क्या विनोद कांबली का करियर लाइफ़ स्टाइल से हुआ बर्बाद?

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- Author, दिनेश उप्रेती
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- स्कूली क्रिकेट में 349 रनों की पारी और 664 रन की रिकॉर्ड साझेदारी
- रणजी ट्रॉफ़ी के पहले ही मैच में पहली ही गेंद पर छक्का
- टेस्ट मैचों में सबसे तेज़ 1000 रन बनाने का भारतीय रिकॉर्ड
- शुरुआती 7 टेस्ट में दो दोहरे शतकों के साथ कुल चार शतक
- टेस्ट में 54 और प्रथम श्रेणी में 60 से अधिक का औसत
- 21 साल की उम्र में पहला टेस्ट, लेकिन सिर्फ़ 14 मैच
- दिग्गज स्पिनर शेन वार्न के एक ओवर में 22 रन
- 23 की उम्र में आख़िरी टेस्ट और वापसी का रास्ता बंद
ये आंकड़े किसी और के नहीं, बल्कि बाएं हाथ के बेहद प्रतिभाशाली माने जाने वाले क्रिकेटर विनोद गणपत कांबली के क्रिकेट करियर के हैं.
बाएं हाथ के इस बल्लेबाज़ ने 29 अक्टूबर 2000 को अपना आखिरी अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबला खेला था, मैदान था शारजाह का और विपक्षी टीम थी श्रीलंका.
ये वही मुक़ाबला था जिसे भारतीय क्रिकेटप्रेमी शायद ही याद रखना चाहें, जब श्रीलंकाई गेंदबाज़ों के सामने टीम इंडिया ने घुटने टेक दिए थे और पूरी टीम 54 रनों पर सिमट गई थी.

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धमाकेदार एंट्री
कांबली इस मैच के स्कोरकार्ड पर अपने नाम के आगे सिर्फ़ तीन रन ही दर्ज करा सके थे. स्कोरकार्ड पर यही हाल सचिन तेंदुलकर, सौरभ गांगुली, युवराज सिंह जैसे दिग्गजों का भी था. 11 खिलाड़ियों में से सिर्फ़ रॉबिन सिंह ही थे जो दहाई के आंकड़े को छू सके थे.
ख़ैर, इस शर्मनाक हार पर गांगुली की अगुवाई में खेल रही टीम इंडिया की खूब लानत-मलामत हुई, लेकिन नौ बार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी करने वाले विनोद कांबली के लिए ये उनका टीम इंडिया के लिए आख़िरी मैच साबित हुआ और वापसी का रास्ता हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो गया.
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में धमाकेदार एंट्री और फिर कुछ ही समय में असफलता के गर्त में फिसल जाने के कई किस्से कहानियां क्रिकेट मैगजीनों में भरे पड़े हैं, लेकिन कांबली की दास्तां इन सबसे जुदा है.
कांबली की प्रतिभा की तुलना अक्सर उनके स्कूली दिनों के साथी रहे मास्टर ब्लास्टर से की जाती है.
ये कहानी न जाने कितनी बार अख़बार और मैगजीनों के पन्ने काले कर चुकी है कि जब सचिन 15 साल के थे और कांबली 16 के, तब उन्होंने हैरिस शील्ड ट्रॉफी में 664 रनों की नाबाद पार्टनरशिप की थी...कांबली ने 349 रन बनाए थे और सचिन ने 326 रन.

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वक्त से पहले क्यों सिमट गया कांबली का करियर?
....लेकिन ये बात शायद बहुत कम लोगों को मालूम हो कि उसी मैच में कांबली ने गेंद से भी कमाल किया था और 37 रन देकर 6 विकेट झटके थे. शायद यही वजह थी कि कोच रमाकांत आचरेकर समेत कई क्रिकेट जानकार कांबली को सचिन समेत उनके कई दोस्तों से अधिक प्रतिभावान मानते थे.
तो फिर ऐसा क्या हुआ कि कांबली के लिए इंटरनेशनल क्रिकेट चार दिन की चांदनी साबित हुआ.
कांबली की मानें तो उनके करियर की असमय मौत के लिए उनके कप्तान, उनके टीम साथी, चयनकर्ता और क्रिकेट बोर्ड ज़िम्मेदार थे. उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि राजनीति और पक्षपात के कारण ही उनके इंटरनेशनल करियर पर इतनी जल्दी फुलस्टॉप लगा.
हो सकता है कि कांबली के इन आरोपों में कुछ दम भी हो, लेकिन क्रिकेट विश्लेषकों ने इन आरोपों से अधिक इस खब्बू बल्लेबाज़ के व्यवहार, खेल को लेकर उनका अप्रोच, हालात के मुताबिक अपने खेल को न बदल पाने को कांबली के करियर के 'द एंड' की बड़ी वजह माना.

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टेस्ट क्रिकेट
क्रिकेट कमेंटटेर और लेखक हर्षा भोगले ने आईआईएम अहमदाबाद में एक कार्यक्रम में कहा था, "जब आप किसी निश्चित पड़ाव से आगे बढ़ जाते हैं तो फिर प्रतिभा का कोई मतलब नहीं रह जाता. ऐसा कांबली समेत कई प्रतिभावान क्रिकेटरों के साथ हुआ है. जैसे ही उन्हें आगे का रास्ता बंद दिखता है उन्हें समझ ही नहीं आता कि अब क्या करना है. क्योंकि उन्होंने सफलता के लिए कभी संघर्ष नहीं किया, उन्होंने सफलता के लिए हमेशा अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल किया."
कांबली खुद को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के मुताबिक भी नहीं ढाल पाए. 1994 में कर्टनी वाल्श जैसे गेंदबाज़ों के बाउंसर उनके लिए पहेली साबित हुए.
हर्षा भोगले के मुताबिक, "उन्हें (कांबली) नहीं पता था कि क्या करना है क्योंकि अब तक प्रतिभा ही उनकी हर समस्या सुलझा दे रही थी."
कांबली तेज़ रफ़्तार से कंधे तक उठकर आती इन गेंदों को खेलने की काट नहीं ढूंढ पाए और टेस्ट क्रिकेट में उनके लिए दरवाज़े बंद हो गए.

