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बुधवार, 07 मई, 2008 को 11:19 GMT तक के समाचार
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दवाएँ घटाती हैं शिशु में एचआईवी संक्रमण का ख़तरा
नवजात बच्चा
औरतों में संक्रमण की पहचान की दर वर्ष 2000 के 70 फ़ीसदी से बढ़कर वर्ष 2005 में 95 फ़ीसदी तक पहुँच गई
शोधकर्ताओं का दावा है कि उचित इलाज से एचआईवी ग्रस्त महिलाओं के बच्चों में एचआईवी के संक्रमण के ख़तरे को काफ़ी हद तक घटाया जा सकता है.

शोधकर्ताओं ने ब्रिटेन और आयरलैंड में वर्ष 2000 से 2006 के बीच माँ बनीं 5151 एचआईवी पीड़ित औरतों के बारे में आंकड़े जुटाए.

आँकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि एहतियाती क़दम उठाने वाली औरतों के बच्चों में इस बीमारी के संक्रमण की दर मात्र 1.2 फ़ीसदी थी.

जब 1990 के दशक के मध्य में प्रभावी दवाएँ उपलब्ध नहीं थीं, तब शिशु संक्रमण की दर 20 फ़ीसदी के ऊपर थी.

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज के शोधकर्ताओं ने इस ऑनलाइन अध्ययन को अंजाम दिया है.

उनका कहना है कि यह पहली बार है कि संक्रमण की इतनी कम दर देखी गई है.

'काम कर रही दवा'

ब्रिटेन में एचआईवी संक्रमित ज़्यादातर औरतें इन दिनों गर्भकाल में एचआईवी के इलाज 'एंटीरेट्रोवाइरल थिरेपी' (एआरटी) वाली कई तरह की दवाइयाँ लेती हैं.

 शोध से पता चलता है कि अगर गर्भवती औरत समय पर एचाआईवी की जाँच कराती है और दवाएँ लेना शुरू कर देती है तो उसके बच्चों को संक्रमण का ख़तरा बहुत कम हो जाता है
क्लेयर टाउनसेंड, शोधदल की प्रमुख

जिन मामलों में ऑपरेशन की मदद से बच्चे का जन्म होता है, उनमें संक्रमण का ख़तरा कम होता है.

लेकिन हाल में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि दवाएँ इतनी प्रभावी होती हैं कि सामान्य तौर पर भी महिलाएँ बच्चे को जन्म दे सकती हैं.

शोधकर्ताओं का कहना है कि ब्रिटेन और आयरलैंड में अधिकांश महिलाओं ने अब जन्म से पहले ही कई तरह की जाँच कराना शुरू कर दिया है ताकि उन्हें शिशु को संभावित ख़तरों की ख़बर रहे.

नियमित जाँच-पड़ताल से पता चला कि बच्चे के जन्म से पहले औरतों में संक्रमण की पहचान की दर वर्ष 2000 के 70 फ़ीसदी से बढ़कर वर्ष 2005 में 95 फ़ीसदी तक पहुँच गई.

विकासशील देशों की हालत

विश्व स्वास्थ्य संगठन की वर्ष 2006 में आई रिपोर्ट में माना गया था कि विकासशील देशों में बहुत कम महिलाओं को एआरटी दवाएँ उपलब्ध हैं.

नवजात शिशु
विकासशील देशों में अधिकांश महिलाओं को एचआईवी निरोधक दवाएँ उपलब्ध नहीं हैं

रिपोर्ट में बताया गया था कि इन देशों की संक्रमित गर्भवती औरतों में 10 फ़ीसदी से भी कम को ये दवाइयाँ मिल पाती हैं.

रिपोर्ट का आकलन था कि औरतों को ज़रूरी दवाइयाँ नहीं मिलने के कारण रोज़ाना 1800 एचआईवी ग्रस्त बच्चे पैदा होते हैं.

'उत्साहवर्द्धक नतीजे'

शोधदल की प्रमुख क्लेयर टाउनसेंड कहती हैं कि ये दवाइयाँ लेने वाली औरतों में 'बहुत उत्साहवर्द्धक' नतीजे मिले.

क्लेयर ने कहा, "शोध से पता चलता है कि अगर गर्भवती औरत समय पर एचाआईवी की जाँच कराती है और दवाएँ लेना शुरू कर देती है तो उनके बच्चों को संक्रमण का ख़तरा साफ़ तौर पर बहुत कम हो जाता है."

वे कहती हैं कि इससे यह पता चलता है कि गर्भवती औरतों के लिए बच्चे के जन्म से पहले जाँच कराने का क्या महत्व है.

क्लेयर का ज़ोर है कि एचआईवी की जाँच के इस काम को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना चाहिए.

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