकेट लुढ़क चुके थे, तभी हौले-हौले हवा में बल्ला लहराते हुए सचिन मैदान पर उतरे, 28 मिनट तक मैदान पर रहे, कई मर्तबा बीट हुए और जब वो 24वीं गेंद का सामना कर रहे थे तभी वक़ार ने उनका विकेट उखाड़ दिया.
सचिन की इस पारी में दो चौकों के अलावा ऐसा कुछ नहीं था, जिससे वो एक्सपर्ट और क्रिकेट प्रेमियों की नज़रों में आ पाते.
पाकिस्तान के अख़बारों में भी तेंदुलकर का ख़ास चर्चा नहीं था, सिवाय इसके कि क्रिकेट इतिहास में वह सबसे कम उम्र में क्रिकेटरों में से एक हैं.
वक़ार की तारीफ़ों से पाकिस्तानी अख़बारों के पन्ने अटे पड़े थे कि किस तरह इस युवा तेज गेंदबाज़ ने भारतीय बल्लेबाज़ों की नाक में दम किए रखा.
उन्होंने कई बल्लेबाज़ों के हेलमेट्स पिचका दिए थे और चार विकेट चटकाकर टेस्ट करियर का दमदार आगाज किया था.

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घरेलू क्रिकेट
दरअसल, सचिन और वक़ार दोनों की इंटरनेशनल क्रिकेट में इंट्री भी अलग-अलग अंदाज़ में हुई थी, जहाँ एक ओर सचिन ने घरेलू क्रिकेट में रनों की बौछार कर दी थी और दलीप ट्रॉफी हो या रणजी या फिर ईरानी ट्रॉफी...प्रत्येक टूर्नामेंट के पहले ही मैच में सेंचुरी जड़कर चयनकर्ताओं के सामने टीम इंडिया के लिए अपना दावा पेश किया था.
वहीं वक़ार ने भी घरेलू क्रिकेट में अपनी छाप छोड़ी थी, लेकिन उन्हें पाकिस्तान टीम में इंट्री दिलाने वाले इमरान ख़ान थे. वक़ार ने पाकिस्तानी टीवी को दिए इंटरव्यू में इस बात को माना था.
उन्होंने कहा, "मैं शारजाह जाने वाले 22 संभावित खिलाड़ियों में शामिल था. तब मैं कोई 17 साल का था. मैं और आक़िब जावेद और इंजमाम उल हक़ समेत मेरे जैसे कई खिलाड़ियों की तमन्ना रहती थी कि इमरान कब हमें देखने आएंगे."

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गेंदबाज़ों का सिरदर्द
वक़ार ने कहा था, "मैं सिर्फ़ तेज़ गेंदें डालना जानता था. तभी भारत की रणजी चैंपियन और पाकिस्तान की विल्स चैंपियन के बीच मुक़ाबला हुआ. मैं उसमें खेला. उस मैच को टीवी पर इमरान ख़ान भी देख रहे थे. जब मैंने गेंदबाज़ी शुरू की तो रमन लांबा ने मेरी धुनाई कर दी."
"उन्होंने मुझ पर कई छक्के जड़े, लेकिन मैं बहुत तेज गेंदें डाल रहा था और इमरान ख़ान इससे इतने प्रभावित हुए तो वह खुद स्टेडियम चले आए. उसके बाद उन्होंने स्टेडियम में आकर मुझे गेंदबाज़ी करते देखा."
"लेकिन मेरी और इमरान भाई की मुलाक़ात अगले दिन हुई... उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि तुम शारजाह जा रहे हो. तब मैंने पहला वनडे मुक़ाबला वेस्ट इंडीज़ के ख़िलाफ़ शारजाह में खेला."
ख़ैर, जब वक़ार का सचिन से पहली मर्तबा आमना-सामना हुआ तो इस पाकिस्तानी गेंदबाज़ को आभास भी नहीं हुआ था कि अगले करीब 25 सालों तक ये ठिगने कद का बल्लेबाज़ दुनियाभर के गेंदबाज़ों के लिए सिरदर्द बनने जा रहा था.

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यूनुस का अंदाज़ा
14 अक्टूबर 2013 को गल्फ़ न्यूज़ को दिए एक इंटरव्यू में वक़ार ने कहा, "एक अंडर-19 टूर्नामेंट के दौरान हमने सचिन के बारे में अजय जडेजा, नयन मोंगिया और दूसरे भारतीय खिलाड़ियों से सुना था. तेंदुलकर शायद अपनी हाईस्कूल की परीक्षाओं के कारण उस टूर्नामेंट में खेलने के लिए नहीं आ सके थे. वे लोग अक्सर सचिन के बारे में बातें किया करते थे."
वकार ने कहा, "जब वो अगले दौरे पर पाकिस्तान आए तो बच्चे से थे. मुझे लगता है जब मैंने पहली बार उन्हें देखा तो उनकी दाढ़ी भी नहीं निकली थी. घुंघराले बालों के साथ जब वो मैदान पर उतरा तो हमने कतई नहीं सोचा था कि वो इस स्तर की क्रिकेट में टिक भी पाएगा."
कराची में यूनुस का अंदाज़ा सही साबित हुआ था और उन्होंने सचिन को सस्ते में पैवेलियन भेज दिया था. लेकिन सियालकोट आते-आते सचिन ने यूनुस ही नहीं पाकिस्तान समेत दुनिया के तमाम क्रिकेट एक्सपर्ट को अपने बारे में राय बदलने पर मजबूर कर दिया.