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'ज़रूरत के वक्त काम नहीं आए सचिन'
1995 में आख़िरी टेस्ट खेलने के बाद कांबली वनडे टीम में अंदर-बाहर होते रहे. उन्होंने 9 बार कमबैक किया, लेकिन सचिन की तरह टीम में अपनी जगह पक्की नहीं कर सके. फिर एक दौर ऐसा भी आया जब अपने बालसखा सचिन से भी उनकी दूरियां बढ़ती चली गईं.
साल 2009 में रियलिटी शो 'सच का सामना' में कांबली ने कहा था कि उनके साथ टीम इंडिया में भेदभाव हुआ था. उन्होंने कहा कि जब वो बुरे दौर से गुजर रहे थे तो सचिन को उनकी मदद करनी चाहिए थी.
ख़बरों के मुताबिक इस शो से कांबली को 10 लाख रुपये मिले थे. कांबली ने बाद में भी कहा, "जब मुझे उसकी (सचिन की) सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी तो उसने मेरी मदद नहीं की, इसलिए मैंने रियलिटी शो में ऐसा कहा."
कांबली ने भेदभाव का आरोप लगाते हुए कहा कि अगर आप उनके रिकॉर्ड देखेंगे तो पता चलेगा कि न जाने क्यों उन्हें भारतीय टीम से निकाल दिया गया.

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सचिन का फ़ेयरवेल
इसके बाद से दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गई. यहां तक कि सचिन ने साल 2013 में अपनी फेयरवेल स्पीच में भी कांबली का जिक्र तक नहीं किया था. फिर कांबली ने सचिन से दोस्ती तोड़ने की बात कहकर सभी को हैरान कर दिया.
कांबली ने कहा था, "मुझे गहरा दुख पहुंचा है. मुझे उम्मीद थी कि कम-से-कम सचिन अपनी फेयरवेल स्पीच में मेरा नाम लेंगे. उस वर्ल्ड रिकॉर्ड पार्टनरशिप (664 रन) के बारे में बताएंगे, जिसने हम दोनों के करियर को बनाया, जिसके बाद हर आदमी को मालूम हुआ कि कौन सचिन है और कौन कांबली? ऐसा इसलिए कि उस साझेदारी में मेरा भी हाथ था."
कांबली ने आगे कहा था, "मेरे लिए दूसरी दुखद बात यह रही कि सचिन ने अपनी विदाई पार्टी में टीम के सभी दोस्तों और परिवार के लोगों को बुलाया लेकिन मुझे नहीं. मैं इस घटना से आहत और दुखी हूं. मैं 10 साल की उम्र से ही घर में और बाहर सचिन की ज़िंदगी का हिस्सा रहा हूं. हमने एक साथ बुरे और अच्छे दिन देखे हैं. मैं उसके लिए हमेशा तत्पर रहा. अब मैं यही कह सकता हूं कि उसने मुझे भुला दिया."

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कांबली पर सचिन ने क्या कहा?
सचिन का नाम लेकर कांबली कई बार सुर्खियों में आए, लेकिन सचिन ने न तो इन आरोपों का जवाब दिया और न ही किसी तरह की प्रतिक्रिया.
हां, साल 2014 में सचिन ने अंग्रेज़ी अख़बार टेलीग्राफ़ को दिए इंटरव्यू में ये ज़रूर कहा था कि उनमें और कांबली में एक बड़ा फ़र्क था और वो था लाइफ़ स्टाइल का.
सचिन ने कहा था, "मैं प्रतिभा के बारे में बात नहीं करूंगा, क्योंकि उसे तय करना मेरा काम नहीं है. लेकिन अगर हम फर्क की बात करें तो मैं कहूंगा कि उसकी लाइफ़ स्टाइल अलग थी. हम अलग-अलग स्वभाव के व्यक्ति थे और हमने अलग-अलग हालात का सामना अलग-अलग तरीके से किया. मेरे मामले में परिवार की नजरें हमेशा मुझ पर थीं जिससे मेरे पैर हमेशा ज़मीन पर रहे. मैं विनोद के बारे में नहीं कह सकता."

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सचिन और कांबली
मई 2016 में पुणे में एक कार्यक्रम में भारत के पूर्व कप्तान कपिल देव ने भी कहा था कि कांबली की लाइफ़ स्टाइल उनका करियर बर्बाद करने की ज़िम्मेदार थी.
कपिल ने भी सचिन और कांबली की तुलना करते हुए कहा था, ''उन दोनों ने एक साथ शुरुआत की और दोनों में समान प्रतिभा थी. कांबली शायद अधिक प्रतिभावान था, लेकिन उनका सपोर्ट सिस्टम, घर का माहौल, और उनके दोस्त शायद सचिन से बिल्कुल अलग थे. हम सभी को पता है कि बाद में क्या हुआ. सचिन 24 साल तक देश के लिए खेले और कांबली ग़ायब हो गए, क्योंकि वह अपने करियर की शुरुआत में मिली सफलता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाए."












