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मंगलवार, 31 मई, 2005 को 19:44 GMT तक के समाचार
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भारत का पहला एचआईवी मैरिज ब्यूरो

एचआईवी संक्रमित पति पत्नी
मैरिज ब्यूरो की मदद से अब तक सात जोड़ियाँ बन चुकी हैं
हीरे तराशने का काम करने वाले 31 वर्षीय रसिक भाई कहते हैं कि "मैं एचआईवी पॉज़िटिव हूँ और शादी करना चाहता हूँ इसीलिए यहाँ आया हूँ."

इसके जवाब में दक्षा पटेल मुस्कुरा कर कहती हैं, "हमारा काम ही है शादी कराना, आप अपने और अपने परिवार के बारे में थोड़ी जानकारी दे दीजिए."

दक्षा पटेल के पास हर रोज़ रसिक भाई जैसे कई लोग आते हैं, वे एचआईवी पॉज़िटिव लोगों के लिए भारत का पहला मैरिज ब्यूरो चलाती हैं.

गुजरात के सूरत शहर में एक ग़ैर सरकारी संगठन की मदद से चल रहे इस मैरिज ब्यूरो ने अब तक सात जोड़ियाँ बनाई है.

जोड़ियाँ बनाते समय दक्षा शादी करने के इच्छुक लोगों की आर्थिक स्थिति, उनकी सामाजिक समस्याओं और दवाओं की ज़रूरत आदि का भी आकलन करती हैं ताकि जोड़ी अपनी देखभाल ठीक तरह से कर सके.

दक्षा पटेल को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, मिसाल के तौर पर दो एचआईवी पॉज़िटिव लोगों की जोड़ी बनाना सुनने में आसान लगता है कि लेकिन कुछ लोग अपनी जाति में ही शादी करना चाहते हैं तो किसी को गोरी या लंबी दुल्हन की तलाश होती है.

शुरूआत

दक्षा बताती हैं कि उन्हें इस काम को शुरू करने का विचार तब आया जब वे एचआईवी पीड़ित लोगों के बीच सक्रिय एक ग़ैर सरकारी संगठन के साथ जुड़ीं.

 मुझे अपनी शादी के कुछ ही समय बाद पता चला कि मैं एचआईवी पॉज़िटिव हूँ, मैं अपने पति के साथ अच्छी तरह रह रही हूँ तो ये लोग क्यों नहीं रह सकते
दक्षा पटेल

वे बताती हैं, "मैं ऐसे बहुत सारे नौजवान लोगों से मिली जो शादी करने के इच्छुक थे, इनमें से कई तो बहुत कम उम्र की विधवाएँ थीं, मुझे लगा इनकी शादी इनके जीवन को बेहतर बना सकती है."

दक्षा ख़ुद भी एचआईवी संक्रमित हैं, वे बताती हैं, "मुझे अपनी शादी के कुछ ही समय बाद पता चला कि मैं एचआईवी पॉज़िटिव हूँ, मैं अपने पति के साथ अच्छी तरह रह रही हूँ तो ये लोग क्यों नहीं रह सकते."

सूरत जैसे छोटे से शहर में लगभग ढाई हज़ार लोग हैं जो एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त हैं, ऐसे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है ब्यूरो के पास कितना काम है.

सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि दुल्हों की कोई कमी नहीं है लेकिन दुल्हनें बड़ी मुश्किल से मिलती हैं.

इस समय ब्यूरो में विवाह के लिए 70 लोगों ने अपना नाम दर्ज कराया है जिसमें से सिर्फ़ आठ महिलाएँ हैं.

ब्यूरो चलाने वालों का कहना है कि इसकी वजह एचआईवी से जुड़ा सामाजिक नज़रिया है, महिलाएँ खुलकर स्वीकार नहीं करना चाहती हैं कि वे एचआईवी पॉज़िटिव हैं, दक्षा उन महिलाओं की हिम्मत की दाद देती हैं जिन्होंने अपना नाम दर्ज कराया है.

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