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एचआईवी प्रतिरोधी जीन का पता लगा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
वैज्ञानिकों ने एक ऐसे जीन का पता लगाने का दावा किया है जो मनुष्यों में एचआईवी विषाणुओं के प्रसार को रोक सकने में सक्षम है. ब्रिटिश मेडिकल रिसर्च काउंसिल के विशेषज्ञों ने अपने अध्ययन में पाया कि रेसस प्रजाति के बंदरों में एक विशेष जीन की मौजूदगी के कारण एचआईवी-एड्स का प्रसार नहीं हो पाता है. उनकी खोज विज्ञान जर्नल 'करेंट बायोलॉजी' में प्रकाशित की गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इस जीन का प्रतिरूप मानव शरीर में भी पाया जाता है, लेकिन किन्हीं कारणों से एचआईवी विषाणुओं के ख़िलाफ़ वह कारगर नहीं है. वैज्ञानिकों के अनुसार यदि यह विशेष जीन मानव शरीर में भी बंदरों जैसा ही सक्रिय रहता तो शायद आज मानव सभ्यता को एड्स की विभीषिका का सामना नहीं करना पड़ रहा होता. ताज़ा अनुसंधान से जुड़ी टीम के प्रमुख विशेषज्ञ डॉक्टर जोनाथन स्टोये ने कहा, "यह खोज एड्स के ख़िलाफ़ जीन चिकित्सा के प्रभावी उपयोग के रास्ते खोल सकती है." उन्होंने कहा, "सिद्धांत रूप में यह संभव है कि एचआईवी प्रभावित किसी व्यक्ति की कोशिकाएँ लेकर उन्हें एक संशोधित जीन के माध्यम से एचआईवी प्रतिरोधी बनाया जाए. बाद में इन परिवर्द्धित कोशिकाओं को रोगी के शरीर में डालकर एड्स का प्रसार रोका जा सकता है." डॉ. स्टोये ने कहा कि इस खोज को दूसरे तरीके से भी काम में लाया जा सकता है, जैसे ऐसी दवा का विकास करना जो एचआईवी प्रतिरॉधी जीन को सक्रिय कर सके. हालाँकि विशेषज्ञों के अनुसार विशेष जीन संबंधी इस खोज का व्यवहारिक फ़ायदा आने वाले कुछ वर्षों में मिलना मुमकिन नहीं दीखता क्योंकि अभी इसके लिए कोई आसान और सस्ती तकनीक उपलब्ध नहीं है. |
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