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सचिन की पहली पारी
वक़ार ने गल्फ़ न्यूज़ से कहा, "मैंने पहले टेस्ट में सचिन का विकेट लिया था, लेकिन अंतिम टेस्ट आते-आते वो काफ़ी परिपक्व हो गए थे. सियालकोट टेस्ट में मेरी गेंद पर उनकी नाक में चोट लग गई थी, हालाँकि मैंने वो शॉर्ट डिलीवरी जानबूझकर नहीं फेंकी थी. लेकिन वो विकेट पर डटे रहे और दिखाया कि वह किस स्तर के खिलाड़ी हैं."
पहले टेस्ट में सचिन किस कदर असहज थे, इसका जिक्र उन्होंने भी कई मर्तबा विभिन्न मंचों पर किया है. सचिन ने माना था कि ये पहली बार था कि उन्होंने बेहद तेज़ गेंदबाज़ी का सामना किया था, कराची टेस्ट में तो कई बार तो उनका बल्ला, गेंद को छू भी नहीं पाया था.
अपनी आत्मकथा 'प्लेइंग इट माय वे' में तेंदुलकर ने बताया है कि उनकी पहली टेस्ट पारी उनके लिए किस कदर कठिन गुजरी थी.
उन्होंने अपनी किताब में लिखा, "ये अग्निपरीक्षा से कम नहीं था. टेस्ट क्रिकेट में अपनी पहली पारी में मैं वसीम और वकार के सामने थे और मुझे बल्लेबाज़ी की अपनी क्षमता पर शक होने लगा था और मेरे भीतर यह सवाल उठने लगा कि क्या मैं कभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा खेल सकूंगा?"

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गेंद सचिन की नाक से टकराई...
उन्होंने आगे लिखा, "मेरा पदार्पण इसलिए और भी ख़ास हो गया था, क्योंकि हम पाकिस्तान के ख़िलाफ़ पाकिस्तान में खेल रहे थे और उनके पास इमरान ख़ान, वसीम अकरम, वकार यूनुस, आकिब जावेद जैसे तेज़ गेंदबाज थे और मुश्ताक अहमद और अब्दुल कादिर जैसे स्पिनर भी थे."
पूर्व टेस्ट क्रिकेटर सलिल अंकोला सियालकोट में घायल सचिन तक सबसे पहले पहुँचने वालों में से थे. अंकोला उस मैच में 12वें खिलाड़ी थे और जब गेंद सचिन के नाक से टकराई तब अंकोला और टीम के फीजियो अली ईरानी सचिन तक पहुँचने वालों में थे.
साल 2013 में वेबसाइट क्रिकेट कंट्री को दिए इंटरव्यू में अंकोला ने कहा पाकिस्तान में कुछ लोग सचिन का ये कहते हुए मज़ाक उड़ा रहे थे, "ये खेल पाएगा कि नहीं? ये तो बच्चा है."
अंकोला के मुताबिक सियालकोट का विकेट एकदम हरा था और उन्होंने इससे पहले कभी इतना तेज़ विकेट नहीं देखा था. भारत पर हार का ख़तरा मंडरा रहा था.

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तेज़ बाउंसर
38 रन पर भारत के चार विकेट गिर चुके थे और इन हालात में नवजोत सिंह सिद्धू का साथ देने के लिए सचिन मैदान पर उतरे.
इससे पहले कि सचिन गेंद पर नज़रें जमा पाते, वक़ार का एक तेज़ बाउंसर सचिन के बल्ले के अंदरूनी हिस्से से टकराता हुआ उनकी नाक में जा लगा और नाक से खून बहने लगा.
अंकोला ने कहा, "सचिन ने कुछ पानी अपने चेहरे पर मारा और कहा कि वह ठीक है. इसके बाद उन्होंने अगली ही गेंद पर चौका जड़ा."
सचिन तीन घंटे से अधिक समय तक विकेट पर डटे रहे. 57 रनों की पारी के दौरान उन्होंने 134 गेंदों का सामना किया और छह चौके जड़े. सिद्धू के साथ उनकी 101 रनों की इस अहम साझेदारी की बदौलत भारत इस टेस्ट को ड्रॉ कराने में कामयाब रहा.
सचिन और वक़ार का टेस्ट करियर का आगाज़ जितना अलग था. उनका करियर भी उसी तरह अलग-अलग हालात में खत्म हुआ.

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यादगार विदाई
सचिन ने जहाँ 24 साल तक टेस्ट क्रिकेट खेला. 200 टेस्ट मैच में 53.78 की औसत से उन्होंने 15,921 रन बनाए, जिसमें 51 सेंचुरियां शामिल हैं. उन्हें साल 2013 में मुंबई के उनके घरेलू मैदान पर आख़िरी टेस्ट में हज़ारों दर्शकों के सामने यादगार विदाई मिली,
वहीं, वक़ार का टेस्ट करियर सचिन से 10 साल पहले ही खत्म हो गया. वक़ार ने जनवरी 2003 में दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ अपना आख़िरी टेस्ट खेला. वक़ार ने 87 टेस्ट मैचों में 373 विकेट हासिल किए.
2003 विश्व कप में पाकिस्तान टीम की ग्रुप स्टेज में हार के साथ ही उनको कप्तानी से बर्खास्त कर दिया गया और इसके साथ ही उनके करियर पर भी फुल स्टॉप लग गया.
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